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ग़ज़लें
December 21, 2019 • द्विजेन्द्र द्विज • ग़ज़लें

तहज़ीब यह नई है, इसको सलाम कहिए

'रावण' जो सामने हों, उनको भी 'राम' कहिए

 

जो वो दिखा रहे हैं, देखें नज़र से उनकी

रातों को दिन समझिए, सुबहों को शाम कहिए

 

जादूगरी में उनका सानी नहीं है कोई

उनको ही 'राम' कहिए, उनको ही 'श्याम' कहिए

 

ख़ुद को खुदा समझिए मौजूद जब नहीं वो

मौजूदगी में उनकी, ख़ुद को गुलाम कहिए

उनका नसीब वो था, सब फल उन्होंने खाये

अपना नसीब यह है, गुठली को आम कहिए

 

जिन-जिन जगहों पे कोई, लीला उन्होंने की है

उन सब जगहों को चेलो, गंगा का धाम कहिए

 

बेकार उलझनों से गर चाहते हों बचना

वो जो बताएँ उसको अपना मुकाम कहिए

 

इस दौरे-बेबसी में गर कामयाब हैं वो

क़ुदरत का ही करिश्मा या इंतजाम कहिए

 

दस्तूर का निभाना बंदिश है मयकदे की

जो हैं गिलास ख़ाली उनको भी जाम कहिए

 

बदबू हो तेज फिर भी, कहिए उसे न बदबू

'अब हो गया शायद, हमको जुकाम' कहिए

 

यह मुल्क का मुक़द्दर, ये आज की सियासत

मुल्लाओं में हुई है, मुर्गी हराम कहिए

 

'द्विज' सद्र बज्म के हैं, वो जो कहें सो बेहतर

बासी गजल को उनकी ताजा क़लाम कहिए

 

 

 

देखिए  उनका सितारा भी उभर आया है

हाँ में हाँ जिनको मिलाने का हुनर आया है

 

जब कभी ख्वाब में वो रश्क ए कमर आया है

यास का सीने में नश्तर सा उतर आया है

 

मुस्कुराना भी है आँखों में छुपा कर आँसू

क्या बताएँ हमें कैसे ये हुनर आया है

 

कल तलक थी नहीं परवाज की हिम्मत जिस में

आज पर वो पर भी हवाओं के कतर आया है

 

मुत्तफिक अब जो नहीं है वो मुखालिफ ठहरा

उसको आना ही था नेजे़ पे जो सर आया है

 

आज टूटा है तो सालिम भी मिलेगा कल तक

कौन कहता है कि कल्ब अपना बिखर आया है

 

रात भर इसके लिए हमने दुआएँ की हैं

तब सहर में कहीं अंदाजे सहर आया है

 

झूठ गो पूरा नहीं आधा तो है ही उसमें

कोई अखबार कहां ले के खबर आया है

 

शुक्र दरिया का, हवाओं का भी इस मौसम में

आज साहिल मुझे साहिल में नज़र आया है