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भारतीय संविधान और डॉ. भीमराव अम्बेडकर
June 7, 2020 • निशा नंदिनी भारतीय • लेख


निशा नंदिनी भारतीय तिनसुकिया, असम
Mob. 9435533394

डॉ.भीमराव अम्बेडकर समाज सुधारक, राजनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री, वकील,लेखक, चिंतक,दार्शनिक, सांसद, मंत्री व संविधान निर्माता ऐसे बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। उनके इसी बहुआयामी व्यक्तित्व के कारण न केवल भारत में बल्कि विश्व में भारत की यशश्री को आलोकित किया। अम्बेडकर एक अमर ज्योति है। जो अंधकारग्रस्त सामाजिक मानवता के लिए अविच्छिन्न आलोक स्रोत बन गई। डॉ. अम्बेडकर भारत के भव्य भाल पर एक सुरम्य तिलक हैं। वे लोगों के सामाजिक जीवन की कल्पना करते हैं। कुछ चिंतन, कुछ मनन करते हैं। कुछ नए मूल्यों, नए आदर्शों एवं कई आस्थाओं का सृजन करते हैं। नई व्यवस्था देने वाले तथा मार्ग निर्देशन करने वाले ऐसे लोग तटस्थ रहते हैं। मार्क्स ने उपाय बताए, लेनिन ने उन्हें मूर्तरूप दिया, किंतु अम्बेडकर ऐसे महापुरुष हुए जिन्होंने उपाय ही नहीं बताए बल्कि निष्ठा से उन पर आचरण करने के लिए भी जुट गए थे। उन्होंने जो चिंतन-मनन किया वही कहा और जो कहा वही किया। उनमें बात करने एवं आचरण करने का साहस था, सच्चाई थी। उनकी सत्यनिष्ठा एवं दृढ़ता ने उन्हें असाधारण बना दिया। डॉ. अम्बेडकर कोरे आदर्शवादी स्वप्नदृष्टा नहीं थे। उनका आदर्श आचरण ही समाज के लिए एक शिक्षा है। उन्होंने मानव जीवन को अविभाज्य मानकर उनकी समग्रता पर बल दिया तथा जीवन का कोई पक्ष अछूता नहीं छोड़ा। वे समाज के संपूर्ण पक्षों की ओर जागरूक थे।वे स्वतंत्र भारत के प्रथम कानून मंत्री और भारतीय संविधान के प्रमुख वास्तुकार थे। उन्होंने दलित बौद्ध आंदोलन को प्रेरित किया और दलितों के खिलाफ सामाजिक भेदभाव के विरुद्ध अभियान चलाया। श्रमिकों और महिलाओं के अधिकारों का समर्थन किया।बाबा साहब भीमराव अंबेडकर इतिहास के पन्नों में दर्ज वो नाम हैं।जिन्होंने देश के कमजोर तबके की बात को पुरजोर तरीके से रखा।अपने पूरे जीवन के दौरान, उन्होंने दलितों और पिछड़ों की लड़ाई लड़ी। उन्हें भारतीय संविधान के पिता के रूप में भी जाना जाता है। 1990 में उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। देश के लिए बाबा साहब के योगदानों को इसी से समझा जा सकता है कि, आज के दौर में भी सभी राजनीतिक दल उनके सिद्धांतों की बातें करते नज़र आ जाते हैं।

बाबा साहेब ने बचपन से ही  भेदभाव के दंश को झेला है।बाबा साहब जब सरकारी स्कूल में भर्ती हुए तो उन्हें सभी लड़कों से दूर रखा जाता था। अध्यापक भी उनकी अभ्यास-पुस्तिका तक नहीं छूते थे। वे संस्कृत पढ़ना चाहते थे, किन्तु संस्कृत के अध्यापक ने उन्हें पढ़ाना स्वीकार नहीं किया। विवश होकर उन्हें फारसी की शिक्षा हासिल करना पड़ी। कहा जाता है कि विद्यालय में उन्हें दिन भर प्यासा रहना पड़ता था क्योंकि उन्हें पानी के बर्तनों को हाथ लगाने की अनुमति नहीं थी। जाहिर तौर पर भारत में जातिगत भेदभाव को वह बचपन में ही महसूस कर चुके थे।
देश के संविधान को आकार देने वाले अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 में हुआ था। बाबा साहेब को भारतीय संविधान का आधारस्तंभ माना जाता है।उन्होंने हिंदू धर्म में व्याप्त छूआछूत, दलितों, महिलाओं और मजदूरों से भेदभाव जैसी कुरीति के खिलाफ आवाज बुलंद की और इस लड़ाई को धार दी। वे महार जाति से ताल्लुक रखते थे। जिसे हिंदू धर्म में अछूत माना जाता था। उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने की वजह से उन्हें कई मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा था।

बाबा साहब ने भेदभाव के खिलाफ समाचार पत्रों को अपना हथियार बनाया।इंग्लैंड से उच्च शिक्षा लेकर लौटने के बाद जब बाबा साहब भारत लौटे तो समाज में छुआछूत और जातिवाद चरम पर था। इससे प्रभावित होकर उन्होंने इसके खिलाफ अपनी आवाज तेज कर दी। उन्होंने लोगों को इसके प्रति जागरुक करना शुरु किया और इसी कड़ी में 1920 में, बंबई से साप्ताहिक मूकनायक के प्रकाशन की शुरुआत की। साथ ही ‘बहिष्कृत भारत’, ‘मूक नायक’, ‘जनता’ नाम के पाक्षिक और साप्ताहिक पत्र निकालने शुरू किये थे।बाबा साहब’ ने समाज में व्याप्त असमानताओं जैसे, दलितों के मंदिर प्रवेश, छुआछूत, जात-पात आदि कुरीतियों को मिटाने के लिए कई आंदोलन छेड़े। इन आंदोलनों में मनुस्मृति दहन, महाड सत्याग्रह, नासिक सत्याग्रह, येवला की गर्जना कुछ महत्वपूर्ण नाम हैं। उन्होंने कमजोर वर्गों के छात्रों की शिक्षा के लिए छात्रावासों, रात्रि स्कूलों आदि का इंतजाम किया।भारत में रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया की स्थापना में डॉ. अम्बेडकर का महत्वपूर्ण योगदान रहा। चूंकि वह एक कुशल अर्थशात्री थे, इसलिए वह आर.बी.आई की स्थापना में मील का पत्थर साबित हुए। उन्होंने भारत के विकास हेतु मजबूत तकनीकी संगठन का ढांचा प्रस्तुत किया। उन्होंने जल प्रबंधन जैसेसंसाधनों को देश की सेवा में सार्थक रुप से उपयोग करने का रास्ता दिखाया।बाबा साहब ने राष्ट्र को मजबूती देने के लिए समता, समानता, बन्धुता एवं मानवता आधारित एक दस्तावेज तैयार किया। इसको संविधान का नाम दिया गया। इसको बनने में 2 वर्ष 11 महीने और 17 दिन का समय लगा। ‘बाबा साहब’ ने 26 नवंबर 1949 को इसको पूर्ण कर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को सौंप दिया था। यही संविधान आज हमारी भारतीय संस्कृति का गौरव है। तो लोकतंत्र का आधार भी है।डॉ.भीमराव अम्बेडकर को दलितों का मसीहा कहा जाता है।आर्थिक मुश्किलों के साथ ही उन्हें हिंदू धर्म की कुरीतियों का सामना भी करना पड़ा और उन्होंने इन कुरीतियों को दूर करने के लिए हमेशा प्रयास किए। उसके बाद अक्टूबर, 1956 में उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया। जिसके कारण उनके साथ लाखों दलितों ने भी बौद्ध धर्म को अपना लिया। उनका मानना था कि मानव प्रजाति का लक्ष्य अपनी सोच में सतत सुधार लाना है।

डॉ.अंबेडकर की पहली शादी नौ साल की उम्र में रमाबाई से हुई। रमाबाई की मृत्यु के बाद उन्होंने ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखने वाली सविता से विवाह कर लिया। सविता ने भी इनके साथ ही बौद्ध धर्म अपना लिया था। अंबेडकर की दूसरी पत्नी सविता का निधन वर्ष 2003 में हुआ।बी.आर अंबेडकर को आजादी के बाद संविधान निर्माण के लिए 29 अगस्त, 1947 को संविधान की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया। फिर उनकी अध्यक्षता में दो वर्ष,11 माह,18 दिन के बाद संविधान बनकर तैयार हुआ। कहा जाता है कि वे नौ भाषाओं के जानकार थे। डॉ.अंबेडकर जी को देश-विदेश के कई विश्वविद्यालयों से पीएचडी की कई मानद उपाधियां मिली थीं। इनके पास कुल 32 डिग्रियां थीं। साल 1990 में उन्हें "भारत रत्न" भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से मरणोपरांत सम्मानित किया गया था।

अंबेडकर जी ने लाखों दलितों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया था।उनका कहना था कि मैं "हिंदू पैदा तो हुआ हूं, लेकिन हिंदू मरूंगा नहीं"।अंबेडकर जी जिस ताकत के साथ दलितों को उनका हक दिलाने के लिए उन्हें एकजुट करने और राजनीतिक-सामाजिक रूप से उन्हें सशक्त बनाने में जुटे थे। उतनी ही ताकत के साथ उनके विरोधी भी उन्हें रोकने के लिए जोर लगा रहे थे।लंबे संघर्ष के बाद जब अंबेडकर जी को भरोसा हो गया कि वे हिंदू धर्म से जातिप्रथा और छुआ-छूत की कुरीतियां दूर नहीं कर पा रहे हैं,तो उन्होंने वो ऐतिहासिक वक्तव्य दिया।जिसमें उन्होंने कहा कि मैं हिंदू पैदा तो हुआ हूं, लेकिन हिंदू मरूंगा नहीं।आजादी के बाद पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल में डॉक्टर अंबेडकर कानून मंत्री बने और नेहरू की पहल पर उन्होंने हिंदू कोड बिल तैयार किया, लेकिन इस बिल को लेकर भी उन्हें जबर्दस्त विरोध झेलना पड़ा।खुद नेहरू भी तब अपनी पार्टी के अंदर और बाहर इस मुद्दे पर बढ़ते दबाव के सामने झुकते नजर आए।

इस मुद्दे पर मतभेद इसकदर बढ़े कि अंबेडकर ने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि बाद में हिंदू कोड बिल पास हुआ और उससे हिंदू महिलाओं की स्थिति में क्रांतिकारी बदलाव भी आया, लेकिन अंबेडकर के बिल से ये कई मामलों में लचीला था।डॉ. अम्बेडकर न्याय के प्रहरी थे। वे दलित मानव कल्याण के मूलभूत सिद्धांत को अपनाकर, उनमें जागृति पैदा करके समाज के प्रतिनिधि बन गए। सच तो यह है कि पद, सत्ता, यश आदि से उन्हें आसक्ति नहीं थी। वे समाज कल्याण हेतु कार्य करना अपना कर्तव्य समझते थे। मनुष्य में महान कार्यों के संपादन के लिए आत्मविजय तथा आत्मविश्वास परम आवश्यक है। बाबासाहेब अम्बेडकर ने संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर जीना सिखाया। जीवन तो सभी जीते हैं किंतु वास्तव में वह सर्वाधिक जीवंत है, जो सर्वाधिक चिंतन करता है, सर्वाधिक अनुभव करता है और सर्वोत्कृष्ट कार्य करता है।  मानव जीवन का मूल्यांकन आयु की दीर्घता, स्वास्थ्य अथवा केवल धन-संचय अथवा सत्ता के आधार पर नहीं होता बल्कि उन गुणों अथवा कर्मों के आधार पर होता है जिनसे व्यक्ति ने सामाजिक उत्थान एवं प्रगति में योगदान किया है।इतिहास मानव संघर्ष की कहानी है। बिना संघर्ष के क्या जीवन? जय-पराजय, मान-अपमान से ऊपर उठकर सत्य और न्याय के लिए संघर्ष करने वाला व्यक्ति ही जीवन में कुछ महान उपलब्धि प्राप्त कर सकता है। बाबासाहेब ने इस देश पर कई उपकार किए हैं। उक्त तथ्यों के आधार पर बाबासाहेब अम्बेडकर को बहुआयामी व्यक्तित्व का धनी कहने पर अतिशयोक्ति नहीं होगी। डॉ.अम्बेडकर ने इस दिशा में एक ज्वलंत उदाहरण प्रस्तुत किया है जिससे समस्त भारतवासी उनके ऋणी हैं।बाबा साहेब आज भले ही हमारे बीच में उपस्थित नहीं हैं, लेकिन उन्होंने एक सफल जीवन जीने का जो मंत्र दिया। उस पर चलकर हम एक नये भारत की ओर बढ़ सकते हैं। वे हम सब के लिये प्रेरणास्रोत के रूप में युगों-युग तक उपस्थित रहेंगे। उनके विचार, उनकी जीवनशैली और उनका काम करने का तरीका हमेशा हमें उत्साहित करता रहेगा। साथ ही उनकी विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी भी हमारे ही कन्धों पर रहेगी। जिससे देश भर में समानता, शिक्षा का प्रसार और महिलाओं को अधिकार मिलने का उनका लक्ष्य पूरा हो सके।