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भारत की वीरागना : बूंदी की ललना : हांडी रानी
October 6, 2020 • प्रभा कश्यप डोगरा • कविताएँ

प्रभा कश्यप डोगरा, पंचकूला, मो. 9872577538

 

फ़ौज उमड़ती औरंगज़ेब की-

थी चल पड़ी, मेवाड़ ओर!

था युद्ध छिड़ा घनघोर; -

राणा राज सिंह तब,-

घेर लिया था लश्कर को!!!!

चारों ओर से घिरे मुग़ल ने,-

भेजा हरकारा दिल्ली को;-

तब राव रतन सिंह, चूडावत को भी,-

आया संदेशा राणा का,-

जितनी जल्दी हो, सेना लेकर,-

पहुँचो मातृ-भूमि की रक्षा को !!

 

राव रतन सिंह चूडावत को जब,-

देखा केसरिया धारण किए;-

समझ गई नवेली दुल्हन तब,-

चले वीर रण-भूमि   ओर !!!

अपने मन का संधान किया, -

तिलक लगा, आरती करके ;-

था कहा नवेली दुल्हन से राव ने;-

                 

"आऊँगा रण-खेत पाट के,-

सजी सेना, सजे सेनाणी-!"

रण-भेरी का निनाद हुआ ,-

घोड़ों की टापों से था तब,-

सारा अम्बर लाल हुआ !!!

 

कुछ दूर पहुँच कर ही,-

चंन्द्रमुखी रानी का चेहरा ,-

चूडावत को याद हुआ !!

कहीं भूल न जाए, प्रियसी,-

रतन सिंह चूडावत के मन में ,-

फिर यह विचार उठा !!

                                                                       

भेजा दूत पत्रिका देकर,-

जिसमें था यह लिखा हुआ !

चंन्द्रमुखी मुखड़ा तुम्हारा-

"रह रह आता याद मुझे,-

भेज देना तुम निज मुद्रिका,-

रण-खेत पाटना है मुझे !!"

 

रानी ने जब पढ़ी पत्रिका,-

बोली- "हूँ दूँगी संदेसा, दे देना,-

चूडावत को! कह देना मातृ भूमि,-

रक्षा में रण-खेत पाटना है तुमको!!"

शीश दियो काट निज क्षत्राणी,-

थाल सजा ले चला सैनानी,-

चूडावत को सौंप दियो !!

 

देखा मस्तक जब, कर विलाप तब,-

जूझा रण में जब, हो गया निछावर,-

दे दी विजय-श्री, मातृ-भूमि, मेवाड़ देश को!!!