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चालीस चाबियाँ
September 19, 2020 • अनुवाद: नासिरा शर्मा • पुस्तक

एक बादशाह था जिसके सात बेटे थे। एक दिन सातों बेटे घोड़ों पर सवार होकर शिकार खेलने गये। रास्ते में एक-दूसरे से कहने लगे कि “अगर शिकार किसी के हाथ से निकल जाय तो उसे शिकार के पीछे जाना है और बिना मारे नहीं लौटना

यह शर्त तय हो जाने के बाद बादशाह के बेटे शिकार के लिए चल पड़े। उन्हें एक हिरन दिखायी दिया। उस हिरन को इन सबने घेर लिया और चाहते थे कि उसे पकड़ लें कि इतने में शिकार छोटे भाई की तरफ दौड़ा और उधर ही से बचकर भाग निकला। बादशाह के छोटे बेटे ने उस हिरन के पीछे घोड़ा डाल दिया। हिरन दौड़तेदौड़ते एक पहाड़ी के समीप पहुँचा और वहाँ से शाहज़ादे की आँखों से ओझल हो गया। शाहज़ादे ने देखा कि पहाड़ी की चोटी पर एक आबिद (तपस्वी) बैठा है। शाहज़ादा थक चुका था। रात भी होनेवाली थी। उसे सोने की जगह भी चाहिए थी। वह ऊपर गया और आबिद से पूछा, “बाबा, क्या आपके पास इतनी जगह है कि मैं आपके साथ रह सकूँ?"

आबिद यह सुनकर उसे अपने साथ अपने घर ले गया। घर पहुँचकर शाहज़ादे ने देखा कि घर की दीवार पर एक बहुत ही खूबसूरत लड़की की तस्वीर टॅगी हुई है। शाहज़ादा उस लड़की पर मुग्ध हो गया और आबिद से बोला, "बाबा, यह तस्वीर किसकी है?"

तपस्वी ने जवाब दिया, “इस तक पहँच्ना मुश्किल है। पहले सात देवों को मारो तो बाग़ में घुस पाओगे और फिर वहाँ बाग़ में एक बिल्ली है, जिसकी गर्दन में चालीस चाबियाँ हैं। हर चाबी से एक कमरा खुलेगा। जब उन्तालीस कमरे खुल जायँगे तो चालीसवें कमरे में वह लड़की तुमको मिलेगी।" 

रात-भर शाहज़ादा वहीं रहा और सुबह होते ही वह उस जंगल की ओर निकल गया। चलता गया, चलता गया, आख़िर वह सात चौकीदार देवों के पास पहुँच गया। उस वक़्त देव सो रहे थे। उसने उनमें से सबसे बड़े देव को जगाया और उससे लड़ाई की। आख़िर देव हार गया और शाहज़ादे ने उसकी गर्दन काट दी। गर्दन के कटते ही आसमान आपस में टकराने से लगे और ज़मीन धूल से भर गयी। इस तरह से उसने सारे देव मार डाले। सातवें देव के समीप उसे किताब मिली। उसको उठाकर उसने पढ़ा। उसको पढ़कर उसने मन्त्र पढ़े जिससे सारे देवों का जादू टूट गया और वह पहले की तरह हो गये और शाहज़ादे के गुलाम बन गये। शाहज़ादा बाग़ में गया और देखा कि दीवार के किनारे एक बिल्ली बैठी है, जिसके गले में चालीस चाबियाँ हैं। यह देखते ही शाहज़ादे ने कमान पर तीर चढ़ाया। मगर निशाना खाली गया। आख़िर तीसरी बार निशाना ठीक बैठा और बिल्ली मर गयी। शाहज़ादे ने चाबियाँ अपने कब्जे में ले लीं। उन्तालीस कमरे खोले और जो भी उन कमरों में कैद था उसे आज़ाद किया। चालीसवीं चाबी लगायी और कमरा खोला। सामने मसहरी पर शाहज़ादी सो रही थी। उसके सिर पर बुलबुल बैठी गांना गा रही थी। शाहज़ादा शाहज़ादी के समीप गया और उसके गालों का चुम्बन लिया, फिर उसके हाथ को उठाकर अपनी अंगूठी उसकी उँगली में पहना

दी।

शाहज़ादा बाग़ से बाहर आया और आबिद के 'हुजरे' में पहुँचा। आबिद से बोला, “बाबा, मैंने देवों व बिल्ली को मार डाला है और लड़की तक पहुँचकर उसकी उँगली में अपनी अंगूठी भी पहना दी है। अब आगे क्या करूँ?"

आबिद ने कहा, “कल बादशाह ढिंढोरा पिटवानेवाले हैं कि जिसने भी मेरी बेटी के हाथ में अंगूठी पहनायी है वह आकर उससे विवाह करे। ध्यान रहे, उसके साथ तीन शर्ते भी होंगी जिन्हें पूरी न करने पर सिर कटवाना पड़ेगा।"

यह सुनकर वह युवक ज़रा भी न धबराया और दूसरे दिन बादशाह के पास पहुँचा और बोला, “वह अंगूठी जो शाहज़ादी की अंगुली में आपने देखी है, वह मेरी है।"

बादशाह ने सुनकर कहा, "ठीक है, पर शाहज़ादी को पाने के लिए तुमको तीन शर्ते जीतनी पड़ेंगी। अगर हार गये तो सिर कटवाना पड़ेगा।"

जवान शाहज़ादा बोला, “कहिये, मैं हर शर्त पूरी करूँगा।"

बादशाह बोला, “मैं बिल्ली के सिर पर चिराग़ रख दूँगा और बिल्ली ही चारों तरफ गोल-गोल चालीस बार घूमेगी। अगर इस बीच तुमने चिराग़ न गिराया तो शर्त हार जाओगे।"

बिल्ली के सिर पर चिराग़ रखा गया और अभी उसने चक्कर काटना शुरू भी नहीं किया था कि जवान ने चूहा छोड़ दिया। बिल्ली चूहे को देखते ही झपटी और चिराग़ गिर गया। पहली शर्त जीतने के बाद उसने दूसरी शर्त पूछी। दूसरी शर्त थी चर्बी का चिराग़। उसे एक घण्टे में बनाकर जलाना भी था। यह शर्त मुश्किल थी, तो भी उसने जीत ली और चिराग़ से सब जगह रौशन कर दी। तीसरी शर्त में बादशाह ने कहा कि तुमको चालीस रोज़ तक शाहज़ादी का चुम्बन लेना है और इस तरह से लेना है कि वह सोते से जाग न पाये। अगर जाग गयी तो तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर दिया जायगा। शाहज़ादे ने उन्तालीस दिन तक शाहज़ादी के इस तरह से चुम्बन लिये कि वह सोती ही रही, जागी नहीं। आख़िर चालीसवें दिन रात को ख़ुद शाहज़ादे ने चुम्बन ले लड़की को जगाकर कहा, "उठो, आज से तुम मेरी हो।" उसका हाथ पकड़ वह अपने देश लौट गया जहां उनकी शादी की खुशी में सात दिन, सात रात तक खुशियाँ मनायी गयीं।

अनुवाद: नासिरा शर्मा, नई दिल्ली, मो. 9811119489