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'चिराग़-ए-दैर'
July 16, 2020 • प्रो. सादिक • बिरासत

मिर्जा ग़ालिब की बनारस-यात्रा मशहूर है। उन्होंने फ़ारसी में, जो उनकी प्रिय काव्यभाषा थी, एक मस्नवी 'चिराग़-ए-दैर' नाम से लिखी थी। यों तो बनारस सदियों से एक पुण्य-नगरी है और उसकी स्तुति में बहुत कुछ इस दौरान लिखा गया है। ग़ालिब की मसनवी उस परम्परा में होते हुए भी अनोखी है जो एक महान कवि की एक महान तीर्थ की यात्रा को सच्चे और सशक्त काव्य में रूपायित करती है। एक ऐसे समय में जब हिन्दू और इस्लाम धर्मों के बीच दूरी बढ़ाने की अनेक प्रबल और निर्लज्ज दुश्चेष्टाएँ हो रही हैं इस मसनवी का हिन्दी अनुवाद एक तरह की याददहानी का काम करता है कि यह दूरी कितनी बहुत पहले पट चुकी थी।

-अशोक वाजपेयी

नफ़स बा-सूर दमसाज़स्त इमरोज़ 

ख़मोशी महशर-ए-राज़स्त इमरोज़

आज 

मेरी साँस 

सूर1-ए-इसराफ़ील के 

सुर में मिलाती 

अपना सुर 

महसूस होती है

और 

मेरा मौन 

मानो 

हश्र का मैदान2 

बनने जा रहा है 

जिसमें 

उठ जायेंगे 

सब राज़ों से परदे

  1. सूर = नरसिंघा-एक विशेष वाद्ययन्त्र जिसके बारे में मुसलमानों का विश्वास है कि इसराफ़ील फ़रिश्ता जब उसे फूंकेगा तो उसकी आवाज से क़यामत बरपा होगी। 
  2. वह मैदान विशेष जहाँ क़यामत के बाद सबके अच्छे और बुरे कर्मों का हिसाब होगा और उनके सारे कार्यों पर से परदा उठ जायेगा।

 


प्रो. सादिक, नई दिल्ली, मो. 9818776459