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भविष्य का भारत छिपा है 'हिंदी के श्रेष्ठ बाल नाटक' में
October 25, 2020 • योगेश सुदर्शन मिश्र • साहित्य नंदनी


समीक्षक - योगेश सुदर्शन मिश्र, पुस्तक - हिंदी के श्रेष्ठ बाल नाटक
प्रकाशक - आर. के. पब्लिकेशन, मुंबई,
मूल्य - Rs. 400

हिंदी के श्रेष्ठ बाल नाटक, आर.के. प्रकाशन मुंबई से प्रकाशित कुछ अनोखे नाटकों की ऐसी पुस्तक है जिसे शिक्षा से जुड़े सभी शिक्षकों को एक बार अवश्य पढ़ना चाहिए, न केवल पढ़ना चाहिए बल्कि अपने विद्यार्थियों के सहयोग से विद्यालय के वार्षिक समारोह में इसका मंचन भी अवश्य कराना चाहिए। हम यह अनुरोध या आग्रह इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इस पुस्तक में साहित्यिक, सामाजिक एवं पौराणिक विषयों के साथ-साथ समसामयिक विषयों को गंभीरता से और किसी-किसी को प्रहसन शैली के नाटक में हास्य द्वारा प्रकाशित किया गया है।

इस किताब में कुल 16 नाटक संकलित हैं जिनमें से पांच नाटक-राजा रवि वर्मा (एक युगांत कारी चित्रकार), कालिदास काव्यामृतम्, कर्ण की मानवता, वेद  और स्वतंत्रता की बलिदान  गाथा प्रमुख हैं। ये पांच नाटक साहित्यिक, ऐतिहासिक और पौराणिक विषयों को लेकर छात्रों की चेतना को विकसित होने में सृजनात्मक योगदान देते हैं। इस पुस्तक का पहला नाटक भारत के सुप्रसिद्ध चित्रकार 'राजा रवि वर्मा' पर केंद्रित है। वर्मा जी के  जीवन का कालखंड स्वतंत्रता पूर्व  भारत वर्ष में रहा। नाटक के नौवें दृश्य में राजा रवि वर्मा का संवाद आया है कि "परमेश्वर किसी एक व्यक्ति और जाति का नहीं होता। जिन्हें जाति प्रथा के कारण मंदिरों में जाने नहीं दिया जाता, उन्हें मेरे चित्रों के कारण यह लाभ (दर्शन का लाभ) मिला होगा। इस बात का मुझे संतोष है। "(हिंदी के श्रेष्ठ बाल नाटक, राजा रवि वर्मा युगांतरकारी चित्रकार, पृ.क्र. 36) इस प्रसंग में एक बात उल्लेखनीय है, और वह है जाति प्रथा के कारण अपने इष्ट के दर्शन से दूर हुए कुछ निर्बल निर्धन हिंदू वर्ग, जिसे बाद में दलित घोषित किया गया और शूद्र समझा गया। वास्तव में यह फूट डालो और राज्य करो की नीति का एक षड्यंत्र ही था। भारतीय समाज कभी अपने चार अंगों में विभाजित नहीं था, पृथक नहीं था बल्कि वह अपने चारों वर्णों सहित एक दूसरे का पूरक था। एक दूसरे में युक्त था। जाति प्रथा की सच्चाई दूसरी है। इसका बीजारोपण जानबूझकर किया गया। वह समय कंपनी सरकार का समय था जो सोने की चिड़िया के पंखों को दोनों हाथों से नोच  रहे थे। उन्होंने भारत के मंदिरों पर विशेष तरह का कर लगाया था,  ` 10 से लेकर 2 टके तक। जो श्रद्धालु `10 देकर मंदिर में दर्शन करने आते वे विशिष्ट श्रद्धालु होते थे। जो `10 से कम दान करते वे सामान्य श्रद्धालु होते थे। सर्वसामान्य श्रद्धालु को कम से कम 2 टका तो देना ही होता था। किंतु बहुत से ऐसे भी श्रद्धालु थे जिनकी दरिद्रता तब तक ऐसी हो चुकी थी कि उन्हें चढ़ावा चढ़ाने के लिए उनके पास 2 टका भी नहीं होता था। ऐसे ही श्रद्धालुओं को मंदिर में दर्शन पाने से वर्जित किया जाता था। यही वे श्रद्धालु थे जिनका मंदिर में प्रवेश वर्जित था। मंदिर के पुजारी शासक के कानून से बंधे थे, और मंदिर के बाहर देखते ही देखते वर्ग विखंडन का बीजारोपण हो गया। ऐसे में राजा रवि वर्मा के द्वारा बनाए गए पौराणिक चित्रों के चरित्रों ने भारतीय संस्कृति को बहुत अधिक टूटने से बचा लिया। कहीं ना कहीं दर्शन न मिल पाने की टीस को इन चित्रों ने सहलाया। यह एक तरह की सांस्कृतिक लड़ाई ही थी जिसके विजेता राजा रवि वर्मा को मैं अवश्य मानता हूं। उन्होंने भारतीय समाज को बहुत अधिक क्षति से उबार लिया। जिसका प्रतिफल यह हुआ कि उनके ऊपर भी लीलता और अश्लीलता को लेकर हाईकोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया गया था, और इसके माध्यम से भी पंडितों पर निशाना साधा गया।

नाटक के इसी दृश्य में जब राजा रवि वर्मा मुकदमा जीत जाते हैं तो अपने प्रतिपक्षी वकील के कंधे पर हाथ रख कर कहते हैं, "मैं एक चित्रकार हूं। इससे पहले मैंने सीता की अग्निपरीक्षा और उनके भूमि में जाने के दो चित्र बनाए थे लेकिन उस समय मैंने उसका अर्थ नहीं समझा था। इस मुकदमे के कारण मेरी कला की भी अग्नि परीक्षा हुई। बिल्कुल बेदाग। इस सब का श्रेय आपको ही है ना?" ( हिंदी के श्रेष्ठ बाल नाटक, राजा रवि वर्मा युगांतरकारी चित्रकार, पृ क्र 38) यह एक ऐसा संवाद है जो चित्रकार के अंदर चेतना मे उठने वाले द्वंद्व को उजागर करता है।

इस पुस्तक में डॉ. जितेंद्र पांडेय द्वारा रचित जो दूसरा बेहद उल्लेखनीय नाटक है, वह है 'कालिदास काव्यामृतम्'।  इस नाटक के संदर्भ में मैं केवल इतना ही कहना चाहूंगा कि लेखक ने नाट्य विधा के कौशल से कालिदास की कृतियों की  अद्वितीय आलोचना की है। आलोचना एक मौलिक विधा है किंतु वह नाटकीय रसों से युक्त भी हो सकती है, इस संभावना की तलाश जीतेन्द्र जी की अन्वेषी लेखनी ही कर सकी है। इस नाटक में कालिदास का यक्ष  बादल से संवाद करते हुए कहता  है, "कौन कहता है कि तुम केवल धुआं, पानी और हवा के भंडार हो? कौन कहता है कि तुम्हारे अंदर चेतनता नहीं है।" (हिंदी के श्रेष्ठ बाल नाटक, कालिदास काव्यामृतम्, पृ क्र 57) । यहां पर लेखक की मनसा बिल्कुल साफ है। यहां लेखक अपनी अगली पीढ़ी को सीधे-सीधे सचेत कर देना चाहता है कि हमारे पूर्वजों में प्रकृति के साथ कितनी सघन एकरूपता थी कि हम हवा, पानी प्रकाश में भी चेतना के अस्तित्व को स्वीकारते हुए जीवन जीते थे। एक रूप जीवन-एकात्म जीवन। इनका एक और नाटक अत्यंत उल्लेखनीय है जिसका नाम है स्वतंत्रता की बलिदान गाथा। इस नाटक में लेखक ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में 'मंगल से लेकर मोहनदास करमचंद गांधी तक' के समस्त बलिदानों को उनके बलिदानी चरित्रों को न केवल याद किया है बल्कि अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का रोचक मार्ग भी खोज निकाला है।

इसके बाद इस पुस्तक में लेखक अस्लम मुलानी द्वारा लिखे गए पाँच प्रहसन नाटक भी बड़े मनोरंजक बन पड़े हैं। यमराज का दरबार दो भागों में दो श्रेष्ठ नाटक हैं, जो लिंगभेद, यौन शोषण,  स्वच्छंद जीवनशैली, बाल श्रम इत्यादि मुद्दों पर बड़ा मार्मिक प्रहार करते हैं। इनके नाटक के घेरे में वीरप्पन, सलमान और मेधा पाटकर जैसे जीवित व्यक्तित्व के माध्यम से हंसते-हंसाते जीवन  उपयोगी संदेश दिया गया है। लेखक अस्लम मुलानी जी अपने नाटक कलयुग का अमृत, के माध्यम से देश में मदिरा के दुष्प्रभावों से सचेत करते हैं।

इस पुस्तक में डॉ. पूजा अलापुरिया ने बाल जगत की चेतना को स्वच्छता और पर्यावरण के लिए सजग किया है, उनकी चेष्टा न केवल बाहरी स्वच्छता बल्कि आंतरिक स्वच्छता के प्रति भी आग्रहित है। इसी क्रम में उन्होंने एक नाटक लिखा है जिसका शीर्षक है 'अंधविश्वास' । इस नाटक की महिमा और सार्थकता यह है कि इसने मुझे चिंतन करने पर बाध्य किया। पिछले ढाई सौ वर्षों में एक प्रयत्न बड़ी प्राथमिकता से किया गया और वह प्रयत्न था, भारतीय चेतना पर बौद्धिक प्रहार। हमारी चेतना का मूल केंद्र विश्वास है, जिसे पिछले ढाई सौ वर्षो से अंधविश्वास कह कर दुष्प्रचारित किया जा रहा है। मैं मानता हूं विश्वासी होना मानव होने की उत्तम कसौटी है जिसके जीवन में विश्वास की कमी है वह घोर दरिद्रतम मानव होता है। विश्वास करने वाला भोला-भाला व्यक्ति ही अंधविश्वासी कहलाता है और जो लोग अंधविश्वास का विरोध करते हैं वे  वास्तव में विश्वासघाती हैं। उन्होंने जीवन की सरलता, सत्य, निष्ठा और भोलेपन को मार दिया है। उन्होंने ठगों, धोखेबाजों और जालसाजों को निर्दोष छोड़ दिया और विश्वास करने वाले सद्पुरुषों को ही अंधविश्वासी घोषित करके दोषी सिद्ध कर दिया। समाज के चेहरे का विकृत होते स्वरूप के कई कारणों में से एक कारण यह भी है कि हम अच्छे गुणों को छद्म तरीके से कटघरे में खड़ा करके लज्जित करते हैं और दुर्गुणी- दुराचारी की वकालत करते हुए उसे परिस्थिति और समाज का मारा, बेचारा मान बैठते हैं। विश्वासघाती को बचाना और अंधविश्वासी का दुष्प्रचार कर लज्जित करना ही बौद्धिक पराकाष्ठा का छद्म प्रहार है जिसने आदर्श समाज के स्वरूप को कुछ और ही बना दिया। जिन्हें मेरी बातों से कांटे चुभ रहे हों उन्हें लेखक सुदर्शन जी द्वारा रचित कहानी 'हार की जीत' जरूर पढ़नी चाहिए जिसमें बाबा भारती खड़क सिंह द्वारा बलात घोड़े को छीने जाने पर कहते हैं कि मेरे साथ जो किया इस घटना का जिक्र किसी से न करना अन्यथा लोग किसी लाचार पर विश्वास नहीं करेंगे । हर तरह का विश्वास अंधा ही होता है। अतः विश्वास और अंधविश्वास में कोई अंतर नहीं। अंधविश्वास का विरोध करने से अच्छा तो यह है कि हमें तर्क मीमांसा और ज्ञान का प्रसार करना चाहिए।

कुल मिलाकर अंत में मैं कहना  चाहूंगा कि शिक्षा जगत इस पुस्तक के माध्यम से भारत के भविष्य की चेतना और उसकी रचनात्मकता को पोषित और विकसित करे। मुझे संपूर्ण विश्वास है कि इस कसौटी पर यह पुस्तक अवश्य ही सार्थक सिद्ध होगी। अस्तु।