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डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की कहानियों का साहित्यिक- समाजशास्त्रीय अध्ययन
October 25, 2020 • रघुवीर शर्मा • साहित्य नंदनी

समीक्षक - रघुवीर शर्मा, हिंदी, सूचना एवं संस्कृति अधिकारी

भारतीय राजदूतावास काठमांडू, नेपाल,

Email: raghubir75@gmail.com

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने साहित्य और समाज के संबंधों को लेकर अपनी पुस्तक ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में लिखा है कि- “जब कि प्रत्येक देश का साहित्य वहां की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है, तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अंत तक इन्हीं चित्तवृत्तियों की परंपरा को परखते हुए साहित्य परंपरा के साथ उनका सामंजस्य  दिखाना ही साहित्य का इतिहास कहलाता है। जनता  की चित्तवृत्ति बहुत कुछ राजनीतिक, सामाजिक, सांप्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थिति के अनुसार होती है। अतः कारण स्वरूप इन परिस्थितियों का किंचित दिग्दर्शन भी साथ ही साथ आवश्यक होता है।"

कवि और कथाकार डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की कहानियां साहित्य और समाज के उसी अन्योन्याश्रित संबंध को पुष्ट करती हैं और समाज के हित में साहित्य की तरफ से जरूरी सवाल भी उठाती हैं। तभी तो डॉक्टर निशंक अपने कहानी संग्रह ‘खड़े हुए प्रश्न’ में ‘अपनी बात’ में कहते हैं- “इस कहानी संग्रह ‘खड़े हुए प्रश्न’ में जनजीवन के सामने सामाजिक, आर्थिक सहित तमाम व्यवस्थाओं के जो प्रश्न हैं, उन्हीं के  साक्ष्य के रूप में यह कहानी संग्रह आपके हाथों में है। हर आदमी की अपनी-अपनी समस्याएं हैं, कभी वह खुश नजर आता है तो कभी गम में डूबा दिखाई देता है। किसी न किसी उलझन में  आदमी उलझा है, कुछ कम कुछ ज्यादा। इस संग्रह की अधिकांश कहानियां सत्य घटनाओं पर आधारित हैं, जो आज घट रहा है, उसे मैंने शब्दों के रूप में पिरोने भर की कोशिश की है।"

इसी संग्रह की शीर्षक कथा ‘खड़े हुए प्रश्न’ को ही लीजिए। शहर में आफिसों के चक्कर तो कभी बैंक के चक्कर काट-काट कर कथा नायक सुरेश बाबू के जूते ही घिस गए। कथा नायक कई बार सोचता है कि गांव लौट जाए पर पाता है कि वहां गांव में भी जीविका के कोई साधन नहीं हैं। गांव में जो दो-चार खेत हैं, वे भी बंजर पड़े हैं, उन पर गेहूं धान तो दूर कोदा-झंगोरा भी पैदा नहीं होता। वह सोचने के लिए मजबूर हो जाता है कि उसका गांव देश की मुख्यधारा से ही अलग-थलग पड़ा है। वह महसूस करता है आजादी के पांच दशक बाद भी हमारे अपने देश का अपना सा अधिकारी भी इन गांवों में नहीं आ रहा है | वह यह भी महसूस करता है कि आजाद भारत के इन अधिकारियों को जनता के सुख-दुख से कोई वास्ता नहीं। तभी तो उसके मन में ये सवाल आते हैं- “कौन हैं इन अव्यस्थाओं के जिम्मेदार? कौन सरकारी तंत्र पर लगे वर्षों पुराने भ्रष्टाचार के जंक को धोयेगा? कौन एक गरीब नौजवान को जीने लायक रास्ता दिखा सकेगा? कौन लड़ेगा इस अव्यवस्था  व अराजकता के खिलाफ? कौन फाइलों का पानी जमीन में ला सकेगा? और कौन रोकेगा पहाड़ से युवाओं का पलायन?”

यहां पर जनकवि अदम गोंडवी बेसाख्ता याद आते हैं-

तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है,

मगर ये दावा झूठा है, ये आंकड़ा किताबी है

यही है वो यथार्थवाद जिसे मुंशी प्रेमचंद ‘चरित्रगत दुर्बलताओं, क्रूरताओं और विषमताओं का नग्न चित्र’ मानते हैं लेकिन वही प्रेमचंद ‘कुछ विचार’ शीर्षक से अपनी पुस्तक में आदर्शोन्मुख यथार्थवाद शब्द देते हैं और स्वयं अपनी अनेक रचनाओं में इसका विनियोजन भी करते हैं। ‘पंच परमेश्वर’ से लेकर ‘नमक का दरोगा’ कहानी तक उनकी तमाम कहानियों में हमें इसी आदर्शोन्मुख यथार्थवाद के दर्शन होते हैं। इस संदर्भ में उपन्यास में पात्रों के चरित्र निर्माण के पहलू पर बात करते हुए प्रेमचंद लिखते हैं-

“संसार में सदैव नेकी का फल नेकी और बदी का फल बदी नहीं होता बल्कि इसके विपरीत भी हुआ करता है। नेक आदमी धक्के खाते हैं, यातनाएं सहते हैं, मुसीबतें झेलते हैं, अपमानित होते हैं, उनको नेकी का फल उल्टा मिलता है| बुरे आदमी चैन करते हैं, नामवर होते हैं, यशस्वी बनते हैं। उनको बदी का फल उल्टा मिलता है। यथार्थवादी अनुभव की बेड़ियों में जकड़ा होता है और चूंकि संसार में बुरे चरित्रों की प्रधानता है, यहां तक कि उज्ज्वल चरित्र में भी कुछ न कुछ दाग- धब्बे रहते हैं, इसलिए यथार्थवाद हमारी दुर्बलताओं, हमारी क्रूरताओं का नग्न चित्र होता है। मानव-चरित्र से हमारा विश्वास उठ जाता है। हमको अपने चारों तरफ बुराई ही बुराई नजर आती है।

प्रेमचंद के अनुसार मनुष्य सदैव क्षुद्रता और नीचता के वातावरण में ही नहीं रहना चाहता| कभी-कभी उड़कर ऐसी जगह पहुंचना चाहता है, जहां उसे कुत्सित भावों से निजात मिले, उसे सहृदय, उदार, सज्जन प्राणियों के दर्शन हों| यथार्थवाद विषयक अपने एक निबंध में वे लिखते हैं-

“यथार्थवाद का यह आशय नहीं है कि हम अपनी दृष्टि को अंधकार की ओर ही केंद्रित कर दें। अंधकार में मनुष्य को अंधकार के सिवा सूझ ही क्या सकता है? बेशक चुटकियां लेना, यहां तक कि नश्तर लगाना कभी-कभी आवश्यक होता है लेकिन दैहिक व्यथा चाहे नश्तर से दूर हो जाए, मानसिक व्यथा सहानुभूति और उदारता से ही शांत हो सकती है| साहित्य का संबंध सत्य और सुंदर से है, यह हमें न भूलना चाहिए।”

डॉ निशंक की ऐसी कई कहानियां है जो जाने अनजाने प्रेमचंद के आदर्शोन्मुख यथार्थवाद से प्रेरित-अनुप्राणित दिखाई देती हैं। उनकी ‘लक्ष्य’ कहानी में बिल्कुल यही आदर्शोन्मुख यथार्थवाद है जो कथा नायक शेखर के लिए सुखद आश्चर्य बन जाता है जब उसे पता चलता है कि उसके सामाजिक कार्यों और तज्जन्य व्यस्तताओं से चिढ़ती हुई प्रतीत होने वाली उसकी पत्नी स्वयं ही पिछड़ी बस्ती के लोगों के साथ हार्दिक रूप से जुड़ी हुई है।

इसी प्रकार ‘अविश्वास’ कहानी का बिशन एक नेक चरित्र है जो अपने ही गांव के कुछ धूर्त लोगों के षड्यंत्र का शिकार होकर जेल भी जाता है। लेकिन इस यथार्थ के बाद आदर्श तब स्थापित होता है जब गांव वाले अपनी अपार सहानुभूति के साथ जेल से छूटे हुए बिशन को अपने सर आंखों पर बिठाते हैं और प्रधानी के चुनाव में विरोधी प्रत्याशी की जमानत तक जब्त करवा देते हैं।

डॉ निशंक की अनेक कहानियों के केंद्र में गांव हैं और वह गांव भी प्रायः पहाड़ के हैं। इसीलिए पहाड़ी जनजीवन और प्रकृति का चित्रण भी इनकी कहानियों में खूब मिलता है| उनकी ग्राम केंद्रित कुछ कहानियों में प्रकृति का मनोरम और सुरम्य चित्रण है- “दोपहर के दो बजे हैं। आकाश में काले बादलों से बनती बिगड़ती आकृतियां, कुछ काले शेरों के मानिंद, कुछ हल्के गोरे श्वेत मेघ। दोहरे-चौहरे परत दर परत एक दूसरे के पीछे भयंकर विद्रूप जैसे आकाश में ज्वालामुखी फटा हो, काले-स्याह डरावने..... अचानक बिजली की चमक व कड़कड़ाहट। कुछ ही पल में झमाझम बारिश से तन-मन तर-बतर हो गए। इतनी उमस के बाद  बारिश की बूंदें, जैसे प्यासे को पानी मिल गया। कुदरत के इस अनोखे करिश्मे को देख परमो का मन-मयूर नाच उठता। प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर पहाड़ी मार्गों पर संकरी सड़कों का सफर वास्तव में कम रोमांचकारी नहीं।”

(‘अभिशप्तशीर्षक कहानी का प्रथम अनुच्छेद)

लेकिन जैसा कि स्पष्ट है कि उनकी कहानियों के पहाड़ी गांवों में चित्रित जीवन एक पर्यटक की भांति देखे हुए जीवन का चित्रण मात्र नहीं है बल्कि यह उनका अपना भोगा हुआ जीवन का यथार्थ ही है जो उनकी कहानियों में पहाड़ी ग्राम्य जीवन के चित्रण के रूप में सामने आता है।

तभी तो जिस ‘अभिशप्त’ कहानी की शुरुआत प्रकृति के खूबसूरत चित्रण के साथ होती है, उसके अंत तक आते-आते लेखक कहानी के एक पात्र के माध्यम से मानो स्वयं बोल रहा है-

“हम गांव के लोगों की कोई कीमत नहीं है। हमारी जान की कीमत तो पशुओं के बराबर भी नहीं है। तब से सरकार से मांग कर रहे हैं कि कुरगुड़खाल में एक छोटा सा अस्पताल ही खुल जाए, 25 गांव हैं, इसके हेरफेर में, पर सरकार भी हमारे लिए हमेशा बहरी निकली। सरकार कर रही होगी कुछ किसी के लिए पर अभी तक तो हम लोगों के लिए कुछ नहीं हुआ| अंग्रेजों के जमाने में भी हम वैसे ही थे, जैसे आज हैं।“

इसी प्रकार ‘उत्सर्ग’ कहानी का प्रारंभ  भी सघन प्रकृति चित्रण के साथ होता है लेकिन उसमें भी लेखक एक पात्र के माध्यम से मानो स्वयं ही पत्रकारिता जगत से प्रश्न पूछ रहा है-

“आप लोग क्या लिखते हो? किसके बारे में लिखते हो? क्या गरीब की पीड़ा को कभी देखा आपने? क्या गरीबों को स्थान देते हो आप लोग अपनी खबरों में?  अखबारों में?”

पृथक राज्य के लिए उत्तराखंड वासियों के संघर्ष की मार्मिक कहानी है यह| ऐसे आंदोलन अपने पीछे जो जख्म, जो घाव छोड़ जाते हैं, उसकी कहानी है यह।

‘दीनू’, ‘कुछ नहीं जिंदगी’, ‘नियति’ और ‘तकदीर’ कहानियां पहाड़ के पहाड़ जैसे दुखों की कहानियां है जिन्हें पढ़ते हुए अंग्रेजी के मशहूर उपन्यासकार थॉमस हार्डी की जीवन के बारे में कही गई यह पंक्तियां बार-बार याद आती हैं-

 “Happiness is but an occasional episode in a general drama of pain.”

‘दीनू’ कहानी में पहाड़ के जीवन के बारे में जितना कहा गया, उससे कहीं ज्यादा, कई गुना अनकहा रह गया। वे अनकही स्थितियां या कि मानवीय त्रासदियां जिनका संकेत मात्र करके छोड़ दिया गया लेकिन असल में वही लेखक का ‘कथ्य’ है| दीनू मात्र एक पात्र नहीं है बल्कि मानो पहाड़ ही  मानवीकृत हो गया है  उसके रूप में।

इसी प्रकार ‘कुछ नहीं जिंदगी’, ‘नियति’ और ‘तकदीर’ कहानियों में भी बार-बार पहाड़ का जीवन पूरी शिद्दत के साथ उभर कर सामने आता है|

2008 में डॉ रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की कुछ चुनी हुई कहानियों का अंग्रेजी अनुवाद “The Crowd Bears Witness” के नाम से आया था। इसकी भूमिका में डॉ. निशंक लिखते हैं कि यह कहानियां उनके जीवन के लंबे संघर्ष की साक्षी हैं और इनमें वही अनुभव अभिव्यक्त हुए हैं जो उन्होंने देखे, भोगे हैं और जिनसे वे गुजरे हैं।

डॉ निशंक की कहानियों में अनुभव की प्रामाणिकता को ही रेखांकित करता अंग्रेजी के मशहूर लेखक रस्किन बॉन्ड का यह मंतव्य भी उल्लेखनीय है- “निशंक ने अपना अधिकांश जीवन जनसाधारण के बीच गुजारा है, उन्हें उनके सुख-दुख और उनकी समस्याओं की जानकारी है। जिन पहाड़ों में उनका जीवन गुजरा है और जिनसे उन्हें गहरा लगाव है, उन्हीं पहाड़ों की पृष्ठभूमि पर केंद्रित इन कहानियों में उनकी यही जानकारी फलीभूत हुई है। सीधी और सरल शैली में लिखी गई उनकी ये कहानियां अंग्रेजी में बखूबी अनूदित हुई हैं।”

पाश्चात्य देशों में  एडगर एलन पो आधुनिक कहानी (जिसे पश्चिम में शॉर्ट स्टोरी कहा जाता है) के जन्मदाताओं में प्रमुख माने जाते हैं। उन्होंने कहानी की परिभाषा देते हुए कहा है कि,” छोटी कहानी एक ऐसा आख्यान है जो इतना छोटा है कि एक बैठक में पढ़ा जा सके और जो पाठक पर एक ही प्रभाव उत्पन्न करने के उद्देश्य से लिखा गया हो। वह स्वत: पूर्ण होती है।”

यहां पर विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि डॉक्टर रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की संपूर्ण कहानियां कहानी की इस कसौटी पर पूरी तरह खरी उतरती हैं। उन्होंने अपनी कहानियों को लंबी और उबाऊ होने से बचाया है और उनकी कहानियों को पढ़ना आम पाठक के लिए भी एक आनंदप्रद अनुभव है।

संदर्भ

  1. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, ‘खड़े हुए प्रश्न’ (कहानी संग्रह), विनसर पब्लिशिंग कंपनी, देहरादून, द्वितीय संस्करण 2008, मुद्रित।
  2. Dr. Ramesh Pokhriyal ‘Nishank’, The Crowd Bears Witness (A collection of short stories), Bishen Singh Maheder Pal Singh, Dehra Dun, 2008, Printed.
  3. आचार्य रामचंद्र शुक्ल, ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, संवत 2035, संशोधित और प्रवर्धित 18वां पुनर्मुद्रण।
  4. डॉ. अमरनाथ, ‘हिंदी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली’, राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, दूसरा संशोधित और परिवर्द्धित संस्करण 2012 (पहली आवृत्ति 2013)