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'एक बार फिर'
June 8, 2020 • डॉ.विभा रजन (कनक) • कविताएँ

   डॉ.विभा रजन (कनक)     

  
एक बार फिर
वही, पहला स्पर्श!
महसूस करना चाहती हूं!
प्रेम में किया गया,
हर एक प्रयास,
फिर से दोहराना चाहती हूं!
अपने र्जीर्ण होते हुए,
प्रेम हवेली के द्वार पर,
खडी हो प्रियतम की राह में
प्रतिक्षारत, प्रतिपल,
हर विसंगतियों को भू्ल कर,
प्रेम में बंधे अश्र्वों-रथ को,
तुम्हारे मोहपाश में बंधे,
प्रेम के मीठे क्षण से लिपटे,
उस काल को पुनःजीना चाहती हूं!

प्रेम अधिकार में छुटे,
अधूरे मधूर पलों को,
ओस की बूंद की तरह,
हम दोनों के स्पर्श से धमनियों मे,
स्पन्दित होते प्रवाह से,
अपने इस जीवन प्राण को!
आंनदित करना चाहती हूं!

मन के गहराइयों में,
अश़्क बन छुपा बैठा है जो
मेरी अंजुरी में सिमट,
मन के भूमि की मिट्टी पर,
स्मरण चिंह की तरह अपनी,
आस के चुनरी से भिंगोना चाहती हूं!
तुम्हारे यादो के साये,
जो प्रेम-पथ पर रुहानियत से भरे,
बेहिचक आया-जाया करते थे!
उन यादो का एक,
सुंदर लिबास बनाकर,
मैं!अपने तन पर ओढ़ना चाहती हूं!
तुम्हारे जिस्म से निकलते,
खुबसूरत रुह की खुशबू को,
सुगंधित फूलों में मिलाकर,
खुशबुदार इत्र बनाकर,
अपने पुरे अस्तित्व पर छिडककर,
तुम्हारे रुह में समाना चाहती हूं!

नई दिल्ली, मो. 9911809903