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दास्तान पैदाइश-ए-शतरंज
January 10, 2020 • नासिरा शर्मा • कहानी

भारतवर्ष के नगर सन्दल में जमहूर नाम का एक राजा राज करता था। उसका साम्राज्य बसत व कश्मीर से लेकर चीन तक फैला हुआ था। राजा के पास अथाह

धन और बड़ी फौज थी। हर जगह उसके नाम का डंका बजता था।

‘‘हिन्दुस्तान का यह बादशाह बहुत बुद्धिमान, सूक्ष्म दृष्टि और रवान खुले विचार रखने वाला था।’’

प्रजा उसका बहुत आदर करती थी। आखिर राजा के यहाँ एक पुत्र ने जन्म लिया जिसका नाम उसने गव रखा। कुछ दिनों बाद राजा बीमार पड़ा और उसने महारानी से अपनी अन्तिम इच्छा कही कि मेरे बाद मेरा बेटा राजा होगा।

राजा के देहान्त के बाद फौजी और सरकारी लोग जमा हुए। औरत मर्द, बूढ़े, जवान सभी सलाह-मशविरे के लिए बैठ गए। सबकी एक ही राय थी कि छोटा-सा बच्चा कुछ नहीं जानता, न फौज को काबू में रख सकता है और न न्याय कर सकता है और न खुद राजसिंहासन पर बैठ सकता है और न सिर पर मुकुट रख सकता है। इसलिए सब लोग इस परिणाम पर पहुँचे कि अगर किसी उचित व्यक्ति को राजा न बनाया गया तो सारे राज्य में अशान्ति फैल जाएगी। अन्त में तय पाया कि राजा के भाई ‘माय‘ को, जो नगर दनबर का शासक है, बुलाया जाए और उसे राजगद्दी दी जाए। माय अपने शहर से सन्दल आया और राज्य की बागडोर सँभाली। उसने अपने मृत भाई की पत्नी को अपनी रानी बना लिया। कुछ समय पश्चात् माय से भी एक पुत्र तलहन्द नाम का पैदा हुआ। माय उससे बहुत प्रेम करता था लेकिन अभी तलहन्द दो साल और गव सात साल का हुआ था कि माय बीमार पड़ा और दो हफ्ते बाद ही उसकी मृत्यु हो गई।

सन्दल के लोगों को माय की मौत का बहुत दुःख हुआ। एक मास तक सब उसकी मौत का दुःख मनाते रहे। इसके पश्चात् फौज के अफसर और शहर के बुद्धिमान लोग जमा हुए और नये राजा के बारे में परामर्श करने लगे। आख़िरकार सबने तय किया कि जब तक दोनों राजकुमार छोटे हैं, खुद रानी राज्य का कार्य सम्भालेगी। सारे लोग रानी के न्यायप्रिय स्वभाव के प्रशंसक थे और उसे राजसिंहासन के लिए योग्य भी समझते थे, इसलिए लोग रानी के सम्मुख उपस्थित हुए और कहा कि यह साम्राज्य आपके दोनों बेटों का है, लेकिन जब तक वे बड़े नहीं होते, तब तक आपको ही राज-काज देखना पड़ेगा। जब वे बड़े हो जाएँगे तो राज-पाट उनके हाथ सौंपकर स्वयं उनकी मंत्री बन जाइएगा। रानी ने प्रजा की बात मान ली और राज-पाट सँभाल लिया।

‘‘उसने दो चतुर ब्राह्मणों को अपने बेटों की शिक्षा-दीक्षा के लिए नियुक्त किया।’’

समय गुज़रता गया। धीरे-धीरे उसके बेटे बड़े हो गए। कभी-कभी वे अपनी माँ से पूछते कि हममें से कौन अच्छा है? माँ जवाब देती-“तुममे से जो ज़्यादा बुद्धिमान, पवित्र और ईमानदार है; वही अच्छा और महान् है।” फिर वे पूछते कि यह देश किसका है? यह धन-दौलत, यह तख्त-ताज किसके हिस्से में आएगा। माँ दोनों से अलग-अलग कहती-“यह देश, यह तख्त व ताज तेरा है।‘‘ इस उत्तर से दोनों बेटे अपनी-अपनी जगह प्रसन्न हो जाते परन्तु धीरे-धीरे उनके दिलों में ईर्ष्या की आग भड़कने लगी और वे तख्त-ताज के लिए अधिक चिन्तित रहने लगे। कभी-कभी मन-ही-मन उदास भी हो जाते। आग पर तेल का काम उनके साथी करते थे। वे भड़काते हुए कहते कि अपनी माँ से जाकर पूछो कि हममें से कौन अच्छा और लायक है और बुरे-भले समय में सन्तोष, शान्ति और सद्बुद्धि से काम ले सकता है?

आखिर एक दिन माँ ने कहा, “शहर के बुद्धिमान और सहृदय लोगों को बुलाकर परामर्श करो कि इन दोनों बेटों में से कौन तख्त-ताज का अधिकारी बनने के लिए न्यायप्रियता एवं अन्य गुणों से युक्त है। यूँ तो हिंसा से राज का नाश ही हो जाएगा।‘‘ माँ की बात सुनकर बड़ा बेटा गव बोला-‘‘माँ, सच-सच बताओ-बहाने मत बनाओ। अगर मैं राज की बागडोर, सम्भालने के लायक नहीं हूँ तो राज तलहन्द को दे दो। मैं छोटे भाई की तरह उसकी सेवा करूँगा। लेकिन यदि मैं आयु और बुद्धि में तलहन्द से बड़ा हूँ और अपने पिता का सच्चा बेटा हूँ तो तलहन्द से कह दो कि वह राजगद्दी पर नज़र न लगाए और इस बात को दिल पर अधिक न लगाए।‘‘

माँ ने समझाते हुए कहा-‘‘राजकाज के लिए ज़्यादा दुखी न हो। यह नश्वर संसार किसी का नहीं है। तुम्हारा बाप राजा जमहूर कितना अच्छा आदमी था, पर वह मर गया। उसके बाद तेरा चाचा तख्त पर बैठा। कुछ समय पश्चात् वह भी चला गया। तू बड़ा है, ज़्यादा सूझ-बूझ वाला है, फिर क्यों बिना वजह कुढ़ता है।” माँ ने दुखी होकर आगे कहा कि “मेरी मजबूरी यह है अगर मैं एक को राजपाट देती हूँ तो दूसरा मेरा शत्रु बन जाएगा और खून-खराबे पर उतर जाएगा। लेकिन मेरा कहना है कि इस नश्वर संसार के लिए आपस में खून-खराबा करने से क्या लाभ है।‘‘

इधर तलहन्द यह सोचता कि माँ गव का साथ देती है। वह माँ से कहता-“ठीक है, गव मुझसे आयु में बड़ा है। लेकिन मुझसे अच्छा नहीं। अफसोस कि मेरा पिता जवानी में मर गया और मुझे तख्त-ताज का स्वामी न बना सका। माँ तेरा मन तो गव में लगा है और तू उसी को आगे बढ़ाना चाहती है।‘‘

माँ ने सौगन्ध खाई कि उसके मन में ऐसी कोई बात नहीं है। लेकिन उसने देखा कि समझाने-बझाने से कोई लाभ नहीं है। इस कारण उसने दूसरी राह अपनाई उसने देश-भर के बुद्धिमान लोगों को इकट्ठा किया। उनके सामने दोनों राजाओं के खज़ाने की कुंजियाँ रख दी और उन्हें बताया कि दोनों बेटे राज-पाट के बारे में क्या सोचते हैं। गव ने तलहन्द से कहा-“तुम्हें मालूम है कि मेरा बाप जमहूर तुम्हारे बाप ‘माय‘ से उम्र और अक्ल में बड़ा था, लेकिन माय भी सज्जन आदमी था, क्योंकि बड़े भाई के जीते-जी उसने कभी तख्त-ताज की हवस नहीं की और कभी बड़ा बनने की कोशिश भी नहीं की। लेकिन अगर तुम राजसिंहासन पर बैठोगे और मैं छोटे भाई की तरह तुम्हारी सेवा करूँगा तो यह उचित नहीं होगा। अच्छा यही है कि हम चन्द अक्लमन्दों को इकट्ठा करें और वे जो फैसला करें, उसे हम मान लें, क्योंकि वे लोग हमसे अधिक बुद्धिमान हैं।‘‘

इसके पश्चात् गव और तलहन्द की तरफ से एक-एक विद्वान् चुने गए। दोनों वार्तालाप करने लगे। गव की तरफ का विद्वान बोला कि संदल का तख्त-ताज गव को मिलना चाहिए। मगर तलहन्द की तरफ का आया आदमी तरह-तरह की दलीलें पेश कर रहा था। परिणाम यह हुआ कि परामर्श की जगह वे एक-दूसरे से लड़ने लगे।

आखिरकर महल में दो तख्त बिछाए गए। गव और तलहन्द उन पर बैठे और उनका अपना-अपना विद्वान् उनकी दाहिनी तरफ विराजमान हुआ। उन्होंने राज्य के सारे बुद्धिमानों को जमा किया और तख्त के दाहिनी और बायीं ओर बिठाया। विद्वानों ने पूछा कि आप लोग दोनों राजकुमारों में से किसे राजा बनाना चाहते हैं?

सबने देखा कि किसी एक को राजा बनाना मुश्किल है। इससे बात लड़ाई तक पहुँचेगी और राज्य के दो टुकड़े हो जाएँगे जिससे लोगों का नुकसान होगा। इसलिए उन्होंने तय किया कि एक संस्था बनाकर परस्पर इस गुत्थी को सुलझा लेंगे। जो तय होगा उसके अनुसार दोनों राजकुमारों में से एक को राजा बना दिया जाएगा।

यह कहकर विद्वान् और बड़े-बूढ़े लोग महल से बाहर निकले। उनके मन उदास और चेहरे उतरे हुए थे। वे लोग सारी रात परामर्श करते रहे लेकिन किसी परिणाम पर नहीं पहुँचे। सुबह को सारे नगर में इसी बात की चर्चा थी।

एक तरफ कुछ लोग गव को राजा बनाना चाहते थे तो दूसरे तलहन्द को। तलहन्द के मानने वाले गव को गाली दे रहे थे और गव के तरफदार उस पर जान देने को तैयार थे। इस प्रकार सारे सन्दल राज्य में अशान्ति फैल गई। सच है, जब किसी घर में दो हुक्म चलने लगें तो घर बरबाद हो जाता है।

कुछ लोगों ने यह उपाय निकाला कि दोनों राजकुमारों को अलग-अलग राज दे दिया जाए ताकि वे अपने लालच और अहं की खातिर देश को बर्बाद न करें। परन्तु दोनों राजकुमारों का मस्तिष्क तो युद्ध की गर्मी से उबल रहा था और मुखों पर नफरत की छाया मँडरा रही थी। दोनों एक-दूसरे से सन्धि करने और नम्रता का व्यवहार करने के लिए कह रहे थे। अन्त में सलाह-मशविरा कुछ काम न आया और युद्ध के अतिरिक्त कोई दूसरी राह नहीं बची।

अब गव और तलहन्द के तरफदार तेजी से युद्ध की तैयारियाँ करने लगे! तलहन्द ने पिता के खजाने का मुख खोल दिया, सिपाहियों को सोना और कवच दिए और स्वयं भी हथियारों से सुसज्जित लड़ने के लिए तैयार हो गया। गव ने भी फौजी वस्त्र पहने, बाप की आत्मा का पुण्य स्मरण किया और रणक्षेत्र के लिए तैयार हो गया। हाथियों पर हौदे रखे गए। युद्ध का नगाड़ा बज उठा।

गव और तलहन्द दोनों ने दो मील के फासले पर अपनी-अपनी फौजें आमने-सामने खड़ी कर लीं। दोनों राजकुमार हाथी पर सवार होकर रणक्षेत्र में आए। उनके आगे-आगे पैदल सिपाही भाले और ढाल लिए हुए थे। गव को यह सोचकर बड़ा दुःख हो रहा था कि रणक्षेत्र में कितने बेगुनाह मारे जाएँगे। इस विचार को आते ही उसने फिर भाई के पास सन्देश भेजा-“अब भी समय है, युद्ध का विचार छोड़ दो बहकावे में आकर सत्य मार्ग को छोड़कर ऐसा काम न करो जिससे हमारे पूर्वजों की

धरती वीरान हो जाए और शेर-गीदड़ आ बसें। अगर तू सन्धि कर ले और वहाँ से दूर जा बसे तो मैं तुझे अपार धन व दौलत दूंगा ओर तुझे जान से अधिक प्यार करूँगा। यदि तू युद्ध पर तुला है तो इंसानों की बरबादी और दुःख के पछतावे के सिवा कुछ हाथ नहीं लगेगा।‘‘

तलहन्द को भाई का जब यह सन्देश मिला तो उसने कहलवाया-“युद्ध में बहानेबाजी से काम नहीं चलता। तू न मेरा भाई है, न मेरा मित्र और न मेरे परिवार का सदस्य। युद्ध तूने शुरू किया है, मैंने नहीं। इसका पाप तेरी गर्दन पर होगा। बदनामी और पछतावा तेरे हिस्से में आएगा। रह गई तेरे दान की बात कि तू मुझे तख्त और ताज देगा तो सच्चाई यह है कि अगर तेरे राज्य में कोई जागीर या इनाम स्वीकार करूँ तो भगवान मेरा अन्त शीघ्र करे।‘‘

तलहन्द ने सन्देशवाहक से कहा-“मैं अपने योद्धाओं को लेकर रणक्षेत्र में उतार रहा हूँ ताकि गव को हाथ बाँधकर बन्दी बनाऊँ और उसके योद्धाओं को मौत के घाट उतारूँ।‘‘

भाई की बात सुनकर गव के मन को दुःख पहुँचा और बुद्धिमान सलाहकारों के कहने के बाद भी उसने कोई सख्त कदम नहीं उठाया और भाई को समझा-बुझाकर युद्ध से दूर करने की कोशिश की। उसने दोबारा सन्देश भेजा कि “भाई-भाई का लड़ना ठीक नहीं है। हमारे चारों तरफ शत्रु हैं। अगर हमने युद्ध किया तो चीन से लेकर कश्मीर तक के बादशाह सब ही हमें बुरा-भला कहेंगे। अब भी तू मेरे पास आ जा। मैं तुझे हीरे-जवाहारात, घोड़े-हाथी सब कुछ दूंगा। मुझे तुमसे युद्ध करने की इच्छा नहीं है।‘‘

लेकिन तलहन्द ने फिर कड़ा उत्तर दिया-“मैने तेरी बकवास सुन ली है। तू कौन है, जो धन-दौलत देने का वायदा कर रहा है! ख़जाना और बल मेरे पास है। धरती और आकाश पर मेरा राज है। लेकिन तू जो यूँ बढ़-बढ़कर बातें बना रहा है तो लगता है-चींटी के पर निकल आए हैं। चूँकि तू खाई में गिरने वाला है इसलिए चिकनी-चुपड़ी बातें करके मुझे युद्ध से रोकना चाहता है। अब युद्ध की तैयारियाँ कर, विलम्ब ठीक नहीं।‘‘

लाचार गव युद्ध के लिए तैयार हो गया। प्रातः जब सूरज निकला तो दोनों फौजें आमने-सामने खड़ी हो गईं। दोनों राजकुमार अपनी-अपनी फौज के बीच में थे। उनके करीब उनके बुद्धिमान सलाहकार थे। गव ने कहा-“मेरी फौज का कोई वीर आक्रमण में पहल न करे बल्कि जहाँ खड़ा है, वहीं अलम (पताका) को उठाए खड़ा रहे, युद्ध में जल्दी करना बुद्धिमानों का काम नहीं है। हम यहीं ठहरकर देखेंगे कि तलहन्द अपनी फौज को लेकर कैसे आगे बढ़ता है। हमने उसे समझाने-बुझाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। मगर अफसोस, उसने हमारी बात न सुनी। यदि इस युद्ध में भगवान् की कृपा से हमने विजय प्राप्त की तो खबरदार कोई योद्धा केवल धन के लालच में किसी योद्धा को न मारे। अगर हमारे वीरों में से कोई फौज के बीच में पहुँच जाए और तलहन्द पर काबू पा ले तो हरगिज उसे हानि न पहुँचाए।‘‘

सारी फौज ने गव को अपनी आज्ञाकारिता का विश्वास दिलाया। इधर तलहन्द अपनी फौज से कह रहा था-“यदि भाग्य से हमें इस युद्ध में विजय मिलती है तो तुम लोग एक-एक

योद्धा को मौत के घाट उतार देना। गव यदि मान जाए तो न तो उसे मारना, न बुरा-भला कहना, बल्कि उसे घसीटते हुए मेरे पास ले आना।” युद्ध आरम्भ हो गया। आखिर दोनों राजकुमार अपने-अपने वीरों के बीच से बाहर निकले और संध्या तक खून-खराबा करते रहे। संध्या को गव ने तलहन्द के सिपाहियों से कहा-“तुम लोगों में से जो भी मेरी तरफ आ जाएगा, उसको मैं जीवन-दान दे दूंगा।‘‘

यह एलान सुनकर तलहन्द के बहुत सारे सिपाही गव की ओर आ गए। बहुत मारे गए, बहुत सारे इधर-उधर भाग गए। तलहन्द अकेला रह गया था। गडू़रिया रह गया था, जानवर भाग गए थे।

तलहन्द को तन्हा देखकर गव ने फिर कहा-“भाई, अब भी तू अपने महल वापस हो जा और अपनी जागीर की देख-भाल कर, जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, मैं तुझे कोई दुःख नहीं दूंगा।‘‘

तलहन्द भाई की इस बात को सुनकर मन-ही-मन उफन गया। अन्त में वह रणक्षेत्र से भाग खड़ा हुआ। एक सुरक्षित स्थान पर पहुँकर, उसने फिर अपने सिपाहियों को जमा किया, उन्हें इनाम दिए। उनकी तरफ से जब उसे सन्तोष हो गया तो उसने गव को फिर पैगाम भिजवाया कि यदि हिम्मत है तो शेर की तरह दोबारा रणक्षेत्र में आओ। इस चुनौती को केवल गीदड़-भभकी मत समझना।

गव को दोबारा तलहन्द का यह कड़ा सन्देश मिला तो उसे बहुत कष्ट पहँचा। फिर भी, उसने नम्रता का परिचय दिया। प्रेमपूर्वक वार्तालाप किया और भाई को सन्धि के लिए आमन्त्रित किया। परन्तु साथ-ही-साथ कहलवाया भी कि “यदि तू अब भी युद्ध के लिए हठ करता है तो मैं तैयार हूँ लेकिन इस बार हम लोग दूर समुद्र के किनारे युद्ध करेंगे और फौज के चारों तरफ खन्दक खोदेंगे ताकि फौज घिराव में रहे और पराजय के बाद भाग न सके।‘‘

तलहन्द ने अपनी फौज के जनरलों को बुलाया। उसके सामने गव का नक्शा रखते हुए बोला-“जब लड़ना ही है तो क्या जंगल और क्या बियावान, क्या दरिया और क्या सहरा, क्या पहाड़ और क्या मैदान। अगर हमारी जीत हुई तो मैं तुम सबको धन से मालामाल कर दूंगा।‘‘

तलहन्द और गव की फौजें समुन्दर की तरफ चली। दोनों भाई आमने-सामने पंक्ति बाँधकर खड़े हो गए। खन्दक खोदकर उसमें पानी भर दिया गया। राजकुमारों ने अपनी-अपनी फौज की कमान संभाली। वह घमासान लड़ाई हुई कि धूल से वातावरण धुंधला गया। समुन्दर में भूकम्प सा आ गया। रणक्षेत्र का अजीब दृश्य था। कहीं किसी का पेट फटा पड़ा था तो कहीं किसी का सर कटा पड़ा था। धरती खून से लथपथ थी, घोड़ों की टापें इस खूनी कीचड़ से सनी हुई थीं।

तलहन्द ने अपने हाथी पर बैठे हुए दूर-दूर तक दृष्टि डाली तो सारा मैदान खून में डूबा दिखा। अब उसके पास न तो भागने की कोई राह थी और न बचने की कोई तरकीब। उसने समझ लिया कि वास्तव में वह फँस गया है और उसका समय निकट आ गया है। यह सोचकर उसका दिल डूब गया और इसी दुःख में वह अपने हौदे के तख्त पर लेट गया, लेटते ही उसके प्राण-पखेरू उड़ गए।

गव ने देखा कि तलहन्द का झण्डा नजर नहीं आ रहा है। उसने एक सवार को भेजा कि आगे बढ़कर पता लगाए कि तलहन्द कहाँ है। सवार ने वापस आकर बताया कि राजकुमार का कहीं पता नहीं है। यह सुनकर गव घोड़े से उतर पड़ा और रोता हुआ शत्रु की फौज की तरफ पैदल चल पड़ा। वहाँ जाकर उसे मालूम हुआ, तलहन्द मर चुका है और उसके सिपाही शोक में डूबे हुए हैं। गव ने सुना तो एक हृदय-विदारक चीख मारी और कहने लगा कि

‘‘ए बहादुर, तू इस संसार से इस तरह गया कि तेरे दिल पर घावों का बोझ और आत्मा पीड़ा से बोझिल थी। तेरे ग्रह ख़राब थे जो तुझे मौत आ गई, वरना जीते-जी तुझे हवा का तेज झोंका भी न लगा था। अफसोस! तूने समझाने-बुझाने वालों की बात पर ध्यान न दिया। आज तेरी माँ का दिल कितना दुखी होगा। आह, मैंने तुझे कितने उपदेश दिए परन्तु तूने मेरा एक भी शब्द न माना।’’

इतने में गव का परामर्शदाता आ गया और राजकुमार को तसल्ली देने लगा। गव ने आज्ञा दी कि तलहन्द के लिए हाथी-दाँत और हीरे-जवाहरात का एक ताबूत तैयार किया जाए। इस पर चीनी रेशम की चादर डाली जाए और उसका दरवाजा इत्र व काफूर से बन्द किया जाए। इससे निबटकर उसने तलहन्द के सारे सिपाहियों को क्षमा कर दिया।

इधर रानी ने जब सुना कि दोनों राजकुमार फिर युद्ध कर रहे हैं तो उसने अन्न-जल छोड़ दिया। उसने एक सन्देशवाहक को नियुक्त किया ताकि वह रणक्षेत्र के समाचार लगातार लाता रहे। जब वातावरण की धूल कुछ कम हुई तो सन्देशवाहक ने देखा कि गव की पताका तो दिख रही है परन्तु तलहन्द का कहीं पता नहीं है। उसने रानी के समीप एक सवार को दौड़ाया कि तलहन्द शायद रणक्षेत्र में काम आ गया है।

जब रानी को यह समाचार मिला तो वह खून के आँसू रोई। उसने अपने कपड़े फाड़ डाले और बाल नोच डाले। सारे महल में कोहराम मच गया। रानी ने आज्ञा दी कि एक चिता तैयार की जाए ताकि वह हिन्दू रिवाज के अनुसार सती हो सके।

गव को जब ज्ञात हुआ कि उसकी माँ सती होने जा रही है तो वह हवा से बातें करता माँ के पास पहुँचा और रो-रोकर कहा-“माँ! पहले मेरी बात तो सुन लो। तलहन्द को न मैंने मारा है और न मेरे किसी सिपाही ने, बल्कि उसको उसकी बदकिस्मती ने मारा है।‘‘

माँ को गव की बातों पर तनिक भी विश्वास न हुआ। उसने कहा-“तू दुष्ट है और अपने भाई का हत्यारा है।” गव ने सफाई देते हुए कहा-“माँ! जरा धीरज से काम लो, तुझे ले चलकर रणक्षेत्र दिखाऊँगा और साबित करूँगा कि तलहन्द की मृत्यु में मेरा कोई दोष नहीं है। बस उसके दिन पूरे हो गए थे लकिन यदि तुझे विश्वास नहीं है तो मैं इस आग में जलकर स्वयं को भस्म कर दूंगा ताकि मेरे शत्रुओं का कलेजा ठण्डा हो जाए।‘‘

रानी ने बेटे की बात सुनी तो सोचने लगी-“एक बेटा तो गया। अब दूसरा भी चला जाएगा तो मैं कहीं की नहीं रहूँगी और वह भी ऐसा बहादुर जवान है।” ठहरकर गव से बोली-“तलहन्द हाथी पर कैसे मरा, चलकर दिखा ताकि मुझे विश्वास हो जाए और मेरे मन को शान्ति मिले।” गव अपने महल में गया। उसने अपने दूरदर्शी सलाहकार को बुलाया और उसको अपनी बातें बताईं। आखिर देश-भर के बुद्धिमान, क्या जवान, क्या बूढ़े, जमा हुए ताकि वे रणक्षेत्र का नक्शा बना सकें। गव ने युद्ध का सारा विवरण दिया। उन लोगों ने सारी रात विचार किया। इसके बाद आबनूस की लकड़ी का एक तख्ता बनाया जिसमें सौ खाने थे और उन खानों के आमने-सामने दो बादशाहों की फौजें हरकत करती हुई दिखाई गई थीं। दोनों फौजों में से एक के

योद्धा सागौन की लकड़ी के बने थे। दूसरे हाथी-दाँत के बने थे। बादशाह; वजीर, घोड़ा हाथी और प्यादा आमने-सामने रखे गए। हर बादशाह अपनी फौज के बीच में था। उसके पहले में उनका मंत्री था और उनके दायें-बायें एक-एक ऊँट, एक-एक घोड़ा था। यानी उसमें सिर्फ दो मर्द थे।

इस तरह ऊँचे सर वाला हाथी तीन खाने चलता था और जैसे दो मील की दूरी से सारे रणक्षेत्र पर नजर दौड़ाता था। इसी तरह से ऊँट भी तीन खाने चलता था और घोड़ा भी तीन खाने चलता। मगर एक में वह बेगाना-सा रहता। हाथी शत्रुता से सारे रणक्षेत्र में धावा बोलता हुआ चारों तरफ चलता था। हर मोहरा अपने-अपने मैदान में चलता था और उसमें कोई कमी या ज़्यादती न करता था। जब कोई बादशाह के मुकाबले में आता तो चिल्लाकर कहता कि ऐ बादशाह! मैंने बाजी जीत ली है। तब बादशाह अपने खाने से आगे बढ़ जाता ओर उसी तरह ऐसी जगह भी पहुँच जाता जहाँ से आगे बढ़ने का कोई रास्ता न रहता। इसके बाद हाथी, घोड़ा, मंत्री और प्यादे मिलकर बादशाह की राह रोक लेते हैं। अन्त में थक-हार कर बादशह की मौत हो जाती है और वह संसार के चक्करों से स्वतन्त्र हो जाता है। शतरंज के इस खेल का अर्थ था कि रणक्षेत्र में तलहन्द की स्थिति और उसकी मृत्यु को समझाया जा सके। रानी ने ध्यान से खेल देखा मानो उसने अपनी आँखों के सामने तलहन्द की मौत को देख लिया हो। इसके पश्चात् वह रात-दिन शतरंज की चैपड़ पर मोहरों को देखती रहती। उसकी आँखें मूसलाधार बरसतीं। तलहन्द की मौत ने उसको गहरा दुःख पहुँचाया था, जिस पर शतरंज का खेल मलहम का काम करता था।