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एक मुलाक़ात मीराकांत जी से
May 25, 2020 • ज़ैबुन्निसा

 लेखिका मीरा कांत, Mob. 09811335375

श्रीनगर में जन्मीं मीरा कांत जी को दो बार मोहन राकेश सम्मान (प्रथम पुरस्कार) नट सम्राट सम्मान और हिन्दी-अकादमी, दिल्ली के साहित्यकार सम्मान सहित कई अन्य प्रतिष्ठित सम्मान भी प्राप्त हुए हैं।

मीरा कांत जी की पहचान उस लेखन से की जाती है जिसने संकीर्णता पैदा करने वाले हर वाद और नारे को दरकिनार किया है। तीन कहानी संग्रह, तीन उपन्यास और एक दर्जन से अधिक प्रकाशित मंचित नाटकों में उनकी लेखनी हाशिए पर सहमी, सुनी- अनसुनी मानवता की पुकार की हिमायती रही है। आपके साहित्य की भाषा की रेंज विषय वैविध्य के साथ जुगलबंदी करती है। मिथक से इतिहास तक का फ़ासला तय करता आपका रचना धर्म हर युग की ज़बान उसकी धड़कन जज़्ब का बयान करता आया है।

पिछले दिनों उन्हीं से एक यादगार मुलाक़ात-

प्रश्न: आप अपनी तालीम के बारे में बतायें की आपने कहाँ-कहाँ से तालीम हासिल की?

उत्तर: मैं दिल्ली में पली-बढ़ी हूँ सो ज़ाहिर है कि तालीम भी यहीं पाई। मैंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से हिन्दी (आनर्स) में बी.ए. किया। फिर यहीं से हिन्दी में एम.ए. किया। उसके बाद मैंने भारतीय विद्या भवन से जर्नलिज़्म में डिप्लोमा किया। फिर नौकरी करते हुए जामिया मिलिया इस्लामिया से पी.एच.डी. की। मेरे रिसर्च का टापिक था- ‘‘अन्तर्राष्ट्रीय महिला दशक में हिन्दी पत्रकारिता की भूमिका।

प्रश्न: तालीम के दौरान आपने जिन किताबों का मुताला किया उनमें किस किताब से सबसे ज्यादा मुतासिर हुई ?

उत्तर: तालीम के दौरान ही क्या मैं जिन्दगी में जाने कब अलग-अलग किताबों से मुतासिर होती रही हूँ और उम्मीद है कि होती जाऊँगी क्योंकि तालीम और मेरा रिश्ता तो ताजिन्दगी बरक़रार रहने वाला है। हाँ वक़्त-वक़्त पर अलहदा नज़्मों, अफ़सानों नाॅविलो, सफ़रनामों ने मुझे मुतासिर किया है पर उनमें से चंद पर अंगुली रखना और बाकियों को नज़र अंदाज़ कर देना मेरे लिए मुमकिन नहीं है। मुतासिर होना या असर अंदाज होना मेरे लिए कुछ ऐसा है जैसे धुप्पअंधेरे कमरे में बिल्ली का होना, वो हमें दिखाई नहीं देती सिर्फ उसकी चमकती आँखों से अहसास होता है कि वो वहाँ मौजूद है।

प्रश्न: आपने जो किताबों  या तहरीरे लिखी हैं उनमें समाजी मसाइल को ज़्यादा बयान किया है या अख़लाकी मसलों को ?

उत्तर: समाजी मसाइल और अखलाक़ी मसलों के बीच मुझे खाई नहीं नज़र आती है। मैं इन्हें अलहदा-अलहदा खानों में रखकर भी नहीं देख पाती हूँ। समाज और समाजी रिश्ते अख़लाक़ के सुतून पर ही क़ायम रह सकते हैं। जगह-जगह उसकी मौजूदगी और गै़र-मौजूदगी का क़िस्सा मेरी कोशिश रही है। मैंने औरतों के सूरतेहाल, समाज में उनके दर्जे उनके हकों से जुड़े समाजी मसलों पर लिखा तो अपने नाॅविल ‘‘उर्फ हिटलर’’ में इस बात पर भी ग़ौर किया कि अगर किसी शख़्स या कहें कि मर्द पर अख़लाक़ी तौर पर ज़ुल्म या ज़्यादती हो रही है तो उसके खिलाफ़ भी आवाज़ बुलन्द की जाए डिप्रेशन और दिमाग़ी सेहत से जूझते लोगों की अपनी जड़ों से उखड़े कश्मीरियों, कश्मीर की बराबर जलती वादी में ख़ौफ़ के साए में जीने को मजबूर लोगों, यानि कुल मिलाकर हाशिये पर खड़े लोगों की जद्दोजहद और समाजी-मसाइल भी मेरे कामों में मौजूद हैं।

प्रश्न: मैदाने-सियासत में या हूक़ूक़ के मैदान में पुरअमन जद्दो-जहद के बारे में आपकी क्या राय है ? ख़ास तौर पर जब औरत अपने हक़ों के लिए उठ खड़ी हो ?

उत्तर: जब गांधी जी की एक आवाज़ पर औरतों ने बड़ी तादाद में घरों से निकल कर मुल्क की आज़्ाादी की लड़ाई में मर्दो के शानःवशानः हिस्सा लिया तो अपने हक़ों की जद्दोजहद के मैदान में भला ये कैसे पीछे रहेगीं और क्यों रहें! उन्हें आवाज़ बुलंद करनी ही होगी। सियासत के मैदान में अभी वो बहुत पीछे हैं। सियासी ओहदे पर बैठ कर उन्हें औरतों के हक़ की बात करनी होगी जो अमूमन दरकिनार हो जाती है। जिन चन्द औरतों ने हिम्मत कर ऐसा किया उनमें से कई को ख़तरनाक नतीजे भुगतने पड़े। असल में औरतों के हक़ की लड़ाई चाहे सियासी हो या समाजी, वो तभी कामयाब होगी जब समाज की ज़हनियत बदलेगी। जब औरतों के हक़ों की लड़ाई में औरतों के साथ-साथ मर्दों की भी शिरकत होगी और ऐसा होने लगा है।

प्रश्न: एक फनकार जब कुछ तख़लीक़ करता है चाहे वह किसी ज़बान में हो, वह अफ़साना हो या ड्रामा या नाॅविल हो या मुक़तसर क़िस्सा और कहानी हो तो वह उसमें अपनी ज़िन्दगी के तर्जुबात या अपनी निगाह से जिन चीज़ों को वह देखता और महसूस करता है उसे फंनकार बयान करता है, आपने इस एतबार से किन मसाईल को या किन पहलुओं को ज़्यादा अहम् समझा और उनपर ज़्यादा तवज्जोह दी ?

उत्तर: समाज के मौजूदा इंनसानी रिश्तों में मेरी दिलचस्पी बचपन से ही थी। इन्हें जब बारीकी से समझा तो इंसानी रिश्तों में हुकूमत और हूकूक़ की जद्दोजहद को जान पाई, घर और बाहर यानी समाज में जो विरोधाभास और गै़र बराबरी मौजूद है उनके बारे में भी पढ़ा कि ये पितृसत्तात्मक मूल्यों पर आधारित व्यवस्था है जो हम सदियों से झेल रहे हैं। आहिस्ता-आहिस्ता यह चुभन बन कर स्त्री विमर्श के रूप में साहित्य का हिस्सा बन गया। इन हालात को जितना जितना महसूस करती थी, इन पर जितना गहराई से सोचती थी मेरे अन्दर एक ग़्ाुस्सा पैदा होता था जो शायद कहीं चेतना के गोदाम में इकट्ठा हो रहा था। आख़िरकार मेरे अफ़सानों में और बाद में ड्रामों और नाॅविलों में इसने एक क्रिएटिव शक्ल में अपना इज़्ाहार किया। यही वजह है कि ज़्यादा तवज्जोह मैंने औरतों के हालात और ज़िन्दगी में उनकी जद्दोजहद को दी, उनके ख़िलाफ़ होने वाली ज़्यादतियों पर लिखा। कुल मिलाकर हाशिये पर धकेल दिए गए लोगों की कराह मेरी क़लम की स्याही बनती गई।

प्रश्न: आपका आबाई वतन ?

उत्तर: मेरा आबाई वतन कश्मीर है। मेरे माता-पिता कश्मीर के थे। रोज़गार के सिलसिले में मेरे पिता ने 1948 में दिल्ली की तरफ़ रूख़ किया और फिर यही बस गए।

प्रश्न: आपकी किताबों की और तहरीरों की तदाद क्या है ? और उनको मक़बूलियत किन बुनियादों पर हासिल हुई क्या समाज के तमाम तबक़ात में उनको मक़बूलियत मिली ? या सिर्फ अदबी ज़ौक़ रखने वाले हलक़ों में ?

उत्तर: अब तक अंदाज़न नौ-ड्रामें, तीन सोलो ड्रामें, चार नाॅविल और तवील अफ़सानों के तीन संग्रह छप चुके हैं। हाल ही में मुझे 1947 के आस-पास के कश्मीर के हाजियों की ज़िन्दगी के तलातुल पर लिखने का मौक़ा मिला। ये सिलसिला शुरू हुआ मोहन राकेश के एक अधूरे नाविल ‘‘काँपता हुआ दरिया’’ से जो उनके अचानक इंतक़ाल की वजह से पूरा ना हो पाया था। इसे पूरा करने का ज़िम्मा मुझे सौंपा गया था, और वो हाल ही में छपा है। जहाँ तक मक़बूलियत का सवाल है ये तो आप लोग बताएँगे पढ़ने वाले बताएँगे। मैं तो इतना ही कह सकती हूँ कि मेरे ड्रामें मुल्क की ज़्यादातर यूनिवर्सटी में बी.ए. और एम.ए. में पढ़ाए जाते हैं। उन पर और मेरे बाक़ी अदब पर पी.एच.डी. की रिसर्च हो चुकी है और कुछ पर जारी है। अगर आप इसे मक़बूलियत का पैमाना मानें तो.......।

प्रश्न: आपकी मौजूदा मशगूलियात क्या हैं?

उत्तर: आजकल मैं एक तबील अफ़साने पर काम कर रही हूँ। इसमें हमारे वक़्त और आज़ादी से पहले अंग्रेज़ों के ज़माने का ताना-बाना एक साथ बुना जाएगा। यानी इसमें हमारा आज भी होगा और हमारा माज़ी भी।

प्रश्न: आज़ादी के बाद हिन्दुस्तान में औरत को समाजी ऐतबार से क्या-क्या हूक़ूक़ हासिल हुए या अब भी वह महरूम हैं?

उत्तर: आज़ादी के बाद औरतों को सामाजिक-आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक सभी सतहों पर आगे बढ़ने के मौक़ं मिले। मर्दो की दुनिया में मुश्किल और मुखालिफ़ हालात को दाएँ-बाएँ करते हुए ख़्वातीन आगे बढ़ी हैं। आज औरत पायलट भी है, डाक्टर. भी और साइ-सदाँ है। इतना ही नहीं सरहद पर लड़ भी सकती हैं। हाँ मगर ये भी इसी समाज की हक़ीक़त है कि आज कहीं-कहीं लड़की पैदा होने से पहले ख़ात्मा कर दिया जाता है। उनके पास अपनी ज़िन्दगी के फै़सले ख़ुद लेने का हक़ नहीं है। इसके बावजूद मैं कहूँगी कि औरत आगे बढ़ी है। मगर अभी अपनी आज़ादी बेहतरी और आइडेंटिटी के लिए औरतों को एक लम्बी लड़ाई लड़नी है। वो तभी मुमकिन होगा जब औरतों और मर्दों यानी पूरे समाज की जहनियत में बदलाब आएगा।

प्रश्न: हिन्दुस्तान के मौजूदा-हालात के बारे में आपका क्या तासुर है ? और क्या जब अमनों-अमान की फ़िज़ा के बजाए तनाव की और कशमकश की फिज़ा होगी तो उसमें क्या कोई अदबी या इल्मी काम हो सकता है ?

उत्तर: तनाव और कशमकश की फिज़ा में अदब और निखरता है। क़लम की सियाही का रंग कुछ और गहरा हो जाता हैं

प्रश्न: आपका सबसे बेहतरीन अफ़साना कौन-सा है ? जिसे फने-अफ़साना का आला नमूना कहा जा सके ?

उत्तर: मेरे ख़्याल से वो अफ़साना लिखना अभी बाक़ी है। यक़ीन जानिए मेरी कोशिश बराबर जारी है।

ज़ैबुन्निसा
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