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बॉर्न टू स्पैन्ड
August 18, 2020 • राकेश गौड़ • लघुकथा


राकेश गौड़, नई दिल्ली, मो. 9818974184

सुबह कोई साढ़े छह बजे का समय रहा होगा लेकिन गरमी का मौसम होने के कारण अच्छी धूप खिल रही थी । मैं पार्क में सैर करने जा रहा था । बाएँ कंधे पर पोलिथीन की बोरी उठाए और दाएँ हाथ में एक छड़ी, जो शायद कूड़ा अलग करने और कुत्ते भगाने के काम आती होगी, लिए हुए साँवले रंग का २४-२५ वर्षीय युवक अपनी धुन में मस्त चला आ रहा था। थोड़ा और नज़दीक आया तो देखा उसने सफ़ेद मगर मैली टी शर्ट, फटी जींस और फटी चप्पल पहन रखी थी। मेरे बराबर से जैसे ही वह निकलने लगा तो उस की टी शर्ट पर लिखे शब्दों पर मेरी निगाह गई। बड़े ही कलात्मक ढंग से लिखा था-"बोर्न टू स्पैन्ड" । अचानक मेरे मन में उससे बात करने की जिज्ञासा हुई । वह थोड़ा आगे निकल गया था, मैंने मुड़ कर उसे आवाज़ दी, "अरे भैया, ज़रा सुनो।" उसने उत्सुकतावश घूम कर देखा और मेरी और बढ़ने लगा। मैंने कहा, " टी शर्ट तो बहुत बढ़िया पहन रखी है।" " अरे सर, क्यों मज़ाक़ करते हैं? एक भैया ने तरस खाकर दे दी थी। मेरी ऐसी औक़ात कहाँ कि इतने महँगे कपड़े पहन सकूँ।", उसने सकुचाते हुए कहा। मैंने कहा, "भाई मैं मज़ाक़ नहीं कर रहा। तुम जानते हो इस टी शर्ट पर क्या लिखा है ?" वह प्रश्नवाचक दृष्टि से मुझे देखने लगा, " इस पर लिखा है- बोर्न टू स्पैन्ड यानि खर्चा करने के लिए जन्मा हूँ। लगता है यह टी शर्ट किसी रईसजादे ने तुम्हे दी है, जो शायद अपने बाप के पैसों पर मजे कर रहा होगा, इसीलिए ऐसे स्लोगन वाली टी शर्ट पर भी पहनता था।" " सर मैं क्या जानूँ, पर आप शायद ठीक ही कह रहे हैं। वह अपने दोस्तों के साथ बहुत बड़ी गाड़ी में घूमता दिखाई देता है। उस पर तो टी शर्ट जमती है। मैं तो साहब कमाने और पैसा गाँव भेजने के लिए पैदा हुआ हूँ।"

मेरी उत्सुकता और बढ़ गई। मैंने कहा, "ऐसा क्यों कहते हो?" उसके चेहरे पर उदासी पसर गई। हाथ में ली छड़ी से ज़मीन कुरेदते हुए कहने लगा, " सर आपका टाइम खराब कर रहा हूँ लेकिन आप पूछ ही रहे हैं तो सुनो," मैं सात आठ साल पहले एक पड़ोसी के साथ बिहार के दरभंगा जिले के एक गाँव से दिल्ली आया था। पांच भाईयों के बीच दादाजी ने ज़मीन का बंटवारा करके एक टुकड़ा जो पिताजी को दिया था, वह उस पर खेती करते थे। माँ, तीन भाई और दो बहनों के परिवार को उस ज़मीन से भरपेट खाना और तन ढ़कने के लिए कपड़ा मिल जाए वही बहुत था। स्कूल जाने के बारे में तो हम सोच भी नहीं सकते थे। पिताजी ने हमारा दाखिला गाँव के प्राईमरी स्कूल में इसलिए करवा दिया था ताकि स्कूल में हमें एक टाइम का खाना मिलता रहे। उसके बाद मैं घर बैठ गया। भाइयों में सबसे बड़ा होने के कारण 16 -17 साल की उम्र होते ही पड़ोस के लोगों ने पिताजी को सलाह देनी शुरू कर दी, "अरे भैया, इसे दिल्ली भेज दो। गाँव के कितने बच्चे दिल्ली जाकर अच्छी कमाई कर रहे हैं। यह भी कुछ कमाई करके गाँव भेजेगा तो भाई बहनों का कुछ बोझ तो तुम्हारे कन्धों से उतरेगा।" एक दिन पिताजी ने हिम्मत करके, मुझे समझा बुझा कर पड़ोस के एक लड़के के साथ दिल्ली भेज दिया। जीवन में पहली बार इतने बड़े शहर में आया था। रेलवे स्टेशन से बस में बैठ कर चले तो भैया की बस्ती तक पहुँचते पहुंचते एक ओर शहर की चकाचौंध तो दूसरी ओर झुग्गी झोंपड़ी बस्ती का माहौल देखने को मिला। भैया ने कहा, " इन अमीरों के लिए ये बड़े बड़े घर, दुकान और फैक्ट्रियां हम दिन भर कमरतोड़ मेहनत करके बनाते हैं। कोई कोई ठेकेदार तो ज्यादा काम लेने के चक्कर में उसी बिल्डिंग में हमें रहने की इजाजत दे देता है। जैसे ही बिल्डिंग बन कर तैयार होती है, हम अपने गुदडे और फटे पुराने कपड़ों की गठड़ी उठा कर किसी झुग्गी की तलाश में निकल जाते हैं। हाँ, कोई कोई सेठ गृह प्रवेश के दिन हमारे जैसे मजदूरों को भी घर के पिछवाड़े में बिठा कर खाना खिला देता है वरना तो उस घर में हम घुस भी नहीं सकते। सो आज ही यह अच्छे से जान लो कि शहर एक तरफ और हमारी झुग्गी बस्ती की दुनिया दूसरी तरफ।" मैं उसकी ओर एकटक देख रहा था की अचानक उसने गर्दन उठा कर आकाश की तरफ देखा, " अरे सर, सूरज कितना चढ़ आया, मैं भी क्या बात लेकर बैठ गया। चलता हूँ, धूप बढ़ गई तो कूड़ा भी नहीं बीन पाऊँगा" कहते हुए आगे बढ़ गया।

पार्क से लौटते हुए भी मेरी आँखों के सामने उसका चेहरा घूमता रहा। दिन भर दफ्तर के काम में डूबा रहा मगर अगले दिन सुबह फिर जब मैं सैर करने निकला तो उसी जगह बोरी कंधे पर लटकाये और वही टी शर्ट पहने वह युवक सामने से आता दिखाई दिया। मुझे कल का वार्तालाप याद हो आया। जैसे ही वह मेरे सामने पड़ा, मैंने पूछा, " अरे भाई, कैसे हो ? कल इतनी बातें हुई पर तुमने अपना नाम तो बताया ही नहीं।" "नमस्ते सर, मेरा नाम कन्हैया है। " उसने हाथ में पकड़ी छड़ी से अपने उसी अंदाज़ में ज़मीन कुरदते हुए कहा। "अच्छा कन्हैया ये बताओ, तुमने दिल्ली में आकर क्या किया?", मैंने बातों का सिलसिला शुरू करते हुए पूछा। वह निगाह झुकाये हुए ही कहने लगा ," करना क्या था सर, सुरेंदर भैया जिनके साथ गाँव से दिल्ली आया था, ने अपने ठेकेदार से मिलवा दिया। उन्हीं के साथ उसी बिल्डिंग में दिहाड़ी मजदूरी करने लगा। दो तीन साल जी तोड़ मेहनत की। 6 -7 हजार रुपए महीना कमा लेता था। 3 -4 हजार रूपये खाने पीने और झुग्गी के किराए में लग जाते थे और बाकी के 3 -4 हजार रुपए पिताजी के पास भेज देता था लेकिन हाथ तंग ही रहता था। उधर बड़ी बहनों की शादी की चिंता और माँ की बीमारी के चलते, ज्यादा पैसे भेजने के लिए बार-बार पिताजी का फोन आता था। बगल की झुग्गी में रहने वाले मेरे गाँव के ही एक भैया ने सलाह दी, " देख कन्हैया, काम तो थोड़ा गंदा है लेकिन तू सुबह तड़के उठ कर दो घंटे भी कूड़ा बीनने का करेगा तो 4 -5 हजार रुपए ऊपर से कमा सकता है। मुझे देख, मैं भी कई साल से यह काम कर रहा हूँ" "मुझे घर पैसे भेजने की सख्त जरूरत थी इसलिए न चाहते हुए भी मैं एक दिन उस भैया के साथ एक बोरी लेकर निकल पड़ा। रास्ते में एक पेड़ से डंडी तोड़ कर उसने मुझे दे दी और कहा इससे कूड़ा बीनोगे तो हाथ कम गंदे होंगे। जैसे ही हम कूड़े के ढेर के पास पहुंचे तो देखा कि दो लड़के पहले से ही वहां कूड़ा बीन रहे थे। उन्होंने उस भैया को घूर कर देखा और एक लड़के ने कहा, " अबे साले एक और को पकड़ लाया। वैसे ही हम तीनों को यहां क्या मिलता है , जो तू इसे और पकड़ लाया?" भैया ने उन्हें समझाते हुए कहा, " नया-नया है, एक-दो दिन में काम सीख कर कोई नया कूड़ादान पकड़ लेगा। सच कहूँ तो सर, पहले दिन तो बदबू के मारे मुझे चक्कर आने लगे मगर कचरे में से बीने सामान को बेच कर जब मुझे 50 रुपए मिले तो सारी बदबू गायब हो गई। दो-तीन दिन में तो वह बदबू मेरी नाक में रम गई। अब मैं सुबह तड़के उठ कर कूड़ा बीनने का काम करता हूँ और दिन में दिहाड़ी मजदूरी। मेरे भेजे हुए पैसों से माँ का इलाज हो गया और दो साल पहले बरसात में घर की छत टूट गई थी, पिताजी ने उसकी मरम्मत भी करवा ली। अब तो माँ ने बहनों की शादी के लिए पैसे जोड़ने शुरू कर दिए हैं और मेरा अपना खाने-किराए का खर्चा भी आराम से निकल जाता है ।"

"पिताजी को तुम्हारे कूड़ा बीनने की खबर जान कर दुःख तो हुआ होगा?" कन्हैया ने तपाक से जवाब दिया,"सर, उन्हें बताया ही कहाँ? सारे गाँव में बदनामी हो जाती। हम ऊँची जाति के लोग और ये काम। मैंने तो भैया को भी किसी से भी इस बारे में ज़िक्र करने से मना कर दिया। वैसे उन्होंने अपने बारे में भी किसी को कहाँ बताया था।" मैंने कन्हैया को समझाया, "कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता, हाँ साफ़ सफाई का ध्यान जरूर रखा करो। पर चलो, तुमने घर पैसा भेज-भेज कर अपने परिवार की अच्छी मदद कर दी है। किस्मत भी मेहनत करने वालों का ही साथ देती है।" अचानक मैंने अपनी जेब से मार्कर पैन निकाला और कन्हैया की टी शर्ट पर लिखे 'स्पैन्ड' शब्द से अंग्रेजी का अक्षर 'पी' काट दिया। कन्हैया चौंक गया,"सर, यह आपने क्या किया?" मैंने मुस्कुराते हुए समझाया," कन्हैया, देखो अब यह शब्द बन गया 'सैंड' यानि 'भेजना'। याद है कल तुमने कहा था कि तुम अपनी कमाई खर्च करने वाले नहीं बल्कि पैसा घर भेजने वाले हो। अब कोई पूछे कि टी शर्ट पर क्या लिखा है तो तुम उन्हें समझा सकते हो कि तुम पैसा खर्च करने के लिए नहीं बल्कि पैसा कमा कर घर परिवार की मदद के लिए भेजने के लिए पैदा हुए हो। खैर, ये तो हुई मज़ाक की बात, मेरी दुआ है कि तुम मेहनत करके इतना पैसा कमा लो कि घर भी भेजते रहो और अपने ऊपर भी खुल कर खर्च करो और फिर टी शर्ट पर दुबारा लिखवाना 'बॉर्न टू स्पैन्ड'। कन्हैया के चेहरे पर मुस्कान आ गई और मुझे लगा कि अंग्रेजी का एक अक्षर निकाल कर 'स्पैन्ड' का 'सैंड' बनाना भले ही उसे समझ ना आया हो पर मेरी तारीफ़ और दुआ ने उसका हौसला जरूर बढ़ा दिया था।