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भारत की पारम्परिक कलाऐं
June 24, 2020 • निर्मला डोसी • लेख


निर्मला डोसी, मुम्बई, मो. 9322496620

लोह काम - बस्तर, छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ राज्य का बस्तर जिला, आदिवासी जनजातियों, अकाल, सूखे, गरीबी के लिये अक्कसर अखबारों की सूर्खियां बना है। कम लोग जानते हैं कि उस गाँव में एक अनूठा शिल्प किया जाता है जिसने बड़े बड़े शहरों के कोरपोरेट हाउसों, होटलों, संग्रहालयों में जगह बना ली है। कलापारखियों की नजरों में चढ़ने का सफर न सरल था, न सीधा क्योंकि उस कला के समानान्तर ‘रोट् आयरन’ का विशाल चमचमाता बाजार शहरों में पसर चुका था। आम ग्राहक को हस्त शिल्प और मशीन के काम में भेद है उसकी समझ आते-आते समय लगना ही था। अन्ततः शाश्वत सच फिर स्थापित हुआ कि सहज सौन्दर्य निगाहों में बसेगा और बसेगा तो याद भी रखा जायेगा। मांग भी बढ़ेगी।

इतिहास बताता है कि पाषाण युग के बाद लोहा युग आया। लोगों ने खदानों से लोहा निकालना शुरु किया और शिकार में काम आने वाले औजार बनाऐं। ये औजार पत्थरों की वनिस्पति हल्के व नूकीलें होते थे। शिकार उस वक्त पेट पालन का मुख्य साधन था। धीरे-धीरे लोहे से कृषि के उपकरण बने। घरेलु उपयोग आने वाली चीजें, बर्तन बने। जीवन में जरा सा स्थायित्व आया तब सजावटी वस्तुवें बनाई जाने लगीं। जैसे जैसे मानव सभ्यता ने विकास किया, सभ्यता व संस्कृति में उस विकास के चिन्ह दिखने गले। हड़प्पा व मोहनजोदड़ों सभ्यताऐं इसकी गवाह है। लोह काम का कलात्मक स्वरूप जो आज देखा जा रहा है व ज्यादा पुराना नहीं है। लगभग साठ-सत्तर वर्षों से होने लगा है।

बस्तरके आदिवासी परिवारों में कुटीर उद्योगों की तरह ‘लोह काम’ किया जाता है। बच्चे बचपन से ही उसे करते हुए देखते बड़े होते हैं और सीखते भी हैं। ‘लौह काम’ बड़ा श्रम साध्य काम है। लोहे को पहाड़ के पत्थरों से निकालना और भट्टी में पकाना होता है। भट्टी लकड़ी के कोयलों की ही होनी जरूरी है। ठण्डा होने पर उसे तोड़ कर दूसरी बार फिर भट्टी में पकाया जाता है, तब रिफाइन लोहा प्राप्त होता है। यह ठोस रूप में होता है। इसे पीट-पीट कर पत्तर बनाऐं जाते हैं। फिर शीट बनती है। यह शत प्रतिशत शुद्ध कच्चा लोहा होता है स्टील नहीं। और इसमें कभी जंग नहीं लगता। इस पर खाने का तेल लगाया जाता है। भारत के पुरातन स्मारकों में हजारों वर्षों से खड़ी मीनारों में यही लोहा प्रयुक्त हुआ होगा। लोह कला की सबसे अद्भुत बात यह है कि न इसमें न कोई सांचा बनाया जाता है न डाई और न ड्राइंग अर्थात् सारा खेल दिमाग, बाजू व हाथ की उंगलियों का है। गर्म भट्टी में लोहे के पत्तरों को तपाना व पीट-पीट कर मनचाही शक्ल देना होता है। जो बचपन से इस काम में लगे होते हैं वे ही कर पाते हैं हर किसी के वश का काम नहीं है।

एकल लोह खण्ड की सजावटी वस्तु को कला की दृष्टि से सुंदर माना जाता है। उसकी कीमत भी ज्यादा होती है। लोह कला के राष्ट्रीय पुरस्कार कलाकार सोनाधर विश्वकर्मा कहते हैं कि ‘‘जो पीस एक बार बन जाता है ठीक वैसा का वैसा हम चाह कर भी दूसरा नहीं बना पाते। मौलिकता इस कला का मूल गुण है।

मुंबई, दिल्ली बंगलुरु में अच्छी मांग है। कारीगर वर्ष भर काम करके चीज़ें एकत्रित करते रहते हैं। प्रदर्शनियों के लिये। सम्मान वजनी होता हैं लाने, ले जाने में बड़ी सावधानी व श्रम की जरूरत होती है। खर्च भी बहुत आता है परन्तु कलाप्रेमी हाथोंहाथ काम को लेते हैं तभी इतना बड़ा जोखिम कारीगर उठाते हैं। लोह-काम वैसे तो राजस्थान और थोड़ा बहुत अन्य जगहों में भी होता है मगर बस्तर के जैसा काम कही नहीं होता। एक ही लोह खण्ड पर बड़ी-बड़ी कलाकृतियां शुरु करने का श्रेय विश्वकर्मा जी को ही जाता है। उनके पिता दीया, दो पैर का घोड़ा इत्यादि चीज़ें बनाते थे। जो लड़की को दहेज में अनिवार्य रूप से देने का चलन था। उसमें नए-नए प्रयोग भी करते रहे। सोनघर ने पहली बार चार पैर का घोड़ा बनाया। 30-35 वर्ष पूर्व मुंबई के वरली स्थित नेहरू सेंटर में प्रदर्शनी हुयी तो उस कलाकृति को बेहद पसंद किया गया तथा मांग भी बढ़ी। तबसे वे अलग-अलग तरह की चीज़ें पलंग, टेबिल, कुर्सी, दरवाजे, शो पीस इत्यादि बनाने लगे। उस वक्त डेवलेपमेन्ट कमीशनर आफ हेन्डीक्राफ्ट (D.C.F.) के मार्फत काम होता था। ट्रांसपोर्ट तथा स्टाल का खर्च सरकार वहन करती थी। परेशानी कम थी। कारीगर पर अपने माल को एहतियात से ले जाने, बेचने और मांग के अनुसार नए-नए प्रयोग करने का ही भार था।

दरअसल बस्तर आदिवासी इलाका है। कहीं भी जाने के लिये रेल की सुविधा रायपुर से है और रायपुर आने के लिये पहले अढ़ाई सौ किलोमीटर बस का सफर करना पड़ता है। जाहिर है इसमें समय व पैसा अधिक खर्च होता है। भारी व बड़ा माल लाना हो तो भी चालीस पचास हजार ट्रक का खर्च करना उनके बूते के बाहर होता है।

कच्चा माल रायपुर लेने जाना पड़ता है। खाने का तेल तथा बोर्डो को रंगने वाला काला रंग प्रयुक्त होता है। पूरा काम हाथ का है। शहरों में मांग बढ़ रही है यह शुभ संकेत हैं परन्तु समय व पैसे की बचत होगी तभी मांग पूरी कर पायेगा कारीगर क्योंकि कच्चा माल खरीदने में पैसा चाहिये होता है। गरीब कारीगर कई तरह की परेशानियों से जूझते हैं। चुंकि यह काम पूरी एकाग्रता की मांग करता है वह सुलभ होनी जरूरी है तभी काम के स्तर का और विकास संभव है।

‘लोह काम’ करते कारीगर को देखना और उसके काम की प्रक्रिया को सुनना एक अनूठा अनुभव होता है। तब लगता है सरल व साधारण दिखने वाला मगर अपनी उपस्थिती से समूचे परिवेश में कलात्मकता भर देने वाला यह काम किसी इंजिनियर के काम जैसा ही है। सबसे अहम बात यह है कि भट्टी का काम सिर्फ रात को ही किया जाता है। रात जो दिन भर की मशक्कत के बाद आराम करने के लिये होती है। उस वक्त ‘लोह काम’ के ये कारीगर तपती भट्टियों में लोहा पिघला रहे होते हैं। ऐसी ऐसी मोहक आकृतियां गढ़ रहे होते हैं जो कल्पनाशीलता व रचनात्मकता का बेहतरीन नमूना होती हैं। भारी गर्मी में भट्टी का काम रात में ही करने का कारण है रातें जरा ठण्डी होती हैं।

सोनाधर विश्वकर्मा बताते हैं कि ‘जब छत्तीसगढ़ बना तो लोहा काम का विशाल दरवाजा बनवा कर छत्तीसगढ़ में शहर के मुख्य मार्ग पर लगवाया। पचास निष्णात कारीगरों ने रात दिन लग कर इसे बनाया। यह दरवाजा इतना बड़ा बनाया गया था जिसमें से होकर ऊपर तक भरा ट्रक भी जा सके। आज भी वहाँ के संग्राहलय में इसे देखा जा सकता है। रायपुर में 350 एकड़ में मुक्तांगन बनाया जा रहा है उसमें इस कला का बहुत काम करवाया गया है।

शहरों में इन कारीगरों को बड़े-बड़े होटलों कोपपोरेट हाउसों इत्यादि से पेशकस होती है कि वे उनके खर्च पर होटलों में रहे, आये, खाये पिये और वहीं रह कर काम करें। मगर यही संभव नहीं होता। कोई इस प्रलोभन में नहीं फंसता क्योंकि कलाकार पंछी की तरह मुक्त रह कर ही काम कर सकता है। उसे डोर से बांध कर उड़ने की छूट दी जाये तो भी बात नहीं बनती। वह कोई बंधुवा मजदूर नहीं होता, जिसे समय व स्थान की सीमा में बांधा जा सके। दबाव में कला नहीं उतरती हाथों में। कला का जन्म उसके स्वतः स्फुर्त होने में है। अपने गांवों के जाने-पहचाने परिवेश में ही काम कर पाते हैं।

कलाकार के काम पर समय के हस्ताक्षर कितने पैने होते हैं इसका उदाहरण सोनाधर विश्वकर्मा के कलाकृतियों के फोटो एलबम को देख कर मिला। अति संवेदनशील विश्वकर्मा ने। तब विश्वास करना पड़ा कि कलाऐं अपने समय का सशक्त दस्तावेज होती है और कलाकार होता है सच्चा इतिहासकार। उसके लिये शिक्षित होना कतई जरूरत नहीं है। अहसासों की मनोभूमि उर्वर होनी चाहिये बस। और तब अपने औजारों से वे जो रचते हैं वह वस्तु न केवल संरक्षणीय होती है बल्कि अपने समय की सच्चाई का लपलपाता सबूत भी होती है। उनकी वह कृति आज भी वहां के संग्रहालय में पड़ी उस काली घटना का सांगोपांग बयान कर रही है।

दसवीं तक पढ़े विश्वकर्मा अनजाने बहुत बड़ी सच्चाई बयान कर जाते हैं कि यह धूल-मिट्टी आग का मुश्किल काम है पर हमारे बच्चों को यही करना पड़ेगा क्योंकि उन्होंनपे यही सीखा है। नौकरी मिलना आसान कहाँ है? थोड़ी बहुत खेती भी करते हैं वहां के लोग।

अधिक श्रम का कार्य पुरुष करते हैं बाकी का काम औरतें तथा बच्चे निपटाते हैं। जो लोग काम सीखने आते हैं उन्हें भी परख पड़ताल का काम सिखाया जाता है क्योंकि अधूरा ज्ञान मारक हो सकता है।

लोह काम की सजावटी कृतियां पौराणिक कहानियों की थीम पर बनाई जाती है। ‘जाली फ्रेम’ में पूरी एक कथा गढ़ी जाती है। अक्सर धार्मिक चरित्र, कृषि, पूजा विधान इत्यादि विषय लेते हैं तो कभी-कभी सामायिक घटना उतर आती है कलाकर्म में।

उनकी भट्टी से उठने वाला धुँआ पर्यावरण को जरूर नुकसान तो पहुँचाता ही है परन्तु, दूसरा कोई उपाय भी नहीं है। कोशिशों की भी..... मगर सफलता मिली नहीं। क्योंकि ‘लोह काम’ ऐसा शिल्प है जिसके लिये विशेष प्रकार के लकड़ी के कोयले की भट्टी ही जरूरी है। डिजाईन सेंटर में मेटल को पिघलाने का काम मशीनों से होता जरूर है परन्तु ‘लोह काम’ में जल्दी सुगलने वाला लकड़ी का कोयला ही चाहिये जो ठण्डा भी जल्दी हो जाता है। कोयला भी विशेषतः ‘साल लकड़ी’ का काम में लाया जाता है। जोड़ लगाने के लिये भी वेल्डिंग मशीनें नहीं काम ली जाती है। सीधे भट्टी में तपा कर ही जोड़ लगाए जाते हैं। सभी कारीगरों का काम एक सा नहीं होता। काम देख कर ही दाम दिये जाते हैं। हालांकि इस शिल्प में कच्चा माल ज़्यादा नहीं लगता। कड़ी मेहनत ही ज़्यादा लगती है। यह वैसी कला नहीं कि कारीगर वातानुकूलित कमरों में बैठ कर ड्राइंग या पेन्टिंग बना लें। दहकती भट्टियों में लोहे को पिघलाना, पीटना पड़ता है। अखाड़े में उतरने जैसा ही है जहां शारीरिक शक्ति भी चाहिये और कलाकार की रचनात्मकता भी। दिमाग में एक अक्श उभरता है। हाथ की अंगुलिया उसका कहा मानती है। और इसमें पहले शरीर की पूरी ताकत बाजुओं के जरिये हथोड़े से लोहे के पत्तर बनाती है औजार उसके वाहक बनते हैं। तमाम मशक्कत के बाद जो रचना तैयार होती है और गुणाग्राही लोगों की ‘वाह’ सुनते ही कारीगर को अपनी मेहनत सार्थक लगती है। कुछ और नया गढ़ने की प्रेरणा मिलती है। ‘लोह शिल्प’ बल व बुद्धि दोनों के मेल से तैयार होने वाला बेहतरीन काम है जिसके कद्रदानों की संस्था कम भले ही हो मगर है यह बात आश्वस्त करती है कि कलाएँ मानव सभ्यता को सु-संस्कारित करती हैं वे समय का दर्पण होती है। जीवन के बीहड़ पथों पर चलने से आयी क्लातिं को हर कर जरा सा सकून देती हैं उन कलाओं का रूप अलग-अलग हो सकता है किंतु सभी का असर तकरीबन एक सा होता है। साहित्य, संगीत, शिल्प कलाएं, नाट्य कला, वस्तु कला चित्रकला, अर्थात् एक विशाल कैनवास है। कला क्षेत्र का, और सुखद पहलु यह है कि हमारे देश की पाराम्परिक कलाएं इतनी समृद्ध है कि वक्त के झंझावतों की मार खा कर भी जीवित ही नहीं रही बल्कि फली फूलीं भी। भारतीय कलाओं कि विविधता का आलम तो यह कि प्रत्येक राज्य के छोटे छोटे गाँवों में किया जाने वाला कलाकर्म इतना खूबसूरत कि उसी के कारण उस स्थान की पहचान होती है।