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July 24, 2020 • गोविंद उपाध्याय • कहानी


गोविंद उपाध्याय, कानपुर, मो. 9651670106

‘नहीं शिब्बू मैं अब गांव नहीं जाऊंगा। क्या रखा है वहां …? अपमान की पराकाष्ठा थी वह। नहीं तो कौन भला चाहेगा कि अपनी जनम भूमि  छोड़े ..? वह भी चला चली के बेला में …।’

अब मोबाइल पर विभूति भइया की हांफने की आवाज़ आ रही थी। जैसे एक लंबा सफ़र करने के बाद थक गए हों  और एक अल्प विश्राम के बाद फिर से चल निकलेंगे ..एक अनंत यात्रा के लिए ..।

‘ऐसा क्यों कह रहे  हैं ? वह सब भी तो आपके ही बच्चे हैं। उन्हें भी आपकी जरूरत है। मैं गांव गया था। सब आपको बहुत याद कर रहे थें। मन्नू तो लगता है आपके चले जाने से बहुत आहत है। मुझसे कह भी रहा था- बाबूजी को ऐसे मझदार में छोड़कर नहीं जाना चाहिए था। मैं तो कहीं का नहीं रह गया। थोड़े दिन और  सहारा दे देते तो… ’

‘बस रहने दो शिब्बू। क्यों घावों को कुरेद रहे हो। तुम्हारी उम्र  कितनी है ? पचास..। तुमसे कितना छोटा है वह ? सिर्फ़ दो साल ..? कोई किसी को कब तक सहारा दे सकता है ? वह निकम्मा ही नहीं कमीना भी है। मैंने उसके बच्चों के मोह में अपनी सारी पूजी ख़त्म कर दी और बदले में मुझे क्या मिला ? उसकी और उसकी पत्नी की गालियां ..। भाई अब मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो। मेरे पास अब कुछ भी नहीं बचा है। सिवाय पेंशन के…’

शायद बात आगे भी होती, लेकिन मोबाइल डिस्कनेक्ट हो गया। हो सकता है विभूति भइया ही बात नहीं करना चाहते हों। कारण जो भी हो, एक बात साफ़ हो चुकी  थी कि उनका अपने बड़े बेटे से पूरी तरह मोह भंग हो चुका  था।

विभूति भइया  पांच फुट चार इंच के औसत कद-काठी के इंसान थे। रंग-रूप से वह बहुत आकर्षक दिखते। पीली गोराई थी उनकी..जैसे दूध में हल्दी घोल दिया गया हो। मैं पैदा होने के बाद मां-बाबूजी के बाद जिस गोद में सबसे ज़्यादा खेला था वह विभूति भइया की गोद  ही थी।  विभूति भइया   ताऊजी के  बड़े बेटे थे। उनसे छोटे भभूति भइया थे।  बाबूजी विभूति भइया को बहुत मानते थे।  बाबूजी  ने उनके लिए बहुत कुछ किया। पढ़ने के लिए ट्यूटर रखा। जब दसवीं में तीसरे साल भी पास नहीं हो पाए तो उन्हें साइकिल मरम्मत की दुकान खुलवा दी। भइया दुकान  नहीं चला पाए। दिन भर लफ़ंगों की दुकान पर बैठकी होती। दुकान की सारी पूंजी चाय-समोसा और गोस्त-भात में ख़त्म हो गयी। कुछ दिन बेकार रहे तो बाबूजी ने कुछ पैसों का जुगाड़ करके एक  ढाबा खुलवा दिया। वहां भी मार-पीट कर लिए। ताऊ जी उनकी हरकतों से हमेशा खिन्न रहते। बाबूजी ने उन्हें शहर बुला लिया।  अपने विभाग के अफ़सरों के हाथ पैर- जोड़ कर चपरासी की  नौकरी  भी दिलाई ..पक्की सरकारी  नौकरी…। यह बात दूसरी थी कि वह कभी बाबूजी के विश्वास पर खरे नहीं उतरे।

यह शिकायत बाबूजी को मरते दम तक रही-‘यदि विभूति ने साथ दिया होता तो आज हम सब कहां से कहां निकल गए होते। लेकिन सुख-स्वार्थ के लिए उसने सबसे पहले हमसे ही किनारा कर लिया। अरे पेट तो सुअर का भी भर रहा है। का पेटे भरना सब कुछ होता है ?’

ताउजी की इकलौती बेटी जानकी दीदी की शादी में बाबूजी ने बहुत कर्जा ले लिया था। उन्हें विश्वास था कि विभूति कर्ज उतारने में उनकी मदद करेंगे। आख़िर जानकी उसी की  बहन है। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ ..। जानकी दीदी की शादी से लौटते ही विभूति  भइया ने अपना घोसला अलग कर लिया।

अम्मा बताती थी –‘जिस साल तू पैदा हुआ था उसी साल विभूति को नौकरी मिली थी।’

और  जिस साल मैं पांचवी में पढ़ने लगा… उस साल  जाकर  बाबूजी जानकी दीदी की शादी का कर्जा व्याज़ के साथ अदा कर पाए थे।

विभूति भइया  की पत्नी …यानि कुसुमा भाभी दोहरे बदन की महिला थी। पांच फुट से ज्यादा लंबी वह कदापि नहीं होंगी। रंग गेहुंआ था। माथे पर एक लंबा सा कटे का निशान था। यदि वह पुरुष होती तो नि:संदेह  गली के चवन्नी छाप गुंडे जैसा ही दिखती। नाक से बोलती थी। साथ में हर पूर्ण विराम के बाद कांखना न भूलती। कई बीमारियों का पनाहगाह थी उनकी थुलथुल देह …। पर परिवार के लोगों का विचार दूसरा था –उनकी सारी नौटंकी इस लिए थी कि उन्हें काम न करना पड़े।

कुसुमा भाभी ने दो पुत्रों को जन्म दिया था। दोनों बेटे आपरेशन से हुए थे। मन्नू और चन्नू  यानि मनोज और चंद्र मोहन …। जिन बीमारियों की दुहाई देकर भाभी कराहती थी, कालांतर में वह सारी बीमारियां स्थायी रूप से उनके शरीर में निवास करने लगी।

विभूति भइया को अपने बेटों पर बड़ा नाज़ था। बच्चों की पढ़ाई ऐसी थी कि एक ही कक्षा में दो साल लगा देते । वह उन्हें डाक्टर -इंजीनियर बनाना चाहते थे। बच्चे थे कि गैस एजेन्सी और पेट्रोल पंप का मालिक बनने को सोचते। विभूति भइया हाई स्कूल पास नहीं कर पाये । फोर्थ ग्रेड में भर्ती हुए थे। फिर बाबू बन गए। कोई बहुत पैसा नहीं था। चूंकि पारिवारिक जिम्मेदारियों से दूर रहे, इस कारण  दो मकानों के मालिक ज़रूर बन गए थे। दोनों मकान दो अलग-अलग कालोनियों में था। एक में वह खुद रहते थे …दूसरा किराए पर था। सोचा होगा दोनों बेटों के लिए एक-एक घर हो जाएगा।

पर उनका सोचा हो कहां  पाया ? कहने को दोनो बेटों ने विज्ञान विषयों से मास्टर डिग्री ले रखी थी, लेकिन वह किसी काग़ज़ के टुकड़े से ज़्यादा  महत्व नहीं रखती थी। तीसरे श्रेणी की यह डिग्रियां छाती से चिपकाए उनके लाडले ओवर एज हो गए। बड़े बेटे ने एक परचून की दुकान कर ली। छोटा एक वैक्यूम क्लीनर बनाने वाली कंपनी का सेल्स मैन बन गया। आमदनी की चिंता जब तक नहीं थी, दोनों बेटे लंबी-लंबी छौंकते रहे । गांव का बावन बीघा पोदीना अलग सूखता रहा। विभूति भइया बड़े बाबू के पद से रिटायर हुए थे। महीने की तनख्वाह सिकुड़ कर पेंशन में बदल गयी।

जब विभूति भइया रिटायर हुए तो उन्हें लगने लगा था कि आने वाले समय में इस परिवार के सिर पर अभावों का चमगादड़ अपना पंख फैलाने वाला है। ऐसे समय में वर्षों से छूटा गांव याद आया –‘कम से कम खर्चे भर का आनाज़ तो वहां से लाया जा सकता था। वह गांव आना-जाना शुरू कर दिए। छोटे भाई ने उनका भरपूर स्वागत किया। उसे लगा-भइया शहर में खूब कमाए हैं ..रिटायरमेंट के बाद ढ़ेर सारा पैसा पाए हैं। उसका कुछ अंश भी यदि खर्च कर दिए तो घर का काया-कल्प हो जाएगा।

विभूति भइया ने शुरू में कुछ पैसा खर्च भी किया। जब यह बात बच्चों को और पत्नी को पता चली तो बच्चों ने ऐसा गदर काटा कि उन्होंने कसम खायी –अब चाहे जो हो जाए  भभूति को कानी कौड़ी भी नहीं देंगे।

भभूति को भी बड़े भाई की नियति समझ में आने लगी। सारी प्यार -मोहब्बत साल भर में ही धुल-पुंछ कर बराबर हो गयी। खेत बंट गया, घर बंट गया ..सुख-दु:ख बंट गया …

तीन साल तक विभूति भइया  गांव से राशन ढो कर शहर लाते रहे। रिटायरमेंट  के चार साल निकल गया था। बड़के के  एक बेटी और दो बेटे हो चुके थे । छोटे के लिए रिश्ते आने लगे थे। विभूति भइया चाहते थे कि छोटे की शादी  करके अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाए। लेकिन बड़ी बहू के बर्ताव से उनकी हिम्मत जवाब दे जाती।

कुसुमा भाभी की स्थिति सबसे दयनीय थी। गठिया और दमा ने उन्हें बुरी तरह तोड़कर रख दिया था।  उनका चलना-फिरना मुहाल था। बालों में कंघी तक करने की शक्ति उनके पास नहीं थी। बड़ी बहू अपने से ही परेशान थी। एक तो जल्दी-जल्दी तीन बच्चे हो गए। ऊपर से गैर जिम्मेदार मरद .. उसे लगता इस सब की जिम्मेदार यह बुढ़िया ही है। इसी के लाड़-प्यार ने उसके पति को निकम्मा बना दिया। अच्छे घर की लड़की थी। कालेज तक पढ़ी थी। तमाम सपनों के साथ इस घर में पैर रखा था। और सपने थे कि पानी के बुलबुले साबित हुए। ऐसे में वह चिड़चिड़ी हो गयी। सबसे ज़्यादा चिढ़ तो उसे कुसुमा भाभी की कराहटों से थी। कुसुमा भाभी ने किसी काम के लिए मुंह खोला नहीं कि बहू तलवार लेकर भाजना शुरू कर देती-‘अम्मा जी क्या दिन भर मनुहूसियत फैलाये रहती हैं.. सबको दर्द होता है। हमें भी क्या कम तकलीफ़ है ? क्या कांखने से ही दर्द का पता चलता है। अरे हाथ-पैर धो कर साफ़-सुथरा बने रहने में कोई पैसा नहीं लगता है। लेकिन किसी-किसी को फूहड़ बने रहने में ही मज़ा आता है। पता नहीं किस मिट्टी की बनी हैं। चबड़-चबड़ करेंगी.. गंधाएगी, लेकिन दो लोटा पानी गिराने में पता नहीं कौन सा पहाड़ टूट पड़ता है।

बड़े की परचून की दुकान खाली रहने लगी थी। अब उसमें सिर्फ़ पान मसाले की पुड़िया वाले ग्राहक ही आते थे। दुकान पर मुहल्ले के आवारा और उस जैसे ही निकम्मे लोगों की जमघट लगी रहती।

विभूति भाइया को लगा होगा कि इस शहर में अगर  ज़्यादा दिन टिक गए तो रोटी के लाले पड़ जाएंगे। धीरे-धीरे समय उनके हाथों से फिसलता जा रहा था। वह कमर से थोड़ा झुक गए थे। बात-बात में गीता व रामायण का उल्लेख करते। छोटे बेटे की नौकरी भी ठीक-ठाक नहीं चल पा रही थी। वह दिन भर पान मसाले की पुड़िया मुंह में डाले जुगाली करता। देर रात को घर लौटता, लेकिन आज तक एक दमड़ी भी विभूति भइया के हाथ पर नहीं रखा था। हां ! बातें वह भी लच्छेदार करता था।

उस दिन शिव रात्रि थी। अचानक मौसम बदला था। गरमी आते –आते रुक गयी थी। शाम से ही बादल गरज रहे थे और सुबह होते-होते  मुसलाधार पानी बरसने लगा । सहमा हुआ ठंड एक बार फिर ताल ठोंक कर मैदान में आ गयी थी। अलमारी में जाने की तैयारी करने वाले गरम कपड़े वापिस शरीर पर लदने की तैयारी करने लगे।

विभूति भइया  पूरी तरह से भींगे  थे। वह ठंड से थर-थर कांप रहे थे। उनके चेहरे पर कई दिन की उगी हुई  दाढ़ी  दयनीयता को और बढ़ा रही थी। कपड़े बदलने के बाद उन्हें दीवान पर बैठा कर  रजाई से लपेटा।

‘शिब्बू मैं शहर छोड़ रहा हूं। वहीं गांव पर ही कुछ करने का विचार है। मैंने एक मकान बेच दिया है। पहले चन्नू को ले जाता हूं। शायद जगह बदलने से ही कुछ बदलाव आए। सुखौली में सुभाष मार्केट बन रहा है। सोच रहा हूं वहीं चन्नू के लिए एक दुकान ले लूं। अभी नया शहर है। रेडीमेड गारमेंट की दुकान खोलने का विचार है। शेष ऊपर वाला जाने। भगवान कृष्ण ने गीता में भी कहा है –हे अर्जुन तुम अपना कर्म करो। फल की चिंता करना तुम्हारा काम नहीं है …।’

उनके होठों पर एक उदास मुस्कराहट थिरक रही थी। पहली बार मेरे अंदर उनके लिए दया  भाव आया। वह ज़िंदगी की लड़ाई निरंतर हारते जा रहे थे। बचपन के अभावों का कसैलापन मुझे जब भी कचोटता तो विभूति भइया का अक्स उसके नेपथ्य में दिखायी देता। पिता को  जानकी दीदी के विवाह का कर्ज भरने की गणित में दिन-रात जूंझते हुए देखा था। शायद  उसका ही परिणाम था कि जब चन्नू और मन्नू पेट्रोल पंप खोलने के सपने देख रहे  थे हम दोनों भाई छोटी-मोटी नौकरी करके पिता के कमजोर होते कंधों को सहारा देने का प्रयास करते रहे थे।

आज हम दोनों भाइयों के पास ठीक-ठाक नौकरी है। जिसमें विलासिता के लिए भले ही कोई गुंजाइश न हो, एक सम्मान पूर्ण जीवन जीने का आत्म संतोष जरूर है।

विभूति भइया के गए छ: महीने हो चुके थे।  शायद उस दिन पन्द्रह  अगस्त था। छुट्टी का दिन, भागा-दौड़ी से मुक्ति का दिन ….। विभूति भइया का बड़ा बेटा मनोज आया था।

‘चाचा जी, मेरा बाप एक नंबर का हरामी आदमी है। मुझे इस शहर में अपने मकान की चौकीदारी करने के लिए यहां छोड़कर चला गया है। मैं यहां बवकूफ़ों की तरह बैठा मकान की रखवाली कर रहा हूं  और वहां तीनों मौज़ कर रहे हैं। उन्हें इस बात की जरा भी चिंता नहीं है कि तीन मासूम बच्चों के साथ मैं किस तरह से दिन काट  रहा हूं। एक मकान बेचा और पूरा पैसा खुद डकार गए। यही सोच लिया होता कि उन्हीं का खून इन बच्चों में भी बह रहा है …एक टुकड़ा इनको भी फेंक दो।’

मनोज के तेवर अच्छे नहीं थे। वैसे भी ऐसे मामले में कोई टिपप्णी करना मेरे लिए उचित नहीं था। वह अपने मन का गुबार निकाल कर चला गया। उसके बाद  मनोज से मेरी मुलाकात एक साल बाद गांव पर हुई। मैं उसके छोटे भाई चन्नू  के विवाह में सम्मलित होने गया था। पता चला मनोज दूसरा मकान बेंच कर स्थायी रूप से गांव चला आया था। दोनों भाइयों में दूसरे मकान की रकम  को लेकर खूब लड़ाई हुई थी। मकान की पूरी रकम मनोज ने डकार ली थी। चन्नू की शादी में मनोज नहीं शामिल हुआ। शादी के बाद नई बहू के आगमन के साथी ही कुसमा भाभी के दिन थोड़ा बहुरे। नई बहू   ने उनके बालों को संवारने से लेकर नहलाने तक सारी जिम्मेदारी ले ली। लेकिन वह सुख कुसमा भाभी को ज़्यादा रास नहीं आया। बीमारियों से जर्जर शरीर बहुत दिन नहीं खींच पाया।

जिस दिन कुसुमा भाभी मरी उस दिन बाहर उनकी लाश पड़ी  थी और अंदर दोनो बहुएं उनके गहनों को लेकर कर एक दूसरे की चोटी उखाड़ रही थी। घर के अंदर की बात थी, विभूति भइया खून के आंसू  रोते रहे। किसी के घर के पतन की सीमा का चरम था यह ..।

चन्नू घर के किट-किट से तंग आ कर  सुखौली में ही रहने लगे। मनोज एक प्राइवेट स्कूल में मास्टरी करने लगे थे। स्कूल से तनख्वाह के नाम पर मात्र हज़ार रुपल्ली ही मिलता था, लेकिन ट्यूशन से दो-ढाई हज़ार रुपए अतिरिक्त बन जाते। राशन घर का था … और घटने-बढ़ने पर बाप की  पेंशन तो  थी ही ..।

विभूति भइया  ने खेती-बाड़ी में मन रमा लिया  था। उनका अपना खर्चा कुछ भी  नहीं था। सिर्फ़ खाने के लिए दो रोटी और पहनने के लिए एक जोड़ी कपड़ा ..। कुसमा भाभी के रहने पर उनकी दवा में ज़रूर खर्चा था। पेंशन भी वह दोनो बेटों में बराबर-बराबर बांट देते थे। इसके बावजूद सकून नहीं था। दोनों को शक था-बुढ्ढा मुझको थोड़े पैसे दे कर टरका देता है और दूसरा बाप के पैसे पर ऐश कर रहा है।  दोनों बेटे एक दूसरे से बात नहीं करते थे। आपसी संवाद के लिए भी माध्यम विभूति भइया ही थे।

हालांकि अपने बेटों से पूरी तरह निराश होने के बाद भी उनका झुकाव छोटे बेटे की तरफ ज़्यादा था। शायद उसका कारण छोटी बहू थी। जब वह सुखौली जाते तो बहू उनका खूब आदर सत्कार करती। विभूति भइया  गदगद हो जाते –खानदानी घर की है। उसे मालूम है कि बड़े-बुजुर्गों का सम्मान कैसे किया जाता। बड़ी बहू का परिवार ही छीछोरा है तो बहू में कहां से अच्छे संस्कार आएंगे ?

इधर एक नाटक और शुरू हो गया था। मनोज ने कहना शुरू कर दिया-‘बाबूजी इ सब नहीं चलेगा। जब आप की सेवा हम कर रहे हैं तो पूरा पेंशन पर हक भी हमारा बनता है । वैसे भी हमारा खर्चा ज़्यादा है। बच्चे पढ़ने वाले हैं। चन्नू की तो बेटी अभी गोद में ही है। मैं किसी का हक मारने के पक्ष में कभी नहीं रहता। लेकिन मेरा हक कोई मारे यह भी सहन नहीं कर पाऊंगा। खेती से  राशन ले जाने के लिए तो मैंने कभी नहीं बोला …पर अपके पेंशन से भी अधिया झटक ले जा रहे हैं यह ठीक नहीं है। मैं यहां किसी तरह से परिवार की गाड़ी खींच रहा हूं  और वो भाई साहब बीबी के साथ गुलछर्रे उड़ा रहे हैं। आखिर सहनशीलता  की भी एक सीमा होती है।’

विभूति भइया चुपचाप सुन लेते थे। उन्हें तो मालूम ही था कि मुंह भले मनोज का है, लेकिन स्वर तो बड़ी  बहू का ही है। बोलने दो। बोलने से भला मेरा क्या घिस रहा है …।

पर ऐसा बहुत दिन तक नहीं चला। एक दिन चन्नू सुखौली से घर आए। बड़ी बहू बहुत दिनों से इसी ताक में थी। उसने पति को ललकारा-‘खाली मुंह हिलाने से काम नहीं चलेगा। हाथ भी हिलाइए  ..।’

हाथ पकड़ लिए मनोज-‘ नहीं  बाबूजी… अब नहीं …चन्नू को आप पैसा नहीं देंगे। एक भाई रबड़ी चाटे और दूसरे को सिर्फ सूखी रोटी …मेरा खून मत खौलाइए नहीं तो अनर्थ हो जाएगा।’

दोनों भाई भिड़ गए। सारा गांव तमाशा देख रहा था। जब मनोज कमज़ोर पड़ने लगे तो पत्नी भी मैदान में कूद गयी। विभूति भइया बचाव के लिए आये तो बड़ी बहू ने उनके सिर पर भी दो मुक्का धर दिया..।

यह सदमा वह  नहीं सहन कर पाए। चंद्र मोहन के साथ गांव छोड़ कर सुखौली आ गए। उन्होंने कसम खा लिया था –जीते जी  अब गांव में कदम नहीं रखेंगे।

चंद्र मोहन के लिए पिता बोझ नहीं थे। छ: हजार पेंशन के हर महीने उनके जेब में  जा रहा था। भला आती हुई लक्ष्मी से किसे परहेज़ था…।

मनोज ने ऐसा तो सोचा ही नहीं था कि बाबूजी इतने निष्ठुर हो जाएंगे। जब कोई उनसे पिता का नाम लेता तो वह बाप को धारा प्रवाह गरियाना शुरू कर देते …….. उनके ऊपर दोहरी मार थी। पिता से मिलने वाला पैसा ही नहीं गया, खेती–बारी भी राम भरोसे हो गयी। अब वह ट्यूशन पढ़ाए कि खेती करें…।

दोनों भाइयों के बीच नफरत की खाई इतनी चौड़ी हो चुकी थी कि कोई चमत्कार ही उसे पाट सकता था।