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चित्रा मुद्गल की कहानी 'अभी भी' में स्त्री विमर्श
October 3, 2020 • शीना.वी.के • साहित्य नंदनी


शीना.वी.के सहायक आचार्य हिन्दी विभाग सरकारी ब्रेन्नन काँलेज तलश्शेरी - 670106

चित्र मुदुगल आधुनिक हिन्दी साहित्य के महत्वपूर्ण कहानीकार, उपन्यासकार, निबन्धकार आदि है। उनका जन्म 10 दिसंबर 1944 में चेन्नई में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले में हुई। 1962 में हायर सेंकडरी पूना बोर्ड से हुई। शेष पढ़ाई मुंबई में हुई थी।

अब तक चित्रा मुद्गल के तेरह कहानी संकलन प्रकाशित हो चुके है। इनमें प्रमुख है दुलहिन, जिनावर, अपनी वापसी, लाक्षागृह, इस हमाम में, जगदंबा बाबु गाँव आ रहे हैं, लपटें, पेटिंग अकेली है आदि बहुचर्चित हुए। उन्होंने 80 से अधिक कहानियाँ लिखी है। उनके प्रमुख उपन्यास है एक ज़मीन अपनी, आवाँ आदि। इनके अलावा चित्रा मुदुगल के समीक्षा लेख, लघुकथा, कथात्मक रिपोर्ताज, बाल उपन्यास, आदि प्रकाशित हुए थे।

चित्रा मुद्गल की महत्वपूर्ण कहानी है 'अभी भी'। इसमें नारी की समस्या पारिवारिक समस्या, सामाजिक समस्या आदि की अभिव्यक्ति है। वर्तमान युग में नारी समाज तथा परिवार में विभिन्न समस्याएँ भोग रही है। नारी को समाज द्वारा परिवार के द्वारा अत्याचार भोगना पड़ता है। इस विषय को लेकर प्रस्तुत कहानी निर्मित है।

'अभी भी' कहानी के मुख्य पात्र है शिल्पा, मुकेश, सुरेश, अनिल, मीरा, शिवा, घर की माँ बीजी आदि। बीजी को अपने बच्चों के प्रति बहुत प्यार था। वह उनकी देख भाल अच्छी तरह करती थी। नगरपालिका के स्कूल में बीजी अध्यापन का कार्य करती थी। बीजी के चार बच्चे थे।

बीजी का बड़ा बेटा था मुकेश। वह पाएलेट का काम करता था। जब मुकेश का विवाह शिल्पा से हुआ तो शिल्पा पति के साथ मुंबई शहर में आई। वहाँ मुकेश के परिवार से उसका मिलना- जुलना हुआ था। माँ बीजी, देवर सुरेश और अनिल, ननद सब शिल्पा केलिए आत्मीय और खुश मिजाज लगे। मंझला बेटा सुरेश जीवन बीमा निगम में काम करता था। छोटा बेटा अनिल काँलेज की पढ़ाई पूर्ण करने के बाद छोटे मोटे व्यवसाय की योजना कर रहा था। मुकेश और शिल्पा के विवाह के छह महीने के बाद अनिल ने मीरा से प्रेमविवाह किया और घर ले आया । मुकेश की माँ बीजी को यह अच्छा नहीं लगा था। लेकिन मुकेश ने अपनी माँ को पत्र लिखा कि जो हो गया उसे स्वीकार करो | इसी में समझदारी है।

एक दिन एक दुर्घटना में मुकेश की मृत्यु हुई। तब से शिल्पा का जीवन दुःख भरा बन गया था। वह विचार करती है। मुकेश के संग बीते वर्ष किसी लंबे मादकसपने की तरंग से गुजर गये। सपना ही तो था ।

घनी पीडा के दबाव से शिल्पा दुःखित हुई। बहन शिवा ने ब्याह के आलबम उलट पलटकर कुछ कहा तो शिल्पा रोने लगी। उसके रोने की आवाज़ सुनकर सब दुःखित हुए।

एक महीने के बाद शिल्पा के पिताजी बीजी के घर आए और वह शिल्पा को अपने घर ले जाने का विचार रखते हैं। छोटा भाई और बहनों के साथ रहने पर उसका दुःख हलका बन जाएगा। अगर कोई नौकरी मिली तो उसकी हालात में सुधार आएगी । लेकिन बीजी ने रोका और शिल्पा के पिता के सामने शिल्पा और देवर सुरेश के बीच के विवाह का प्रस्ताव रखा | नौकरी करने से कोई लाभ नहीं हैं।

बीजी ने कहा। इस प्रकार देवर सुरेश और शिल्पा का विवाह हो जाता है। मुकेश और शिल्पा के रिश्ते में एक बच्चा हुआ था जिसका नाम है किशु । वह शिल्पा के साथ रहता था। मुकेश के जायदाद में काफी धन था और वह सब शिल्पा के नाम पर था। मुंबई उपनगर की सोसाइटी में मुकेश ने शिल्पा के नाम से एक घर भी खरीदा था।

विवाह के बाद मालूम हुआ कि सुरेश को अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं हैं। अनिल भी शिल्पा से चैक में दस्तखत करने के लिए मज़बूर करते थे। अब शिल्पा की संपत्ती पाँच लाख से केवल सवा डेढ़ लाख में सीमित हो गई। अनिल एक दूकान स्वंय खरीदना चाहता था। इसकेलिए और अस्सी हज़ार रूपए की आवश्यकता है।

वह रोज़ शिल्पा से रूपए माँगता है। घर की समस्याओं के बारे में अकेले में सुरेश से शिल्पा कहना चाहने लगी तो अनिल और बीजी बीच में आ जाते। बीजी और अनिल के बारे में शिल्पा ने सुरेश से सूचित की तो उसने कहा कि बीजी के व्यवहार बुरा नहीं वह पारिवारिक अनुशासन करती है। घर के प्रत्येक व्यक्ति के हित अहित बीजी को देखना पड़ता है। बीजी ने शिल्पा के साथ अच्छा कार्य ही किया हो जो कुछउसने किया है क्या उसे कोई सास कर सकती है ?

अनिल शिल्पा के खाते से रूपए लेना चाहता है। किशु की पढाई कोई अच्छे स्कूल में कराने के उद्देश्य शिल्पा को था। लेकिन बीजी ने कहा कि अच्छे स्कूल की हैसियत से कोई भी व्यक्ति उन्नत पद प्राप्त नहीं कर सकता। अनिल ने रूपए जमा करके एक फ्लैट खरीदा है। अब एक दूकान खरीदने का विचार उसको है।

कहानी की चरम सीमा तब आती है जब अनिल एक बार शिल्पा के पास रूपए माँगने आता है। शिल्पा रूपए देने से इनकार करती है। दोनों में भारी झगड़ा होते हैं। फिर अनिल ने शिल्पा को कन्धे से पकडकर अपनी ओर खींचा और पूरी शक्ति से दीवार पर उसे पटक दिया । फिर उसने उसके घुटनों पर प्रहार किये।

शिल्पा की दर्दनाक चीख घर और परिसर में गूंज उठी। बच्चा किशु रोने लगा।

बीजी वहाँ तब आई और शिल्पा को दोनों हाथों से धकियाती हुई कमरों के बीच स्थित रहना में ले आई। और शिल्पा को डाँटने लगी। उसने शिल्पा से कहा कि पिता नौकरी कराकर विवाह भी कराता तब मेरे बेटे मुकेश की सारी कमाई तुम हड़प लेगी। यह बात सुनकर शिल्पा को मालूम हुआ कि बीजी धोखेबाज है उदार स्त्री नहीं हैं। सारे नाटक का सूत्रधार बीजी है।

शिल्पा को मालूम हो जाता है कि उसके पति के परिवार वालों को मुकेश के मरणोपराँत की सभी संपत्ती हडप लेने का षडयंत्र है। सुरेश के साथ विवाह का प्रस्ताव उसको सुनिश्चत भविष्य देने की दूरदर्शिती नहीं हैं। सुरेश भी एक दिन शिल्पा का विरोधी बन जाएगा। वह हीनताबोध से आक्राँत व्यक्ति है।

कुछ देर के बाद बीजी कमरे में फिर से आई और कहा कि पडोसवाले ने खबर कर दी है और पिता पुलिस के साथ आ रहा हैं। उससे कहना है कि सिर में चक्कर आया था। उसने कहा। जब पुलिस और पिता आये तब शिल्पा ने कहा कि वक्त कम है। अभी मुझे यहाँ से ले चालिए नहीं तो जीवन को खतरा है।

शिल्पा की दर्दभरी चीख सुनकर पड़ोस के लोगों ने शिल्पा के पिता को फोनपर खबर दिया था। शिल्पा चाहती है कि जल्दी ही उस घर से लौट चलना है।

उसके जीवन बचाने का मात्र यही उपाय है कि पति के घर से निकलकर बाहर आए। अभी भी जाना है नहीं तो वक्त चला जाएगा।

इस प्रकार इस कहानी की समाप्ति होती है। शिल्पा पति के परिवार के द्वारा अनेक अत्याचार भोगती है। पति की मृत्यु के बाद वह अपने देवर सुरेश से दूसरा विवाह करती है। लेकिन यह विवाह उसकेलिए चैन नहीं बलिक मानसिक संघर्ष बढ़ाने का कार्य करता है। वह प्रतिदिन मानसिक अंतर्द्वन्द, अत्याचार, पिटाई के शिकार बन जाती है। उसकी सास भी उससे बुरा व्यवहार करती है। सास को अपना बड़ा बेटे मुकेश के धन संपत्ती हडपने का विचार था। न कि बहु के अच्छे भविष्य की चिंता।

शिल्पा अपने पति के परिवार से अनेक अत्याचार पीडादायक अनुभव भोगती है वह पति के घर से आखिर विचार करती है कि क्यों पडी है यहाँ, जीवित ही क्यों है? जीवन जीने केलिए ही होता है, होता होगा। जीने के नाम पर जो जीवन उसे सौंपा गया है पिछले पाँच वर्षों से उसे मंझा-मंझाकर उसका रोयाँ निचुड़ चुका है। समाजिक  परिवारिक सुरक्षा शिल्पा को नहीं मिली । वह पढ़ी लिखी युवती है नौकरी कर सकती थी। क्यों कठपुतली बनकर जीवन बिताये ? वह सोचती है। वह आत्मनिर्भर बन सकती थी अपने को मोहविमुक्त होकर बाहर निकलना है।

इस प्रकार वह अपने अनुभवों से नई सबक प्राप्त करती है। पति के घर छोड़ देने का निर्णय करती है। और आत्मनिर्भर युवती बनना चाहती है। वह अपने पिता से कहती भी है - मुझे जीवित देखना चाहते हैं तो यहाँ से फोरन निकाल ले चलिए |

अभी भी वक्त है अभी भी। यहाँ कहानी का शीर्षक "अभी भी” सार्थक है। शिल्पा के जीवन खतरे में हैं यही सूचना है।

इस कहानी की भाषा उतकृष्ट तथा प्रौढ़ है। नये नये शब्दों का चयन करके कहानी को स्तरीय बनाया गया है। वार्तालाप या संवाद में भी चुस्तता सुन्दरता है

जिससे भावार्थ ग्रहण करने में कठिनाई नहीं होगी। कहानी का शीर्षक भी सार्थक है।

तलश्शेरी, केरल 08.08.2020