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घर 
October 6, 2020 • प्रणव भारती • कविताएँ

प्रणव भारती, अहमदाबाद, गुजरात, मो. 9940516484

 

घर बहुत  पुराना था 

ये ---लंबा -चौड़ा -----

बहुत से कमरों वाला 

कमरों के नाम भी थे 

बड़े सुन्दर ,बड़े प्यारे 

प्रेम,स्नेह,लाड़ ,दुलार 

मुस्कान ,खिलखिलाहट 

मेजबानी ,कुर्बानी 

हाँ,इनसे दूरी पर कुछ और भी कमरे थे 

जिनमें शायद ही कोई झाँकता था 

उनके भी नाम थे ---

लिप्सा,माया तृष्णा ,घृणा,ईर्ष्या 

उनमें जाने पर झुलस जाने का भय 

पालती मारे बैठा रहता ---सो 

ताले लगा दिए गए थे उनमें ---किन्तु 

चुराने के लिए घुस ही तो आए कुछ लोग 

देखकर मोटे ताले 

बीज उगा लालच का --

तोड़ लिया गया  मोटे तालों को  

अब कमरों की क़तार में 

न जाने कैसे ---

दूर वाले कमरे उड़कर 

चिपक गए आगे 

पुराने मकान के आँगन में 

घर का थरथराता  बूढा मालिक

सोच में था 

क्या कमरों के भी पँख होते हैं ?

कमरों में पसरती दुर्गंध से 

आकुल-व्याकुल हो 

उसने छोड़ दिया 

अपना वो --पुराना घर 

अगले दिन सुबह 

सड़क पर  लैंप-पोस्ट के नीचे 

उसकी झिंगली खाट पड़ी थी