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दास्तान-ए-बहराम शाह और लम्बक सक़्क़ा
January 9, 2020 • नासिरा शर्मा • कहानी

एक दिन बादशाह बहराम पहलवानों एवं बहादुरों के संग शिकार खेलने जा रहा था। राह में एक बूढ़ा आदमी लाठी टेकता हुआ, उसके सामने आन खड़ा हुआ और बोला-“जहाँपनाह! हमारे शहर में दो आदमी रहते हैं। एक अमीर और दूसरा गरीब। अमीर का नाम बराहाम है, जो दरअस्ल कंजूस यहूदी है। जो अमीर है, उसको लम्बक सक़्क़ा के नाम से जाना जाता है। यह खुले दिल का हँसमुख इंसान है।

बहराम शाह ने दोनों के बारे में विस्तार से जानना चाहा तो उस बूढ़े ने कहा कि लम्बक सक़्क़ा आधे दिन पानी बेचता है और उससे होने वाली आमदनी को मेहमानों के आदर-सत्कार में खर्च कर देता है और दूसरे दिन के लिए एक कौड़ी भी बचाकर नहीं रखता है। मगर बराहाम अपनी सारी धन-दौलत के साथ, सारे शहर में कंजूस यहूदी के नाम से जाना जाता है।

बहराम बादशाह ने पूरे शहर में मुनादी करा दी कि किसी भी आदमी को लम्बक सक़्क़ा से पानी खरीदने की इजाजत नहीं है। शाम ढले बहराम शाह घोड़े पर बैठा अकेला सक़्क़ा के घर की तरफ चल पड़ा। दरवाजे पर दस्तक दी और कहा कि मैं ईरानी फ़ौज से बिछड़ गया हूँ। अब तुम्हारे दर पर पनाह लेने आया हूँ। यदि तुम कहो, तो मैं रात यहीं गुज़ारूँ, तुम्हें अपनी मर्दानगी की सौगन्ध, मुझे इजाज़त दे दो!

सक़्क़ा बहराम शाह की मीठी आवाज और बोलने के ढंग से प्रभावित हुआ और दरवाज़ा खोलकर कहने लगा-“ए सवार! अन्दर आ जा, तेरे साथ दस आदमी और हों तो वे भी सर-आँखों पर।‘‘।

बहराम शाह यह सुनकर घोड़े से नीचे उतरा। सक़्क़ा ने बढ़कर घोड़े की लगाम पकड़ी और उसको एक किनारे ले जाकर बाँधा। फिर बहराम को अन्दर लाकर आदर से बिठाया और उसके आगे शतरंज की चैपड़ बिछाई ताकि अतिथि अकेलापन महसूस न करें। कब तक वह मोहरों को इधर-उधर करेगा, तब तक सक़्क़ा रात के भोजन की तैयारी कर लेगा। जब भोजन तैयार हो गया तो उसने बहराम शाह को ‘दस्तरखान‘ पर बुलाया, शराब से उसकी आवभगत की और प्रेम से भोजन कराया। बहराम शाह सक़्क़ा के अतिथि-सत्कार से बहुत प्रभावित हुआ।

खाना खाकर बहराम बादशाह सो गया। जब सुबह उसकी आँख खुली तो सक़्क़ा ने कहा-“आज हमारे यहाँ और रुकिए अगर कोई दोस्त हो जिसे आप बुलाना चाहें तो बुला लीजिए।‘‘ यह कहकर सक़्क़ा ने अपनी मशक़ उठाई और पानी बेचने चल दिया। सारे दिन सक़्क़ा इधर-उधर मारा-मारा फिरा, मगर किसी ने उसका पानी नहीं खरीदा। थककर वह बाजार गया और अपना कुर्ता बेच दिया। मशक के नीचे रखने वाले कपड़े से उसने अपना तन ढक लिया। खुशी-खुशी लम्बक सक़्क़ा ने उस पैसे से गोश्त खरीदा और घर आकर उसी आदर-सत्कार से अतिथि-सेवा में जुट गया और इस तरह से दूसरा दिन भी गुज़र गया।

तीसरे दिन सक़्क़ा ने फिर बहराम शाह को रुकने को कहा। बहराम मान गया। सक़्क़ा बाज़ार की तरफ गया और उसने अपनी मशक़ एक बूढ़े आदमी के पास गिरवी रखी और उस पैसे से गोश्त खरीदकर जल्द घर लौट आया और मेहमान से कहा कि आज तुम भी खाना पकाने में मेरी मदद करो। दोनों ने मिलकर खाना पकाया। फिर ईरान के शाह के नाम पर शराब का जाम मुँह को लगाया।

चैथे दिन लम्बक सक़्क़ा ने बहराम शाह से कहा कि अगरचे मेरी इस झोंपड़ी में तुमको कोई आराम नहीं पहुँचा, फिर भी, तुम्हें अगर शाह ईरान का भय न हो तो दो सप्ताह मेरे यहाँ मेहमान रह जाओ। बहराम शाह ने इंकार करते हए कहा कि मैं तीन दिन तेरा अतिथि रहा, अब आज्ञा दे! अलबत्ता मैं तेरी मेहमानवाजी का ज़िक्र किसी ऐसी महफ़िल मे ज़रूर करूँगा कि जिससे तुझे खुशी भी होगी और फ़ायदा भी पहँुचेगा।

यह कहकर बहराम शाह शिकारगाह की ओर लौटा और सारे दिन शिकार खेलता रहा। जब शाम ढली तो वह चुपके से बराहाम यहूदी के यहाँ पहुँचा। कुंडी खटखटाई और कहा-“मैं शाही फौज से भटक गया हूँ। रास्ता जानता नहीं हूँ। इस

अँधेरी रात में फ़ौज तक पहुंचना मुश्किल है। इजाज़त हो तो मैं यहीं किसी कोने में रात बसर कर लूँ। तुझे कोई तक़लीफ नहीं होने दूंगा।‘‘

नौकर ने बहराम गूर की बात कंजूस यहूदी से जाकर कही। यहूदी ने इंकार करते हुए कहा कि उसके घर में कोई जगह नहीं है। बहराम बादशाह ने फिर अपना निवेदन दोहराया कि केवल रात-भर ठहरने की जगह दे दो। मैं और कुछ नहीं माँगता।

कंजूस यहूदी चिढ़कर बोला-“बाबा, इस घर में केवल एक नंगा-भूखा यहूदी रहता है। तेरे लिए कोई जगह नहीं है। जा, लौट जा!‘‘

बहराम शाह ने कहा- “अच्छा, अगर घर के अन्दर नहीं आने देते हो तो मुझे दरवाजे़ पर सोने की इजाज़त दे दो!‘‘ कंजूस यहूदी उसकी बात सुनकर पिघला और बोला-“तू दरवाज़े पर सोना चाहता है। अगर तेरी कोई चीज चोरी चली गई तो तू मुझी को तंग करेगा। अच्छा अन्दर आ जा। लेकिन ख़बरदार जो मुझसे कुछ माँगा। यह भी याद रख कि अगर तू मर गया तो तेरे कफन-दफन की कोई ज़िम्मेदारी मुझ पर नहीं है।‘‘

बहराम शाह दरवाजे के पास बैठ गया। अब कंजूस यहूदी को तरह-तरह की चिन्ताएँ सताने लगीं। आखिर इसके घोड़े की रखवाली कौन करेगा! अजीब बेशर्म-बेहया आदमी हैं। वह फिर उत्तेजित-सा बोला-‘देख अगर तेरे घोड़े ने लीद की या खुरों से फर्श की कोई ईंट तोड़ दी तो यह तेरी ज़िम्मेदारी होगी कि लीद को मैदान में फेंककर आए और टूटी ईंट के बदले नई ईंट लाकर दे।‘‘

बहराम शाह ने कंजूस यहूदी की हर शर्त मान ली। घोड़े को एक तरफ बाँधा। म्यान से तलवार निकाली। नम्दे का बिस्तर और ज़ीन का तक़िया बनाया और टाँगें पसारकर सो गया।

कंजूस यहूदी ने उसको सोया जानकर पहले घर का दरवाजा बन्द किया। उसके बाद दस्तरखान बिछाकर भोजन करना आरम्भ किया। बहराम शाह की तरफ मुँह करके बोला-“मेरी बात गौर से सुन, दुनिया में जिसके पास होता है, वह मेरी तरह खाता है और जिसके पास नहीं होता है, वह तेरी तरह टुकर-टुकर ताकता रहता है!‘‘

बहराम शाह ने करवट बदलकर कहा-‘‘मैंने यह बात पहले भी सुनी थी। मगर आज आँखों से देख रहा हूँ।‘‘ खाना खाकर यहूदी ने शराब का जाम भरा और बहराम शाह को सम्बोधित करता हुआ बोला

‘‘जिसके पास दौलत है, उसके दिल में गर्मी है। दौलत कवच के समान आदमी की रक्षा करती है।’’

कंजूस यहूदी ने शराब का दूसरा घूंट भरा और बड़ी मस्ती में कहा:

‘‘जिसके पास पैसा नहीं, उसके होंठ सूखे रहते हैं और ठीक तेरी तरह वह आधी रात को भूखा सोता है।’’

बहराम शाह ने कहा- ‘‘तुम्हारी दिलचस्प बातें मुझे याद रहेंगी।‘‘

सुबह हुई तो बहराम शाह ने घोड़े पर ज़ीन कसी और चलने की तैयारी करने लगा। यहूदी कंजूस लपकते हुए बहराम शाह के समीप पहुँचा और बोला-‘‘तुझे याद नहीं कि तूने वायदा किया था कि घोड़े की लीद साफ करके जंगल में फैंक आएगा। मुझे तेरा जैसा मेहमान बिल्कुल पसन्द नहीं है।‘‘

बहराम शाह ने कहा-“तुम इस लीद को किसी से साफ करा दो, मैं उसको पैसा दे दूंगा।‘‘

यहूदी कंजूस बोला-“मेरे पास कोई आदमी नहीं है जो लीद साफ करके फैंक आए।‘‘

बहराम शाह ने जब उसका जवाब सुना तो उसके दिमाग़ में एक तरक़ीब आई। उसने अपना रेशमी रूमाल जो इत्र से बसा हुआ था, निकाला और उससे लीद उठाकर दूर फेंक दी। यहूदी कंजूस रेशमी रूमाल के पीछे भागा और लीद झाड़कर वह रूमाल उठा लिया। बहराम शाह उसकी यह हरकत देखकर ठगा-सा रह गया।

“अगर तुम्हारी इस हरकत के बारे में ईरान के शाह को पता चला तो वह तुम्हें दरबार में जरूर ऊँची पदवी देकर इतनी धन-दौलत देंगे कि तेरा दिल दुनिया की हर चीज़ से भर जाएगा।” इतना कहकर बहराम शाह महल लौट आया। सारी रात वह चिन्ता में डूबा रहा। मगर इस भेद को किसी पर ज़ाहिर नहीं किया।

सुबह हुई तो उसने लम्बक सक़्क़ा और बराहाम यहूदी कंजूस को अपने दरबार में बुलाया। साथ ही यह हुक्म भी दिया कि एक ईमानदार आदमी यहूदी के घर जाए और उसका सारा माल जो उसके घर में मौजूद हो उसे तथा यहूदी कंजूस को अपने साथ लेकर दरबार में हाज़िर हो।

जब वह ईमानदार आदमी यहूदी के घर पहुंचा तो घर के हर कमरे को सोने-चाँदी, कालीन और कीमती वस्तुओं से भरा पाया। माल-असबाब इतना ज़्यादा था कि उसकी गिनती करना मुश्किल था। उसने हजार ऊँटों पर वह सारा सामान लदवाया और बादशाह के हुजूर में लाया। फिर बहराम शाह को बताया-“हुज़्ाूर! इतनी दौलत तो आपके ख़जाने में भी नहीं है। अब भी जो कुछ वहाँ रह गया है, उसको दो सौ गधों पर लादा जा सकता है।‘‘

बहराम शाह इतनी धन-दौलत देखकर आश्चर्यचकित रह गया और सोच में पड़ गया। उसने सौ ऊँटों पर लदा सामान लम्बक सका को इनाम में दे दिया और यहूदी कंजूस को

सम्बोधित करता हुआ बोला कि रात तुम्हारे घर में सवार मेहमान था, उसने मुझे तुम्हारी बातें बताई थीं कि

‘‘जिसके पास होता है वह पेट भर खाता है और जिसके पास कुछ नहीं होता वह यूँ ही तरसता है।’’

बहराम शाह ने इतनी बात कहकर यहूदी कंजूस के चेहरे को देखा और कहा कि

‘‘अब तुम खाने से अपना हाथ खींच लो और आज से सक़्क़ा के खाने को ताकते रहो!’’ .

इसके बाद बहराम शाह ने यहूदी कंजूस को रात की एक-एक बात याद दिलाई और उसके हाथ पर चार दरहम रखते हुए बोला-“जाओ इससे अपना गुजा़रा करो!‘‘

बेचारा यहूदी कंजूस वहाँ से रोता-पीटता हुआ चल दिया।