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गंगा से गंगोत्री तक
February 6, 2020 • चन्द्रकान्ता • कहानी

नारियल के ऊँचे पंखेदार पेड़ों पर शाम गाढ़ी हो आई है। आसमान पर मुट्ठी भर-भर तारे दूर-दूर तक कुछ इस कदर बिखर गए हैं, ज्यों नीली चादर पर नटखट बच्चों ने चमकते कंचों की थैली उंड़ेल दी हो।

कमरा नम्बर सात में नए जन्म को अवगाहती दर्द-भरी आवाजें डोल रही हैं। बरामदा धीमी खुसुर-फुसुर और शब्दहीन पगध्वनियों से अटा बाहर से शांत और भीतर से त्रस्त है।

इधर मेरे कमरे में चारपाई पर उठती-गिरती नन्हीं-साँसें पीड़ा से लस्त, पसीने से ठंडे मेरे जिस्म को उष्ण टकोरे दे रही है। कानों में बड़ी गड़गड़ आवाजें डोल रही हैं। आँखें पूरी खोल नहीं पा रही हूँ। सिर पर ज्यों मन-भर बोझ धरा है। लेकिन इस अधटूटी बेहोशी में भी एक सुकून देह अहसास मेरे भीतर हिलोरें ले रहा है, आश्चर्य ! बाँह में कई सुइयाँ घुसी हुई हैं और ग्लूकोज धीरे-धीरे मेरी नसों से भीतर ड्रिप होता जा रहा है, एक नियमित लय से, एक निश्चित अंतराल से, फिर भी मैं इस सुकून का चेहरा पढ़ पा रही हूँ।

माँ-पापा पास के सोफे पर बैठे हैं। थके हुए, लेकिन कमोवेश सन्तुष्ट सी मनःस्थिति लिए। तीन दिन और तीन रातों की त्रासद चिंता, दौड़-धूप और आशंका भरे पलों से गुज़रने के बाद माँ ज़र्द ‘ममी‘-सी नजर आ रही है। मेरी आधी पीड़ा झेलती मेरी यह माँ पता नहीं कैसी आधुनिका है जो अपने

बौद्धिक अहसासों और व्यस्त अनुशासन के बीच जीती हुई भी भीड़ में गुम बच्ची-सी आतंकित और बदहवास नजर आ रही थी। अपने बेहिसाब पीड़ा के क्षणों में भी मैंने पापा के रुआबदार अफसरी चेहरे पर थरथराती विवश हरकतें देखी हैं। मेरी

असाधारण पीड़ा ने किस कदर हिलाकर रख दिया है उन्हें! मुझे आश्चर्य होता है। किसी आशा-अपेक्षा के स्वार्थ में बँधे बिना भी ममता की यह गंगोत्री मुझे अपने में समा रही है।

सूखे होंठों को छोटी-सी मुस्कराहट से तर करते हुए पापा ने मेरे माथे पर आशीष देता-सा हाथ फेरा है। माँ तो मेरे सिरहाने खड़ी कुछ पल स्तब्ध-सी मुझे देखती रह गई थी। प्रार्थना में सिर झुकाए कितनी ही देर वह बैठी रही थी। तब शब्दों की असमर्थता से पराजित उसने एकदम मुड़कर हिंडोले से नन्हीं पोटली उठाई थी और मेरे चेहरे के करीब झुकाकर कहा था, ‘‘ले भई, भूखे बेटे को जन्म दिया है। अभी से दोनों हाथ मुँह में डाल रहा है।‘‘ माँ ने बेटे‘ शब्द का उच्चारण मुझे किसी राहत की तरह थमा दिया है हाँ,शायद! क्योंकि उसने अनि को कहते सुना था-‘‘यों बेटा-बेटी में आज कोई फर्क नहीं रह गया है, पर एक बात है कि बेटी हुई तो, आई मीन..... आई कांट हैव अनेदर चांस.....‘‘

माँ जैसे कुछ समझी नहीं थी, अनि क्या कह रहा था? क्या! हमारे बेटी हुई तो अनि उसे दूध की बाल्टी में डाल देंगे?‘‘क्यों नहीं !‘ माँ अभी भी पहली बार माता-पिता बनने की खुशी से चहकते हमारे संवादों में बिना व्याख्या किए शरीक हो रही थी। क्यों नहीं क्या माँ ? कह रहे है दूध की बाल्टी में डुबो देंगे।‘

धत्त!‘ माँ को धक्का लगा, यह तुम लोग बोल रहे हो, तुम? नई पीढ़ी के लोग? वीमेन्स लिब के हिमायती?‘‘ओ माँ!..... ओ माँ! मैं तो मज़ाक कर रहा था......‘

कच्चे तन के गुलाबी बबुए के चेहरे पर लाल गुलाब की दो ओस-धुली पंखुड़ियाँ हिलीं। भूरी काली बरौनियाँ फड़फड़ाकर नन्हे पाँखी ने ज्यों आँख-चोंच खोल आसपास की दुनिया का जायज़ा लिया और तमाम मासूमियत में भी पूरा जोर देकर अपनी पहली माँग पेश की-‘इयाँ-याँ-याँ ऽऽऽ!‘

बड़ा रोमांचकारी अनुभव था वह। एक नन्हा-सा जीवन ! पत्थरों से फूटकर ज्यों नन्हा सोता उमग आया हो। सहरा में एकाएक नन्हीं दूब लहलहा आई हो और मुझे हरियाली धरती बना गई हो।

यह मेरा अंश! गुच्छे-गुच्छे भर काले रेशम से अँटा इसका दो अंगुल-भर का माथा, भागवत का पृष्ठ तो नहीं हो सकता था पर वेद की एक ऋचा मैंने इस पर पढ़ ली थी। उस वक्त अंधेरे में प्रकाश का एक वर्तुल दिखा था मुझे, जीवंत साँस लेता हुआ। लिंगभेद से उसमें क्या फर्क पड़ने वाला था? मुक्त आकाश की मनःस्थिति में कोई सरहदें बाँधने की बेअकली करता है? मैं तो इस प्रकाश-वृत्त को बाँहों में अँकोर चूम लेना चाहती थी। उफनते दूध की धार से कड़ी छाती से छुआ लेना चाहती थी।

पर मैं अँगुली तक न हिला सकी। भारी पलकें उठाकर नजर-भर देखा और लेडेटिब्ज के नशीले आवरण में कैद हो गई। जरा-सा होश आते ही जिस्म में पीड़ा की हिलोर ऐंठने लगती थी।

अनि ने बाद में वह नन्ही-सी पोटली मेरी छाती से छुआ ली थी- नर्सों के मना करने के बावजूद-‘‘ना-ना, अभी ज्यादा नहीं उठाना, सीजेरियन बेबी है.....‘‘

पर अनि को शायद मेरे भीतर उठी हिलोर का अंदाजा लग गया था या शायद यों ही ‘बेबी केयर‘ में पढ़े दूसरों के अनुभवों को याद कर एक मीठी-सी औपचारिकता का निर्वाह कर गया था।

यों जैसा होता आया है‘ वाक्य, जिन्दगी के किसी पहलू से जुड़कर उसे सामान्यीकृत भले करता हो, पर जो कुछ भी होता है, निजीपन की छुअन के साथ हो जाता है, शायद भिन्न भी एक विशिष्ट अहसास मुझ पर हाबी हो रहा था। फिर भी यह सच है कि डॉक्टर-नर्से बधाइयाँ मुस्कराहटें थमा-थमाकर भी इन सबको, रोजमर्रा की एक घटना से अधिक कुछ भी मानने को तैयार न थीं।

केरल से आई विजया ने तो माँ को सिजेरियन ऑपरेशन की सारी प्रक्रिया . मिनट-भर में संकेतों और ध्वनियों के साथ स्पष्ट कर दी थी, ‘‘यह समझो माँजी, पेशेंट! यह आई डॉक्टर, इस तरह दिया बेहोशी का इंजेक्शन। फिर यह, इस तरह बेबी का पोजीशन देखा, तब यहाँ से यहाँ तक चीरा लगा दिया। यों हाथ रखकर बेबी को बाहर निकाला और यह रहा बेबी आपकी गोद में.......‘‘

अन्नमा विजया के अभिनय पर जी भरकर हँसी थी। अभी कुँवारी है न? वैसे नर्सों को तो बड़ी जल्दी दुनिया भर के अनुभव हो जाते हैं। सुबह से शाम तक यही तो चलता रहता है, मरीज पीड़ा, ऑपरेशन, काटन-कपड़े और नन्हें-मुन्नों का नई दुनिया में आगमन- इयाँ-याँ ऽऽऽ!

‘‘कहीं आशा की लहर, कहीं निराश उदासियाँ ! बस? इतना ही?‘‘ मैंने बडी दिलचस्पी से अन्नमा से पूछा था।

‘‘ना-ना, इतना ही नहीं, आज देखा न क्या हुआ?‘‘

मैंने देखा नहीं था। बिस्तरे से बँधी जो थी।

‘‘सुना तो होगा?‘‘ उसने बड़ी-बड़ी आँखें घुमाकर पूछा।

‘‘क्या?‘‘

‘‘वही, पुओऽऽऽ और धड़ाम-धम्म!‘‘

अन्नमा बड़ी मज़ाकिया लड़की है। वचकानी हरकतों से अक्सर बीमारों का मनोरंजन करती है, और डॉक्टरों की डाँट खाती रहती है। कहती है- ‘‘कैलोरीज का बिजनेस करती हूँ। यही लेना-देना। जिसकी ज्यादा, उससे लेती हूँ, जिसकी कम, उसे दे देती हूँ। सो भी फोकट में।‘‘

‘‘वह कैसे भई?‘‘

‘‘समझा नहीं? देखा, मोटा लोग हँसेगा तो थोड़ा व्यायाम हो जाएगा। दुबला हँसेगा तो खुश रहेगा,टॉनिक का काम देगा। सेहत बन जाएगा।‘‘

अन्नमा सचमुच उन लोगों में है जो अपनी आदतें न छोड़ने की भीष्म प्रतिज्ञा लिए जन्म लेते हैं। उसने आँखें बंद करके दोनों बाँहें पीछे फेंक, चीखकर गिरने का नाटक किया। अनि हँस पड़ा।

‘‘सच कह रही है सिस्टर ! ऐसा ही हुआ था?‘‘

‘‘हाँ, हुआ होगा ऐसा ही कुछ। आवाजें मैंने भी सुनी थीं । बड़ी दहशत हुई थी सुनकर। कमजोर और बीमार को धमाकेदार आवाजें घबराहट से भर ही देती

बाद में आठ नम्बर की महिला ने ज्यों रहस्योद्घाटन किया

‘‘ओ माँ! पंद्रह वर्ष! पूरे पंद्रह वर्ष बाद!‘‘ तीन बार एक ही पंजे को खोल-समेटकर उसने भौंहे माथे पर चढ़ा, महान आश्चर्य संप्रेषित किया, “सो भी लड़का! अब बताओ चिल्लाएगा नहीं !‘‘

‘‘हिस्टीरियकल भी होगा?‘‘नीतू ने जोड़ दिया।

‘‘बेचारे का सिर फूटते-फूटते बचा। खिक्-खिक् !‘‘ यह अणिमा थी।

‘‘खुशी हुई सो ठीक, पर धड़ाम से गिरकर सिर फोड़नेवाली बात क्या थी?‘‘

“भई अमरीकन डॉलर है, देसी करेंसी नहीं!‘‘यह हेमू था।

‘‘क्रेजी फेलो।‘‘

कमरे में गुस्सैल किशोर आवाजें गूंजने लगी, ‘‘भई बुढ़ापे का बीमा हो गया, सेवा करेगा।........‘

‘‘अहँ सेवा ! हाँ, जाते-जाते मुँह में दो बूंद जल, तुलसी जरूर डाल देगा। सो भी पास हुआ तो। यों इसकी दस प्रतिशत गारन्टी भी नहीं।‘‘ सेवा शब्द नीतू को चुभा था, “यों सच मानो तो, जितना ख्याल बेटी माता-पिता का रखती है, उतना बेटा नहीं।‘‘

नीतू अभी-अभी डॉक्टरी पास कर चुकी है। अणिमा थोड़ी गम्भीर है, पर तेजी में कम नहीं। वक्त पर बोलना जानती है- ‘‘भई, माता-पिता बच्चे पैदा करते हैं। उससे उनके मातृत्व-पितृत्व की भावना को संतुष्टि मिलती है। बच्चा भी अपनी किलकारियों-अठखेलियों से उन्हें सुख देता है। बस यही लेना-देना हो गया। कौन किसका ऋणी और कौन किस पर एहसान करने वाला? फिर लड़का-लड़की का भेद तो तब था, जब बेटियाँ असूर्यंपश्या थीं......‘‘

‘असर्यंपश्या‘ शब्द का अर्थ समझने से पहले हेमू लडकियों के साथ द्वन्द्वयुद्ध पर तैयार हो गया। अनि को बीच-बचाव करना पड़ा, ‘‘भई, यह नर्सिंग होम है, कमरा नम्बर सात! कॉलेज का स्टेज नहीं। यों इस वाद-विवाद प्रतियोगिता में अणिमा का प्रथम पुरस्कार पक्का।‘‘

‘‘हमें नहीं चाहिए पुरस्कार। हेमू को दीजिए। अमरीकन डॉलर है न! बड़ा अपने को मॉडर्न समझता है। पड़ादादी के सोच से एक इंच आगे नहीं बढ़ा, मेल , शोबिनस्ट!‘‘नीतू गुस्से में थी।

लड़के-लड़कियों की आपस में तू-तू मैं-मैं और एक-दूसरे पर विजयी दिखने की मुद्राओं से मेरा मनोरंजन हो रहा था। अन्नमा, जो अभी तक बहस को भड़काने में पूरी मदद दे रही थी, मेरी मुस्कराहट ताड़ गई, ‘‘लो तुम भी खुश हो रही हो, निकालो मिठाई स्पेशल। तुम्हारा भी सिजेरियन हुआ है। लड्डू-वड्डू कुछ न चलेगा। सोंदेश, मिल्क केक, रोशोगुल्ला लाओ!‘‘

‘‘लेकिन मैं तो चिल्लाकर बेहोश नहीं हुआ न?‘‘ अनि ने मुझे बोलने की जहमत से बचा लिया। उसकी आवाज में चहक थी।

मैंने बाजू में लेटी, एहतियात से लिपटी-ढकी नन्हीं पोटली को देखा, विवादों से परे इस नन्हीं जान को। क्या प्रतिक्रिया होगी इसकी? लेकिन वह तो उसके बोल सीखने के बाद ही मुझे मालूम होगा। तब तक मैं इस उफान को रोक नहीं सकती थी, जो भीतर के लिजलिजे मांसपिंड से किसी तरल द्रव की तरह मुझे भिगो रहा था। हर चीज मेरे सामने साफ थी, बारिश से

धुली-निखरी। मैंने वक्ष के नीचे, गाँज-पट्टियों से बँधे पेट को कोमलता से छुआ और मैं, जिसे अनि मैटर ऑफ फैक्ट लेडी‘ कहता है, अचानक भावुक हो उठी। जीवन पता नहीं किसने दिया, मैंने जन्मा, मैं अचानक महत्वपूर्ण हो गई अपनी ही नजरों में। यह बेटा न होकर बेटी भी तो हो सकती थी। उससे मेरे सृजन में क्या फर्क पड़ता? मेरी भौतिक सोच पर कोई आध्यात्मिक सुकून हावी हो रहा था।

दसवें दिन टाँके उतरने थे। तब तक नर्सिंग होम से मुक्ति असम्भव थी। देखा जाए तो अन्नमा मनोरंजन का बढ़िया

साधन थी। रात देर तक कमरे में बैठकर गप्पे लड़ाना उसका शौक था। मेरी विंग में ड्यूटी भी उसी की थी। उसी के अनुरोध पर मैंने बीटल्ज के कुछ कैसेट घर से मँगाए थे। अन्नमा को उनके गीतों पर ताल देना और झूम-झूम पंजे-एड़ियाँ हिलाना पसन्द था। इस तरह शामें मजे में गुजर जाती थीं। पर दिन का वही माहौल था। कॉरीडोर में गुपचुप आवाजें रेंगती रहतीं, अस्पताल की विशिष्ट गंध व पगध्वनियाँ लिए अक्सर धीमे पर कभी-कभी उत्तेजना-भरे स्वर, कभी चिंता-भरी हड़बड़ाहट और रुदन । सुबह शाम नए जन्म को अवगाहती पुकारें, नन्हीं आवाजें-‘इयाँ-याँ ऽऽऽ! हम आ गए, हमारा बंदोबस्त करो।‘ यो नई जिन्दगी अपने नाद-संगीत से स्वयं अपना स्वागत करती। पर बरामदे में गूंजती ध्वनियों, मिठाई-बधाइयों के आदान-प्रदान से लिंग-भेद का रहस्य आम तौर पर खुल ही जाता।

ग्यारहवें दिन मुझे छुट्टी मिली। टाँके सही उतरे थे, पर चलने-फिरने, सीढ़ियाँ उतरने की फिलहाल मनाही थी। डॉक्टर ने ढेर सारे टॉनिक, आइरन-विटामिन और उससे भी ज्यादा हिदायतों की लम्बी सूची थमाकर मुझे विदा किया। नर्स, आयाएँ गाड़ी तक छोड़ने आईं, तभी सीढ़ियों के पास ऊँची उठती आवाजों ने मेरा ध्यान खींचा- क्या हो सकता है? किसी का बेटा या बेटी? जिन्दा या मुर्दा? या कोई आसन्नप्रसवा......

जिन्दगी और मौत! दो ही तो चीजें उगती और दफन होती हैं अस्पतालों में। दो के बीच जो महाभारत-रामायण चलता रहता है, उनकी कहानियाँ नर्सिंग होम का विषय नहीं। रोज की तकलीफें, मसरतें, उलझनें, वे यहाँ से बाहर की चीजें हैं।

‘‘हमारा कंसर्न पेशेंट है। उसकी जिन्दगी बचाना हमारी समस्या,‘‘ डॉ. पूर्णा कह रही थीं, ‘‘बाकी समस्याएँ आप खुद हल कीजिए। वह हमारा काम नहीं।‘‘

‘‘वे कैसे आपका काम नहीं? आप डॉक्टर हैं, आपके दिल में दया होनी चाहिए।‘‘ एक अधबूढ़ी उम्र और बहुत बूढ़ी आवाज डॉ. पूर्णिमा का प्रतिरोध कर रही थी।

डॉक्टर पूर्णा की भौहें प्रश्नात्मक मुद्रा में उठीं- इस गैरजरूरी साहसवाली स्त्री को देखने के लिए, जो उसके हुनर और रुआब से नितांत अपरिचित लगती थी। लेकिन कुछ कहने से पूर्व उम्र के आदर में उसने थोड़ा मुस्कराकर उत्तर दिया, ‘‘दया है, तभी तो हमने आपकी बहू को बचाने के लिए बाहर से भी स्पेशलिस्ट बुलाए।‘‘

‘‘लेकिन यह इतना भारी बिल?‘‘

‘‘आप राघव जी से बात कीजिए.....‘‘ डॉक्टर जल्दी में चुस्त कदम उठाए चली गई। कहा नहीं कि नर्सिंग होम और खैराती अस्पताल में जग-जाहिर फर्क है, जो तुम्हें इधर आने से पहले मालूम होना चाहिए।‘‘ राघव जी का काम है दीवारों से सिर फोड़ना और काले तिलों से तेल निकालना। उसी का हवाला दिया।

‘‘क्या लूट मची है.......‘‘

अधेड़ महिला के पीछे खड़े युवक की कनपटियाँ बज रही थीं। शर्म और अपमान से वह जमीन ताकने लगा था। जाहिर है कि बेटे को माँ की भरतनाट्यम की मुद्राओं में, हाथों-आँखों के संचालन में देशकाल का दोष नजर आ रहा था। मातृदेवो भवः युक्ति का पालन करते हुए भी युवक आपातस्थिति का कष्ट महसूस करने लगा था। तभी उसने माँ की बाँह पर हल्का-सा स्पर्श देकर उसे आगे बढ़ने का अनुरोध किया!‘‘हम बात करेंगे माँ, तुम चिंता मत करो।‘‘

‘‘कोई लड़का होता, तो भी चलो दान-पुण्य समझकर तसल्ली कर लेते...‘‘ अन्नमा के कान में ज्यों मकौड़ा घुस गया, ‘‘क्या माँ, गॉड ने इतनी प्यारी बच्ची दिया! माँ इतना तकलीफ उठाया! दोनों जान बच गया! थैक्स करो अपने गॉड का, मिठाई बाँटो ! कोई जुल्म नहीं हुआ!‘‘

अधेड़ स्त्री खा जानेवाली नजरों से अन्नमा को देख रही थी। पोचम्मा समझदार आया है, हाथ जोड़कर बोली,‘‘खुशी-खुशी जाओ अम्मा इदिदेवि! गंगा माँ! नमस्कारम्!‘‘

माथे के साथ दोनों हाथ जोड़कर पोचम्मा ने नन्हीं बच्ची को नमस्कार किया। लेकिन उसकी दादी माँ की नाराजगी में कोई फर्क नहीं आया। वह सभी से नाराज थी, डॉक्टर, आया, नर्सों, यहाँ तक कि हर बेटेवाली माँ से भी। उसके अपने कारण थे, वह नाराज सासोंवाली तीन बेटियों की माँ थी। पोचम्मा की आवाज में बेहद ईमानदारी और विश्वास की छुअन थी। मैंने मुड़कर नई माँ को देखा। क्या प्रतिक्रिया होगी उसकी दादीजी के असन्तुष्ट रवैये पर? दुःख, क्रोध, निराशा? आखिर उसने इस नई माँ की पीड़ा और सृजन के सुख दोनों को एकदम अकारथ करने का अपराध किया है। पोचम्मा ने इसकी बेटी को गंगा कहा। ढोक, चट्टानों को नकारती, संधों से रास्ते बनाती गंगा..... जिसकी स्वतन्त्र चेतना स्वयं शंकर भी पहचान गए थे। इसे दादी के सोच की सरहदें कैसे प्रभावित करेंगी? हाँ, इसकी माँ को दुख जरूर पहुँचा सकती है।

मैं शायद उदास होने लगी थी। लेकिन तभी मेरे साथ खड़े अनि ने हँसकर इशारे से मुझे पीछे मुड़ने को कहा। नई माँ शाल के नीचे ढका दो किलो का मिल्क केक पोचम्मा को पकड़ा रही थी। मुझसे नज़र मिली तो मुस्कराई। नहीं, वहाँ कोई उदासी,क्रोध या नाराजगी नहीं थी।

तभी न जाने क्या करिश्मा हुआ। नर्सिंग होम के मुख्य द्वार पर खड़ी मैं सहसा गंगोत्री पहुंच गई।