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बकताश और राबे
October 23, 2019 • शेख फरिउद्दीन अत्तार

दूसरे काव्य-खण्ड 'मनतकुत्तैर' से शेख सनआन से ली गई है, यह कथा सूफी रंग में सराबोर है और सूफी काव्य साहित्य में जगह-जगह 'शेख सनआन' का संकेत मिलता है। इस कथा में अत्तार ने लौकिक प्रेम के माध्यम से आध्यात्मिक प्रेम की व्यंजना की है, क्योंकि वे एक सूफी कवि थे इनके लौकिक प्रेमाख्यानों पर मसनवी शैली की छाप है। क्योंकि वास्तविकता यह है कि सूफी काव्य में आत्मा और परमात्मा के एकत्व पर जोर दिया गया है। इसमें ईश्वर के प्रति श्रद्धा को स्त्री तथा साधक को पुरुष के रूप में कल्पित किया है। इसी सूफी विचार धारा में आत्म-परिष्कार के लिए प्रेम को अत्यधिक महत्व दिया है। माया के स्थान पर सूफियों ने शैतान को साधक के मार्ग की बाधा माना है और इसी शैतान से बचने के लिए गुरु की आवश्यकता समझी जाती है। सूफी मत में परमात्मा की प्राप्ति की चार अवस्थाएं हैं - शरीयत, तरीकत, हकीकत, मारफत, इन चारों अवस्थाओं का उल्लेख शेख सनआन में है क्योंकि मारफत में रूह बका प्राप्त करने हेतु ”फना“ हो जाती है। ”फना“ के लिए इश्क़ का होना आवश्यक है। इसी बक़ा में रूह अनलहक की अधिकारिणी बन जाती है। आत्मा का परमात्मा में मिलना या एकाकार हो जाने के सूफी दर्शन को अत्तार ने बड़ी दक्षता परन्तु सरलता से ''शेख सनआन'' में बांधा है।

राबे बल्ख के शासक काब की इकलौती बेटी थी, उसके सौन्दर्य और सुकुमारता का यह हाल था कि जो उसे देखता उसके दिल का चैन जाता रहता। उसकी काली आंखें और उस पर लम्बी-लम्बी पलकें दिल में तीरों की तेज नोकों की तरह चुभन पैदा करती थीं, लाल गुलाब की तरह दहकते होंठ उस पर से मोती जैसे सफेद दांत जिन्हें देखकर लोगों की जान उस पर निछावर हो जाती थी। दूर-दूर तक कोई ऐसी रूपवान सुन्दरी नहीं थी जिसको भगवान ने इतना अनुपम सौन्दर्य और काव्यमय प्रतिभा दी हो। राबे की मिठास में डूबी बातें और रसीले शेर सुनकर लगता था कि जैसे उसने स्वयं अपने होठों के शहद को शेरों में घोल दिया हो।

बल्ख के शासक के मन में अपनी बेटी के लिए असीम अनुराग था, एक पल भी राबे उसकी आंखों से ओझल हो जाती तो वह बेचैन हो उठता। उसका यह स्नेह कभी-कभी चिन्ता के सागर में उसे डुबो देता कि किस प्रकार और कैसे और कहां से वह उचित वर राबे के लिए खोजे?

इस चिन्ता में उसके दिन पूरे हो गये। मृत्यु शय्या पर लेटा वह बेटी के भविष्य के लिए व्याकुल था! अन्त में उसने अपने बेटे हारिस को समीप बुलाया और राबे की सारी ज़िम्मेदारी उसको सौंपते हुए बोला, “कैसे-कैसे शूरवीर राजाओं, महाराजाओं ने इस मूल्यवान मोती को मांगा परन्तु मैंने इसको छुपा कर रखा, क्योंकि इस हीरे को परखने वाला कोई भी जौहरी उनमें न था, यदि तुम कोई लड़का राबे के लिए उचित समझना तो ब्याह देना। मेरी इच्छा केवल इतनी सी है कि राबे सदा खुशियों के झूले में झूलती रहे।

हारिस ने पिता की बातें ध्यान से सुनी। कुछ दिनों बाद बल्ख़ के शासक का स्वर्गवास हो गया। उसने पिता को दिये गये वचनानुसार बहन को फूल की तरह संभाल कर रखा। इस सत्य से अनभिज्ञ हो कि समय एक दूसरी ही चाल चलने वाला है।

हारिस के राज्याभिषेक का जश्न मनाया जा रहा था। इस समारोह का आयोजन ऐसे वैभवपूर्ण बाग़ में किया गया था कि देखने वाले हैरत में पर गये थे, मानो स्वर्ग धरती पर उतर आया हो, एक ओर प्राकृतिक छटा बिखरी थी तो दूसरी ओर ऐश्वर्य और विलासपूर्ण सुविधाएं । मखमली घास का कंपन और

अधखिली कलियों की मुस्कान ने वातावरण में एक अद्भुत रस घोल दिया था। नहर में पिघली चांदी जैसा स्वच्छ व चमकीला पानी बह रहा था जिसको दोनों ओर से फूलों से भरी क्यारियों ने अपने अंक में भर रखा था, शाही रोब का ऐसा दबदबा था कि नहर में लहरें नहीं उठ रही थीं।

एक ऊंचे स्थान पर शाही तख़्त सजा़या गया। नवयुवक बादशाह हारिस तख़्त पर विराजमान था। अपने चमकीले ताज और बहुमूल्य कपड़ों में वह सूरज की तरह चमक रहा था, रंग-बिरंगे कपड़ों में सजे गुलाम दोनों ओर खड़े थे, जरा से इशारे पर जान हाज़िर करने को तैयार थे। हर दास पौरुषता में और सौन्दर्य में अपना जवाब आप था। उनका लम्बा क़द और गौरवपूर्ण ऊपर उठा सर उनके व्यक्तित्व में चार चांद लगा रहा था। उन्हीं गुलामों में एक सजीला नवयुवक था जो तारों में चांद की तरह नज़र आ रहा था। जिसकी दृष्टि उसके तेजस्वी मुख मंडल पर पड़ती मुख से 'वाह' की ध्वनि निकल पड़ती। नवयुवक का नाम बकताश था जो शाही खज़ाने का रक्षक था।

इस राज्याभिषेक में मंत्रीगण व दूसरे शूरवीर सम्मिलित हुए थे। हर व्यक्ति बढ़-चढ़कर आशीर्वाद व मुबारकवाद बादशाह के हज़्ाूर में पेश कर रहा था। सबकी आंखों में खुशी के डोरे तैर रहे थे। राबे ने इस समारोह का वैभव सुना तो व्याकुल हो छत पर आई ताकि अपनी आंखों से समारोह की रौनक भरी गहमागहमी देख सके। वह थोड़ी देर तक इधर-उधर देखती रही। अचानक उसकी दृष्टि बकताश पर पड़ी जो शराब का प्याला लिए बादशाह हारिस के समीप खड़ा था। उसका चेहरा कुन्दन की तरह दमक रहा था। कभी वह जाम पर जाम शराब चढ़ाता, कभी रबाब के तारों को मस्त होकर छेड़ता, कभी बुलबुल की तरह अपनी मीठी आवाज़ से गाना गाता, कभी नाज भरी अदाएं दिखाता।

राबे ने बकताश का मनोरम व्यक्तित्व जो देखा तो जी जान से उस पर मर मिटी। उसके दिल में इश्क़ की आग ऐसी फड़की कि रात की नींद और दिन का चैन ले गई। राबे को लगता, उसका सारा अस्तित्व अनुराग की आग में दहक रहा है। वह एक ख़तरनाक तूफान के दहाने पर खड़ी है। उसकी आंखे बरसाती बादलों की तरह झमाझम बरसती रहती हैं और उसका दिल शमा की तरह पिघलता रहता।

एक वर्ष तक राबे इस जलन में तड़पती रही, आखिर इस अनुराग ने उसे ऐसा भस्म किया कि वह बिस्तर से लग गई। भाई ने बहन की जब यह शोचनीय हालत देखी तो शाही वैद्य को बुलाया ताकि उसका इलाज हो सके। परन्तु रोग तो उस सीमा तक पहुंच गया था जहां पर वैद्य की गोलियां नहीं बल्कि माशूक़ का ध्यान चाहिए था।

राबे की एक दासी थी बड़ी चतुर अनुभवी और राबे के दुःख-दर्द की साथिन। उसने जो राबे का यह हाल देखा तो ऐसी चतुरता से इधर-उधर की लच्छेदार बातों में राबे को उलझाया जिससे राबे के मन से झिझक और संकोच जाता रहा और उसने राज़ खोला और दासी से अपने दिल का हाल कह सुनाया।

''मुझे उस गुलाम के प्यार ने ऐसा अपने में बांध लिया है कि मुझे लगता है मैं जाने कब से प्यार के दुःख को झेल रही हूं। मुझे इस इश्क़ ने उस दर्द का अनुभव कराया है जैसे कि मैं इस टीस को बरसों से जानती हूं।''

फिर राबे ने दासी से कहा- “तू अभी जा और मेरे महबूब से मेरा यह प्रेम सन्देश दे आ! यह ध्यान रहे कि बात बहुत नाज़्ाुक है किसी को हवा तक न लगने पाये।'' यह कहकर राबे उठी और बकताश को पत्र लिखने लगी। ''दोस्त! कैसे कहूं तू कहां है, नज़रों से दूर दिल के करीब है आ! मैं तुझे अपने दिल और आंखों में रख लूं क्योंकि मेरा यह नाज़्ाुक तन विरह में झुलस जायेगा, तेरी सौगन्ध! एक जान क्या अगर मेरे पास हज़ार जान होती तो सबकी सब तेरे कदमों पर निछावर कर देती। तू मेरी आत्मा में इस तरह बस गया है कि एक पल भी दिल तेरी याद से खाली नहीं होता है। जो तुझे देख लूं तो अपने को भाग्यशाली समझूं वरना हाल मेरा यह है कि जहाँ जाती हूँ पीड़ा छाया की तरह मेरे साथ रहती है। मैं अपनी एक अंगुली पर जलती शमा लेकर तुझे हर जंगल हर बियाबान में ढूंढ रही हूं। अगर मुझे तेरा दीदार न मिला तो सच जान, मैं किसी गरीब के दिये की तरह बुझ जाऊंगी।''

राबे ने पत्र लिखकर उस पर अपना चित्र बनाया और अपने प्रीतम के पास भेज दिया। बकताश ने पत्र पढ़ा और चित्र देखा तो राबे की काव्य प्रतिभा पर आश्चर्य चकित रह गया। उसे लगा वर्षों से वह राबे को जानता है। उस पर असीम प्यार निछावर करता है। बकताश ने राबे को ऐसा प्रेम से भीगा पत्र लिखा जो प्रेम पत्र का ही उत्तर हो सकता था।

जब दासी ने आकर राबे को बकताश का आकर्षित हो जाने की चर्चा की तो राबे प्रसन्नता से रो पड़ी। अब राबे दिन रात प्रेम से पगी हुई गजलें कह कर अपने प्रीतम के पास भेजती और हर ग़ज़ल पर बकताश के जज़्बात भड़क उठते थे।

इस तरह से बहुत दिन गुजर गये। एक रोज बकताश ने राबे को कहीं जाते हुए देखा, “वह व्याकुल हो दौड़ा और उसके दामन से लिपट गया। लेकिन राबे उससे लिपटने और मिलन की उत्तेजना को शांत करने के बजाय वह बकताश की इस हरक़त पर क्रोध से उबल पड़ी, भवें तन गईं, वो झिड़कर चिल्लाईं-“ऐ गुस्ताख़ गुलाम! तेरी इतनी हिम्मत की तू अपनी लोमड़ी जैसी ख़सलत को भूलकर शेर जैसी अदाएं दिखा रहा है। तेरी हिम्मत कैसे हुई कि मेरे वस्त्र को हाथ लगाता, जबकि मेरे वस्त्र मेरे शरीर के स्पर्श से झिझकते हैं।''

बकताश ठगा सा रह गया, काटो तो जैसे खून नहीं, आखिर साहस बटोर कर बोला, “मेरी जान! यह क्या है कि छुप-छुपकर मुझे प्यार से भीगे शेर लिखती हो और मेरे जज़्बात को भड़काती हो और जब तुम्हारे मिलने का अवसर मुझे मिला तो मेरी छाया से तुम्हें घृणा महसूस हो रही है और मुझे अपनी आंखों से दूर करना चाह रही हो।''

राबे ने उसी तमतमाहट से उत्तर दिया, “तू उस भेद से अनजान है, तुझे नहीं मालूम कि जो आग मेरे सीने में धधक रही है और मेरे वुजूद को आहिस्ता-आहिस्ता भस्म कर रही है, न तो मेरा प्रेम शरीर है न मैं शह्बत की चाहत रखती हूँ, इस जज़्बे की पाक़ीज़गी को समझो। तेरे लिए यही क्या कम है कि मैं तेरे इश्क़ में डूबी हूँ, तू मेरा राज़दार है। खबरदार! जो फिर मेरे दामन में हाथ लगाया वरना सदा के लिए मुझे खो देगा।''

राबे बकताश की इच्छाओं में आग लगा कर चल दी। वह उसी तरह दर्द में डूबे शेर कहती रही और अपनी सुलगती आत्मा को संतोष पहुँचाती रही।

एक दिन राबे बाग़ में टहल रही थी और एक शेर गुनगुना रही थी, ''ए-सुबह की हवा, जाना, मेरा हाल महबूब से कह कर आना! कहना कि तेरी याद में मेरी आंखों से नींद चुरा ली और तेरे अनुराग ने मेरे ग़रूर को सिजदे पर मजबूर कर दिया है।''

अचानक राबे को लगा उसके भाई ने उसका शेर सुन लिया है, उसने बड़ी चतुरता से प्रेमी की जगह “लाल बेहिशती” में शेर बदल दिया, यह बेहिशती रोज राबे के महल में पानी लाती थी। परन्तु राबे की सारी चतुरता के बाद भी भाई के मन में बहन की तरफ से एक खटक सी बैठ गई।

इस घटना के एक मास बाद राबे के भाई हारिस के देश पर शत्रु ने आक्रमण कर दिया। हारिस युद्ध के लिए लैस होकर युद्ध करने चल पड़ा। युद्ध के नक्कारों से आकाश गूंज उठा। ऐसी घमासान लड़ाई हुई कि धरती क्या आकाश से खून की बारिश होने लगी।

हारिस की फ़ौज वीरता के साथ लड़ रही थी, उन्हीं में बकताश भी था जो दोनों हाथों में तलवार लेकर शत्रुओं का सफाया कर रहा था। अचानक बकताश के सर पर किसी की तलवार आकर लगी, उसका सर बुरी तरह घायल हो गया। लगभग उसे शत्रु क़ैद करने ही वाले थे कि अचानक एक नकाबपोश घुड़सवार शत्रुओं पर झपटा। उसने इतनी जोर से नारा बुलंद किया कि शत्रु के सिपाही डर गये और उस नक़ाबपोश ने मूलीगाजर की तरह शत्रुओं के सर काट डाले। फिर तेजी से बकताश के समीप पहुंचा उसे घोड़े पर बिठाया और हारिस के फ़ौज में ले आया। और रक्षकों के हवाले कर घोड़े को ऐड लगाकर यह जा और वो जा। कोई व्यक्ति समझ न सका, वो सवार कौन था, कहां से आया था, कहां गायब हो गया। दरअसल यह नक़ाबपोश राबे थी। जिसने अपनी जान पर खेल कर बकताश को मौत के चंगुल से बचाया था।

राबे ने जैसे ही रणक्षेत्र को छोड़ा शत्रुओं ने दोबारा धावा बोल दिया। हारिस की फ़ौज थोड़ी देर के लिए बौखला गई। इसी समय बुखारा के शाह की फ़ौज सहायता के लिए पहुँच गई। पासा पलट गया, शत्रुओं को दांतों पसीना आ गया। शत्रु की पराजय हुई और हारिस विजय पताका लहराता हुआ वापस बल्ख लौटा। अब उस नकाबपोश की खोज़ शुरु हुई। परन्तु कोई भी उस नक़ाबपोश का अता-पता न बता सका, जैसे वह कोई देवदूत था जो फरिश्ता बनकर आया और दोबारा आकाश पर जाकर अदृश्य हो गया।

जब रात हुई और चांद ने अपनी दूधिया चांदनी बिखेरी तो राबे बकताश के शरीर के घावों की टीसों से तड़प रही थी, आखिर बेचैन होकर क़लम कागज़ लेकर बैठ गई, “यह कौन सी विपदा पड़ी है मेरे मित्र! तुझ पर, कि मेरी जगह तू खून में डूब गया है आ देख मैं तेरे घावों की पीड़ा सें पीड़ित हूं। मैं रात भर शमा की तरह जलती हूं और दिन भर दुःख में तड़पती हूं। हर पल मैं प्रेम की ज्वाला में सुलगती अपना सुख चैन तज चुकी हूं। मैं अपने होश हवास तेरे इश्क़ में खो चुकी हूं। अपने अन्त से लापरवाह हूं, मेरा हृदय घावों से चूर है और मैं दुःख की कोठरी में बन्द हो गई हूं। मैं तुझे नज़र भर देखने की उम्मीद में ज़िन्दा हूँ, वरना कब की ख़त्म हो चुकी होती।''

बकताश को राबे का पत्र मिला तो उसे लगा उसे घावों पर किसी ने मलहम रख दिया हो, उसकी आंखें बरस पड़ी, उसने राबे को सन्देश भेजा, “मेरी जान! कब तक मैं प्रतीक्षा करता रहूं। क्या अपने मरीज को देखने नहीं आओगी? क्या तुम अपने प्रभाव से राह निकाल पलभर के लिए मेरे समीप नहीं आ सकती हो, मेरे सर पे एक घाव मगर मेरी आत्मा ने हज़ारों घावों के वार सहे हैं। तुम्हारे प्रेम ने मेरी जान ले ली है।'' यह कह कर बकताश मूर्छित हो गया। कुछ समय बाद बकताश के घाव भर गये और वह पूर्ण स्वस्थ हो गया।

राबे एक दिन रास्ते में रूदकी नामक कवि से मिली, आपस में इधर-उधर की बातें हुईं, फिर एक दूसरे को अपने-अपने शेर सुनाए। रूदकी राबे की काव्य प्रतिभा से अचंभित हुआ लेकिन जब उसे यह महसूस हुआ जैसे कि राबे किसी के इश्क़ में है, तो यह समझते देर नहीं लगी कि उसको शायरी में यह दर्द, यह कसक, यह चुभन कहां से आई है। रूदकी बुखारा पहुंचा तो शाह बुखारा के दरबार में हाज़िर हुआ! इत्तिफाक से उसी दिन हारिस को भी बुखारा के बादशाह के दरबार में धन्यवाद के लिए उपस्थित होना था, क्योंकि बुखारा की फौज़ के कारण ही उसे विजय प्राप्त हुई थी। इस अवसर पर एक बहुत बड़ा जश्न मनाया जा रहा था। कवियों और साहित्य प्रेमियों का जमघट था। बुखारा के बादशाह ने रूदकी से शेर सुनाने को कहा। रूदकी खड़ा हुआ और उसने राबे के चन्द शेर सुनाए । शेरों में इतना दर्द था कि सुनने वालों की आहें निकल पड़ीं। शाहनशाह की अजीब हालत हो गई उसने रूदकी से पूछा, “इन शेरों का कहने वाला कौन है? रूदकी शराब के नशे में मस्त था, वह भूल गया कि दरबार में हारिस भी मौजूद है। उसने बिना किसी झिझक के कह दिया, यह शेर “काब की बेटी राबे के हैं जो एक गुलाम के इश्क़ में ऐसी दीवानी हुई है कि खाना-पीना छोड़ बैठी है, दिन-रात शेर कहती है, छुप-छुपकर अपने प्रियतम को पत्र लिखती है, उसके शेरों में जो असाधारण पीड़ा और दर्द की अनुभूति है उसका भेद वास्तव में यही है।

हारिस ने जो यह सुना उसके दिल को धक्का पहुंचा, परन्तु उसने ऐसा दिखावा किया जैसे वह नशे में धुत्त है और रूदकी की बातें नहीं सुन रहा है। जब वह अपने शहर लौटा तो क्रोध के मारे उसका खून खौल रहा था। उसने सोचा राबे ने खानदान की इज्ज़त पर जो बट्टा लगाया है वह सिर्फ उसी के खून से ही धोया जा सकता है। अब हारिस को केवल किसी बहाने की जरूरत भर थी।

बकताश को राबे ने जो अब तक प्रेमपत्र लिखे थे वह एक डिब्बे में उसने सारे के सारे छुपा कर रख रखे थे। बकताश का एक लालची साथी था, वह समझा कि बकताश ने डिब्बे में जवाहरात छिपा रखे हैं। एक दिन उसने चोरी से डिब्बा खोला तो उसमें जवाहरात की जगह प्रेमपत्र मिले। उस लालची आदमी ने सारे पत्र जाकर हारिस को दे दिये, पत्र देखकर हारिस आग बबूला हो गया। क्रोध से उसका शरीर कांपने लगा उसके मन में बवंडर सा उठने लगा कि अब राबे का खून किये बिना अपमान की आग ठण्डी नहीं हो सकती है।

हारिस ने पहले बकताश को गिरफ्तार किया और उसके बाद उसे एक कुएं में क़ैद करवा दिया। फिर उसने बहन के क़त्ल का नक़्शा खींचा, उसने हुक़्म दिया कि एक हमामखाने को खूब गर्म किया जाये और राबे के दोनों हाथों की कलाई की नसों को काट कर उसे गर्म हमामखाने में बन्द कर दिया जाए। जल्लादों ने शाही हुक़्म के मुताबिक़ राबे को गर्म हमामखाने में ले जाकर बन्द कर दिया और उसके दरवाज़़ों को ईंट से चिन दिया। राबे लाख चीखी-चिल्लाई मगर किसी ने नहीं सुना। उसकी यह चित्कार रहम की दरख्वास्त नहीं थी बल्कि उसका सारा शरीर आग की तरह सुलग रहा था। उससे उठती लपटें इश्क़ की थी, मस्ती की थी, जवानी की थी। उसके सुलगते दिल की लपटें थीं, बदनामी व रुसवाई की तपिश थी, उसकी धधकती आत्मा की आंच थी। राबे जलन और पीड़ा की चरम सीमा पर पहुंच गई थी जहां पर सात समुन्द्र का पानी भी उसके अस्तित्व के लपकते शोलों, दहकते अंगारों को बुझाने में असमर्थ था।

राबे के शरीर से धीरे-धीरे खून बह कर चारों तरफ जमा होने लगा लेकिन इश्क़ के मक़तल पर बलि चढ़ने वाली यह कवयित्री अपने खून में उंगलियां डुबो-डुबोकर दीवार पर दर्द भरे शेर लिखती रही। जैसे-जैसे दीवार पर खून की लाली बढ़ती गई, राबे का मुख मलिन पड़ता गया। वहाँ सरसों फूलती गई। जब हमाम की दीवार अक्षरों की चित्रकारी से भर गई तो राबे के शरीर से आखिरी बूंद भी बह निकली। राबे दीवार के हर कोने में अपने इश्क़ की अमिट छाप छोड़ कर अपने खून और आंसुओं का क़फन पहन कर सदा के लिए सो गई। परन्तु उसके खून में डूबे शेर दीवार पर अंकित थे।

तेरे बिना मैं जीवित न रह सकी,

लेकिन मेरी प्रार्थना है कि

मेरे बिना तू हमेशा जीवित रहे।

अगले दिन हमाम का दरवाज़़ा खोला गया तो लाल अक्षरों से सजे हमामखाने में राबे जाफरान के पौधे की तरह धरती पर पड़ी थी। अंतिम स्नान देकर उसे धरती में दफना दिया गया।

बकताश को राबे की दर्दनाक मौत का जब पता चला तो रात के अन्धेरे में वह क़ैद खाने से भाग निकला और सीधा शाही महल पहुंचा। हारिस को खंजर से मौत की नींद सुलाकर राबे की कब्र की ओर गया और वह खंजर जो अभी हारिस के खून से गर्म था अपने दिल में पेवस्त कर लिया। राबे के वियोग का दुःख सहन न कर सकता था सो वहीं कब्र पर उसने अपनी जान दे दी।