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घुटन भरा कोहरा
June 25, 2020 • देवी नागरानी • कहानी

  देवी नागरानी, मुम्बई, मो. 9987928358

नैनीताल, 5 जून, 2011

प्यारी दीपा,

तुम्हारा ख़त मिला, पढ़कर लगा कि तुम मेरे बारे में जानने के लिए ज़्यादा चिन्तित भी हो और उत्सुक भी। क्यों न रहोगी, मैं फेरोज़पुर से अपना सब कुछ रातों-रात समेटकर, तुमसे बिना कुछ कहे, बिना कुछ बताए यहाँ नैनीताल आ गई। यहाँ आकर अब दो महीने हो गए हैं, अपने अतीत से पीछा छुड़ाने की कोशिश में मन किसी हद तक कुछ ठहराव पाने लगा है। मैं पीछे मुड़कर देखना नहीं चाहती, उन यादों की परछाइयों में जीना नहीं चाहती। पर आज फिर तुम्हारे खत ने मेरे मन में एक क्रांतिकारी उथल पुथल मचा दी है। खुद को बचाये रखने के लिए अपनी सोच के प्रवाह पर काबू पाने का प्रयास करने में जुटी हुई हूँ, पर सैलाब थम ही नहीं रहा। बहाव में बह जाने के खौफ़ से खुद के बचाव के लिए बस खुद को तेरे साथ बाँटने के लिए क़लम उठा ली है, और यह खत ...! और फिर हमारा साथ कोई एक दो दिन का नहीं, लगता है सालों का नाता है...सदियों का है... जन्म-जन्मांतर का है। खुद को तुम्हारे सामने बेपरदा करने में मुझे अब कोई हिजाब नहीं।

तुम तो जानती ही हो, मैं घर में सब से छोटी हूँ। मेरी दो बड़ी बहनें अब भी घर में बैठे बैठे बड़ी हो रही हैं। मेरी ज़िद के कारण मुझे आगे पढ़ने की अनुमति देने के लिए पिताजी मजबूर हो गए थे। मैंने पाँच साल पढ़ाई करने के बाद पोस्ट ग्राजुएशन करने के लिए विश्वविध्यालय में दाखिला ले ली। अभी तक दोनों बहनें एक आठवीं पास और दूसरी मैट्रिक पास घर में पिछले सात सालों से बैठी जाने किसके इंतिज़ार में अपनी उम्र के साल बढ़ा रही हैं। अब तक पढ़ लिख कर नौकरी पर लग गईं होती तो ज़िंदगी यूं ठूठ सी नीरस न होती, कुछ अर्थपूर्ण रंगों से ज़रूर भरी होती। मुझे वह ज़माना अच्छी तरह याद है और हो भी क्यों न? आख़िर उस वक़्त मैं उन्नीस बरस की थी। इस उम्र में तो लड़कियों को पूरा होश होता है और वे ज़हनी तौर पर लड़कों से दो कदम आगे होती हैं।

खैर, मैं अपनी बात पर आती हूँ।

तुम भी तो कॉलेज पढ़ी हो, वहाँ के माहौल से, हो रही गतिविधियों की हलचल से परिचित हो। मैं भी अपरिचित होने का ढोंग नहीं करूंगी। सीधे अपनी बात पर आती हूँ। अब यह निश्चित रूप से जान गई हूँ कि ज़िन्दगी रिश्तों का एक पुलिंदा है, और रिश्ते भी कोई अपने चुनाव के नहीं होते। कुछ प्राकृतिक होते हैं जैसे माँ बाप बहन भाई और कुछ बन जाते है, जैसे अपनेपराए, दोस्त, दुशमन और फिर पनपते रहने पर उनसे एक लगाव सा हो जाता है, अपने से लगने लगते हैं, अज़ीज़ हो जाते हैं।

ऐसे ही एक मोड़ पर मुझसे आफ़ताब मिला। मेरा भी उसके साथ नाता जुड़ गया, एक बंधन सा बंध गया। सच कहती हूँ दीपा, जितनी जल्दी वह नाता जुड़ा, उससे कहीं ज़्यादा रफ़्तार से वह अपनी पटरी से उतर भी गया। मैं भी टूटने लगी किसी वारदात की तरह। अब उस रिश्ते को कोई नाम देना ठीक न होगा ! शायद इसलिए कि मैंने उस रिश्ते को पहचानने में भूल की। अब तो उसे भूल कहने का भी कोई अर्थ नहीं। भूल भी कैसी? बस यूँ समझो खुद के लिए सज़ा मुक़र्रर की है। यहाँ मैं अपनी कही बात का सुधार करना चाहती हूँ। 'जिंदगी यूं वीरान व नीरस न होती, कुछ अर्थपूर्ण रंगों से ज़रूर भरी होती अगर कोई हमसफ़र मिल जाता।' कहने वाली मैं अब अपनी जिंदगी को बेरंग करना चाहती हूँ. जिसने मुझे इन्द्रधनुषी रंगों से सजा ख़्वाबों का आसमान दिखाया वह अब मेरी जिंदगी में कहीं नहीं। तुम समझ रही हो न, मैं क्या कह रही हूँ? मैं अफ़ताब की बात कर रही हूँ जो कहा करता था'अपर्णा मैं तुम्हें चाँद-सितारों की ऐसी दुनिया देना चाहता हूँ, जो तुम्हारी मांग में सिंदूर नहीं सितारों की जगमगाहट भर दे.... !' 'कब आफ़ताब ....?' मैं कनखियों से उसकी ओर देखते हुए कहती। 'जब हमारी पढ़ाई खत्म होगी तब ! जब हमें नौकरी मिल जाएगी तब! जब हम तुम दोनों अपनी जवाबदारी संभालने के क़ाबिल हो जाएंगे तब!' 'जवाबदारी से तुम्हारा मतलब..... ?' 'अर्पणा क्या ये भी तुम्हें बताना पड़ेगा? जवाबदारी तो जवाबदारी होती है न ? जब कमाएंगे, तब कहीं घर लेकर बस जाएंगे, फिर मियां बीबी कहलाए जाने पर, अम्मी-अब्बू कहलाये जाने की ललक तो होगी न? होगी कि नहीं.....?' वह मेरी ओर देखते हुए हंस पड़ता। मैंने संजीदा होते हुए कहा -'इस सिलसिले में शादी का तो कहीं ज़िक्र ही नहीं हुआ ! वह कब करोगे?'

'शादी क्यों होगी, बाक़ायदा निकाह होगा, पूरी रीति रस्मों के साथ और मैंने तो तुम्हारा नाम भी सोच रखा है- ज़रीना ! नाम कैसा लगा ?'

दीपा सच कहती हूँ मुझे जैसे एक नहीं हज़ार साँप डस गए। मेरा इस ओर ध्यान केन्द्रित ही नहीं हुआ था कि आफ़ताब इतना कट्टर मुसलमान होगा, इस तरह अपनी धर्म की रवायतों को मुझपर थोपेगा। तब मुझे आफ़ताब पर गुस्सा आने लगा था, प्यार का रंग बातों की कटुता से धीरे-धीरे नहीं पर तेज़ी से उतरने लगा। ग़लती तो मेरी थी, मैंने ही इश्क मुहब्बत के अनेक किस्सों की तरह इसे भी अपनी सलोनी प्रेम कहानी के रूप में अंजाम देने का स्वप्न देखा था। सोचा था पिता से बगावत करूंगी, प्रेम भरा एक नया संसार बसाऊँगी जहां हम दो, हमारे दो होंगे...! 'आफ़ताब तुम्हें मज़ाक सूझ रहा है, पर मैं संजीदा हूँ। मैं तुम्हारे बच्चे की माँ बनने वाली हूँ यह तो तुम्हें पता है। हमने इस बारे में बात की है और तुमने वादा किया था कि जल्द ही इस बात को घर में छेड़कर कोई हल निकाल लोगे! और आज ये आश्चर्यजनक अनूठी बातें लेकर क्या सिद्ध करना चाहते हो?'

दीपा, एक बात मैं तुम्हें बताना भूल गई कि जब आफ़ताब से मेरी आखें लड़ी थीं, मुझे इस बात का ज़रा भी अनुमान नहीं हुआ कि मैं हिन्दू हूँ और वह मुसलमान। लगा दिल का मामला है, दिलों में सुलझ जाएगा। पर मेरा वह गुमान एक सिद्धांतमय समस्या बन कर सामने आया है।

अचानक मुझे लगा कि मैं खुद को संभाल नहीं पा रही थी, बदन कांपने लगा था। गुस्से से या डर से, यह उस पल तय नहीं कर पाई। पर जब आफ़ताब का हठीला रवैया देखा तो मुझे यक़ीन हुआ कि मेरे डर की बुनियाद ठोस थी। 'क्यों क्या हुआ अर्पणा, कांप क्यों रही हो?' 'आफ़ताब तुम्हें मेरे साथ आज ही, अभी शादी करनी होगी। यह क्यों इतना ज़रूरी है तुम अच्छी तरह जानते हो?' 'मैंने तो तुमसे कहा था अर्पणा...., पर तुम भी कभी-कभी अड़ जाती हो। 'क्या मतलब? क्या इसकी जवाबदार सिर्फ मैं अकेली हूँ? तुमने तो कहा था हल निकाल लोगे, घर में बात करोगे...!'

'की थी, पर अब्बू-अम्मी ज़िद पर अड़ गए हैं- कहते हैं उन्होने कहीं ज़बान दे रखी है।' 'मतलब....क्या हुआ आफ़ताब, साफ़-साफ़ बताओ ?' 'वे कहते हैं कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो वे अपनी जान दे देंगे' 'कैसा नहीं होगा तो, आफ़ताब ......? 'अगर मैंने उनकी पसंद की हुई लड़की से निकाह नहीं किया तो....!'

सखी, क्या बताऊँ, कैसे बयां करूँ कि उस समय इस 'अगर मगर' को सुनकर मुझपर क्या गुज़री? जैसे एक साथ कई ज्वालामुखी मेरे समस्त अस्तित्व की धज्जियां उड़ाने के लिए विस्फोटित हुए। मेरा सहमा सहमा वजूद बस नाउम्मीदी से आफ़ताब को देखता रहा। 'तो तुम निकाह करोगे...? उसके साथ जिसको तुम जानते ही नहीं, सिर्फ तुम्हारे माता- पिता ने वादा किया है... और मेरा क्या? मेरे पेट में पल रहे इस बच्चे का क्या, उन वादों का क्या जो तुमने मेरे साथ किए ?' 'अर्पणा मैं तुमसे...!' 'तुमसे क्या आफ़ताब....? अभी अभी जो तुम हम दोनों की जवाबदारी की बात कर रहे थे, उस जवाबदारी को संभालने की बात कर रहे थे। अब तुम अपनी ही कही बात से मुक्कर रहे हो!'

उस पल मेरा सारा बदन कांप रहा था, डर से नहीं, बल्कि गुस्से से। दीपा, ऐसा क्यों होता है कि हर जुर्म में भागीदारी तो मर्द की भी होता है, पर सज़ा अकेली औरत को भुगतनी पड़ती है? क्यों संकीर्ण समाज की इन घिसी पिट्टी रिवायतों से औरत को समझौता करना पड़ता है? क्या आज़ादी सिर्फ मर्दो के हिस्से में आती है कि वे मनमानियों की गंगा में नहाते रहें और गंगा को मैली करते रहें?

सखी, फिर जो हुआ उसने तो मेरे सर से प्यार का भूत ही उतार दिया। बेशर्मी की हर दीवार को फलांगते हुए एक पाक जज़्बे को नापाक करते हुए उस नामुराद ने क्या कहा, जानती हो ? सुनोगी तो जान पाओगी कि दरिंदगी क्या होती है? दानवता का चेहरा कैसा होता है? साफ़ पन्नों पर काली तहरीरें लिखने वाले नारी के साथ खिलवाड़ करके, बेबसी की हालत में उसे गिरावट की राह पर कैसे छोड़ जाते है? 'कमबख़्त जवाबदारी से कौन मुक्कर रहा है अर्पणा? मैं तो तुम्हें अपने सर पर आई हुई मुसीबतों की दास्ताँ बता रहा था, ये अम्मी-अब्बू भी ना ....! कुछ समझते ही नहीं औरत जात की परेशानी.....!

'अपने अम्मी-अब्बू को दोष देने के पहले, अपना चेहरा किसी साफ़ आईने में देख लो। वे तो दिये हुए वादे को भली-भांति निभाने की रावयत पर मर मिटने की बात कर रहे हैं। शायद तुम ही ज़िंदगी में रिश्तों की अहमियत नहीं समझ पाये, या समझते हुए नासमझ बन रहे हो। अब तो मुझे तुम्हारी नीयत पर संदेह होने लगा है...!'

'कैसा संदेह अर्पणा ? मेरे इरादों को यूं शक की धूल से मटमैला न करो, मैं तुम्हें दिलो-जान से चाहता हूँ। 'चाहत क्या होती है तुम इस सच से कोसों दूर हो आफ़ताब ! अब अपने नापाक इरादों से तुम मुझे और झांसा नहीं दे सकते। तुम अभी, इसी वक़्त मेरी जिंदगी से अपने इस मनहूस साये के साथ रफ़ा- दफ़ा हो जाओ। 'अर्पणा ... !' आफ़ताब मिमियाता रहा ' तुमने मेरे नाम पर कालिख पोतकर, मेरी इज्ज़त की धज्जियां उड़ाई हैं। एक औरत की जिंदगी के साथ खिलवाड़ किया है। अब इस बेहयाई से तौबा कर लो...यही बेहतर है।' 'अर्पणा मुझे कहने का मौक़ा तो दो..!' 'मुझे अपनी लापरवाहियों का पूरी तरह अहसास है, अब तुम्हारी कोई भी बात मेरे घाव का मरहम नहीं बन सकती। और वैसे भी तजुर्बे बार-बार नहीं किए जाते। बेहतर है अपने अम्मीअब्बू के दिये हुए वचन को निभाकर एक और जिंदगी तबाह होने से बचालो। अगर ज़िंदगी में कभी बाप बनने का सुख हासिल हो तो इस अजन्मे बच्चे की क़सम, मैं तुम्हें बददुआ देती हूँ कि तुम्हारा वह सुख भी दुख में बदल जाए!'

'इतनी कठोर न बनो अपर्णा, मैंने सोच लिया है कि अम्मी-अब्बू की तमन्ना पूरी करके, मैं उस लड़की को तलाक़ देकर तुम्हें अपना लूँगा। और इस बच्चे को अपना नाम दूंगा।'

दीपा, अब उसकी लरज़ती हुई आवाज़ में डर था, अपने महफूज न रहने की बददुआ का खौफ़ झलक रहा था। इन्सान इतना कायर भी हो सकता है, यह पता नहीं था। अपनी सलामती को लेकर कोई इतना खुदगर्ज़ हो जाता है यह उस समय जाना जब आफ़ताब को स्वार्थ का नंगा नाच करते हुए पाया। मेरे कोमल जज़्बों को उसने इस क़दर कठोर बना दिया कि मेरे हृदय की सारी कड़वाहट ज़हर बनकर शब्दों में प्रवाहमान होने लगी। 'मुझे तुम से अब कोई उम्मीद नहीं। जाने कौन से खंडहरों पर अपने सपनों के महल बनाने के मनसूबे गढ़ते हो, जो ऐसे खयाल तुम्हारे ज़हन को तारीक करने के सिवा कुछ नहीं कर पाते। अब तुम अंधेरे में रहने के आदी हो गए हो, रोशनी तुम्हारे किस काम की? मैं तुम जैसे कायर इन्सान का साया न खुद पर, न अपने बच्चे पर पड़ने दूंगी। एक और बात ज़रूर सुन लो, मुझे न तुम्हारे सहारे की ज़रूरत है और न मेरे बच्चे को तुम्हारे नाम की !'

दीपा सच कहती हूँ, मैंने उस दिन मैंने उस कायर इन्सान को देखा, जो गुनाह तो डंके की चोट पर करता है और माफ़ी भी माँगता है तो अपना हक़ समझ कर। पता है फिर क्या हुआ? वह अपनी जगह से उठा, अपनी कमीज़ झटकी और बालों को संवारता हुआ दो कदम आगे गया और फिर रुककर कहने लगा...'अर्पणा हो सके तो मुझे माफ़ कर देना।'

मानवता जहां अपने अर्थों पर पूरी नहीं उतरती शायद वहीं जवाबदारी का अंत हो जाता है। अब भी सोचती हूँ कि क्या उसके साथ जुड़ी हुई ज़िन्दगानियों के साथ भी वह इसी तरह निभाएगा? क्या औरत के आत्म-सम्मान को अपने छल-कपट एवं धूर्तता से स्वाहा करता रहेगा? अपने स्वार्थ के आगे मासूम, बेगुनाह मुस्कराहट को सांस लेने के पहले ही यूं घुटन भरी सज़ा का हक़दार बनाता रहेगा?

ये सवाल बिजली की मानिंद मेरे दिमाग में कौंध उठे, जिनके जवाब आने वाले कल में ये मासूम ज़िन्दगानियां हमसे तलब करेंगी, जब वे अँधेरों से निकल कर उजाले में आएंगी? अब थक गई हूँ, फिर कभी लियूँगी।

तुम्हारी सखी,

अर्पणा