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बेज़ुबानों की ज़ुबाँ
August 19, 2020 • रोमा गुप्ता • कविताएँ


रोमा गुप्ता, लुधियाना, मो. 7837891343

ये उगता हुआ सूरज,
ये सुबह का मौसम,
ये भोर में चहकते- गुनगुनाते परिंदे,
ये कोयल की सूरीली आवाज़,
ये ख़ुशी में लहराते पेड़ पौधे,
ये चमचमाती हुई रंगीन तितलियाँ,
मानो हर घड़ी कुछ कहना चाहते हैं ये।

यूँ तो कोई इल्म न था खुलकर जीने का इन्हें
पर इस महामारी ने सिखा दिया खुले आसमान में जीने का जज़्बा इन्हें,
थोड़ा सुकून तो मिला होगा इन्हें,
असली जीने का मज़ा तो आता होगा इन्हें,
जैसे जन्नत का एहसास हो रहा है इन्हें।
हंस कर सह लेते हैं ये कड़कती धूप को,
अरसे से तरसते थे इस आज़ादी को,
हर डाल ने ओढ़ लिया है नयी चादर को
प्रेम की इसी मीठी छाया में रहना चाहते हैं ये,
मानो हर घड़ी कुछ कहना चाहते हैं ये।

अब कहते हैं हमें ऐसे ही जी लेने दो,
घुटन से आज़ादी की ओर जा लेने दो,
साँसों की गागर को तो भर लेने दो,
इन कुदरती नज़ारों का ग़ुरूर तो देखो,
इस नीले आसमान की मुस्कान तो देखो,
आईने जैसी उछलती नदियाँ तो देखो,
समझो तो खामोशियाँ भी बोलती है
मानो हर घड़ी कुछ कहना चाहते हैं ये।

पूछो इन परिंदों , पेड़-पौधों, नज़ारों और फूलों से,
तुम्हारे इस गुरूर की वजह क्या है?
तो पलट कर हमारा ही शुक्रिया करते हुए कहते है,
इसकी अस्ली वजह तो तू ही है ऐ इन्सान,
अब तो रख ले इस पर्यावरण का ध्यान,
मानो हर घड़ी कुछ कहना चाहते हैं ये।

गुम से थे ये इन्सानों की उड़ाई धूल में,
सहमे-सहमे से रहते थे हमारे फैलाए इस प्रधूशन में,
अब हर दम खुश रहते हैं ये अपनी ही मस्ती में,
ऐ बंदेया, छोड़ दे तू भी इस दुनियावी ज़िंदगी को,
सीख ले जीने का असली मज़ा अब तो इन परिंदों से,
और खुश रह हमेशा ईश्वर की हर इक रज़ा में।।