ALL संपादकीय पुस्तक कहानी कविताएँ ग़ज़लें लघुकथा लेख पत्रांश साहित्य नंदनी बिरासत
धर्म का मर्म
February 21, 2020 • Devendra kumar • कहानी

एक बीज धरती में

जब भी गिरता है

पहले माटी में

मिलकर / मिटता है

ऐसे ही जीवन में

झुकना

धरती सा होना

क्षमा और अहं

गला कर

सबसे मिलना

मृदुता है

 

उगा अंकुर

सीधा होकर

जैसे ऊपर उठता है

तन-मन प्राणों का

सीधा होना

ऊँचे उठना

ऋजुता है

 

फिर जो माटी

शेष रही अंकुर पर

उसे हटा कर

नन्हीं कोंपल

प्रकाश में आकर

जैसे खिलती है

ऐसे ही जीवन में

लोभ-विकार हटा कर

निज प्रकाश में आना

खिलना

सत्य और शुचिता को

पाना है

 

अब नन्हे पौधे को

जैसे बाड़ लगा कर

हम बचा लिया करते हैं

ऐसे ही

अपने जीवन को

मन को

हर एक बुराई से

हमें बचाना

संयम से रहना है

 

फिर जैसे पौधा

गर्मी, सर्दी, वर्षा

सह कर

बड़ा वृक्ष बनता है 

ऐसे ही जीवन में

सब कुछ सहना

और जीतना मन को

उत्तम तप करना है

और वृक्ष से सूखे पत्ते

पतझर आने पर

जैसे झरते हैं

वृक्ष प्रतीक्षा में

वसंत की

जैसे मौन

खड़े रहते हैं

ऐसे ही जीवन में

अविनश्वर को पाने

जो भी नश्वर है

उसे सहज

चुपचाप छोड़ना

त्याग धर्म पाना है

 

अपने सुरभित

पुष्प लुटा कर

जैसे वृक्ष

अडिग, अकेले

आनंदित रहते हैं

ऐसे ही जीवन में

सबके बीच

स्वयं को

एकाकी पाना

मैं और मेरेपन की

मन में बात नहीं लाना

आकिंचन्य होना है

घने वृक्ष की छाया

जैसे सबको मिलती है

उसमें जैसे

अपने-दूजे का

भेद नहीं है

ऐसे ही जीवन में

सब में पाना ब्रह्म

सभी को अपनाना है

और वासना में जाती

जीवन की धारा

बड़े जतन से

अपनी ओर

बहा लाना है

यही ब्रह्म में रमना

ब्रह्मचर्य पाना है

अंतर

 

ये मंदिर इसलिए कि हम

आ सकें

बाहर से भीतर

 

ये मूर्तियाँ अनुपम सुंदर

इसलिए कि हम पा सकें

कोई रूप अपने में अनुत्तर

 

और श्रद्धा से झुक कर

गलाते जाएँ

अपना मान-मद

पर्त-दर-पर्त निरंतर

 

ताकि कम होता जाए

हमारे और प्रभु के

बीच का अंतर

 

सबूत

 

ये लोग

पूरा जीना

नहीं चाहते...

परस्पर

एक दूसरे से

ज़्यादा विख्यात

होना चाहते हैं...

जो इनके

अधूरेपन का

सबूत है

 

साकार और निराकार

 

साकार

जहाँ सब कुछ

दिन की रोशनी  सा

साफ दिखता है

देखो....

 

निराकार

जहाँ कुछ

होते हुये भी

नहीं दिख पाता

सोचो....

 

कौन साकार

कौन निराकार

किसमें किससे ज़्यादा

‘मैं’ का आधार

 

 

हर वक्त

 

पुराने को

न चाहते हुए भी

बीत जाना है...

और नये को अनायास

पुराना होकर

मर जाना है...

पर हमें तो

हर वक्त

दोनों का साथ

निभाना है

 

हमारा मन

 

किसे/किसने

पकड़ा है...

कौन/किससे

बँधा है...

ये तो बंधने की

बांधने की

वासना से

साफ ज़ाहिर है...

 

पर हम, हमारा मन

जिसे अपने

खुलेपन पर नाज़ है...

दुनिया की

हर चीज़ से

बंधकर भी

स्वयं को

अलिप्त/अबद्ध मानता है...

 

पहली बार रोका था

 

मैं अपने को

खोजने निकला था

लोगों के मन

ये पलायन था........

 

मेरा सड़कों पर

निरावृत घूमना

औरों के मन

निरा पागलपन था...

 

मेरे मित्रता के लिये फैले

दो हाथों को

लोगों ने सरासर

वासना कहा था...

 

मेरा मौन

औरों के लेखे

सिर्फ अहंकार था...

 

मेरी ऋजुता

मेरा सीधापन

औरों के मन

कायरता था...

 

मेरी मृदुता

मेरा मीठापन

कमज़ोरी था...

 

मेरे जीवन का

सब शुभ सुंदर

औरों को

बस आत्म हनन था...

 

ये सब मैंने

चुपचाप सहा था

 

पर जब

किसी ने मुझे

ऊँचे आसन पर बिठा

देव कहा था

और मेरे

आदमी होने को नकारा था

तब मैंने

पहली बार उन्हें

ऐसा करने से रोका था...

 

 

वृक्ष और मानव

 

बीज गिरा

अंकुर फूटा

पौधा उगा

पेड़ हुआ,

वो पेड़ ही था

छायादार

फल-फूलदार

भरा-पूरा

सबका शुक्रगुज़ार,

उसमें रूप था

रंग था

यौवन था

वो सृजन को आतुर

बेमिसाल फनकार था...

 

उसकी जड़ें

ज़मीन में

और फूल

आकाश में था,

तब आकाश

ज़मीन के

इतने करीब आया था

ज़मीन ने

उसी रोज़

आकाश को

अपना सब सौंपा था.

 

फल लगे

पेड़ झुका

ये पेड़ का

ज़मीन को नमन था.

 

अजीब हो

मैं पेड़ लिख रहा हूँ

तुम कविता समझ रहे हो....

 

जिसका था

उसी को अर्पण था.

 

जड़ें धरती की

शेष सब

आकाश का/सबका था.

 

पेड़ का निजी

कुछ भी नहीं था,

ये ही उसका

जीवन था...    

 

बीज गिरा

अंकुर फूटा

पौधा उगा,

बड़ा हुआ

ये मनुष्य था

 

बलात्

औरों के सृजन का दावेदार

रूपदार, रसदार

पर आधा-अधूरा

और मक्कार.

 

किसी को क्या देता,

औरों को लूटकर/हटाकर

अपने लिये

जगह बनाता था...

इसकी जड़ें  नहीं थी

आकाश नहीं था

टिकता कहाँ

आवारा बना घूमता था...

 

इसे पद का मद था

अकड़ थी

झुकता कैसे

टूटने का डर था...

 

ये पैसे में फूला

और फूलता ही रहा...

 

फूलना रूकता

तो फल लगते,

फल लगते, तो झुकता

(बेचारा आदमी

इसलिये नहीं झुका)...

औरों का छीनकर

घर भरा था, ये बढ़ा था.

 

इसका निजी

कुछ भी नहीं था...

 

वो पेड़ था

और ज़िंदा था

ये मनुष्य था

पर मुर्दा था...

 

Core of Righteousness

      

Whenever a seed

Falls into the earth

First it gets intermingled

And assimilated

Into the soil

Similarly to bow down in life

To be like the earth

To meet everyone

Adopting forgiveness

Dissolving ego

Is tenderness

 

As the offshoot

Gets straightened

And rise

Likewise

The rising of

Mind-body and soul

Is pureness

 

Then the way

Removing the leftover soil

On the seed

Tiny blossom

Comes into the light

Similarly, removal of

Greed and corruption

From the life

To come out

Into the self-light

Is to achieve

Truth and chastity

 

Now the way

We secure the young plant

By raising up

The fence

Likewise

To secure

Our life and mind

From each immorality is

To live with sobriety

 

Then the way

Plant becomes a huge tree

By enduring

Heat, cold and rain

Similarly

To endure everything in life

And to win over one’s own mind

Is the best perseverance

 

And the way

Dry leaves

Fall down from the tree

On arrival of autumn

And the way

Trees stand still

Waiting for the spring

Likewise

To leave whatever is mortal

Simply, silently…

To acquire

The immortal

Is renunciation

 

The way giving away

All their fragrant flowers

Trees live

Alone

Immovable

Joyful

Likewise

To live in solitude

Amongst all

And not to ponder over

Me and mine

Is mendicity (aakinchanya)

 The way everyone

Gets the shade

Of a dense tree

Without being partial

To anyone dear or not

Likewise to see the almighty

In everyone

Is to accept all

And to divert the tide of life

That was moving to the lust

Through sheer hard work

Towards the self

This is to comprehend

The formless

To attain self-mastery

 

This is the core of righteousness

 

 

 

 

 

 

 

Gap

      

These temples…

So that we can enter

Within from without

 

These unique, marvelous idols…

For we can find

An unanswered form

Into the self

 

And by bowing down in respect

Coat by coat, ceaselessly

We may melt away

Our pride-arrogance

 

In order to

Dilute the difference

Between the divine and us

 

Evidence

      

These people

Do not want to

Exist entirely…

Mutually

They want to be

More renowned

Than each other

Which is the proof

Of their

Incompleteness

 

 

Corporeal And Incorporeal

      

Corporeal

Where everything

Is clearly visible

Like daylight

Look…

 

Incorporeal

Where

Something is there

But still invisible

Contemplate…

 

Who is corporeal

Who is incorporeal

Who has the more

Base of ‘I’

 

Our Mind

      

Who is trapped

By whom…

Who is confined

With whom…

This is clear

From the desire

Of tying

Of getting bind

 

But we, our mind

That is proud

Of its openness…

Acknowledges itself

As unattached/unbound

Despite being

Attached with everything

In the world…

 

 

Prevented For the First Time

      

I got away

To seek myself

In people’s mind

It was escape…

 

My wandering

On the streets

Bare

In people’s mind

It was sheer madness…

 

People called

My spread arms

For friendship

Stark desire…

 

My silence

Was mere egotism

For them…

 

My innocence

Mt straightness

Was cowardice

In their minds…

 

My tenderness

My sweetness

Was frailty…

 

Everything auspicious

Cheerful of my life

Was only self-harm

For them…

 

I endured all that

Quietly

 

But when someone

Made me sat

On a throne

Called me God

And negated

My being human

Then for the first time

I prevented them

From doing so…

 

 

Tree And Human

      

The seed fell

Got germinated

The plant grew

Became a tree

That was the tree only

Shady

Fruitful-flowery

Complete

Grateful to all,

It had beauty

Color

Youth

It was an incomparable artist

Eager for creation…

 

Its roots

Were in the ground

And flower

Was in the sky

When the sky

Came that closer

To the earth

That day only

The earth devoted

All that she had

To the sky

 

Fruits appeared

The tree bowed

That was tree’s homage

To the earth

 

You are strange

I am writing a tree

You are taking it as poetry

 

Whose it was

Offered to him only

 

The roots were of the earth

The rest

Was of the sky/of all

 

Nothing was

Tree's personal

This was

It's life…

 

The seed fell

Got germinated

The plant

Grew up

This was human

 

The claimant of others’ creation

Forcefully

Beautiful, delightful

But incomplete

And deceitful

 

How could he give

Something to someone

He used to rob/expel others

To make way for himself

He neither had roots

Nor sky

Where could he abide

He used to wander

Like stroller…

 

He had arrogance of rank

Had stiffness

How could have he bend

There was a fear of getting broken…

He got bloated in money

And continued to bloat

 

If bloating would have stopped

The fruits would have appeared

Then he could have bowed

 

(Poor man that’s why

he couldn’t bend)…

He snatched from others

To fill his house

To grow

 

He had

Nothing personal…

 

That was a tree

And was alive

This was a man

But dead…