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एक हजार बच्चों वाली माँ
June 29, 2020 • अनुवादक: डा. मज़हर महमूद


अनुवादक : मज़हर महमूद, नई दिल्ली, मो. 9891241192

–रामलाल

गली के मोड़ पर जो छोटा-सा मैदान है, उसके दोनों तरफ पक्के मकान बने हुए हैं, तीसरी तरफ एक मकान के पीछे की दीवार है और उसी के साए में तीन छोटी-छोटी झोंपड़ी बनी हुई हैं। सरकंडों और सूखी घास की। एक झोंपड़ी में साठ साल की बूढ़ी बख्ताँ रहती है अपनी दो कुंवारी बेटियों के साथ। बड़ी बेटी जिसका नाम खैरी है, अपनी दादी की तरह लंबी है। छोटी का नाम कैनी है, वह सांवली होने के अलावा छोटे कद की भी है। कहते हैं वह अपने बाप पर गई है जो ऐसा ही सांवला और पस्ता कद था। उसे मरे हुए कई साल हो चुके हैं। दूसरी झोपड़ी में बख़्ताँ का बेटा गुलाम हुसैन और उसकी बीवी मरयम और मेरी उमर का एक बेटा कादिर रहते हैं। गुलाम हुसैन रात को बाजार में चौकीदारी करता है और दिन में अपने में उसके दोनों बैल बांधे जाते हैं।

मुझे याद है इसी मैदान में एक बार उनका बैल अचानक भड़क उठा था और जब वह किसी तरह काबू में न आ सका तो, गुलाम हुसैन ने गुस्से में भरकर उसके पेट में अपना नेजा भोंक दिया था। फिर महकमए–इन्सिदादे-बेरहमी-एजानवरों (पशु-प्रतारण रोकथाम विभाग) से डर कर उसने अपनी पगड़ी उतार कर बैल के जख्म पर बांध दी थी और उसे जानवरों के अस्पताल में ले गया था।

इसी मैदान के साथ मेरे बचपन की बहुत सी यादें वाबस्ता हैं।यहीं मैंने पहले-पहल साइकिल चलाना सीखा था और कई बार बख़्ताँ के पानी के घड़े फोड़ डाले थे। इसी मैदान में हम लड़के लोग कबूतरों को फांसने के लिए एक टोकरे को ओंधा करके एक डंडे के सहारे खड़ा कर देते थे और उसके नीचे बाजरा बिखेर कर और डंडे के साथ बंधी हुई लंबी डोर का सिरा पकड़ कर दूर ग्रूप बनाकर बैठ जाते थे। जब कोई कबूतर फंस जाता तो वह मारा कहकर दबोच लेते थे। कबूतर एक हाथ से दूसरे हाथ में,फिर तीसरे हाथ में और कई हाथों में से होता हुआ बिल-आखिर बूढ़ी बख़्ताँ के हाथों में जा पहुंचता जो उसे खुली फिजा में छोड़कर हमें समझाने लगती थी, आज़ाद पंछियों को कैद कर लेना गुनाह होता है। उन्हें उड़ने दो।"

हमारे इस खेल में यकीनन उसका पोता कादिर भी शामिल रहता था जो उमूमन सिर्फ कुर्ता ही लपेटे होता और जब वह हमारे साथ कबूतर की घात में बैठा होता तो आगे से हमेशा नंगा हो जाता था। हम उसे नंगा हो जाने पर छेड़ते तो बख़्ताँ की दोनों बेटियाँ दूर खड़ी मुंह में अपने दुपट्टों के पल्लू टूंसे हंसी को रोकने की नाकाम कोशिश किया करती थीं।

मैं आँख बंद किए लेटे-लेटे उसी मैदान के सामने एक छोटे से गुरूद्वारे को भी देख रहा हूँ। एक लंबे चौले और नंगी टाँगों वाला ग्रंथि अरदास ख़त्म करके हाथ में एक बड़ी-सी थाली उठाए हुए बाहर आ जाता है। गरम-गरम भाप देता हुआ। कढ़ा प्रसाद पाने की खुशी में हम सारे लड़के उसके गिर्द जमा हो जाते हैं। शोर भी मचाते हैं और दोनों अलग-अलग हाथों में प्रसाद लेने के लिए उसे धोखा भी देने की कोशिश करते हैं। भीड़ में उसे हाथों की तमीज़ करना मुश्किल हो जाता है। लेकिन जब वह किसी को पकड़ लेता है तो उसे सिर्फ इतनी नसीहत करके माफ कर देता है कि वह उसके पास गुरमुखी पढ़ने के लिए ज़रूर आ जाया करे। प्रसाद पाने के लालच में मैंने बहुत बार गुरमुखी पढ़ने की कोशिश की मगर उड़ा-ऐड़ा कक्का घघा से कभी आगे न बढ़ सका।

एक बार मैं दोनों हाथों में प्रसाद लिये बाहर निकला तो दरवाजे पर बख्ताँ को खड़े हुए देख लिया जो कादिर को ढूंडने आ गई थी। कादिर एक भीड़ के पीछे खड़ा जल्दी-जल्दी कढ़ा प्रसाद निगल रहा था और दादी को देखते ही जल्दी से खिसक गया। मैंने बख्ताँ का ध्यान बटाने के लिए अपना प्रसाद उसके हाथों में दे दिया और कहा---"अम्मा तुम्हें भी प्रसाद चाहिए? यह मेरा हिस्सा है, इसे खाना मत, यहीं रूको।" और फिर ग्रंथि को पकड़ कर उसके पास ले आया--- "सरदार जी, उन्हें भी प्रसाद दो ना! यह हमारी अम्माँ है।"

ग्रंथि उसे जानता था। वह खुद भी उसे अम्माँ कह कर बुलाता था। उसने बख्ताँ की तरफ मुस्कुरा कर देखा और कहा--- "तुम्हारे पास तो प्रसाद है अम्माँ! कहाँ से पा गईं,!"

यह सुनकर मैंने झपट कर अपना हिस्सा अम्माँ के हाथों से उठा लिया और ग्रंथि ने उसके हिस्से से उसके दोनों हाथ लबालब भर दिए और वह हम सब को अल्लाह की बरकतें नाज़िल होने की दुआएं देती हुई मैदान की तरफ लौट गई।

सिर के नीचे कितनी देर से अटैची रखे रखे खोपड़ी में एक टीस-सी उठने लगी है। गाड़ी का शोर भी मेरे दिमाग में भर गया है। मैं करवट बदल कर फिर आँखें बंद कर लेता हूँ। और दादी से पूछने लगता हूँ---- अम्माँ ----वह बख़्ताँ इतनी अच्छी क्यूँ लगती है मुझे? बिल्कुल तुम्हारी तरह!"

दादी मुझे अपने सीने से लगाए हुए जवाब देती है----"बेशर्मा, उसे नाम से क्यों पुकारता है? वह भी तो तेरी अम्माँ है।

"है तो। मैं जानता हूँ पर वह इतनी अच्छी क्यों लगती है।बस यही जी चाहता है दिन में दो-एक बार उसे देखने मैदान में जरूर जाया करूं।"

"देख वै! वह तुझे इसलिए अच्छी लगती है कि वही तुझे इस दुनिया में ले आई थी। और तेरे बाप और तेरे दोनों चाचों और तेरी फूफियों को भी। मैं कहती हूँ हमारे परिवार के सब छोटे-बड़े उसी के हाथों जनवाए हुए हैं।"

बच्चे की पैदाइश का जो तसव्वुर बचपन में मेरे जहन में मौजूद था, वह अब किसी तरह टूटता हुआ मालूम नहीं होता। और मैं एक अजीब सी हैरत से खला में घूरता हुआ एक ऊंचे कद की रूई के गालों जैसे बालों वाली बुढ़िया को आसमान की ओर हाथ उठाए हुए देखने लगता हूँ जो हाथ बढ़ा कर धुंध के पहाड़ में से एक बच्चा ले लेती है और फिर पलटकर उसकी माँ की गोद में डाल देती है। और यह सिलसिला कभी खत्म होने में नहीं आता।

"अम्माँ, अम्माँ, वह फिर कब बच्चा जनवाने आएगी ? मैं उसके पास खड़ा होकर देखूँगा।

"हश्त् ! बेशरम का बेशरम! पर अब तो तेरा चाचा उसे घर के अंदर कदम भी नहीं धरने देता। पढ़-लिखकर नई रोशनी का हो गया है ना! कहता है उसके नाखुनों के अंदर मेल भरा रहता है और उसकी आँखों में गंदगी भी लगी रहती है। खैर अब तो बेचारी की बहू मरयम ने ही यह धंधा संभाल लिया है।"

मुझे याद है जब मेरी चाची मरी थी तो रोने वालों में बख्ताँ भी आ के बैठ गई थी। पहले तो मुहँ पर कपड़ा रख कर अकेली बैठी आँसू बहाती रही थी। फिर मेरी दादी के पास खिसक कर रो-रोकर कहती रही थी---- अब मारना-जिलाना तो पर्वरदिगार के हाथ में रहता है। इस मोहल्ले में जितनी औरतें मरी हैं, उन्हें मैंने थोड़े ही मारा है! मेरे इख्तियार में होता तो किसी को ऊपर जाने ही न देती!"

छुट्टियों में घर आने से पहले ही रोज़ मैं उसी मैदान की तरफ चला गया था। हालाँकि अब मेरे बचपन का कोई हमजोली वहाँ मौजूद नहीं था। मेरी तरह सब बड़े होकर इधर-उधर तालीम व तरबियत और आर्थिक जिद्दोजहद में समा गए थे। बख्ताँ का पौता कादिर तक फौज में भर्ती होकर किसी दूर की छावनी में जाकर रहने लगा था। मुझे देख कर बख्ताँ का झुर्रियों से भरा हुआ चहरा खुशी से गुलनार हो गया था। उसने कहा ---पुत्तर, अब तू लाहौर में पढ़ता है ना। बहुत बड़ा जिला अफसर बनकर दिखाना! मैं मियां जकरी के मजार पर तेरे लिये मन्न्त मांगूंगी।"

उसकी दुआओं से मुतासिर होकर मैंने कोट की जेब में हाथ डाला तो एक ही सिक्का हाथ लगा और उसकी मुट्ठी में दे दिया जिसे महसूस कर के वह खुश होकर बोली----"अल्लाह तेरी कमाई में बरकत दे। पर यह तो पूरी चवन्नी है। इतनी सारी मुझे क्यों दे रहा है?"

" अब रख भी ले अम्माँ ! यह इतनी सारी कहाँ है!"

"अरे वाह! इसकी तो आधी भैली गुढ़ की आजाएगी। मैं अभी जाकर ले आऊँगी

जिस हिसाब से उसने चवन्नी की इक्तिसादियात का अंदाजा लगाया था, उसी तरह मैं मन ही मन में सोचने लगा---अम्माँ सच कहती है। इसी चवन्नी से मैं स्टेशन से अपने घर तक तांगे पर आठ बार आ जा सकता हूँ और अंग्रेज़ी नहाने वाले साबुन की दो टिकियाँ खरीद सकता हूँ या एक फाउंटेन पेन भी ले सकता हूँ या हॉकी की एक बॉल या दो पैसे फी लिफाफे के हिसाब से अपनी दिल पसंद लड़की को आठ खत भी पोस्ट कर सकता हूँ!

"क्या सोच रहा है पुत्तर।”

“अम्माँ मैं यह सोच रहा हूँ तुम्हारे अगर सारे बच्चे तुम्हें एक-एक चवन्नी लाकर दे दे तो तुम न सिर्फ इस मैदान को खरीद सकती हो। बल्कि उसके ऊपर एक महल भी तामीर कर सकती हो। अगर ऐसा हो जाए तो कितना अच्छा हो!"

“अरे तू तो बिल्कुल शैख चिल्ली जैसी बातें करता है! मेरे बच्चे अपने-अपने महलों में आबाद रहें, मुझे इससे बड़ी खुशी होगी। मैं मर भी जाऊँगी तब भी सुकून महसूस करती रहूंगी कि अपने पीछे एक आबाद और शाद खानदान छोड़ आई!"

मैं बड़ी बेचैनी से अपनी क्यू में धीरे-धीरे खिसकता हुआ कस्टम आफिसर तक पहुंचता हूँ | उसके इशारे पर अटैची उसके सामने खोल देता हूँ। वह कपड़ों के दरमियान से एक नई गर्म शॉल खींच कर पूछता है---"यह क्या है? किसके लिए है?"

मैं कशमकश में पड़ जाता हूँ। पहले उसका नाम बताता हूँ,जिसके लिए शॉल ले जा रहा हूँ। फिर उसकी उम्र का हिसाब बताने लगता हूँ कि वह किस कदर अजीम है----चालीस साल पहले उसे देखा था तो उस वक्त वह साठ साल की थी। इस बीच में कुछ वर्षों के हिसाब की गड़बड़ भी है। अंदाजन दस साल और जोड़ लूं तो वह एक सौ दस साल की तो जरूर हो चुकी होगी और जब मैं अपने हाथों से उसको यह शॉल ओढ़ाऊँगा तो वह किस कदर खुश हो उठेगी! मुझे बेशुमार दुआएं देगी। बार-बार मेरा सिर चूमेगी----इन्सपेक्टर साहब! वह मेरी माँ है।

हाँ हाँ वह तुम्हारी माँ जरूर होगी पर तुम्हें यकीन है कि वह अब तक जिन्दा होगी भी या मर-खप चुकी होगी।"।

वह हंसने लगता है और मुझे उसके बार-बार खुलते और बंद होते हुए मुँह को देखकर एक अंधेरी कब्र का खयाल आ जाता है। एक सुनसान कब्रिस्तान के अंदर बेशुमार धंसी हुई और नई-नई कब्रों के दरिमयान और मैं फैसला कर लेता हूँ---ठीक है मैं उसे वहाँ भी तलाश कर लूंगा और उसे एक बार यह ओढाऊंगा जरूर।