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दास्तान-ए-सोहराब
January 6, 2020 • नासिरा शर्मा • कहानी

उधर सोहराब सारी रात दोस्तों के संग महफिल जमाए रहा, लेकिन उसका दिल व दिमाग़ स्थिर नहीं था। उसने हुमान से कहा कि वह पहलवान जो मुझसे कल ज़ोर-आज़माई कर रहा था, वह बाहुबल में किसी तरह मुझसे कम नहीं है। पता नहीं क्यों, तब मैं उसकी तरफ आँख भरकर देखता हूँ तो मेरा दिल नर्म पड़ने लगता है और चेहरा शर्म से लाल होने लगता है। माँ ने बाबा की जो पहचान मुझे बताई थी, वह सब मैं उसमें देख रहा हूँ! मुझे शक है कि यही रुस्तम है। मगर अपना नाम मुझसे छुपा रहा है। ऐसा न हो कि मैं बाबा से युद्ध करूँ और अपने भाग्य को अँधेरे में डूबो दूँ।

हुमान ने मक्कारी से कहा-“मैंने रुस्तम को कई बार रण-क्षेत्र में देखा है! यह पहलवान रुस्तम नहीं है।‘‘

सूरज ने जैसे ही अपनी सुनहरी किरणें बिखेरीं, रात ने अपने काले डैने समेट लिए। सोहराब नींद से जागा। जिरह-बख़्तर पहन, तीर व कमान, भाला, गदा लेकर वह घोड़े पर बैठा और युद्ध के मैदान की तरफ चल पड़ा।

तहमतन यानी रुस्तम ने बबरेबयान पहना, हथियार उठाए, रख्श घोड़े पर बैठा और रण-क्षेत्र की तरफ चल पड़ा।

जैसे ही सोहराब की नज़र रुस्तम पर पड़ी, उसके दिल में प्यार उमड़ने लगा और हँसकर पूछने लगा-‘‘दिलावर! आपकी रात कैसे गुज़री और अब दिन कैसे गुज़ारेंगे, इस युद्ध का इरादा क्यों नहीं छोड़ देते? कहिए तो मैं आपके कन्धे से तीर व कमान उतार लूँ और बदले की भावना को हम दोनों दिलों से निकाल फेंके और दोस्त बनकर युद्ध का इरादा छोड़ दें। एक साथ बैठें, और जाम भरें। मेरे दिल में जाने क्यों आपके लिए बहुत ज़्यादा प्यार उमड़ रहा है। आप जरूर ऊँची नस्ल और दिलेर पहलवान परिवार से हैं। आप मुझसे अपने को न छुपाएँ

और अपना सही नाम बताएँ। मुझे शक है कि आप ज़ालज़र के बेटे रुस्तम हैं। मैंने आपको बहुत ढूँढ़ा। सबसे पूछा, मगर किसी ने आपका नाम नहीं बताया। आप तो मुझे अपना नाम बता दें।‘‘

रुस्तम ने सोहराब की बात सुनकर कहा-“अरे जवान मर्द कल तक सारी बातें लड़ाई और मरने-मारने की कर रहे थे, हथियार डालने और शराब पीने का कोई ज़िक्र नहीं था। आज ये सब बेकार की बातें और युद्ध रोकने की कोशिशें मत करो। तुम्हारे जाल और फरेब में फँसने वाला नहीं हूँ। तुम जवान हो, तो मैं बच्चा नहीं हूँ। ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव बहुत देखे हैं। हजारों से मिला हूँ। अब देखना है कि खुदा ने हमारी तकदीर में लिखा क्या है?

सोहराब ने जवाब दिया-“बहादुर बुजुर्ग! मेरी सबसे बड़ी इच्छा है कि आपको मौत के मुँह में जाने से बचा लूँ और आप इस दुनिया से जाने के लिए अपने बिस्तर पर ही अपनी आँखें बन्द करें। अगर आपको बहुत जल्दी है और मौत का सामना करना ही चाहते हैं तो फिर खुदा की मर्ज़ी पर छोड़ने के अलावा हमारे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है। घोड़े से उतरिए। लड़ाई शुरू करते हैं।‘‘

दोनों पहलवान अपने-अपने घोड़ों से नीचे उतर आए और उनको बाँधा। एक-दूसरे की कमर में हाथ डाला और इस तरह गुँथ गए जैसे दो अज़दहे एक-दूसरे से लिपट गए हों। सुबह से शाम तक दोनों पहलवान इस कोशिश में लगे रहे कि एक-दूसरे को पछाड़ दें। चेहरे और बदन से खून बह रहा था, मगर दोनों युद्ध किए जा रहे थे।

अन्त में सोहराब ने शेर की तरह दहाड़ मारी और रुस्तम को कमर से पकड़कर दोनों हाथों से सर के ऊपर उठाया और पूरी ताकत से जमीन पर दे मारा और उचककर उसके सीने पर चढ़ बैठा और म्यान से खंजर निकाला ताकि रुस्तम का सिर

धड़ से अलग कर दे। यह देखकर रुस्तम अपनी जान की खैर मनाने लगा। कुछ सोचकर बड़ी नर्मी से सोहराब से कहा-“जवान मर्द! हमारा रिवाज यह है कि जब दो पहलवान कुश्ती लड़ते हैं तो एक-दूसरे को पहली बार ज़मीन पर पटकने पर खंजर नहीं उठाते। अगर दूसरी बार भी पहला दूसरे को ज़मीन पर पटक देता है तो फिर रिवाज के अनुसार उसका सिर धड़ से अलग कर सकता है।‘‘

उधर हुमान सोहराब की प्रतीक्षा में था। जब सोहराब के लौटने में देर हुई तो वह घोड़े पर बैठकर उसे देखने निकला। कुछ देर बाद हुमान ने सोहराब को शिकारगाह के पास देखा। करीब पहुँचकर उससे कुश्ती का हाल पूछा। सोहराब ने सारा माजरा कह सुनाया। सुनकर हुमान दुःख से चीख उठा कि क्या तुम्हारा दिल ज़िन्दगी से भर चुका है, जो हाथ में आए हुए शिकार को छोड़ आए हो? आज तक किसी दिलेर ने हाथ में आए दुश्मन को आज़ाद नहीं किया है। पता नहीं, वक़्त अब क्या गुल खिलाता है? ।

सोहराब ने कहा-“दुःखी मत हो! यह पहलवान मेरे पंजे से आज़ाद नहीं हो सकता। कल फिर वह मैदान में आ रहा है। फिर कुश्ती होगी और इस बार मैं उसका सिर धड़ से अलग कर दूंगा।‘‘

अब रुस्तम सोहराब के चंगुल से छूटा तो सारी नामक चश्मे के किनारे पहुँचा हाथ-मुँह धोया, पानी पिया और सजदे में गिर गया।

कहते हैं कि शुरू में रुस्तम के बदन में इतनी ताकत थी कि यदि वह चलते हुए जरा-सा ज़्यादा जोर पंजों पर डालता, तो वहाँ की जमीन नीचे धंस जाती थी। अपने इस बल से स्वयं रुस्तम भी बहुत परेशान था। इसलिए एक बार रुस्तम ने रो-रोकर खुदा से दुआ मांगी थी कि वह रुस्तम के बदन का बल कम कर दे ताकि वह आराम से कदम रखता हुआ ज़मीन पर चल सके। खुदा ने उसकी दुआ सुन ली और उसके बदन का बल घट गया।

आज रुस्तम ने खुदा के सामने खड़े होकर यह दुआ माँगी कि उसके बदन का घटा बल उसको वापस मिल जाए। इस बार भी खुदा ने उसकी विनती सुन ली और रुस्तम के बदन में नयी ताकत व स्फूर्ति दौड़ गई। उस बल के संग रुस्तम चिंघाड़ता हुआ लड़ाई के मैदान की तरफ बढ़ा।

उधर से सोहराब कमान और कमन्द हाथ में उठाए शेर की तरह गुर्राता हुआ रुस्तम की तरफ बढ़ा। आखिर पर्वतकाय दो पहलवान एक-दूसरे के सामने पहुँचकर ठहर गए। सोहराब रुस्तम के नये जोश व खरोश भरे इस व्यवहार से चकित होकर बोला कि ओ शेर के पंजे से छूट जाने वाले! क्या तुम्हारा दिल जीने से भर चुका है जो दोबारा रण-क्षेत्र में आ गए हो! और आज यह दिलेरी जो तुम दिखा रहे हो, पहले अपना नाम पता तो बताओ।

रुस्तम ने कोई जवाब नहीं दिया। दोनों पहलवान घोड़े से उतरे और कुश्ती लड़ने में व्यस्त हो गए। उनके ऊपर उनकी मौत किसी परन्दे की तरह मँडरा रही थी। सोहराब ने रुस्तम की कमर पकड़ी और चाहा उसे पछाड़े मगर उसकी कमर किसी पर्वत की तरह जड़ थी। इस बार आसमान ने दूसरा रंग दिखाया। रुस्तम ने किसी अजदहे की तरह सोहराब को ऊपर उठाया और जमीन पर दे पटका! रुस्तम को पता था कि सोहराब जमीन पर पड़ा नहीं रह पायेगा। इसलिए उसने कमर से फौरन खंजर निकाला और साहेराब का कलेजा चीरकर रख दिया। सोहराब दर्द से तड़प उठा और ठण्डी साँस भरी। नेकी और बुराई के बारे में उसने सोचा, फिर रुस्तम की तरफ देखा और कहा कि ओ दिलेर! आखिर तुमने मुझे खून में नहला ही दिया। इसमें तेरा कोई कसूर नहीं, बल्कि होना यही था। अभी तो मेरी उम्र के लड़के कहेंगे कि हमारा साथी पहलवान इतनी जल्दी मर गया फिर सोहराब एक आह खींचकर बोला

‘‘माँ ने मेरे बाबा की निशानी (तावीज) के साथ मुझे भेजा था कि मैं जब उन्हें ढूँढ़ लूँगा तो वह मुझे पहचान लेंगे मगर अफसोस यही है कि मैं उन्हें तलाश करता रहा और आज उन्हें देखे बिना मौत को गले लगा रहा हूँ।’’

‘‘मगर तुम उससे बचकर नहीं जा पाओगे, चाहे मछली बनकर पानी में जा छुपो या रात की कालिमा में छुपो या सितारे बनकर आसमान पर टँग जाओ। वह तुमको पकड़ लेंगे।’’

‘‘जब मेरी लाश देखेंगे तब मेरे बाबा तुमसे बदला लेंगे। इन बड़े पहलवानों और नामवरों में से कोई रुस्तम को यह निशानी दिखाए और उन्हें खबर दे कि सोहराब तुम्हें ढूँढ़ता रहा और अब वह इस तरह खाक में पड़ा दम तोड़ रहा है।’’

ये बातें सोहराब के मुँह से सुनकर रुस्तम सन्न रह गया। आँखों के सामने तारे टूटने लगे और चारों तरफ अँधेरा छा गया। एकाएक वह बेहोश हो गया। जब रुस्तम को होश आया तो उसने देखा कि सोहराब खून में नहाया उसके सामने जमीन पर पड़ा है।

रुस्तम ने सोहराब का सर अपनी जाँघ पर प्यार से रखा और एकाएक पीड़ा से चीत्कार कर उठा कि रुस्तम की नस्ल इस ज़मीन से अब मिट जायेगी। फिर रुस्तम ने सोहराब से पूछा कि बताओ अपने पिता की कौन-सी निशानी तुम्हारे पास है? मैं रुस्तम हूँ। खुदा करे मेरे ये हाथ कट जाएँ जिनसे मैंने अपने बेटे का कलेजा चीरा है। इतना कहकर रुस्तम फफक कर रो पड़ा और गम में अपना चेहरा तथा बाल नोच डाले।

सोहराब ने रुस्तम की जब यह हालत देखी तो पूछा कि पहलवान! अगर रुस्तम तुम्ही हो, तो फिर मुझसे यह बात छुपाई क्यों? मैंने तो हर तरह से तुम्हारा नाम और पता जानना चाहा था। मगर तुम्हारे दिल में मेरे लिए ज़र्रा बराबर भी प्यार नहीं उमड़ा। मेरा जोशन खोलो और देखो। जब मैं फौज के साथ ईरान की तरफ चलने लगा था, उस वक्त मेरी माँ डबडबाई आँखों से मेरे पास आई थीं और यह तावीज मेरे बाजू पर

बाँधकर कहा था कि यह तुम्हारे पिता रुस्तम की यादगार है। रास्ते में काम आयेगी। मगर अफसोस जब यह काम आई तो मेरे जाने का समय आ गया है।

रुस्तम ने जल्दी से सोहराब के लिबास का बन्द खोला और अपना तावीज़ उसने सोहराब के बाजू पर बँधा देखा। यह देखकर रुस्तम गम से पागल हो उठा। उत्तेजना से कपड़े फाड़ने और रोने-चिल्लाने लगा कि ओ दिलावर बेटे! ऐ मेरे जवान बेटे! अभी तो तुम्हारे गालों के गुलाब ताज़ा थे कि तुम मुरझा गए! अभी तो तुम्हारी उम्र का सूरज पूरे शबाब पर भी नहीं चढ़ा कि तुम अँधेरे में डूब गए! अपने पिता के हाथों क़त्ल हुए और बहार आने से पहले ही पतझड़ बन गए। सोहराब रुस्तम का यह दुःख देखकर ठण्डी साँस भरकर कहने लगा कि खुदा की मर्जी यही थी। अब इस तरह से रोने-चिल्लाने और शोक मनाने से क्या हासिल होगा? मेरी किस्मत में यही लिखा था कि पिता के हाथों मारा जाऊँ। वही हुआ। आप यूँ गम न मनाएँ।

सूरज डूबने को आया और जब रुस्तम फौज के पड़ाव की ओर नहीं लौटा तो शाह काऊस ने बीस फुर्तीले सवारों को रुस्तम की खबर लेने के लिए रण-क्षेत्र की तरफ भेजा। उन्होंने वहाँ पहुँचकर देखा कि दोनों घोड़े बधे हुए हैं और जीन पर रुस्तम नहीं है। वे समझे रुस्तम युद्ध में काम आ गया। वे फौरन उल्टे पाँव सन्देश देने शाह काऊस की तरफ दौड़े।

फौज में इस ख़बर से सनसनी फैल गई। सारे बहादुर एवं पहलवान शाह काऊस के पास पहुँचे। शाह काऊस ने आदेश दिया कि एक सवार फिर जाकर पता लगाए कि रुस्तम का क्या हुआ और सोहराब का अब क्या इरादा है। यदि रुस्तम को कैद कर लिया गया है तो ये नौ पहलवान उसको स्वतन्त्र कराने की कोशिश करें। उस समय हम तूरान की फौज पर हमला करेंगे और इस समस्या का समाधान निकालेंगे।

दूर से सोहराब ने जब घोड़ों के दौड़ने की आवाज सुनी तो रुस्तम से कहने लगा कि मेरा समय तो खत्म हुआ। तूरानी फौज संकट में पड़ गई है। आप कोशिश करें कि ईरानी फौज तूरानी सिपाहियों को परेशान न करे। उनकी कोई गलती नहीं है। वे मेरी इच्छा का आदर करते हुए मेरे साथ यहाँ आए थे। मैंने उन्हें बड़ी आशाएँ दिलाई थीं। उनसे कहा था कि जब मैं और मेरे बाबा रुस्तम एक हो जाएँगे तो इस दुनिया को अपने क़दमों पर झुका लेंगे। अफसोस मैं अपने बाबा के हाथों मौत के सिवा कुछ न पा सका! जब सफेद किले पर मैंने हमला किया था तो ईरानी सिपाहसालार को कैदी बनाया था। मैंने उससे भी आपका पता बहुत पूछा। उसकी सारी बातें बेतुकी थीं। उसने मुझसे सब भेद छुपाया और आज उसी के कारण यह अन्धेरा देखना पड़ा। आप उसका ध्यान रखें कि उसको कोई हानि न पहुँचे। माँ ने आपकी पहचान ज़बानी बताई थी, जब मैं आपको देखता था तो सारी बातें मैं आपमें पाता था, मगर यकीन नहीं होता था। खुदा को यही मंजूर था। मैं बिजली की तरह आया और हवा की तरह जा रहा हूँ। मगर आपकी दुनिया में दोबारा जरूर आऊँगा। इतना कहकर सोहराब की आवाज टूटने लगी और आँखें आँसुओं से भर गईं।

ये बातें सुनकर रुस्तम का कलेजा मुँह को आने लगा और साँस लेने में बहुत कठिनाई महसूस होने लगी। टूटे दिल और भीगी आँखों के साथ रुस्तम रख़्श पर बैठा और फौज के पड़ाव की तरफ घोड़ा दौड़ाया। ईरानी सिपाहियों ने जब दूर से रुस्तम को आते देखा तो खुदा को धन्यवाद दिया। मगर जब रुस्तम करीब पहुँचा और उसका फटा लिबास, चेहरे पर ख़राश और ग़म से उसे बेहाल देखा तो सबने इसका कारण पूछा। रुस्तम ने बताया कि उसने अपने ही हाथों अपने बेटे को क़त्ल कर दिया है। यह सुनकर सारे सिपाही ग़म से चीख उठे!

रुस्तम ने ग़म से निढाल होकर कहा कि न तो मुझे दिल की खबर है, न तन का होश है। लेकिन अब तुम लोग तूरानी फौज पर आक्रमण नहीं करोगे। आज मुझसे जो काम हुआ है, वही गुनाह के लिए काफी है। इसी बीच रुस्तम का भाई जवारेह आ गया। भाई को फटे हाल देखकर ताज्जुब में पड़ गया। रुस्तम ने उससे कहा कि हुमान को खबर कर दे कि वह अपनी तलवार म्यान में रखे। सोहराब का यह हाल हुजीर के कारण हुआ है। उसको अपने सामने लाने का आदेश रुस्तम ने दिया।

हुजीर की बात सुनकर रुस्तम दुखी हुआ और क्रोध में आकर उसकी हत्या करने के लिए आगे बढ़ा। मगर बीच में ही उसे रोककर पहलवानों ने उसकी जान बख्श देने की विनती की। तंग आकर रुस्तम अपना ही खंजर उठाकर खुद अपना सिर तन से जुदा करने वाला था कि गूदर्ज़ ने उसे समझाया कि इससे क्या फायदा? अब तो जो हो चुका, वह वापस नहीं आ सकता है। इसलिए सोहराब की मौत उतनी महत्वपूर्ण नहीं जितना किसी पहलवान का नाम अमर हो जाना महत्वपूर्ण है। रुस्तम के मन-मस्तिष्क की उत्तेजना शान्त होने लगी। वह गूदर्ज़ से बोला कि तुम शाह काऊस के पास जाओ और मेरा पैग़ाम उनसे कहना कि अब रुस्तम ज़्यादा दिन ज़िन्दा नहीं रहेगा। अपने ही खंजर से अपने जिगर के टुकड़े का सीना चीर दिया है। शाह से मेरी विनती है कि उनके खज़ाने में जो ‘नौशादर‘ है, वह मेरे जख्मी बेटे के लिए मुझे एक जाम भरकर दें ताकि मैं अपने बेटे को बचा सकूँ। मैं अभी ज़िन्दा हूँ उनकी और उनके राज्य की मैं रक्षा करूँगा।

गूदर्ज़ यह पैगाम लेकर शाह काऊस के खेमे में पहुँचा और सारी बात बताकर रुस्तम द्वारा कही दवा माँगी। शाह काऊस ने सारी बात ध्यान से सुनी और मन-ही-मन सोचा कि रुस्तम जैसे पहलवान का बेटा सोहराब है जो पहले ही इस बात का दावा कर चुका है कि वह मुझे मिटा देगा और ईरान को जीत लेगा। ऐसे समय में यह दबा रुस्तम को भेजना उचित नहीं है। कल कहीं ये दोनों बाप-बेटे मिल गए तो मेरा क्या होगा? उसने दवा देने से इंकार कर दिया और अपना भय भी बयान कर दिया।

यह जवाब सुनकर गूदर्ज़ हवा की तरह रुस्तम के पास पहुँचा और शाह काऊस के इंकार की बात रुस्तम को बताकर कहा कि बेहतर है कि रुस्तम आखिरी वक्त बेटे के सिरहाने रहे ताकि इस अँधेरे में डूबते हुए दिल व दिमाग को कुछ रोशनी मिल सके।

अभी रुस्तम बीच रास्ते में ही था कि कोई तेजी से उसकी तरफ सूचना देने बढ़ा कि

‘‘सोहराब इस दुनिया को छोड़ चुका है। अब उसे न महल चाहिए न तख्त न ताबूत ! यह खबर सुनकर बाप ने एक लम्बी आह खींची और रोते हुए पलकें एक-दूसरे पर रखीं।’’

रुस्तम रख़्श से नीचे उतरा और सिर पर टोपी की जगह जमीन की खाक उठाकर डालने लगा और बैन करने लगा कि मैं ये दोनों हाथ काटकर रख दूँ जिन्होंने खंजर उठाया था। अब किस तरह और किस मुँह से तहमीना को यह खबर दूंगा कि मैंने उसके बेटे-अपने जिगर के टुकड़े को अपने ही हाथों से मार डाला! मुझ पर सब लानत भेजेंगे कि मैंने अपने खानदान साम पहलवान के नाम धब्बा लगाया है। इस खबर से पिता ज़ालज़र व माँ रुदाबे का क्या हाल होगा।

रुस्तम सोचने लगा कि किस तरह से जोश व खरोश से भरा यह जवान कल इस मैदान में विजय पताका लहराने आया था। आज वहीं से उसका ताबूत उठ रहा है।

जब सोहराब की मौत की ख़बर काऊस के पास पहुंची तो वह रुस्तम को दिलासा देने पहुँचा। रुस्तम का इतना बुरा हाल देखकर शाह काऊस को बहुत दुःख हुआ। उसने सोहराब को याद करते हुए उसके बल और दिलेर व्यक्तित्व की प्रशंसा की और कहा कि अब रुस्तम को इस दुःख में अपने को मजबूती से सँभालना चाहिए और इस हक़ीकत को समझ लेना चाहिए कि इस दुनिया में जो आया है, वह एक दिन वापस जायेगा चाहे देर में चाहे जल्दी इसलिए रुस्तम कब तक बेटे के शोक में डूबा रहेगा।

रुस्तम ने शाह काऊस से कहा कि वह बिल्कुल टूट चुका है। उसमें कुछ भी करने की शक्ति नहीं रह गई है। यदि शाह काऊस उचित समझें तो जवारेह को हुमान के पास भेजें ताकि उसकी सुरक्षा में तूरानी फौज सुरक्षित समनगान लौट जाए।

शाह काऊस ने अनुरोध सुना और कहा कि बेशक मैं उस तुर्क के व्यवहार से खुश नहीं था। मगर यह कोई बदला लेने का समय नहीं है। जब रुस्तम इस तरह दुःख में डूबा है तो मैं भी उसके दुःख में बराबर शरीक़ हूँ। इतना कहकर शाह काऊस अपनी फौज के साथ ईरान लौट गया।

शाह काऊस के ईरान की तरफ कूच कर जाने के बाद रुस्तम वहाँ तन्हा रहकर जवारेह की वापसी का इन्तजार कर रहा था ताकि वह तूरानी फौज की सुरक्षित वापसी का समाचार जान सके।

जवारेह के आने के बाद रुस्तम ने जाबुलिस्तान की तरफ जाने की तैयारी कर ली। उसके आने की खबर जब ज़ालज़र के पास पहुंची तो सारा सीस्तान शोक में रोता-बिलखता वहाँ पहुँच गया।

‘‘सिपाही ताबूत के आगे-आगे चल रहे थे और ताबूत के पीछे रोते हुए बुजुर्ग। जैसे ही ज़ालज़र की नज़र दूर से ताबूत पर पड़ी वह अपने घोड़े से उतर गया। रुस्तम पैदल चल रहा था। उसका दिल टुकड़े-टुकड़े था, कपड़े फटे थे और चहेरा ग़म से बेहाल था।’’

सारे पहलवानों ने ताबूत को देखकर क़मर ख़म की और सम्मान में सिर झुकाया। ताबूत के ऊँट की पीठ से नीचे उतारकर जमीन पर रखा गया तो रुस्तम रोता हुआ ज़ालज़र को सम्बोधित करता हुआ आगे बढ़ा और बेटे के ताबूत पर सिर रखकर बोला-“इस तंग ताबूत में मेरा बाघ सोया पड़ा है।‘‘ रुस्तम की बात सुनकर ज़ालज़र की आँखें खून के आँसू रोई। रुस्तम ने दुःख में प्रलाप करते हुए कहा-“तुम चले गए और मैं दुखी और अपमानित यहाँ रह गया।‘‘ ज़ालज़र ने पोते की उम्र देखकर आश्चर्य प्रकट करते हुए दुःखी स्वर में कहा-“इस नन्ही-सी उम्र में उसने इतनी दिलेरी का काम किया और गदा हाथ में उठाया। वह सचमुच अजूबा था। ऐसे बच्चे रोज़ कहाँ पैदा होते हैं।” इतना कहकर ज़ालज़र ने अपनी आँखें बन्द कर लीं जिनमें से लगातार आँसू झर रहे थे।

रुदाबे ने जब सोहराब की लाश देखी तो ग़म से उसका कलेजा फटने लगा। बेटे का ग़म और पोते की मौत की खबर सुनकर वह कहने लगी कि जब इसके खेलने-खाने के दिन थे तो यह चल बसा। जाबुलिस्तान के लोगों के चेहरे ग़म से स्याह और आँखें दुख से लाल हो रही थीं।

जिसने भी यह ख़बर सुनी कि बाप के हाथों बेटा मारा गया, उसकी आँखें आँसुओं से भर आईं। रुस्तम ने अपने हाथों से बेटे को कफन पहनाया और ताबूत में लिटाया। सोहराब को दफनाए हुए कई दिन गुजर गए थे, मगर रुस्तम का दिल खुशी को फिर हासिल न कर सका और स्वयं से बार-बार यही कहता कि ज़माने की मार से कब किसका दिल जख्मी हो जाए, यह कौन जानता है।

हुमान जाबुलिस्तान से तूरान की तरफ लौट गया और शाह अफरासियाब से सारी घटना बताईं सुनकर अफरासियाब चकित रह गया। उसके मन की इच्छा सोहराब की मौत से पूरी हुई। यह खबर जब ईरान पहुँची तो रुस्तम के गम में सब शरीक हुए और सोहराब के लिए उनकी आँखें भर आईं।

सोहराब के मरने की खबर तूरान से जब शहर-ए-समनगान पहुँची तो सोहराब के नाना, शाह समनगान दुःख से दीवाने होकर अपने कपड़े फाड़ने लगे। यही हाल तहमीना का हुआ। उसने अपने चेहरे को दुःख में नोच लिया। मुँह को दोनों हाथों से पीटा और धुंघराली जुल्फों में उँगलियों में फंसाकर खींचा। उसके चेहरे पर पड़ी खरोंचों से खून छलक आया और सफेद बदन पर जगह-जगह जख़्म के लाल निशान उभर आये। बैन करती हुई तहमीना कहने लगी:

‘‘मेरे बेटे तुम कहाँ खून व ख़ाक में खो गये हो। मैं तुम्हारी राह में आँखें बिछाए बैठी थी कि मुझे बेटे सोहराब और बाप रुस्तम की खबर एक साथ मिलेगी।’’

“मुझे गुमान हुआ कि तुम लौट आए हो। आह, ऐसे कोई अपने बाबा को ढूँढ़ने और पाने जाता है! तुम्हें जाने की इतनी जल्दी क्यों थी! मुझे क्या पता था बेटे, कि रुस्तम शिकारगाह में तुम्हारा ही जिगर चीरकर रख देगा।

 ‘‘मैंने किस दुलार और प्यार से तुझे पाला था! रात और दिन की मेहनत से तेरा बदन तन्दुरुस्त बनाया था। आज वही तन खून में डूबा कब्र में चला गया और कफन उसका लिबास बन गया।’’

तहमीना अपना सीना पीटती हुई बोली-“इस दुःख को किससे कहूँ। कौन है मेरी सुनने वाला। तुम्हारी जगह मैं किसको पुकारूँ बोलो, अब कौन है मेरा? अफसोस! मेरे जिगर का टुकड़ा, आँखों की रोशनी, बाग और महल से निकलकर ख़ाक में मिल गई है। मैंने तो तुम्हें बाबा की पहचान बताई थी। तावीज़ भी दी थी। न तुम उसे पहचान सके, न बाप की निशानी उसे दिखा सके। तुम्हारी माँ तुम्हारे बिना इस कैद में तड़प रही है और तुम्हारा चाँदी जैसा सीना चीर दिया गया।‘‘

बैन कर-कर के तहमीना कभी सीना कूटती, कभी मुँह पीटती, अपने बाल नोचती और इस तरह से रोती कि सुनने वाला ताब न ला पाता। फिर रोते-रोते बेहोश हो जाती। जब होश में आती तो सोहराब की याद में तड़पने लगती। कभी सोहराब के घोड़े से लिपट जाती, कभी उसको थपकती, उसका मुँह चूमती, फिर सोहराब के तीर व कमान, ढाल और तलवार पर अपना सिर पटकने लगती।

तहमीना रात-दिन सोहराब की याद में रोते हुए कई साल ज़िन्दा रही। फिर एक दिन उसके ग़म को साथ लेकर सोहराब से जा मिली।

Philar

हुमान ने मक्कारी से कहा-“मैंने रुस्तम को कई बार रण-क्षेत्र में देखा है! यह पहलवान रुस्तम नहीं है।‘‘

सूरज ने जैसे ही अपनी सुनहरी किरणें बिखेरीं, रात ने अपने काले डैने समेट लिए। सोहराब नींद से जागा। जिरह-बख़्तर पहन, तीर व कमान, भाला, गदा लेकर वह घोड़े पर बैठा और युद्ध के मैदान की तरफ चल पड़ा।

तहमतन यानी रुस्तम ने बबरेबयान पहना, हथियार उठाए, रख्श घोड़े पर बैठा और रण-क्षेत्र की तरफ चल पड़ा।

जैसे ही सोहराब की नज़र रुस्तम पर पड़ी, उसके दिल में प्यार उमड़ने लगा और हँसकर पूछने लगा-‘‘दिलावर! आपकी रात कैसे गुज़री और अब दिन कैसे गुज़ारेंगे, इस युद्ध का इरादा क्यों नहीं छोड़ देते? कहिए तो मैं आपके कन्धे से तीर व कमान उतार लूँ और बदले की भावना को हम दोनों दिलों से निकाल फेंके और दोस्त बनकर युद्ध का इरादा छोड़ दें। एक साथ बैठें, और जाम भरें। मेरे दिल में जाने क्यों आपके लिए बहुत ज़्यादा प्यार उमड़ रहा है। आप जरूर ऊँची नस्ल और दिलेर पहलवान परिवार से हैं। आप मुझसे अपने को न छुपाएँ

और अपना सही नाम बताएँ। मुझे शक है कि आप ज़ालज़र के बेटे रुस्तम हैं। मैंने आपको बहुत ढूँढ़ा। सबसे पूछा, मगर किसी ने आपका नाम नहीं बताया। आप तो मुझे अपना नाम बता दें।‘‘

रुस्तम ने सोहराब की बात सुनकर कहा-“अरे जवान मर्द कल तक सारी बातें लड़ाई और मरने-मारने की कर रहे थे, हथियार डालने और शराब पीने का कोई ज़िक्र नहीं था। आज ये सब बेकार की बातें और युद्ध रोकने की कोशिशें मत करो। तुम्हारे जाल और फरेब में फँसने वाला नहीं हूँ। तुम जवान हो, तो मैं बच्चा नहीं हूँ। ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव बहुत देखे हैं। हजारों से मिला हूँ। अब देखना है कि खुदा ने हमारी तकदीर में लिखा क्या है?

सोहराब ने जवाब दिया-“बहादुर बुजुर्ग! मेरी सबसे बड़ी इच्छा है कि आपको मौत के मुँह में जाने से बचा लूँ और आप इस दुनिया से जाने के लिए अपने बिस्तर पर ही अपनी आँखें बन्द करें। अगर आपको बहुत जल्दी है और मौत का सामना करना ही चाहते हैं तो फिर खुदा की मर्ज़ी पर छोड़ने के अलावा हमारे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है। घोड़े से उतरिए। लड़ाई शुरू करते हैं।‘‘

दोनों पहलवान अपने-अपने घोड़ों से नीचे उतर आए और उनको बाँधा। एक-दूसरे की कमर में हाथ डाला और इस तरह गुँथ गए जैसे दो अज़दहे एक-दूसरे से लिपट गए हों। सुबह से शाम तक दोनों पहलवान इस कोशिश में लगे रहे कि एक-दूसरे को पछाड़ दें। चेहरे और बदन से खून बह रहा था, मगर दोनों युद्ध किए जा रहे थे।

अन्त में सोहराब ने शेर की तरह दहाड़ मारी और रुस्तम को कमर से पकड़कर दोनों हाथों से सर के ऊपर उठाया और पूरी ताकत से जमीन पर दे मारा और उचककर उसके सीने पर चढ़ बैठा और म्यान से खंजर निकाला ताकि रुस्तम का सिर

धड़ से अलग कर दे। यह देखकर रुस्तम अपनी जान की खैर मनाने लगा। कुछ सोचकर बड़ी नर्मी से सोहराब से कहा-“जवान मर्द! हमारा रिवाज यह है कि जब दो पहलवान कुश्ती लड़ते हैं तो एक-दूसरे को पहली बार ज़मीन पर पटकने पर खंजर नहीं उठाते। अगर दूसरी बार भी पहला दूसरे को ज़मीन पर पटक देता है तो फिर रिवाज के अनुसार उसका सिर धड़ से अलग कर सकता है।‘‘

उधर हुमान सोहराब की प्रतीक्षा में था। जब सोहराब के लौटने में देर हुई तो वह घोड़े पर बैठकर उसे देखने निकला। कुछ देर बाद हुमान ने सोहराब को शिकारगाह के पास देखा। करीब पहुँचकर उससे कुश्ती का हाल पूछा। सोहराब ने सारा माजरा कह सुनाया। सुनकर हुमान दुःख से चीख उठा कि क्या तुम्हारा दिल ज़िन्दगी से भर चुका है, जो हाथ में आए हुए शिकार को छोड़ आए हो? आज तक किसी दिलेर ने हाथ में आए दुश्मन को आज़ाद नहीं किया है। पता नहीं, वक़्त अब क्या गुल खिलाता है? ।

सोहराब ने कहा-“दुःखी मत हो! यह पहलवान मेरे पंजे से आज़ाद नहीं हो सकता। कल फिर वह मैदान में आ रहा है। फिर कुश्ती होगी और इस बार मैं उसका सिर धड़ से अलग कर दूंगा।‘‘

अब रुस्तम सोहराब के चंगुल से छूटा तो सारी नामक चश्मे के किनारे पहुँचा हाथ-मुँह धोया, पानी पिया और सजदे में गिर गया।

कहते हैं कि शुरू में रुस्तम के बदन में इतनी ताकत थी कि यदि वह चलते हुए जरा-सा ज़्यादा जोर पंजों पर डालता, तो वहाँ की जमीन नीचे धंस जाती थी। अपने इस बल से स्वयं रुस्तम भी बहुत परेशान था। इसलिए एक बार रुस्तम ने रो-रोकर खुदा से दुआ मांगी थी कि वह रुस्तम के बदन का बल कम कर दे ताकि वह आराम से कदम रखता हुआ ज़मीन पर चल सके। खुदा ने उसकी दुआ सुन ली और उसके बदन का बल घट गया।

आज रुस्तम ने खुदा के सामने खड़े होकर यह दुआ माँगी कि उसके बदन का घटा बल उसको वापस मिल जाए। इस बार भी खुदा ने उसकी विनती सुन ली और रुस्तम के बदन में नयी ताकत व स्फूर्ति दौड़ गई। उस बल के संग रुस्तम चिंघाड़ता हुआ लड़ाई के मैदान की तरफ बढ़ा।

उधर से सोहराब कमान और कमन्द हाथ में उठाए शेर की तरह गुर्राता हुआ रुस्तम की तरफ बढ़ा। आखिर पर्वतकाय दो पहलवान एक-दूसरे के सामने पहुँचकर ठहर गए। सोहराब रुस्तम के नये जोश व खरोश भरे इस व्यवहार से चकित होकर बोला कि ओ शेर के पंजे से छूट जाने वाले! क्या तुम्हारा दिल जीने से भर चुका है जो दोबारा रण-क्षेत्र में आ गए हो! और आज यह दिलेरी जो तुम दिखा रहे हो, पहले अपना नाम पता तो बताओ।

रुस्तम ने कोई जवाब नहीं दिया। दोनों पहलवान घोड़े से उतरे और कुश्ती लड़ने में व्यस्त हो गए। उनके ऊपर उनकी मौत किसी परन्दे की तरह मँडरा रही थी। सोहराब ने रुस्तम की कमर पकड़ी और चाहा उसे पछाड़े मगर उसकी कमर किसी पर्वत की तरह जड़ थी। इस बार आसमान ने दूसरा रंग दिखाया। रुस्तम ने किसी अजदहे की तरह सोहराब को ऊपर उठाया और जमीन पर दे पटका! रुस्तम को पता था कि सोहराब जमीन पर पड़ा नहीं रह पायेगा। इसलिए उसने कमर से फौरन खंजर निकाला और साहेराब का कलेजा चीरकर रख दिया। सोहराब दर्द से तड़प उठा और ठण्डी साँस भरी। नेकी और बुराई के बारे में उसने सोचा, फिर रुस्तम की तरफ देखा और कहा कि ओ दिलेर! आखिर तुमने मुझे खून में नहला ही दिया। इसमें तेरा कोई कसूर नहीं, बल्कि होना यही था। अभी तो मेरी उम्र के लड़के कहेंगे कि हमारा साथी पहलवान इतनी जल्दी मर गया फिर सोहराब एक आह खींचकर बोला

‘‘माँ ने मेरे बाबा की निशानी (तावीज) के साथ मुझे भेजा था कि मैं जब उन्हें ढूँढ़ लूँगा तो वह मुझे पहचान लेंगे मगर अफसोस यही है कि मैं उन्हें तलाश करता रहा और आज उन्हें देखे बिना मौत को गले लगा रहा हूँ।’’

‘‘मगर तुम उससे बचकर नहीं जा पाओगे, चाहे मछली बनकर पानी में जा छुपो या रात की कालिमा में छुपो या सितारे बनकर आसमान पर टँग जाओ। वह तुमको पकड़ लेंगे।’’

‘‘जब मेरी लाश देखेंगे तब मेरे बाबा तुमसे बदला लेंगे। इन बड़े पहलवानों और नामवरों में से कोई रुस्तम को यह निशानी दिखाए और उन्हें खबर दे कि सोहराब तुम्हें ढूँढ़ता रहा और अब वह इस तरह खाक में पड़ा दम तोड़ रहा है।’’

ये बातें सोहराब के मुँह से सुनकर रुस्तम सन्न रह गया। आँखों के सामने तारे टूटने लगे और चारों तरफ अँधेरा छा गया। एकाएक वह बेहोश हो गया। जब रुस्तम को होश आया तो उसने देखा कि सोहराब खून में नहाया उसके सामने जमीन पर पड़ा है।

रुस्तम ने सोहराब का सर अपनी जाँघ पर प्यार से रखा और एकाएक पीड़ा से चीत्कार कर उठा कि रुस्तम की नस्ल इस ज़मीन से अब मिट जायेगी। फिर रुस्तम ने सोहराब से पूछा कि बताओ अपने पिता की कौन-सी निशानी तुम्हारे पास है? मैं रुस्तम हूँ। खुदा करे मेरे ये हाथ कट जाएँ जिनसे मैंने अपने बेटे का कलेजा चीरा है। इतना कहकर रुस्तम फफक कर रो पड़ा और गम में अपना चेहरा तथा बाल नोच डाले।

सोहराब ने रुस्तम की जब यह हालत देखी तो पूछा कि पहलवान! अगर रुस्तम तुम्ही हो, तो फिर मुझसे यह बात छुपाई क्यों? मैंने तो हर तरह से तुम्हारा नाम और पता जानना चाहा था। मगर तुम्हारे दिल में मेरे लिए ज़र्रा बराबर भी प्यार नहीं उमड़ा। मेरा जोशन खोलो और देखो। जब मैं फौज के साथ ईरान की तरफ चलने लगा था, उस वक्त मेरी माँ डबडबाई आँखों से मेरे पास आई थीं और यह तावीज मेरे बाजू पर

बाँधकर कहा था कि यह तुम्हारे पिता रुस्तम की यादगार है। रास्ते में काम आयेगी। मगर अफसोस जब यह काम आई तो मेरे जाने का समय आ गया है।

रुस्तम ने जल्दी से सोहराब के लिबास का बन्द खोला और अपना तावीज़ उसने सोहराब के बाजू पर बँधा देखा। यह देखकर रुस्तम गम से पागल हो उठा। उत्तेजना से कपड़े फाड़ने और रोने-चिल्लाने लगा कि ओ दिलावर बेटे! ऐ मेरे जवान बेटे! अभी तो तुम्हारे गालों के गुलाब ताज़ा थे कि तुम मुरझा गए! अभी तो तुम्हारी उम्र का सूरज पूरे शबाब पर भी नहीं चढ़ा कि तुम अँधेरे में डूब गए! अपने पिता के हाथों क़त्ल हुए और बहार आने से पहले ही पतझड़ बन गए। सोहराब रुस्तम का यह दुःख देखकर ठण्डी साँस भरकर कहने लगा कि खुदा की मर्जी यही थी। अब इस तरह से रोने-चिल्लाने और शोक मनाने से क्या हासिल होगा? मेरी किस्मत में यही लिखा था कि पिता के हाथों मारा जाऊँ। वही हुआ। आप यूँ गम न मनाएँ।

सूरज डूबने को आया और जब रुस्तम फौज के पड़ाव की ओर नहीं लौटा तो शाह काऊस ने बीस फुर्तीले सवारों को रुस्तम की खबर लेने के लिए रण-क्षेत्र की तरफ भेजा। उन्होंने वहाँ पहुँचकर देखा कि दोनों घोड़े बधे हुए हैं और जीन पर रुस्तम नहीं है। वे समझे रुस्तम युद्ध में काम आ गया। वे फौरन उल्टे पाँव सन्देश देने शाह काऊस की तरफ दौड़े।

फौज में इस ख़बर से सनसनी फैल गई। सारे बहादुर एवं पहलवान शाह काऊस के पास पहुँचे। शाह काऊस ने आदेश दिया कि एक सवार फिर जाकर पता लगाए कि रुस्तम का क्या हुआ और सोहराब का अब क्या इरादा है। यदि रुस्तम को कैद कर लिया गया है तो ये नौ पहलवान उसको स्वतन्त्र कराने की कोशिश करें। उस समय हम तूरान की फौज पर हमला करेंगे और इस समस्या का समाधान निकालेंगे।

दूर से सोहराब ने जब घोड़ों के दौड़ने की आवाज सुनी तो रुस्तम से कहने लगा कि मेरा समय तो खत्म हुआ। तूरानी फौज संकट में पड़ गई है। आप कोशिश करें कि ईरानी फौज तूरानी सिपाहियों को परेशान न करे। उनकी कोई गलती नहीं है। वे मेरी इच्छा का आदर करते हुए मेरे साथ यहाँ आए थे। मैंने उन्हें बड़ी आशाएँ दिलाई थीं। उनसे कहा था कि जब मैं और मेरे बाबा रुस्तम एक हो जाएँगे तो इस दुनिया को अपने क़दमों पर झुका लेंगे। अफसोस मैं अपने बाबा के हाथों मौत के सिवा कुछ न पा सका! जब सफेद किले पर मैंने हमला किया था तो ईरानी सिपाहसालार को कैदी बनाया था। मैंने उससे भी आपका पता बहुत पूछा। उसकी सारी बातें बेतुकी थीं। उसने मुझसे सब भेद छुपाया और आज उसी के कारण यह अन्धेरा देखना पड़ा। आप उसका ध्यान रखें कि उसको कोई हानि न पहुँचे। माँ ने आपकी पहचान ज़बानी बताई थी, जब मैं आपको देखता था तो सारी बातें मैं आपमें पाता था, मगर यकीन नहीं होता था। खुदा को यही मंजूर था। मैं बिजली की तरह आया और हवा की तरह जा रहा हूँ। मगर आपकी दुनिया में दोबारा जरूर आऊँगा। इतना कहकर सोहराब की आवाज टूटने लगी और आँखें आँसुओं से भर गईं।

ये बातें सुनकर रुस्तम का कलेजा मुँह को आने लगा और साँस लेने में बहुत कठिनाई महसूस होने लगी। टूटे दिल और भीगी आँखों के साथ रुस्तम रख़्श पर बैठा और फौज के पड़ाव की तरफ घोड़ा दौड़ाया। ईरानी सिपाहियों ने जब दूर से रुस्तम को आते देखा तो खुदा को धन्यवाद दिया। मगर जब रुस्तम करीब पहुँचा और उसका फटा लिबास, चेहरे पर ख़राश और ग़म से उसे बेहाल देखा तो सबने इसका कारण पूछा। रुस्तम ने बताया कि उसने अपने ही हाथों अपने बेटे को क़त्ल कर दिया है। यह सुनकर सारे सिपाही ग़म से चीख उठे!

रुस्तम ने ग़म से निढाल होकर कहा कि न तो मुझे दिल की खबर है, न तन का होश है। लेकिन अब तुम लोग तूरानी फौज पर आक्रमण नहीं करोगे। आज मुझसे जो काम हुआ है, वही गुनाह के लिए काफी है। इसी बीच रुस्तम का भाई जवारेह आ गया। भाई को फटे हाल देखकर ताज्जुब में पड़ गया। रुस्तम ने उससे कहा कि हुमान को खबर कर दे कि वह अपनी तलवार म्यान में रखे। सोहराब का यह हाल हुजीर के कारण हुआ है। उसको अपने सामने लाने का आदेश रुस्तम ने दिया।

हुजीर की बात सुनकर रुस्तम दुखी हुआ और क्रोध में आकर उसकी हत्या करने के लिए आगे बढ़ा। मगर बीच में ही उसे रोककर पहलवानों ने उसकी जान बख्श देने की विनती की। तंग आकर रुस्तम अपना ही खंजर उठाकर खुद अपना सिर तन से जुदा करने वाला था कि गूदर्ज़ ने उसे समझाया कि इससे क्या फायदा? अब तो जो हो चुका, वह वापस नहीं आ सकता है। इसलिए सोहराब की मौत उतनी महत्वपूर्ण नहीं जितना किसी पहलवान का नाम अमर हो जाना महत्वपूर्ण है। रुस्तम के मन-मस्तिष्क की उत्तेजना शान्त होने लगी। वह गूदर्ज़ से बोला कि तुम शाह काऊस के पास जाओ और मेरा पैग़ाम उनसे कहना कि अब रुस्तम ज़्यादा दिन ज़िन्दा नहीं रहेगा। अपने ही खंजर से अपने जिगर के टुकड़े का सीना चीर दिया है। शाह से मेरी विनती है कि उनके खज़ाने में जो ‘नौशादर‘ है, वह मेरे जख्मी बेटे के लिए मुझे एक जाम भरकर दें ताकि मैं अपने बेटे को बचा सकूँ। मैं अभी ज़िन्दा हूँ उनकी और उनके राज्य की मैं रक्षा करूँगा।

गूदर्ज़ यह पैगाम लेकर शाह काऊस के खेमे में पहुँचा और सारी बात बताकर रुस्तम द्वारा कही दवा माँगी। शाह काऊस ने सारी बात ध्यान से सुनी और मन-ही-मन सोचा कि रुस्तम जैसे पहलवान का बेटा सोहराब है जो पहले ही इस बात का दावा कर चुका है कि वह मुझे मिटा देगा और ईरान को जीत लेगा। ऐसे समय में यह दबा रुस्तम को भेजना उचित नहीं है। कल कहीं ये दोनों बाप-बेटे मिल गए तो मेरा क्या होगा? उसने दवा देने से इंकार कर दिया और अपना भय भी बयान कर दिया।

यह जवाब सुनकर गूदर्ज़ हवा की तरह रुस्तम के पास पहुँचा और शाह काऊस के इंकार की बात रुस्तम को बताकर कहा कि बेहतर है कि रुस्तम आखिरी वक्त बेटे के सिरहाने रहे ताकि इस अँधेरे में डूबते हुए दिल व दिमाग को कुछ रोशनी मिल सके।

अभी रुस्तम बीच रास्ते में ही था कि कोई तेजी से उसकी तरफ सूचना देने बढ़ा कि

‘‘सोहराब इस दुनिया को छोड़ चुका है। अब उसे न महल चाहिए न तख्त न ताबूत ! यह खबर सुनकर बाप ने एक लम्बी आह खींची और रोते हुए पलकें एक-दूसरे पर रखीं।’’

रुस्तम रख़्श से नीचे उतरा और सिर पर टोपी की जगह जमीन की खाक उठाकर डालने लगा और बैन करने लगा कि मैं ये दोनों हाथ काटकर रख दूँ जिन्होंने खंजर उठाया था। अब किस तरह और किस मुँह से तहमीना को यह खबर दूंगा कि मैंने उसके बेटे-अपने जिगर के टुकड़े को अपने ही हाथों से मार डाला! मुझ पर सब लानत भेजेंगे कि मैंने अपने खानदान साम पहलवान के नाम धब्बा लगाया है। इस खबर से पिता ज़ालज़र व माँ रुदाबे का क्या हाल होगा।

रुस्तम सोचने लगा कि किस तरह से जोश व खरोश से भरा यह जवान कल इस मैदान में विजय पताका लहराने आया था। आज वहीं से उसका ताबूत उठ रहा है।

जब सोहराब की मौत की ख़बर काऊस के पास पहुंची तो वह रुस्तम को दिलासा देने पहुँचा। रुस्तम का इतना बुरा हाल देखकर शाह काऊस को बहुत दुःख हुआ। उसने सोहराब को याद करते हुए उसके बल और दिलेर व्यक्तित्व की प्रशंसा की और कहा कि अब रुस्तम को इस दुःख में अपने को मजबूती से सँभालना चाहिए और इस हक़ीकत को समझ लेना चाहिए कि इस दुनिया में जो आया है, वह एक दिन वापस जायेगा चाहे देर में चाहे जल्दी इसलिए रुस्तम कब तक बेटे के शोक में डूबा रहेगा।

रुस्तम ने शाह काऊस से कहा कि वह बिल्कुल टूट चुका है। उसमें कुछ भी करने की शक्ति नहीं रह गई है। यदि शाह काऊस उचित समझें तो जवारेह को हुमान के पास भेजें ताकि उसकी सुरक्षा में तूरानी फौज सुरक्षित समनगान लौट जाए।

शाह काऊस ने अनुरोध सुना और कहा कि बेशक मैं उस तुर्क के व्यवहार से खुश नहीं था। मगर यह कोई बदला लेने का समय नहीं है। जब रुस्तम इस तरह दुःख में डूबा है तो मैं भी उसके दुःख में बराबर शरीक़ हूँ। इतना कहकर शाह काऊस अपनी फौज के साथ ईरान लौट गया।

शाह काऊस के ईरान की तरफ कूच कर जाने के बाद रुस्तम वहाँ तन्हा रहकर जवारेह की वापसी का इन्तजार कर रहा था ताकि वह तूरानी फौज की सुरक्षित वापसी का समाचार जान सके।

जवारेह के आने के बाद रुस्तम ने जाबुलिस्तान की तरफ जाने की तैयारी कर ली। उसके आने की खबर जब ज़ालज़र के पास पहुंची तो सारा सीस्तान शोक में रोता-बिलखता वहाँ पहुँच गया।

‘‘सिपाही ताबूत के आगे-आगे चल रहे थे और ताबूत के पीछे रोते हुए बुजुर्ग। जैसे ही ज़ालज़र की नज़र दूर से ताबूत पर पड़ी वह अपने घोड़े से उतर गया। रुस्तम पैदल चल रहा था। उसका दिल टुकड़े-टुकड़े था, कपड़े फटे थे और चहेरा ग़म से बेहाल था।’’

सारे पहलवानों ने ताबूत को देखकर क़मर ख़म की और सम्मान में सिर झुकाया। ताबूत के ऊँट की पीठ से नीचे उतारकर जमीन पर रखा गया तो रुस्तम रोता हुआ ज़ालज़र को सम्बोधित करता हुआ आगे बढ़ा और बेटे के ताबूत पर सिर रखकर बोला-“इस तंग ताबूत में मेरा बाघ सोया पड़ा है।‘‘ रुस्तम की बात सुनकर ज़ालज़र की आँखें खून के आँसू रोई। रुस्तम ने दुःख में प्रलाप करते हुए कहा-“तुम चले गए और मैं दुखी और अपमानित यहाँ रह गया।‘‘ ज़ालज़र ने पोते की उम्र देखकर आश्चर्य प्रकट करते हुए दुःखी स्वर में कहा-“इस नन्ही-सी उम्र में उसने इतनी दिलेरी का काम किया और गदा हाथ में उठाया। वह सचमुच अजूबा था। ऐसे बच्चे रोज़ कहाँ पैदा होते हैं।” इतना कहकर ज़ालज़र ने अपनी आँखें बन्द कर लीं जिनमें से लगातार आँसू झर रहे थे।

रुदाबे ने जब सोहराब की लाश देखी तो ग़म से उसका कलेजा फटने लगा। बेटे का ग़म और पोते की मौत की खबर सुनकर वह कहने लगी कि जब इसके खेलने-खाने के दिन थे तो यह चल बसा। जाबुलिस्तान के लोगों के चेहरे ग़म से स्याह और आँखें दुख से लाल हो रही थीं।

जिसने भी यह ख़बर सुनी कि बाप के हाथों बेटा मारा गया, उसकी आँखें आँसुओं से भर आईं। रुस्तम ने अपने हाथों से बेटे को कफन पहनाया और ताबूत में लिटाया। सोहराब को दफनाए हुए कई दिन गुजर गए थे, मगर रुस्तम का दिल खुशी को फिर हासिल न कर सका और स्वयं से बार-बार यही कहता कि ज़माने की मार से कब किसका दिल जख्मी हो जाए, यह कौन जानता है।

हुमान जाबुलिस्तान से तूरान की तरफ लौट गया और शाह अफरासियाब से सारी घटना बताईं सुनकर अफरासियाब चकित रह गया। उसके मन की इच्छा सोहराब की मौत से पूरी हुई। यह खबर जब ईरान पहुँची तो रुस्तम के गम में सब शरीक हुए और सोहराब के लिए उनकी आँखें भर आईं।

सोहराब के मरने की खबर तूरान से जब शहर-ए-समनगान पहुँची तो सोहराब के नाना, शाह समनगान दुःख से दीवाने होकर अपने कपड़े फाड़ने लगे। यही हाल तहमीना का हुआ। उसने अपने चेहरे को दुःख में नोच लिया। मुँह को दोनों हाथों से पीटा और धुंघराली जुल्फों में उँगलियों में फंसाकर खींचा। उसके चेहरे पर पड़ी खरोंचों से खून छलक आया और सफेद बदन पर जगह-जगह जख़्म के लाल निशान उभर आये। बैन करती हुई तहमीना कहने लगी:

‘‘मेरे बेटे तुम कहाँ खून व ख़ाक में खो गये हो। मैं तुम्हारी राह में आँखें बिछाए बैठी थी कि मुझे बेटे सोहराब और बाप रुस्तम की खबर एक साथ मिलेगी।’’

“मुझे गुमान हुआ कि तुम लौट आए हो। आह, ऐसे कोई अपने बाबा को ढूँढ़ने और पाने जाता है! तुम्हें जाने की इतनी जल्दी क्यों थी! मुझे क्या पता था बेटे, कि रुस्तम शिकारगाह में तुम्हारा ही जिगर चीरकर रख देगा।

 ‘‘मैंने किस दुलार और प्यार से तुझे पाला था! रात और दिन की मेहनत से तेरा बदन तन्दुरुस्त बनाया था। आज वही तन खून में डूबा कब्र में चला गया और कफन उसका लिबास बन गया।’’

तहमीना अपना सीना पीटती हुई बोली-“इस दुःख को किससे कहूँ। कौन है मेरी सुनने वाला। तुम्हारी जगह मैं किसको पुकारूँ बोलो, अब कौन है मेरा? अफसोस! मेरे जिगर का टुकड़ा, आँखों की रोशनी, बाग और महल से निकलकर ख़ाक में मिल गई है। मैंने तो तुम्हें बाबा की पहचान बताई थी। तावीज़ भी दी थी। न तुम उसे पहचान सके, न बाप की निशानी उसे दिखा सके। तुम्हारी माँ तुम्हारे बिना इस कैद में तड़प रही है और तुम्हारा चाँदी जैसा सीना चीर दिया गया।‘‘

बैन कर-कर के तहमीना कभी सीना कूटती, कभी मुँह पीटती, अपने बाल नोचती और इस तरह से रोती कि सुनने वाला ताब न ला पाता। फिर रोते-रोते बेहोश हो जाती। जब होश में आती तो सोहराब की याद में तड़पने लगती। कभी सोहराब के घोड़े से लिपट जाती, कभी उसको थपकती, उसका मुँह चूमती, फिर सोहराब के तीर व कमान, ढाल और तलवार पर अपना सिर पटकने लगती।

तहमीना रात-दिन सोहराब की याद में रोते हुए कई साल ज़िन्दा रही। फिर एक दिन उसके ग़म को साथ लेकर सोहराब से जा मिली।

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हुमान ने मक्कारी से कहा-“मैंने रुस्तम को कई बार रण-क्षेत्र में देखा है! यह पहलवान रुस्तम नहीं है।‘‘

सूरज ने जैसे ही अपनी सुनहरी किरणें बिखेरीं, रात ने अपने काले डैने समेट लिए। सोहराब नींद से जागा। जिरह-बख़्तर पहन, तीर व कमान, भाला, गदा लेकर वह घोड़े पर बैठा और युद्ध के मैदान की तरफ चल पड़ा।

तहमतन यानी रुस्तम ने बबरेबयान पहना, हथियार उठाए, रख्श घोड़े पर बैठा और रण-क्षेत्र की तरफ चल पड़ा।

जैसे ही सोहराब की नज़र रुस्तम पर पड़ी, उसके दिल में प्यार उमड़ने लगा और हँसकर पूछने लगा-‘‘दिलावर! आपकी रात कैसे गुज़री और अब दिन कैसे गुज़ारेंगे, इस युद्ध का इरादा क्यों नहीं छोड़ देते? कहिए तो मैं आपके कन्धे से तीर व कमान उतार लूँ और बदले की भावना को हम दोनों दिलों से निकाल फेंके और दोस्त बनकर युद्ध का इरादा छोड़ दें। एक साथ बैठें, और जाम भरें। मेरे दिल में जाने क्यों आपके लिए बहुत ज़्यादा प्यार उमड़ रहा है। आप जरूर ऊँची नस्ल और दिलेर पहलवान परिवार से हैं। आप मुझसे अपने को न छुपाएँ

और अपना सही नाम बताएँ। मुझे शक है कि आप ज़ालज़र के बेटे रुस्तम हैं। मैंने आपको बहुत ढूँढ़ा। सबसे पूछा, मगर किसी ने आपका नाम नहीं बताया। आप तो मुझे अपना नाम बता दें।‘‘

रुस्तम ने सोहराब की बात सुनकर कहा-“अरे जवान मर्द कल तक सारी बातें लड़ाई और मरने-मारने की कर रहे थे, हथियार डालने और शराब पीने का कोई ज़िक्र नहीं था। आज ये सब बेकार की बातें और युद्ध रोकने की कोशिशें मत करो। तुम्हारे जाल और फरेब में फँसने वाला नहीं हूँ। तुम जवान हो, तो मैं बच्चा नहीं हूँ। ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव बहुत देखे हैं। हजारों से मिला हूँ। अब देखना है कि खुदा ने हमारी तकदीर में लिखा क्या है?

सोहराब ने जवाब दिया-“बहादुर बुजुर्ग! मेरी सबसे बड़ी इच्छा है कि आपको मौत के मुँह में जाने से बचा लूँ और आप इस दुनिया से जाने के लिए अपने बिस्तर पर ही अपनी आँखें बन्द करें। अगर आपको बहुत जल्दी है और मौत का सामना करना ही चाहते हैं तो फिर खुदा की मर्ज़ी पर छोड़ने के अलावा हमारे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है। घोड़े से उतरिए। लड़ाई शुरू करते हैं।‘‘

दोनों पहलवान अपने-अपने घोड़ों से नीचे उतर आए और उनको बाँधा। एक-दूसरे की कमर में हाथ डाला और इस तरह गुँथ गए जैसे दो अज़दहे एक-दूसरे से लिपट गए हों। सुबह से शाम तक दोनों पहलवान इस कोशिश में लगे रहे कि एक-दूसरे को पछाड़ दें। चेहरे और बदन से खून बह रहा था, मगर दोनों युद्ध किए जा रहे थे।

अन्त में सोहराब ने शेर की तरह दहाड़ मारी और रुस्तम को कमर से पकड़कर दोनों हाथों से सर के ऊपर उठाया और पूरी ताकत से जमीन पर दे मारा और उचककर उसके सीने पर चढ़ बैठा और म्यान से खंजर निकाला ताकि रुस्तम का सिर

धड़ से अलग कर दे। यह देखकर रुस्तम अपनी जान की खैर मनाने लगा। कुछ सोचकर बड़ी नर्मी से सोहराब से कहा-“जवान मर्द! हमारा रिवाज यह है कि जब दो पहलवान कुश्ती लड़ते हैं तो एक-दूसरे को पहली बार ज़मीन पर पटकने पर खंजर नहीं उठाते। अगर दूसरी बार भी पहला दूसरे को ज़मीन पर पटक देता है तो फिर रिवाज के अनुसार उसका सिर धड़ से अलग कर सकता है।‘‘

उधर हुमान सोहराब की प्रतीक्षा में था। जब सोहराब के लौटने में देर हुई तो वह घोड़े पर बैठकर उसे देखने निकला। कुछ देर बाद हुमान ने सोहराब को शिकारगाह के पास देखा। करीब पहुँचकर उससे कुश्ती का हाल पूछा। सोहराब ने सारा माजरा कह सुनाया। सुनकर हुमान दुःख से चीख उठा कि क्या तुम्हारा दिल ज़िन्दगी से भर चुका है, जो हाथ में आए हुए शिकार को छोड़ आए हो? आज तक किसी दिलेर ने हाथ में आए दुश्मन को आज़ाद नहीं किया है। पता नहीं, वक़्त अब क्या गुल खिलाता है? ।

सोहराब ने कहा-“दुःखी मत हो! यह पहलवान मेरे पंजे से आज़ाद नहीं हो सकता। कल फिर वह मैदान में आ रहा है। फिर कुश्ती होगी और इस बार मैं उसका सिर धड़ से अलग कर दूंगा।‘‘

अब रुस्तम सोहराब के चंगुल से छूटा तो सारी नामक चश्मे के किनारे पहुँचा हाथ-मुँह धोया, पानी पिया और सजदे में गिर गया।

कहते हैं कि शुरू में रुस्तम के बदन में इतनी ताकत थी कि यदि वह चलते हुए जरा-सा ज़्यादा जोर पंजों पर डालता, तो वहाँ की जमीन नीचे धंस जाती थी। अपने इस बल से स्वयं रुस्तम भी बहुत परेशान था। इसलिए एक बार रुस्तम ने रो-रोकर खुदा से दुआ मांगी थी कि वह रुस्तम के बदन का बल कम कर दे ताकि वह आराम से कदम रखता हुआ ज़मीन पर चल सके। खुदा ने उसकी दुआ सुन ली और उसके बदन का बल घट गया।

आज रुस्तम ने खुदा के सामने खड़े होकर यह दुआ माँगी कि उसके बदन का घटा बल उसको वापस मिल जाए। इस बार भी खुदा ने उसकी विनती सुन ली और रुस्तम के बदन में नयी ताकत व स्फूर्ति दौड़ गई। उस बल के संग रुस्तम चिंघाड़ता हुआ लड़ाई के मैदान की तरफ बढ़ा।

उधर से सोहराब कमान और कमन्द हाथ में उठाए शेर की तरह गुर्राता हुआ रुस्तम की तरफ बढ़ा। आखिर पर्वतकाय दो पहलवान एक-दूसरे के सामने पहुँचकर ठहर गए। सोहराब रुस्तम के नये जोश व खरोश भरे इस व्यवहार से चकित होकर बोला कि ओ शेर के पंजे से छूट जाने वाले! क्या तुम्हारा दिल जीने से भर चुका है जो दोबारा रण-क्षेत्र में आ गए हो! और आज यह दिलेरी जो तुम दिखा रहे हो, पहले अपना नाम पता तो बताओ।

रुस्तम ने कोई जवाब नहीं दिया। दोनों पहलवान घोड़े से उतरे और कुश्ती लड़ने में व्यस्त हो गए। उनके ऊपर उनकी मौत किसी परन्दे की तरह मँडरा रही थी। सोहराब ने रुस्तम की कमर पकड़ी और चाहा उसे पछाड़े मगर उसकी कमर किसी पर्वत की तरह जड़ थी। इस बार आसमान ने दूसरा रंग दिखाया। रुस्तम ने किसी अजदहे की तरह सोहराब को ऊपर उठाया और जमीन पर दे पटका! रुस्तम को पता था कि सोहराब जमीन पर पड़ा नहीं रह पायेगा। इसलिए उसने कमर से फौरन खंजर निकाला और साहेराब का कलेजा चीरकर रख दिया। सोहराब दर्द से तड़प उठा और ठण्डी साँस भरी। नेकी और बुराई के बारे में उसने सोचा, फिर रुस्तम की तरफ देखा और कहा कि ओ दिलेर! आखिर तुमने मुझे खून में नहला ही दिया। इसमें तेरा कोई कसूर नहीं, बल्कि होना यही था। अभी तो मेरी उम्र के लड़के कहेंगे कि हमारा साथी पहलवान इतनी जल्दी मर गया फिर सोहराब एक आह खींचकर बोला

‘‘माँ ने मेरे बाबा की निशानी (तावीज) के साथ मुझे भेजा था कि मैं जब उन्हें ढूँढ़ लूँगा तो वह मुझे पहचान लेंगे मगर अफसोस यही है कि मैं उन्हें तलाश करता रहा और आज उन्हें देखे बिना मौत को गले लगा रहा हूँ।’’

‘‘मगर तुम उससे बचकर नहीं जा पाओगे, चाहे मछली बनकर पानी में जा छुपो या रात की कालिमा में छुपो या सितारे बनकर आसमान पर टँग जाओ। वह तुमको पकड़ लेंगे।’’

‘‘जब मेरी लाश देखेंगे तब मेरे बाबा तुमसे बदला लेंगे। इन बड़े पहलवानों और नामवरों में से कोई रुस्तम को यह निशानी दिखाए और उन्हें खबर दे कि सोहराब तुम्हें ढूँढ़ता रहा और अब वह इस तरह खाक में पड़ा दम तोड़ रहा है।’’

ये बातें सोहराब के मुँह से सुनकर रुस्तम सन्न रह गया। आँखों के सामने तारे टूटने लगे और चारों तरफ अँधेरा छा गया। एकाएक वह बेहोश हो गया। जब रुस्तम को होश आया तो उसने देखा कि सोहराब खून में नहाया उसके सामने जमीन पर पड़ा है।

रुस्तम ने सोहराब का सर अपनी जाँघ पर प्यार से रखा और एकाएक पीड़ा से चीत्कार कर उठा कि रुस्तम की नस्ल इस ज़मीन से अब मिट जायेगी। फिर रुस्तम ने सोहराब से पूछा कि बताओ अपने पिता की कौन-सी निशानी तुम्हारे पास है? मैं रुस्तम हूँ। खुदा करे मेरे ये हाथ कट जाएँ जिनसे मैंने अपने बेटे का कलेजा चीरा है। इतना कहकर रुस्तम फफक कर रो पड़ा और गम में अपना चेहरा तथा बाल नोच डाले।

सोहराब ने रुस्तम की जब यह हालत देखी तो पूछा कि पहलवान! अगर रुस्तम तुम्ही हो, तो फिर मुझसे यह बात छुपाई क्यों? मैंने तो हर तरह से तुम्हारा नाम और पता जानना चाहा था। मगर तुम्हारे दिल में मेरे लिए ज़र्रा बराबर भी प्यार नहीं उमड़ा। मेरा जोशन खोलो और देखो। जब मैं फौज के साथ ईरान की तरफ चलने लगा था, उस वक्त मेरी माँ डबडबाई आँखों से मेरे पास आई थीं और यह तावीज मेरे बाजू पर

बाँधकर कहा था कि यह तुम्हारे पिता रुस्तम की यादगार है। रास्ते में काम आयेगी। मगर अफसोस जब यह काम आई तो मेरे जाने का समय आ गया है।

रुस्तम ने जल्दी से सोहराब के लिबास का बन्द खोला और अपना तावीज़ उसने सोहराब के बाजू पर बँधा देखा। यह देखकर रुस्तम गम से पागल हो उठा। उत्तेजना से कपड़े फाड़ने और रोने-चिल्लाने लगा कि ओ दिलावर बेटे! ऐ मेरे जवान बेटे! अभी तो तुम्हारे गालों के गुलाब ताज़ा थे कि तुम मुरझा गए! अभी तो तुम्हारी उम्र का सूरज पूरे शबाब पर भी नहीं चढ़ा कि तुम अँधेरे में डूब गए! अपने पिता के हाथों क़त्ल हुए और बहार आने से पहले ही पतझड़ बन गए। सोहराब रुस्तम का यह दुःख देखकर ठण्डी साँस भरकर कहने लगा कि खुदा की मर्जी यही थी। अब इस तरह से रोने-चिल्लाने और शोक मनाने से क्या हासिल होगा? मेरी किस्मत में यही लिखा था कि पिता के हाथों मारा जाऊँ। वही हुआ। आप यूँ गम न मनाएँ।

सूरज डूबने को आया और जब रुस्तम फौज के पड़ाव की ओर नहीं लौटा तो शाह काऊस ने बीस फुर्तीले सवारों को रुस्तम की खबर लेने के लिए रण-क्षेत्र की तरफ भेजा। उन्होंने वहाँ पहुँचकर देखा कि दोनों घोड़े बधे हुए हैं और जीन पर रुस्तम नहीं है। वे समझे रुस्तम युद्ध में काम आ गया। वे फौरन उल्टे पाँव सन्देश देने शाह काऊस की तरफ दौड़े।

फौज में इस ख़बर से सनसनी फैल गई। सारे बहादुर एवं पहलवान शाह काऊस के पास पहुँचे। शाह काऊस ने आदेश दिया कि एक सवार फिर जाकर पता लगाए कि रुस्तम का क्या हुआ और सोहराब का अब क्या इरादा है। यदि रुस्तम को कैद कर लिया गया है तो ये नौ पहलवान उसको स्वतन्त्र कराने की कोशिश करें। उस समय हम तूरान की फौज पर हमला करेंगे और इस समस्या का समाधान निकालेंगे।

दूर से सोहराब ने जब घोड़ों के दौड़ने की आवाज सुनी तो रुस्तम से कहने लगा कि मेरा समय तो खत्म हुआ। तूरानी फौज संकट में पड़ गई है। आप कोशिश करें कि ईरानी फौज तूरानी सिपाहियों को परेशान न करे। उनकी कोई गलती नहीं है। वे मेरी इच्छा का आदर करते हुए मेरे साथ यहाँ आए थे। मैंने उन्हें बड़ी आशाएँ दिलाई थीं। उनसे कहा था कि जब मैं और मेरे बाबा रुस्तम एक हो जाएँगे तो इस दुनिया को अपने क़दमों पर झुका लेंगे। अफसोस मैं अपने बाबा के हाथों मौत के सिवा कुछ न पा सका! जब सफेद किले पर मैंने हमला किया था तो ईरानी सिपाहसालार को कैदी बनाया था। मैंने उससे भी आपका पता बहुत पूछा। उसकी सारी बातें बेतुकी थीं। उसने मुझसे सब भेद छुपाया और आज उसी के कारण यह अन्धेरा देखना पड़ा। आप उसका ध्यान रखें कि उसको कोई हानि न पहुँचे। माँ ने आपकी पहचान ज़बानी बताई थी, जब मैं आपको देखता था तो सारी बातें मैं आपमें पाता था, मगर यकीन नहीं होता था। खुदा को यही मंजूर था। मैं बिजली की तरह आया और हवा की तरह जा रहा हूँ। मगर आपकी दुनिया में दोबारा जरूर आऊँगा। इतना कहकर सोहराब की आवाज टूटने लगी और आँखें आँसुओं से भर गईं।

ये बातें सुनकर रुस्तम का कलेजा मुँह को आने लगा और साँस लेने में बहुत कठिनाई महसूस होने लगी। टूटे दिल और भीगी आँखों के साथ रुस्तम रख़्श पर बैठा और फौज के पड़ाव की तरफ घोड़ा दौड़ाया। ईरानी सिपाहियों ने जब दूर से रुस्तम को आते देखा तो खुदा को धन्यवाद दिया। मगर जब रुस्तम करीब पहुँचा और उसका फटा लिबास, चेहरे पर ख़राश और ग़म से उसे बेहाल देखा तो सबने इसका कारण पूछा। रुस्तम ने बताया कि उसने अपने ही हाथों अपने बेटे को क़त्ल कर दिया है। यह सुनकर सारे सिपाही ग़म से चीख उठे!

रुस्तम ने ग़म से निढाल होकर कहा कि न तो मुझे दिल की खबर है, न तन का होश है। लेकिन अब तुम लोग तूरानी फौज पर आक्रमण नहीं करोगे। आज मुझसे जो काम हुआ है, वही गुनाह के लिए काफी है। इसी बीच रुस्तम का भाई जवारेह आ गया। भाई को फटे हाल देखकर ताज्जुब में पड़ गया। रुस्तम ने उससे कहा कि हुमान को खबर कर दे कि वह अपनी तलवार म्यान में रखे। सोहराब का यह हाल हुजीर के कारण हुआ है। उसको अपने सामने लाने का आदेश रुस्तम ने दिया।

हुजीर की बात सुनकर रुस्तम दुखी हुआ और क्रोध में आकर उसकी हत्या करने के लिए आगे बढ़ा। मगर बीच में ही उसे रोककर पहलवानों ने उसकी जान बख्श देने की विनती की। तंग आकर रुस्तम अपना ही खंजर उठाकर खुद अपना सिर तन से जुदा करने वाला था कि गूदर्ज़ ने उसे समझाया कि इससे क्या फायदा? अब तो जो हो चुका, वह वापस नहीं आ सकता है। इसलिए सोहराब की मौत उतनी महत्वपूर्ण नहीं जितना किसी पहलवान का नाम अमर हो जाना महत्वपूर्ण है। रुस्तम के मन-मस्तिष्क की उत्तेजना शान्त होने लगी। वह गूदर्ज़ से बोला कि तुम शाह काऊस के पास जाओ और मेरा पैग़ाम उनसे कहना कि अब रुस्तम ज़्यादा दिन ज़िन्दा नहीं रहेगा। अपने ही खंजर से अपने जिगर के टुकड़े का सीना चीर दिया है। शाह से मेरी विनती है कि उनके खज़ाने में जो ‘नौशादर‘ है, वह मेरे जख्मी बेटे के लिए मुझे एक जाम भरकर दें ताकि मैं अपने बेटे को बचा सकूँ। मैं अभी ज़िन्दा हूँ उनकी और उनके राज्य की मैं रक्षा करूँगा।

गूदर्ज़ यह पैगाम लेकर शाह काऊस के खेमे में पहुँचा और सारी बात बताकर रुस्तम द्वारा कही दवा माँगी। शाह काऊस ने सारी बात ध्यान से सुनी और मन-ही-मन सोचा कि रुस्तम जैसे पहलवान का बेटा सोहराब है जो पहले ही इस बात का दावा कर चुका है कि वह मुझे मिटा देगा और ईरान को जीत लेगा। ऐसे समय में यह दबा रुस्तम को भेजना उचित नहीं है। कल कहीं ये दोनों बाप-बेटे मिल गए तो मेरा क्या होगा? उसने दवा देने से इंकार कर दिया और अपना भय भी बयान कर दिया।

यह जवाब सुनकर गूदर्ज़ हवा की तरह रुस्तम के पास पहुँचा और शाह काऊस के इंकार की बात रुस्तम को बताकर कहा कि बेहतर है कि रुस्तम आखिरी वक्त बेटे के सिरहाने रहे ताकि इस अँधेरे में डूबते हुए दिल व दिमाग को कुछ रोशनी मिल सके।

अभी रुस्तम बीच रास्ते में ही था कि कोई तेजी से उसकी तरफ सूचना देने बढ़ा कि

‘‘सोहराब इस दुनिया को छोड़ चुका है। अब उसे न महल चाहिए न तख्त न ताबूत ! यह खबर सुनकर बाप ने एक लम्बी आह खींची और रोते हुए पलकें एक-दूसरे पर रखीं।’’

रुस्तम रख़्श से नीचे उतरा और सिर पर टोपी की जगह जमीन की खाक उठाकर डालने लगा और बैन करने लगा कि मैं ये दोनों हाथ काटकर रख दूँ जिन्होंने खंजर उठाया था। अब किस तरह और किस मुँह से तहमीना को यह खबर दूंगा कि मैंने उसके बेटे-अपने जिगर के टुकड़े को अपने ही हाथों से मार डाला! मुझ पर सब लानत भेजेंगे कि मैंने अपने खानदान साम पहलवान के नाम धब्बा लगाया है। इस खबर से पिता ज़ालज़र व माँ रुदाबे का क्या हाल होगा।

रुस्तम सोचने लगा कि किस तरह से जोश व खरोश से भरा यह जवान कल इस मैदान में विजय पताका लहराने आया था। आज वहीं से उसका ताबूत उठ रहा है।

जब सोहराब की मौत की ख़बर काऊस के पास पहुंची तो वह रुस्तम को दिलासा देने पहुँचा। रुस्तम का इतना बुरा हाल देखकर शाह काऊस को बहुत दुःख हुआ। उसने सोहराब को याद करते हुए उसके बल और दिलेर व्यक्तित्व की प्रशंसा की और कहा कि अब रुस्तम को इस दुःख में अपने को मजबूती से सँभालना चाहिए और इस हक़ीकत को समझ लेना चाहिए कि इस दुनिया में जो आया है, वह एक दिन वापस जायेगा चाहे देर में चाहे जल्दी इसलिए रुस्तम कब तक बेटे के शोक में डूबा रहेगा।

रुस्तम ने शाह काऊस से कहा कि वह बिल्कुल टूट चुका है। उसमें कुछ भी करने की शक्ति नहीं रह गई है। यदि शाह काऊस उचित समझें तो जवारेह को हुमान के पास भेजें ताकि उसकी सुरक्षा में तूरानी फौज सुरक्षित समनगान लौट जाए।

शाह काऊस ने अनुरोध सुना और कहा कि बेशक मैं उस तुर्क के व्यवहार से खुश नहीं था। मगर यह कोई बदला लेने का समय नहीं है। जब रुस्तम इस तरह दुःख में डूबा है तो मैं भी उसके दुःख में बराबर शरीक़ हूँ। इतना कहकर शाह काऊस अपनी फौज के साथ ईरान लौट गया।

शाह काऊस के ईरान की तरफ कूच कर जाने के बाद रुस्तम वहाँ तन्हा रहकर जवारेह की वापसी का इन्तजार कर रहा था ताकि वह तूरानी फौज की सुरक्षित वापसी का समाचार जान सके।

जवारेह के आने के बाद रुस्तम ने जाबुलिस्तान की तरफ जाने की तैयारी कर ली। उसके आने की खबर जब ज़ालज़र के पास पहुंची तो सारा सीस्तान शोक में रोता-बिलखता वहाँ पहुँच गया।

‘‘सिपाही ताबूत के आगे-आगे चल रहे थे और ताबूत के पीछे रोते हुए बुजुर्ग। जैसे ही ज़ालज़र की नज़र दूर से ताबूत पर पड़ी वह अपने घोड़े से उतर गया। रुस्तम पैदल चल रहा था। उसका दिल टुकड़े-टुकड़े था, कपड़े फटे थे और चहेरा ग़म से बेहाल था।’’

सारे पहलवानों ने ताबूत को देखकर क़मर ख़म की और सम्मान में सिर झुकाया। ताबूत के ऊँट की पीठ से नीचे उतारकर जमीन पर रखा गया तो रुस्तम रोता हुआ ज़ालज़र को सम्बोधित करता हुआ आगे बढ़ा और बेटे के ताबूत पर सिर रखकर बोला-“इस तंग ताबूत में मेरा बाघ सोया पड़ा है।‘‘ रुस्तम की बात सुनकर ज़ालज़र की आँखें खून के आँसू रोई। रुस्तम ने दुःख में प्रलाप करते हुए कहा-“तुम चले गए और मैं दुखी और अपमानित यहाँ रह गया।‘‘ ज़ालज़र ने पोते की उम्र देखकर आश्चर्य प्रकट करते हुए दुःखी स्वर में कहा-“इस नन्ही-सी उम्र में उसने इतनी दिलेरी का काम किया और गदा हाथ में उठाया। वह सचमुच अजूबा था। ऐसे बच्चे रोज़ कहाँ पैदा होते हैं।” इतना कहकर ज़ालज़र ने अपनी आँखें बन्द कर लीं जिनमें से लगातार आँसू झर रहे थे।

रुदाबे ने जब सोहराब की लाश देखी तो ग़म से उसका कलेजा फटने लगा। बेटे का ग़म और पोते की मौत की खबर सुनकर वह कहने लगी कि जब इसके खेलने-खाने के दिन थे तो यह चल बसा। जाबुलिस्तान के लोगों के चेहरे ग़म से स्याह और आँखें दुख से लाल हो रही थीं।

जिसने भी यह ख़बर सुनी कि बाप के हाथों बेटा मारा गया, उसकी आँखें आँसुओं से भर आईं। रुस्तम ने अपने हाथों से बेटे को कफन पहनाया और ताबूत में लिटाया। सोहराब को दफनाए हुए कई दिन गुजर गए थे, मगर रुस्तम का दिल खुशी को फिर हासिल न कर सका और स्वयं से बार-बार यही कहता कि ज़माने की मार से कब किसका दिल जख्मी हो जाए, यह कौन जानता है।

हुमान जाबुलिस्तान से तूरान की तरफ लौट गया और शाह अफरासियाब से सारी घटना बताईं सुनकर अफरासियाब चकित रह गया। उसके मन की इच्छा सोहराब की मौत से पूरी हुई। यह खबर जब ईरान पहुँची तो रुस्तम के गम में सब शरीक हुए और सोहराब के लिए उनकी आँखें भर आईं।

सोहराब के मरने की खबर तूरान से जब शहर-ए-समनगान पहुँची तो सोहराब के नाना, शाह समनगान दुःख से दीवाने होकर अपने कपड़े फाड़ने लगे। यही हाल तहमीना का हुआ। उसने अपने चेहरे को दुःख में नोच लिया। मुँह को दोनों हाथों से पीटा और धुंघराली जुल्फों में उँगलियों में फंसाकर खींचा। उसके चेहरे पर पड़ी खरोंचों से खून छलक आया और सफेद बदन पर जगह-जगह जख़्म के लाल निशान उभर आये। बैन करती हुई तहमीना कहने लगी:

‘‘मेरे बेटे तुम कहाँ खून व ख़ाक में खो गये हो। मैं तुम्हारी राह में आँखें बिछाए बैठी थी कि मुझे बेटे सोहराब और बाप रुस्तम की खबर एक साथ मिलेगी।’’

“मुझे गुमान हुआ कि तुम लौट आए हो। आह, ऐसे कोई अपने बाबा को ढूँढ़ने और पाने जाता है! तुम्हें जाने की इतनी जल्दी क्यों थी! मुझे क्या पता था बेटे, कि रुस्तम शिकारगाह में तुम्हारा ही जिगर चीरकर रख देगा।

 ‘‘मैंने किस दुलार और प्यार से तुझे पाला था! रात और दिन की मेहनत से तेरा बदन तन्दुरुस्त बनाया था। आज वही तन खून में डूबा कब्र में चला गया और कफन उसका लिबास बन गया।’’

तहमीना अपना सीना पीटती हुई बोली-“इस दुःख को किससे कहूँ। कौन है मेरी सुनने वाला। तुम्हारी जगह मैं किसको पुकारूँ बोलो, अब कौन है मेरा? अफसोस! मेरे जिगर का टुकड़ा, आँखों की रोशनी, बाग और महल से निकलकर ख़ाक में मिल गई है। मैंने तो तुम्हें बाबा की पहचान बताई थी। तावीज़ भी दी थी। न तुम उसे पहचान सके, न बाप की निशानी उसे दिखा सके। तुम्हारी माँ तुम्हारे बिना इस कैद में तड़प रही है और तुम्हारा चाँदी जैसा सीना चीर दिया गया।‘‘

बैन कर-कर के तहमीना कभी सीना कूटती, कभी मुँह पीटती, अपने बाल नोचती और इस तरह से रोती कि सुनने वाला ताब न ला पाता। फिर रोते-रोते बेहोश हो जाती। जब होश में आती तो सोहराब की याद में तड़पने लगती। कभी सोहराब के घोड़े से लिपट जाती, कभी उसको थपकती, उसका मुँह चूमती, फिर सोहराब के तीर व कमान, ढाल और तलवार पर अपना सिर पटकने लगती।

तहमीना रात-दिन सोहराब की याद में रोते हुए कई साल ज़िन्दा रही। फिर एक दिन उसके ग़म को साथ लेकर सोहराब से जा मिली।

हुमान ने मक्कारी से कहा-“मैंने रुस्तम को कई बार रण-क्षेत्र में देखा है! यह पहलवान रुस्तम नहीं है।‘‘

सूरज ने जैसे ही अपनी सुनहरी किरणें बिखेरीं, रात ने अपने काले डैने समेट लिए। सोहराब नींद से जागा। जिरह-बख़्तर पहन, तीर व कमान, भाला, गदा लेकर वह घोड़े पर बैठा और युद्ध के मैदान की तरफ चल पड़ा।

तहमतन यानी रुस्तम ने बबरेबयान पहना, हथियार उठाए, रख्श घोड़े पर बैठा और रण-क्षेत्र की तरफ चल पड़ा।

जैसे ही सोहराब की नज़र रुस्तम पर पड़ी, उसके दिल में प्यार उमड़ने लगा और हँसकर पूछने लगा-‘‘दिलावर! आपकी रात कैसे गुज़री और अब दिन कैसे गुज़ारेंगे, इस युद्ध का इरादा क्यों नहीं छोड़ देते? कहिए तो मैं आपके कन्धे से तीर व कमान उतार लूँ और बदले की भावना को हम दोनों दिलों से निकाल फेंके और दोस्त बनकर युद्ध का इरादा छोड़ दें। एक साथ बैठें, और जाम भरें। मेरे दिल में जाने क्यों आपके लिए बहुत ज़्यादा प्यार उमड़ रहा है। आप जरूर ऊँची नस्ल और दिलेर पहलवान परिवार से हैं। आप मुझसे अपने को न छुपाएँ

और अपना सही नाम बताएँ। मुझे शक है कि आप ज़ालज़र के बेटे रुस्तम हैं। मैंने आपको बहुत ढूँढ़ा। सबसे पूछा, मगर किसी ने आपका नाम नहीं बताया। आप तो मुझे अपना नाम बता दें।‘‘

रुस्तम ने सोहराब की बात सुनकर कहा-“अरे जवान मर्द कल तक सारी बातें लड़ाई और मरने-मारने की कर रहे थे, हथियार डालने और शराब पीने का कोई ज़िक्र नहीं था। आज ये सब बेकार की बातें और युद्ध रोकने की कोशिशें मत करो। तुम्हारे जाल और फरेब में फँसने वाला नहीं हूँ। तुम जवान हो, तो मैं बच्चा नहीं हूँ। ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव बहुत देखे हैं। हजारों से मिला हूँ। अब देखना है कि खुदा ने हमारी तकदीर में लिखा क्या है?

सोहराब ने जवाब दिया-“बहादुर बुजुर्ग! मेरी सबसे बड़ी इच्छा है कि आपको मौत के मुँह में जाने से बचा लूँ और आप इस दुनिया से जाने के लिए अपने बिस्तर पर ही अपनी आँखें बन्द करें। अगर आपको बहुत जल्दी है और मौत का सामना करना ही चाहते हैं तो फिर खुदा की मर्ज़ी पर छोड़ने के अलावा हमारे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है। घोड़े से उतरिए। लड़ाई शुरू करते हैं।‘‘

दोनों पहलवान अपने-अपने घोड़ों से नीचे उतर आए और उनको बाँधा। एक-दूसरे की कमर में हाथ डाला और इस तरह गुँथ गए जैसे दो अज़दहे एक-दूसरे से लिपट गए हों। सुबह से शाम तक दोनों पहलवान इस कोशिश में लगे रहे कि एक-दूसरे को पछाड़ दें। चेहरे और बदन से खून बह रहा था, मगर दोनों युद्ध किए जा रहे थे।

अन्त में सोहराब ने शेर की तरह दहाड़ मारी और रुस्तम को कमर से पकड़कर दोनों हाथों से सर के ऊपर उठाया और पूरी ताकत से जमीन पर दे मारा और उचककर उसके सीने पर चढ़ बैठा और म्यान से खंजर निकाला ताकि रुस्तम का सिर

धड़ से अलग कर दे। यह देखकर रुस्तम अपनी जान की खैर मनाने लगा। कुछ सोचकर बड़ी नर्मी से सोहराब से कहा-“जवान मर्द! हमारा रिवाज यह है कि जब दो पहलवान कुश्ती लड़ते हैं तो एक-दूसरे को पहली बार ज़मीन पर पटकने पर खंजर नहीं उठाते। अगर दूसरी बार भी पहला दूसरे को ज़मीन पर पटक देता है तो फिर रिवाज के अनुसार उसका सिर धड़ से अलग कर सकता है।‘‘

उधर हुमान सोहराब की प्रतीक्षा में था। जब सोहराब के लौटने में देर हुई तो वह घोड़े पर बैठकर उसे देखने निकला। कुछ देर बाद हुमान ने सोहराब को शिकारगाह के पास देखा। करीब पहुँचकर उससे कुश्ती का हाल पूछा। सोहराब ने सारा माजरा कह सुनाया। सुनकर हुमान दुःख से चीख उठा कि क्या तुम्हारा दिल ज़िन्दगी से भर चुका है, जो हाथ में आए हुए शिकार को छोड़ आए हो? आज तक किसी दिलेर ने हाथ में आए दुश्मन को आज़ाद नहीं किया है। पता नहीं, वक़्त अब क्या गुल खिलाता है? ।

सोहराब ने कहा-“दुःखी मत हो! यह पहलवान मेरे पंजे से आज़ाद नहीं हो सकता। कल फिर वह मैदान में आ रहा है। फिर कुश्ती होगी और इस बार मैं उसका सिर धड़ से अलग कर दूंगा।‘‘

अब रुस्तम सोहराब के चंगुल से छूटा तो सारी नामक चश्मे के किनारे पहुँचा हाथ-मुँह धोया, पानी पिया और सजदे में गिर गया।

कहते हैं कि शुरू में रुस्तम के बदन में इतनी ताकत थी कि यदि वह चलते हुए जरा-सा ज़्यादा जोर पंजों पर डालता, तो वहाँ की जमीन नीचे धंस जाती थी। अपने इस बल से स्वयं रुस्तम भी बहुत परेशान था। इसलिए एक बार रुस्तम ने रो-रोकर खुदा से दुआ मांगी थी कि वह रुस्तम के बदन का बल कम कर दे ताकि वह आराम से कदम रखता हुआ ज़मीन पर चल सके। खुदा ने उसकी दुआ सुन ली और उसके बदन का बल घट गया।

आज रुस्तम ने खुदा के सामने खड़े होकर यह दुआ माँगी कि उसके बदन का घटा बल उसको वापस मिल जाए। इस बार भी खुदा ने उसकी विनती सुन ली और रुस्तम के बदन में नयी ताकत व स्फूर्ति दौड़ गई। उस बल के संग रुस्तम चिंघाड़ता हुआ लड़ाई के मैदान की तरफ बढ़ा।

उधर से सोहराब कमान और कमन्द हाथ में उठाए शेर की तरह गुर्राता हुआ रुस्तम की तरफ बढ़ा। आखिर पर्वतकाय दो पहलवान एक-दूसरे के सामने पहुँचकर ठहर गए। सोहराब रुस्तम के नये जोश व खरोश भरे इस व्यवहार से चकित होकर बोला कि ओ शेर के पंजे से छूट जाने वाले! क्या तुम्हारा दिल जीने से भर चुका है जो दोबारा रण-क्षेत्र में आ गए हो! और आज यह दिलेरी जो तुम दिखा रहे हो, पहले अपना नाम पता तो बताओ।

रुस्तम ने कोई जवाब नहीं दिया। दोनों पहलवान घोड़े से उतरे और कुश्ती लड़ने में व्यस्त हो गए। उनके ऊपर उनकी मौत किसी परन्दे की तरह मँडरा रही थी। सोहराब ने रुस्तम की कमर पकड़ी और चाहा उसे पछाड़े मगर उसकी कमर किसी पर्वत की तरह जड़ थी। इस बार आसमान ने दूसरा रंग दिखाया। रुस्तम ने किसी अजदहे की तरह सोहराब को ऊपर उठाया और जमीन पर दे पटका! रुस्तम को पता था कि सोहराब जमीन पर पड़ा नहीं रह पायेगा। इसलिए उसने कमर से फौरन खंजर निकाला और साहेराब का कलेजा चीरकर रख दिया। सोहराब दर्द से तड़प उठा और ठण्डी साँस भरी। नेकी और बुराई के बारे में उसने सोचा, फिर रुस्तम की तरफ देखा और कहा कि ओ दिलेर! आखिर तुमने मुझे खून में नहला ही दिया। इसमें तेरा कोई कसूर नहीं, बल्कि होना यही था। अभी तो मेरी उम्र के लड़के कहेंगे कि हमारा साथी पहलवान इतनी जल्दी मर गया फिर सोहराब एक आह खींचकर बोला

‘‘माँ ने मेरे बाबा की निशानी (तावीज) के साथ मुझे भेजा था कि मैं जब उन्हें ढूँढ़ लूँगा तो वह मुझे पहचान लेंगे मगर अफसोस यही है कि मैं उन्हें तलाश करता रहा और आज उन्हें देखे बिना मौत को गले लगा रहा हूँ।’’

‘‘मगर तुम उससे बचकर नहीं जा पाओगे, चाहे मछली बनकर पानी में जा छुपो या रात की कालिमा में छुपो या सितारे बनकर आसमान पर टँग जाओ। वह तुमको पकड़ लेंगे।’’

‘‘जब मेरी लाश देखेंगे तब मेरे बाबा तुमसे बदला लेंगे। इन बड़े पहलवानों और नामवरों में से कोई रुस्तम को यह निशानी दिखाए और उन्हें खबर दे कि सोहराब तुम्हें ढूँढ़ता रहा और अब वह इस तरह खाक में पड़ा दम तोड़ रहा है।’’

ये बातें सोहराब के मुँह से सुनकर रुस्तम सन्न रह गया। आँखों के सामने तारे टूटने लगे और चारों तरफ अँधेरा छा गया। एकाएक वह बेहोश हो गया। जब रुस्तम को होश आया तो उसने देखा कि सोहराब खून में नहाया उसके सामने जमीन पर पड़ा है।

रुस्तम ने सोहराब का सर अपनी जाँघ पर प्यार से रखा और एकाएक पीड़ा से चीत्कार कर उठा कि रुस्तम की नस्ल इस ज़मीन से अब मिट जायेगी। फिर रुस्तम ने सोहराब से पूछा कि बताओ अपने पिता की कौन-सी निशानी तुम्हारे पास है? मैं रुस्तम हूँ। खुदा करे मेरे ये हाथ कट जाएँ जिनसे मैंने अपने बेटे का कलेजा चीरा है। इतना कहकर रुस्तम फफक कर रो पड़ा और गम में अपना चेहरा तथा बाल नोच डाले।

सोहराब ने रुस्तम की जब यह हालत देखी तो पूछा कि पहलवान! अगर रुस्तम तुम्ही हो, तो फिर मुझसे यह बात छुपाई क्यों? मैंने तो हर तरह से तुम्हारा नाम और पता जानना चाहा था। मगर तुम्हारे दिल में मेरे लिए ज़र्रा बराबर भी प्यार नहीं उमड़ा। मेरा जोशन खोलो और देखो। जब मैं फौज के साथ ईरान की तरफ चलने लगा था, उस वक्त मेरी माँ डबडबाई आँखों से मेरे पास आई थीं और यह तावीज मेरे बाजू पर

बाँधकर कहा था कि यह तुम्हारे पिता रुस्तम की यादगार है। रास्ते में काम आयेगी। मगर अफसोस जब यह काम आई तो मेरे जाने का समय आ गया है।

रुस्तम ने जल्दी से सोहराब के लिबास का बन्द खोला और अपना तावीज़ उसने सोहराब के बाजू पर बँधा देखा। यह देखकर रुस्तम गम से पागल हो उठा। उत्तेजना से कपड़े फाड़ने और रोने-चिल्लाने लगा कि ओ दिलावर बेटे! ऐ मेरे जवान बेटे! अभी तो तुम्हारे गालों के गुलाब ताज़ा थे कि तुम मुरझा गए! अभी तो तुम्हारी उम्र का सूरज पूरे शबाब पर भी नहीं चढ़ा कि तुम अँधेरे में डूब गए! अपने पिता के हाथों क़त्ल हुए और बहार आने से पहले ही पतझड़ बन गए। सोहराब रुस्तम का यह दुःख देखकर ठण्डी साँस भरकर कहने लगा कि खुदा की मर्जी यही थी। अब इस तरह से रोने-चिल्लाने और शोक मनाने से क्या हासिल होगा? मेरी किस्मत में यही लिखा था कि पिता के हाथों मारा जाऊँ। वही हुआ। आप यूँ गम न मनाएँ।

सूरज डूबने को आया और जब रुस्तम फौज के पड़ाव की ओर नहीं लौटा तो शाह काऊस ने बीस फुर्तीले सवारों को रुस्तम की खबर लेने के लिए रण-क्षेत्र की तरफ भेजा। उन्होंने वहाँ पहुँचकर देखा कि दोनों घोड़े बधे हुए हैं और जीन पर रुस्तम नहीं है। वे समझे रुस्तम युद्ध में काम आ गया। वे फौरन उल्टे पाँव सन्देश देने शाह काऊस की तरफ दौड़े।

फौज में इस ख़बर से सनसनी फैल गई। सारे बहादुर एवं पहलवान शाह काऊस के पास पहुँचे। शाह काऊस ने आदेश दिया कि एक सवार फिर जाकर पता लगाए कि रुस्तम का क्या हुआ और सोहराब का अब क्या इरादा है। यदि रुस्तम को कैद कर लिया गया है तो ये नौ पहलवान उसको स्वतन्त्र कराने की कोशिश करें। उस समय हम तूरान की फौज पर हमला करेंगे और इस समस्या का समाधान निकालेंगे।

दूर से सोहराब ने जब घोड़ों के दौड़ने की आवाज सुनी तो रुस्तम से कहने लगा कि मेरा समय तो खत्म हुआ। तूरानी फौज संकट में पड़ गई है। आप कोशिश करें कि ईरानी फौज तूरानी सिपाहियों को परेशान न करे। उनकी कोई गलती नहीं है। वे मेरी इच्छा का आदर करते हुए मेरे साथ यहाँ आए थे। मैंने उन्हें बड़ी आशाएँ दिलाई थीं। उनसे कहा था कि जब मैं और मेरे बाबा रुस्तम एक हो जाएँगे तो इस दुनिया को अपने क़दमों पर झुका लेंगे। अफसोस मैं अपने बाबा के हाथों मौत के सिवा कुछ न पा सका! जब सफेद किले पर मैंने हमला किया था तो ईरानी सिपाहसालार को कैदी बनाया था। मैंने उससे भी आपका पता बहुत पूछा। उसकी सारी बातें बेतुकी थीं। उसने मुझसे सब भेद छुपाया और आज उसी के कारण यह अन्धेरा देखना पड़ा। आप उसका ध्यान रखें कि उसको कोई हानि न पहुँचे। माँ ने आपकी पहचान ज़बानी बताई थी, जब मैं आपको देखता था तो सारी बातें मैं आपमें पाता था, मगर यकीन नहीं होता था। खुदा को यही मंजूर था। मैं बिजली की तरह आया और हवा की तरह जा रहा हूँ। मगर आपकी दुनिया में दोबारा जरूर आऊँगा। इतना कहकर सोहराब की आवाज टूटने लगी और आँखें आँसुओं से भर गईं।

ये बातें सुनकर रुस्तम का कलेजा मुँह को आने लगा और साँस लेने में बहुत कठिनाई महसूस होने लगी। टूटे दिल और भीगी आँखों के साथ रुस्तम रख़्श पर बैठा और फौज के पड़ाव की तरफ घोड़ा दौड़ाया। ईरानी सिपाहियों ने जब दूर से रुस्तम को आते देखा तो खुदा को धन्यवाद दिया। मगर जब रुस्तम करीब पहुँचा और उसका फटा लिबास, चेहरे पर ख़राश और ग़म से उसे बेहाल देखा तो सबने इसका कारण पूछा। रुस्तम ने बताया कि उसने अपने ही हाथों अपने बेटे को क़त्ल कर दिया है। यह सुनकर सारे सिपाही ग़म से चीख उठे!

रुस्तम ने ग़म से निढाल होकर कहा कि न तो मुझे दिल की खबर है, न तन का होश है। लेकिन अब तुम लोग तूरानी फौज पर आक्रमण नहीं करोगे। आज मुझसे जो काम हुआ है, वही गुनाह के लिए काफी है। इसी बीच रुस्तम का भाई जवारेह आ गया। भाई को फटे हाल देखकर ताज्जुब में पड़ गया। रुस्तम ने उससे कहा कि हुमान को खबर कर दे कि वह अपनी तलवार म्यान में रखे। सोहराब का यह हाल हुजीर के कारण हुआ है। उसको अपने सामने लाने का आदेश रुस्तम ने दिया।

हुजीर की बात सुनकर रुस्तम दुखी हुआ और क्रोध में आकर उसकी हत्या करने के लिए आगे बढ़ा। मगर बीच में ही उसे रोककर पहलवानों ने उसकी जान बख्श देने की विनती की। तंग आकर रुस्तम अपना ही खंजर उठाकर खुद अपना सिर तन से जुदा करने वाला था कि गूदर्ज़ ने उसे समझाया कि इससे क्या फायदा? अब तो जो हो चुका, वह वापस नहीं आ सकता है। इसलिए सोहराब की मौत उतनी महत्वपूर्ण नहीं जितना किसी पहलवान का नाम अमर हो जाना महत्वपूर्ण है। रुस्तम के मन-मस्तिष्क की उत्तेजना शान्त होने लगी। वह गूदर्ज़ से बोला कि तुम शाह काऊस के पास जाओ और मेरा पैग़ाम उनसे कहना कि अब रुस्तम ज़्यादा दिन ज़िन्दा नहीं रहेगा। अपने ही खंजर से अपने जिगर के टुकड़े का सीना चीर दिया है। शाह से मेरी विनती है कि उनके खज़ाने में जो ‘नौशादर‘ है, वह मेरे जख्मी बेटे के लिए मुझे एक जाम भरकर दें ताकि मैं अपने बेटे को बचा सकूँ। मैं अभी ज़िन्दा हूँ उनकी और उनके राज्य की मैं रक्षा करूँगा।

गूदर्ज़ यह पैगाम लेकर शाह काऊस के खेमे में पहुँचा और सारी बात बताकर रुस्तम द्वारा कही दवा माँगी। शाह काऊस ने सारी बात ध्यान से सुनी और मन-ही-मन सोचा कि रुस्तम जैसे पहलवान का बेटा सोहराब है जो पहले ही इस बात का दावा कर चुका है कि वह मुझे मिटा देगा और ईरान को जीत लेगा। ऐसे समय में यह दबा रुस्तम को भेजना उचित नहीं है। कल कहीं ये दोनों बाप-बेटे मिल गए तो मेरा क्या होगा? उसने दवा देने से इंकार कर दिया और अपना भय भी बयान कर दिया।

यह जवाब सुनकर गूदर्ज़ हवा की तरह रुस्तम के पास पहुँचा और शाह काऊस के इंकार की बात रुस्तम को बताकर कहा कि बेहतर है कि रुस्तम आखिरी वक्त बेटे के सिरहाने रहे ताकि इस अँधेरे में डूबते हुए दिल व दिमाग को कुछ रोशनी मिल सके।

अभी रुस्तम बीच रास्ते में ही था कि कोई तेजी से उसकी तरफ सूचना देने बढ़ा कि

‘‘सोहराब इस दुनिया को छोड़ चुका है। अब उसे न महल चाहिए न तख्त न ताबूत ! यह खबर सुनकर बाप ने एक लम्बी आह खींची और रोते हुए पलकें एक-दूसरे पर रखीं।’’

रुस्तम रख़्श से नीचे उतरा और सिर पर टोपी की जगह जमीन की खाक उठाकर डालने लगा और बैन करने लगा कि मैं ये दोनों हाथ काटकर रख दूँ जिन्होंने खंजर उठाया था। अब किस तरह और किस मुँह से तहमीना को यह खबर दूंगा कि मैंने उसके बेटे-अपने जिगर के टुकड़े को अपने ही हाथों से मार डाला! मुझ पर सब लानत भेजेंगे कि मैंने अपने खानदान साम पहलवान के नाम धब्बा लगाया है। इस खबर से पिता ज़ालज़र व माँ रुदाबे का क्या हाल होगा।

रुस्तम सोचने लगा कि किस तरह से जोश व खरोश से भरा यह जवान कल इस मैदान में विजय पताका लहराने आया था। आज वहीं से उसका ताबूत उठ रहा है।

जब सोहराब की मौत की ख़बर काऊस के पास पहुंची तो वह रुस्तम को दिलासा देने पहुँचा। रुस्तम का इतना बुरा हाल देखकर शाह काऊस को बहुत दुःख हुआ। उसने सोहराब को याद करते हुए उसके बल और दिलेर व्यक्तित्व की प्रशंसा की और कहा कि अब रुस्तम को इस दुःख में अपने को मजबूती से सँभालना चाहिए और इस हक़ीकत को समझ लेना चाहिए कि इस दुनिया में जो आया है, वह एक दिन वापस जायेगा चाहे देर में चाहे जल्दी इसलिए रुस्तम कब तक बेटे के शोक में डूबा रहेगा।

रुस्तम ने शाह काऊस से कहा कि वह बिल्कुल टूट चुका है। उसमें कुछ भी करने की शक्ति नहीं रह गई है। यदि शाह काऊस उचित समझें तो जवारेह को हुमान के पास भेजें ताकि उसकी सुरक्षा में तूरानी फौज सुरक्षित समनगान लौट जाए।

शाह काऊस ने अनुरोध सुना और कहा कि बेशक मैं उस तुर्क के व्यवहार से खुश नहीं था। मगर यह कोई बदला लेने का समय नहीं है। जब रुस्तम इस तरह दुःख में डूबा है तो मैं भी उसके दुःख में बराबर शरीक़ हूँ। इतना कहकर शाह काऊस अपनी फौज के साथ ईरान लौट गया।

शाह काऊस के ईरान की तरफ कूच कर जाने के बाद रुस्तम वहाँ तन्हा रहकर जवारेह की वापसी का इन्तजार कर रहा था ताकि वह तूरानी फौज की सुरक्षित वापसी का समाचार जान सके।

जवारेह के आने के बाद रुस्तम ने जाबुलिस्तान की तरफ जाने की तैयारी कर ली। उसके आने की खबर जब ज़ालज़र के पास पहुंची तो सारा सीस्तान शोक में रोता-बिलखता वहाँ पहुँच गया।

‘‘सिपाही ताबूत के आगे-आगे चल रहे थे और ताबूत के पीछे रोते हुए बुजुर्ग। जैसे ही ज़ालज़र की नज़र दूर से ताबूत पर पड़ी वह अपने घोड़े से उतर गया। रुस्तम पैदल चल रहा था। उसका दिल टुकड़े-टुकड़े था, कपड़े फटे थे और चहेरा ग़म से बेहाल था।’’

सारे पहलवानों ने ताबूत को देखकर क़मर ख़म की और सम्मान में सिर झुकाया। ताबूत के ऊँट की पीठ से नीचे उतारकर जमीन पर रखा गया तो रुस्तम रोता हुआ ज़ालज़र को सम्बोधित करता हुआ आगे बढ़ा और बेटे के ताबूत पर सिर रखकर बोला-“इस तंग ताबूत में मेरा बाघ सोया पड़ा है।‘‘ रुस्तम की बात सुनकर ज़ालज़र की आँखें खून के आँसू रोई। रुस्तम ने दुःख में प्रलाप करते हुए कहा-“तुम चले गए और मैं दुखी और अपमानित यहाँ रह गया।‘‘ ज़ालज़र ने पोते की उम्र देखकर आश्चर्य प्रकट करते हुए दुःखी स्वर में कहा-“इस नन्ही-सी उम्र में उसने इतनी दिलेरी का काम किया और गदा हाथ में उठाया। वह सचमुच अजूबा था। ऐसे बच्चे रोज़ कहाँ पैदा होते हैं।” इतना कहकर ज़ालज़र ने अपनी आँखें बन्द कर लीं जिनमें से लगातार आँसू झर रहे थे।

रुदाबे ने जब सोहराब की लाश देखी तो ग़म से उसका कलेजा फटने लगा। बेटे का ग़म और पोते की मौत की खबर सुनकर वह कहने लगी कि जब इसके खेलने-खाने के दिन थे तो यह चल बसा। जाबुलिस्तान के लोगों के चेहरे ग़म से स्याह और आँखें दुख से लाल हो रही थीं।

जिसने भी यह ख़बर सुनी कि बाप के हाथों बेटा मारा गया, उसकी आँखें आँसुओं से भर आईं। रुस्तम ने अपने हाथों से बेटे को कफन पहनाया और ताबूत में लिटाया। सोहराब को दफनाए हुए कई दिन गुजर गए थे, मगर रुस्तम का दिल खुशी को फिर हासिल न कर सका और स्वयं से बार-बार यही कहता कि ज़माने की मार से कब किसका दिल जख्मी हो जाए, यह कौन जानता है।

हुमान जाबुलिस्तान से तूरान की तरफ लौट गया और शाह अफरासियाब से सारी घटना बताईं सुनकर अफरासियाब चकित रह गया। उसके मन की इच्छा सोहराब की मौत से पूरी हुई। यह खबर जब ईरान पहुँची तो रुस्तम के गम में सब शरीक हुए और सोहराब के लिए उनकी आँखें भर आईं।

सोहराब के मरने की खबर तूरान से जब शहर-ए-समनगान पहुँची तो सोहराब के नाना, शाह समनगान दुःख से दीवाने होकर अपने कपड़े फाड़ने लगे। यही हाल तहमीना का हुआ। उसने अपने चेहरे को दुःख में नोच लिया। मुँह को दोनों हाथों से पीटा और धुंघराली जुल्फों में उँगलियों में फंसाकर खींचा। उसके चेहरे पर पड़ी खरोंचों से खून छलक आया और सफेद बदन पर जगह-जगह जख़्म के लाल निशान उभर आये। बैन करती हुई तहमीना कहने लगी:

‘‘मेरे बेटे तुम कहाँ खून व ख़ाक में खो गये हो। मैं तुम्हारी राह में आँखें बिछाए बैठी थी कि मुझे बेटे सोहराब और बाप रुस्तम की खबर एक साथ मिलेगी।’’

“मुझे गुमान हुआ कि तुम लौट आए हो। आह, ऐसे कोई अपने बाबा को ढूँढ़ने और पाने जाता है! तुम्हें जाने की इतनी जल्दी क्यों थी! मुझे क्या पता था बेटे, कि रुस्तम शिकारगाह में तुम्हारा ही जिगर चीरकर रख देगा।

 ‘‘मैंने किस दुलार और प्यार से तुझे पाला था! रात और दिन की मेहनत से तेरा बदन तन्दुरुस्त बनाया था। आज वही तन खून में डूबा कब्र में चला गया और कफन उसका लिबास बन गया।’’

तहमीना अपना सीना पीटती हुई बोली-“इस दुःख को किससे कहूँ। कौन है मेरी सुनने वाला। तुम्हारी जगह मैं किसको पुकारूँ बोलो, अब कौन है मेरा? अफसोस! मेरे जिगर का टुकड़ा, आँखों की रोशनी, बाग और महल से निकलकर ख़ाक में मिल गई है। मैंने तो तुम्हें बाबा की पहचान बताई थी। तावीज़ भी दी थी। न तुम उसे पहचान सके, न बाप की निशानी उसे दिखा सके। तुम्हारी माँ तुम्हारे बिना इस कैद में तड़प रही है और तुम्हारा चाँदी जैसा सीना चीर दिया गया।‘‘

बैन कर-कर के तहमीना कभी सीना कूटती, कभी मुँह पीटती, अपने बाल नोचती और इस तरह से रोती कि सुनने वाला ताब न ला पाता। फिर रोते-रोते बेहोश हो जाती। जब होश में आती तो सोहराब की याद में तड़पने लगती। कभी सोहराब के घोड़े से लिपट जाती, कभी उसको थपकती, उसका मुँह चूमती, फिर सोहराब के तीर व कमान, ढाल और तलवार पर अपना सिर पटकने लगती।

तहमीना रात-दिन सोहराब की याद में रोते हुए कई साल ज़िन्दा रही। फिर एक दिन उसके ग़म को साथ लेकर सोहराब से जा मिली।

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