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गांधी हिंदी में हिंदुस्तान का लोक देख रहे थे
June 22, 2020 • डॉ. डी. एन. प्रसाद • साहित्य नंदनी

डॉ. डी. एन. प्रसाद, प्राध्यापक : संस्कृति विद्यापीठ महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय

वर्धा – 442001 (महाराष्ट्र), मो. 9420063304 ई-मेल - dnpsayal@yahoo.co.in

 

आदमी और देवता के बीच का जो मनुष्यत्व होता है, वह अद्भुत, उमदा और विस्मयकारी होता है। गांधी का मनुष्यत्व भी इसी अद्भुत, उमदा और विस्मयकारी के त्रियुगी योग से निर्मित हुआ था। अर्थात् गांधी आदमी और देवता के मध्य के मनुष्य थे; इसलिए जिस पथ पर वे चले, पथ स्वर्णिम होता चला गया, आस्था के पथिक साथ होते चले गए और लक्ष्य साथ-साथ चलने लगे..... ___गांधी समूह के साथ संस्थानिक साया में विश्वास के द्योतक थे, इसलिए भी जो भी कार्य उनके द्वारा संपादित हुआ, उसका प्लेटफार्म कोई-न-कोई संस्था ही रही है। गांधी के पूरे कार्य-जीवन में उनके द्वारा स्थापित और सफलता पूर्वक लक्ष्य प्राप्ति के हेतु क्रियान्वित अनेकानेक संस्थाएं संजीवनी की तरह कार्य कीं, जिनमें अनेकानेक संस्थाएं आज भी पूरी जीवन्तता के साथ कार्यरत हैं। गांधी के रचनात्मक कार्यक्रम को ही लें तो लगभग सभी कार्यक्रम के लिए एक क्रियाशील संस्था का परिपोषण दिखाई देता है। इससे कार्यरत व्यक्ति की भागीदारी और सहभागिता स्वयं की लगती है और संस्थागत लक्ष्य सामूहिक सहोदरता का भान देता है। ऐसी संस्थाएं ही शाश्वत नजीर बनती हैं। मजे की बात है कि 'भाषा' भी उनके रचनात्मक कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण अंग था, जिसमें हिंदी भाषा के सहज प्रवाह की शक्ति की संप्रेषणीयता का बोध गांधी को दक्षिण अफ्रीका में ही हो गया था, इसलिए भी वे हिंदी भाषा के प्रचारप्रसार की अनेक योजनाएं, संस्थानिक उपक्रम और जमीनी कार्यक्रम की गतिविधियां सृजित करते चले गए। दक्षिण अफ्रीका के प्रयोग के बाद भारत जैसे बहुभाषी राष्ट्र को एक राष्ट्रभाषा के हेतु एक हृदय हो भारत जननी' के बोध-स्वर के लिए उन्होंने राष्ट्रभाषा हिंदी प्रचार' का वीणा हाथ में ले लिया। यथा गांधी द्वारा स्थापित ‘दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा' (1918), मद्रास तथा राष्ट्रभाषा प्रचार समिति (1936), वर्धा ने प्रमुख रूप से आम जन के जेहन में पूरी तरह जगह बना लिए, क्योंकि लोक की भाषा 'हिंदी' (चाहे स्वरूप जो भी रहा हो) पूरे राष्ट्र में जागृत थी, इसलिए ब्रिटिश-काल को भी यह महसूस होने लगा था कि इस भाषा की गंगोत्री में स्नान कर भारतीयों पर शासन करना सरल होगा। इसलिए ईस्ट इंडिया कंपनी के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड मार्किस वेलेजली द्वारा सन 1800 ई. में कोलकाता में जो 'फोर्ट विलियम कॉलेज' की स्थापना की गई, उसका उद्देश्य ही था भारतीय भाषाओं के अध्ययन के मध्य खड़ी बोली हिंदी (हिंदुस्तानी) की संप्रेषणीयता की सांगोपांग स्वीकार्यता की खोज! क्योंकि 1800-1837 तक ब्रिटिश हुकमरानों के बीच विवाद के बाद कोर्ट के डाइरेक्टरों को 1830 में ही यह कह देना पड़ा कि 'जनता को न्यायाधीशों की भाषा सिखाने की अपेक्षा न्यायाधीशों के लिए जनता की भाषा सिखना सरल है।' (...and it is easier for the judge to require the language of the people than for the people to require the language of the judge. (printed parliamentary papers relating the affairs of India. General Appendix I Public (1832)-P.47)

तात्पर्य, जनसाधारण की भाषा, लोक की भाषा की स्वीकार्यता की स्वीकारोक्ति लाजिमी थी। अस्तु, फोर्ट विलियम कॉलेज ने हिंदी के पठन-पाठन, प्रचलन और प्रसरण में महती भूमिका का निर्वहन किया।

तत्पश्चात् अपने मिशन के लिए ही सही, ईसाई मिशनरियों ने भारत के दक्षिणी तट से प्रवेश कर हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार अपनी सेवा व सहानुभूति के भाव से किया। स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा सेवा के बल पर अपने धार्मिक प्रचार में हिंदी भाषा के माध्यम से सफल रही ये ईसाई मिशनरियां हिंदी का प्रचार-प्रसार अपने बलबूते कीं।

भारतीय समाज अपनी भाषायी चेतना से शनैःशनैः जागृत हो रहा था। इस परिप्रेक्ष्य में फोर्ट विलियम कॉलेज तथा ईसाई मिशनरियों के हिंदी सद्भाव स्पष्ट हो गए थे, फलस्वरूप भारतीय समाजसुधार आंदोलन के कुछ अनन्य संस्थानिक प्रयास इस दिशा में कार्यरत हो गए थे। यथा ब्रह्मसमाज (1828), आर्य समाज (1875) आदि महत्वपूर्ण संस्थानिक गतिविधियों में हिंदी समाज व संस्कृति का प्रबल प्रचार एवं प्रसार हुआ जिसके पुरोधा क्रमशः राजाराम मोहन राय तथा स्वामी दयानंद सरस्वती थे। राजा राममोहन राय ने तत्वबोधिनी पत्रिका' (1843) का प्रकाशन किया तथा स्वामी दयानंद सरस्वती ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ (1875) हिंदी गद्य रचना का प्रणयन किया। ‘ब्रह्म समाज' से जुड़े श्री केशव चंद्र सेन जो हिंदी जागरण के प्रबल पक्षधर थे, उन्होंने स्वामी दयानंद सरस्वती को संस्कृत में व्याख्यान देने के बजाय हिंदी में व्याख्यान देने की सलाह दी थी जिससे देश में जन-जन तक आपकी बात जनता में जागरण पैदा कर सके। इस तरह राष्ट्रीय भावना के साथ-साथ राष्ट्रभाषा की भावना भी पल्लवित होती गई। इसके परिप्रेक्ष्य में यह भी जान लेना आवश्यक है कि प्राचीन काल से ही पर्यटन, तीर्थाटन व व्यापार ने हिंदी को पूरब से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण यानी भारत के संपूर्ण प्रदेश में प्रसारण कराए, जिसके फलस्वरूप हिंदी जन-जागरण की भाषा बन चुकी थी। दक्खिनी हिंदी का स्वरूप भी इन्हीं व्यवहारपरक कार्यों के बनिस्बत व्यावहारिक बना। इतिहास साक्षी है कि भारत के प्राचीन रियासत, राजा-महाराजा, क्रांतिकारी, सूरमा, संत-संन्यासी आदि प्रर्वतक चिंतक भी क्रांति की भावना जागृत करने के लिए हिंदी भाषा का ही प्रयोग करते थे। धीरे-धीरे भारतीय स्वतंत्राता संग्राम (1857) की भाषा भी हिंदी बन गयी। अर्थात् राष्ट्रीय आंदोलन की राष्ट्रभाषा हिंदी हिलोरें लेने लगी थी। यह भी गौरतलब है कि हिंदी के प्रचार-प्रसार में गैर  हिंदी भाषियों का अवदान आधारभूमि का कार्य किया है। देश भावना की एकता में एक हृदय हो भारत जननी' की गूंज निरंतर प्रवाहित होती रही है। यानी गांधी के आने के पूर्व एक पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी थी। उत्तर भारत की हिंदी प्रचार-प्रसार वाली दो संस्थाएं काशी नागरी प्रचारिणी सभा (1893), वाराणसी तथा हिंदी साहित्य सम्मेलन (1910), इलाहाबाद ने अपनी गतिविधियों से हिंदी का परचम फैला चुकी थीं। 'काशी नागरी प्रचारिणी सभा’ का उपक्रम हिंदी साहित्य सम्मेलन के इंदौर अधिवेशन (1918) का प्रतिफल ‘दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा (मद्रास) तथा नागपुर अधिवेशन (1936) का प्रतिफल 'राष्ट्रभाषा प्रचार समिति (वर्धा) गांधी के नेतृत्व में हिंदी चेतना को जगाने वाली अग्रणी संस्था के रूप में उभरकर सामने आई। अंग्रेजों को गांधी ने सांस्कृतिक लुटेरे' की संज्ञा दी और राष्ट्र की एकता के हेतु हिंदी की संस्कृति को विकसित करने का अहम फैसला लेते हुए अपने 18 वर्षीय सबसे छोटे पुत्र देवदास गांधी को दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास को संचालित करने के लिए भेज दिया। दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास का बोध-वाक्य ‘एक हृदय हो भारत जननी' राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा का भी बोध-वाक्य बन गया। गांधी को यह महसूस हो गया था कि भाषा का स्वराज्य प्राप्त किए बिना स्वराज्य का कोई अर्थ नहीं... इसलिए उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन के व्यापक विस्तार में हिंदी भाषा को प्रमुख माना, जिससे सारी जनता जुड़ सकी। इस तरह ये दोनों संस्थाएं गांधी के नेतृत्व में हिंदी के व्यापक प्रचार-प्रसार में समर्पित हो गई। दब्रिड़ प्रदेश में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास तथा शेष भारत में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा का अद्वितीय योगदान आज भी निरंतर जारी है।

सर्वांगिण दृष्टि डालें तो 'काशी नागरी प्रचारिणी सभा', काशी (वाराणसी) हिंदी की व्यापकता के हेतु आदि संस्था है, जिसके क्रोड़ से उद्गमित हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग (इलाहाबाद) के अधिवेशनों से उद्भासित दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास (चेन्नई) तथा राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा (महाराष्ट्र) दोनों ही गांधी के हिंदी आंदोलन के राष्ट्रीय प्रतीकार्थ प्रतिष्ठित हैं। दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास को भारत सरकार ने राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित किया है, जहां का पठन-पाठन तथा प्रचार-प्रसार निरंतर महत्व के परिप्रेक्ष्य में द्रविड़ प्रदेश के चारों प्रांत तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश तथा कर्नाटक में फलित है। ठीक उसी भांति राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा का पठन-पाठन एवं प्रचार-प्रसार शेष भारत के साथ विदेशों में भी फलित है। ज्ञात हो कि राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के सद्प्रयासों का प्रतिफल है नागपुर में 1975 का प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन का सफल आयोजन जिसकी सुधी भारत सरकार ने ली और निरंतर देश-विदेश में आयोजन के साथ हिंदी भाषा, साहित्य, तकनीकी तथा कार्यान्वयन की वैश्विक भाषा के रूप में प्रचारित, प्रसारित और प्रतिष्ठित है तथा आज वर्धा में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय' (1997) गतिमान है एवं मॉरिशस में अंतरराष्ट्रीय हिंदी सचिवालय' (2008) संचालित है।

गांधी की ये प्रेरक संस्थाएं (दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा तथा राष्ट्रभाषा प्रचार समिति) गांधीपथ की अनुगामिनी बनीं, फलस्वरूप हिंदी की वैश्विक परिणति प्रणीत हुई। हिंदी प्रचार-प्रसार में इन दोनों प्रमुख संस्थाओं के प्रणयन से देशभर में हिंदी प्रचार-प्रसार एवं शैक्षणिक विस्तार के लिए अनेकों संस्थाएं कार्यरत ही नहीं, गतिशील हैं। इनमें महिलाओं की भूमिका भी अद्वितीय है। यहां तक कि अलग से समर्पित महिला संस्थाओं में प्रयाग महिला विद्यापीठ' इलाहाबाद जिसकी बागडोर हिंदी की विदूषी कवयित्री महादेवी वर्मा के करों से कार्यान्वित होता रहा। दक्षिण में कर्नाटक महिला हिंदी सेवा समिति', बैंगलोर गांधी की प्रभाव-प्रेरणा से आज सुनियोजित ढंग से प्रवाहित है जिसमें प्रचार-प्रसार और प्रशिक्षण की अद्भत योजनाएं फलित हो रही हैं। गांधी का वह समय था जब लड़कियों का हिंदी ज्ञान उनकी अतिरिक्त योग्यता मानी जाती थी। तभी तो दक्षिण में पिता अपनी पुत्री की शादी के संदर्भ में वरपक्ष से बड़े गर्व से कहता था कि मेरी बेटी तो राष्ट्रभाषा परीक्षा उत्तीर्ण की है।' तो यह है हिंदी संस्थाओं के प्रचारप्रसार का मान!

वस्तुतः यह तथ्य सत्य है कि किसी भी सभ्यता-संस्कृति को नष्ट कर देना हो तो पहले उसकी भाषा छीन लो; अंग्रेजों ने यही किया। गांधी को यह भान था, इसलिए भाषा को हथियार बनाकर किया गया स्वतंत्रता आंदोलन गांधी की गह्वर चेतना का परिणाम था। हिंदी प्रचार-प्रसार का गांधी-समय उत्प्रेरणा का समय था, उनका संस्थानिक विश्वास इतना प्रतिफलित हुआ कि कश्मीर से कन्याकुमारी और अरुणाचल से द्वारका तक हिंदी हृदय की जननी हो गयी। इसमें गांधी के योजनाबद्ध तरीके से किया गया अविकल प्रयास ही हिंदी के प्रचार-प्रसार में ऐतिहासिक भूमिका का निर्वहन किया। गांधी का यह प्रमेय दक्षिण से उत्तर की तरफ ऐसा प्रतिभाषित होता है कि हिंदी का आलोक-पर्व नैरंतर्यता का स्वरूप ले लेता है। अघोषित तौर पर गांधी के दक्षिण अफ्रीका में किए गए सत्याग्रह प्रयोग में हिंदी की समन्वय की भूमिका परिलक्षित होती है और वह दक्षिण अफ्रीका में रह रहे भारतीयों के लिए ‘जबान' की शक्ति देती है, परिणामतः 1904 में इंडियन ओपीनियन’ के संपादन, प्रकाशन से गुजराती, अंग्रेजी, तमिल के साथ हिंदी प्रभाग का प्रकाशन अखबार की पाठक संख्या में वृद्धि कर देता है और गांधी की बात दूर तलक जाती है, गांधी अपने उद्देश्य में सफल भी होते हैं।

घोषित तौर पर 1909 में अपनी पहली और मूलतः गुजराती में लिखी पुस्तक 'हिंद स्वराज' में राष्ट्रभाषा हिंदी के हेतु घोषणा करते हैं तो यह बात साफ जाहिर हो जाती है कि अपने को अभिव्यक्तने की बेचैनी में लिखी गई पुस्तक की अवधारणा 1908 से ही बनने लगी थी। इसके पूर्व के समय से विलग होकर गांधी की हिंदी चेतना का चैतन्य 1908 से ही देंखे तो वह चेतना जीवन के अंतिम समय (1948) की प्रार्थना सभा में भी हिंदी की जीवन्तता की बात करती है। तात्पर्य यह कि 1908 से 1948 तक गांधी की हिंदी चेतना का संघर्ष अनवरत संघर्षरत रहता है अर्थात 40 वर्षों का गांधी का हिंदी संघर्ष तमाम विसंगतियों के बावजूद अपने संघर्ष के सफर में सफल रहा है।

गांधी का हिंदी चिंतन इस माने में सार्थक है कि शायद गांधी ऐसा व्यक्तित्व इस देश को न मिला होता तो संभव है इस देश की राष्ट्रभाषा हिंदी न हुई होती। तमिल व बंगाल की जो स्थिति थी और अंग्रेजियत का भूत जो सवार था, ऐसी बड़ी विकट स्थिति थी और हिंदी, हिंदुस्तानी के नाम पर गांधी को फिकरे पड़े थे, परंतु और फिर भी राष्ट्रभाषा के लक्षणों के आगे हिंदी सर्वमान्य हुई, वरना अंग्रेजी, फारसी न जाने क्या-क्या होती देश की राष्ट्रभाषा! पढ़े-लिखे लाट साहबों की भाषा हमारे ही कुछ भाई बोल रहे थे। 29 मार्च 1918 का हिंदी साहित्य सम्मेलन, इंदौर का वह ऐतिहासिक अध्यक्षीय भाषण जिसकी न जाने कितनी-कितनी आलोचना हुई। ध्यातव्य हो कि अहिंदी भाषी गांधी और लंदन से वकालत की पढ़ाई पढ़े गांधी अफ्रीका में अपने जीवन, जीविका और अस्तित्व की लड़ाई में भाषा की लड़ाई भी लड़ रहे थे। ‘इंडियन ओपिनियन’ समाचार-पत्र के भाषाई-संघर्ष (अंग्रेजी, गुजराती, तमिल व हिंदी) से हिंदीसंघर्ष की शुरूआत होती है। वह दौर 1908 के आस-पास का था और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बीबीसी लंदन के एक पत्रकार की 15 अगस्त, 1947 की रात्रि में आजादी मिलने की प्रतिक्रिया जानने पर गांधी का उत्तर था- “कृपया, दुनिया को खबर कर दें कि गांधी अंग्रेजी भूल गया है।'' अर्थात् लगभग 40 वर्षों का हिंदी संघर्ष गांधी के जेहन में जिंदा है। गांधी हिंदी में हिंदस्तान के लोक को देख रहे थे. इसलिए उनका हिंदी का चिंतन समीचीन था। गांधी का कथन है, 'आप अपनी भाषा में बोलें, अपनी भाषा में लिखें। उनको गरज होगी, तो हमारी बात सुनेंगे।' (अखिल भारतीय भाषा सम्मेलन, लखनऊ, 29.12.1916) ब्रिटिश सरकार को हमारी भाषा के प्रति विवश होने का यह संदेश जिस आत्मीय भाव से कहा गया, वह आज पल्लवित हो रहा है। हमारी हिंदी एक मीठी भाषा के रूप में वैश्विक बन चुकी है, यह गांधी की आजादी की लड़ाई का एक अहम पहलू था।