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गुल्लक
July 24, 2020 • विकेश निझावन • कहानी


विकेश निझावन, हरियाणा, मो. 8168724620

'ममी! इस बार कितने दिन के लिये आई हो?' शिप्रा ने आइने पर से नजर हटाते हुए मेरी ओर देखते हुए पूछा, तो मैं खिलखिला कर हंस दी थी। शिप्रा को बाँहों में भरते हुए मैंने कहा था, 'मेरी बेटी जब तक चाहेगी, मैं उसके पास रह लूँगी।'

'अगर मैं वापस ही न जाने दूँ?'

'तो हम नहीं जाएँगे।'

'सच कह रही हो ममी?'

'क्या हम अपनी बेटी से झूठ बोलेंगे?'

'आई लव यू ममी! आई रियली लव यू!' शिप्रा ने मेरे दाएँ गाल पर किस किया और मेरी बाँहों का घेरा तोड़ते हुए बाहर को भाग गई।

शिप्रा के इस निश्छल स्नेह को मैं समझ पा रही थी| यकीनन मेरे प्यार के लिये वह अतृप्त है| इस पूरे सात साल के बीच मैं बहुत ही कम आ पाई हूँ| सरकारी नौकरी में कितना काम है, कितने बन्धन हैं- इन बातों को शिप्रा क्या समझे। उसकी यह उम्र भी तो नहीं ये सब समझने की। लेकिन इस बार अपनी इस लम्बी छुट्टी के बीच तो मैं इसे पूरी तरह से तृप्त कर दूंगी| अपना पिछला एकाकीपन भी भूल जाएगी वह।

मैं तो अपनी छुट्टियों काs भूली ही चली जा रही थी| वर्मा साहब ने रजिस्टर पर नज़र दौड़ाते हुए मुझे कनखियों से देखते हुए कहा था, 'मिसेज श्रीवास्तव, क्या इस बार श्रीवास्तव साहब से झगड़ा कर के आयी हैं?

'क्या मतलब?' मैं चौंकी थी।

‘साल खत्म होने जा रहा है।'

'सो तो है!

'अब तो कुछ रोज़ साहब के पास जाकर रह लीजिए।'

'कैसी बातें करते हैं वर्मा साहब! हमारे साहब हमें चाहते हैं और हम उन्हें चाहते हैं, यह तो सच है! लेकिन विदाऊट पे छुट्टी लेकर घर पर रहना न उन्हें गंवारा है न हमें।'

'भई वही तो बताने जा रहा था। आपकी तो ढेर छुट्टियाँ बन रही हैं। इस पूरे वर्ष में केवल तीन ही तो छुट्टियाँ ली हैं आपने!

केवल तीन! जतिन की शादी पर... अरे-रे! मैं तो कन्फ्यूज़ हो जाती हूँ। वह तो पिछले साल की बात थी| यह वर्ष इतनी तेज़ी से गुज़र गया, पता ही नहीं चला| इस बार बच्चे छुट्टियों में मेरे पास ही आ गए थे, सो उनसे दूरी का पता ही नहीं चला। यों तो उनसे एक-एक पल की दूरी सालती है लेकिन काम के बोझ से इतना दब जाती हूँ मैं कि मुझे उन्हें अपने से दूर रखना ही पड़ता है। यों पिछली बार मेरे चेहरे को देखते हुए पापा ने अनायास कह दिया था, अपनी सेहत का ध्यान रखो| जब बच्चों को हमारे पास छोड़ा है, तो हम पर विश्वास भी रखना होगा। यह बात केवल पापा ने ही नहीं, ममी, भैया और भाभी ने भी कही थी| सच में उनके इन शब्दों से मुझे कहीं भीतर तक राहत मिली थी और मैं बच्चों को लेकर पूरी तरह से निश्चिन्त हो आई थी।

पिछली छुट्टियों में मैंने देव से फोन पर कह दिया था, मैं इस बार नहीं आ पाऊँगी| नए डायरैक्टर आए हैं, अभी हमें उन्हें और उन्हें हमें समझने में समय लगेगा|

मेरी इस बात पर देव हंस पड़े थे, ‘भई, तुम्हें आने के लिये कह कौन रहा है! छुट्टियाँ शुरू होते ही मैं बच्चों को तुम्हारे पास छोड़ जाऊँगा।'

देव जिस रोज़ आए थे, अगले रोज़ ईद की छुट्टी थी। एक रोज़ छोड़ कर रविवार था, जिस वजह से देव ने चार छुट्टियाँ बना ली थीं। इन चार दिनों को खूब जिया था हमने| ईद के मेले से शिप्रा और अर्शी ने ढेरों छोटी-छोटी चीज़ें खरीद डाली थीं। लेकिन घर आकर महसूस किया कि अर्शी को अपनी बन्दूक और शिप्रा को अपनी मिट्टी की बत्तख के आकार की गुल्लक बहुत पसन्द थी| मेरे पर्स में पड़ी आठ-दस रुपये की रेज़गारी शिप्रा ने घर में आते ही अपनी गुल्लक में डाल ली थी।

हर सुबह उठते ही शिप्रा गुल्लक मेरे सामने ले आती, ममी! इसमें कुछ कॉयन्स डालिये न!' मुझे अच्छा लगा था कि बच्चे इन छोटी-छोटी चीज़ों के मोह में मुझसे दूर रह सकते हैं। छुट्टियाँ खत्म होने पर देव बच्चों को लेने आए तो शिप्रा का चेहरा उतर गया था। अर्शी नाना-नानी को बराबर मिस कर रहा था लेकिन शिप्रा ने नाना-नानी के नाम पर कोई उत्सुकता जाहिर नहीं की| जाने क्यों वह मेरे चेहरे की ओर देखने लगी, तो मैंने तपाक से कहा था, 'नाना-नानी से भी हर रोज कॉयन्स डलवाती रहना। फिर देखना, गुल्लक जल्दी ही भर जाएगी।'

पलभर के लिये शिप्रा के होंठ फैले थे लेकिन अगले पल फिर सिकुड़ कर रह गए| जाते हुए उसने बाय किया था लेकिन शब्द उसके होंठों पर नहीं थे। मैं समझ गई थी, शिप्रा अब बड़ी हो रही है। सब समझने लगी है वह।

'पापा, एक रोज़ और रुक जाएँ?' रात सोने से पहले शिप्रा ने कहा तो देव डपटकर बोले थे, 'दिमाग खराब हो रहा है तुम्हारा! दो महीने रह लिये, क्या मन नहीं भरा तुम्हारा?' मैंने महसूस किया कि शिप्रा सहम गई

देव के यहाँ से रवाना होते ही मैंने ममी-पापा से फोन पर कह दिया था कि वे शिप्रा का विशेष रूप से ध्यान रखें। शी इज़ मोर सैन्सिटिव!

'ममी, राघव हमें खेलने नहीं देता।' शिप्रा ने अपने हाथ मेरे कंधे पर रख दिये तो मैं वर्तमान में लौटी थी, 'तो उसके साथ मत खेलो!'

'ममी, वह गन्दी-गन्दी बातें करता है।"

'कहा न, उसके साथ मत खेला करो| अर्शी को अन्दर बुलाओ, हम मिलकर कैरम खेलेंगे।' मेरी बात पर शिप्रा उछल पड़ी थी और चहकती हुई सी अर्शी को बुला लाई थी।

कैरम की गोटियाँ सैट करते हुए अर्शी बोला था, 'ममी, राघव को भी बुला लो न! वह भी खेलेगा।' अर्शी ने नजर उठा कर बाहर की ओर देखा, तो मेरी नजर भी उधर ही घूम गई। मैंने देखा, राघव दरवाजे की ओट में ललचाई नजरों से हमारी ओर ही देख रहा था।

'आओ बेटा, तुम भी आ जाओ!' मैंने कहा तो शिप्रा एकाएक चिल्ला उठी, 'नहीं ममी! इसे नहीं खिलाएँगे हम| इसे अन्दर मत आने दो| ये गन्दा है। गन्दी बातें करता है ये।'

शिप्रा और अर्शी की तरह राघव भी इस घर में पला और बड़ा हुआ है। लेकिन शिप्रा की जिदद के आगे मुझे स्वीकारोक्ति देनी पड़ी| मैंने जरा सा लहजा बदला, 'राघव बेटे, वो बाई छत पर कपड़े डाल गई थी न, वो उतार ला| मौसम खराब है, कहीं बारिश ही न आ जाए।' वह मुड़ने को हुआ तो मैंने पुनः उसे रोका, 'हाँ, एक कप गरम-गरम चाय का भी बना दे| सर में दर्द हो रहा है, चाय लेकर ठीक हो जाएगा। उसके बाद तू भी खेल लेना।'

'ममी, तुम्हारे सर में दर्द है तो मैं दबाए देती हूँ| तुम आराम कर लो।' शिप्रा ने कहा था|

शिप्रा की बात को अर्शी ने काट दिया, 'चल बुद्धू कहीं की| आराम करने से सर दर्द चला जाएगा क्या! सर दर्द तो खेलने से जाएगा। खेलने से ममी का ध्यान बंट जाएगा।' दोनों बच्चे इतने समझदार हो रहे हैं, मैं कहीं भीतर तक गदगद हो आई थी।

राघव चाय लेकर आया तो मैंने कैरम एक ओर सरका दिया, 'तुम लोग बाहर चल कर खेलो| मैं चाय पीकर थोड़ा आराम करना चाहूँगी।'

'हाँ-हाँ! अर्शी और राघव, आओ हम बाहर चलकर खेलते हैं। ममी को आराम करने दो।' शिप्रा अब तक राघव के प्रति अपने गुस्से को भूल चुकी थी| राघव चलते-चलते बोला था, मेमसाहब, छोटी मेमसाहब कब आएँगी?'

'अरे आ जाएँगी! तू चलकर अपना काम निबटा।' इसे कैसे समझाती मैं कि मेरे आने पर सबको कितनी आजादी मिल जाती है, वरना बच्चों की वजह से सबको बन्धन तो रहता ही है। जाने अपने कितने-कितने प्रोग्राम इनकी वजह से इन्हें रद्द करने पड़ते होंगे| जब ममी-पापा मसूरी गए हुए थे, छाया भाभी को दो बार अपनी किट्टी पार्टी भी मिस करनी पड़ी थी, जय ने बताया था|

कल छाया भाभी सकुचाती हुई बोली थीं, 'दीदी, आज हम ममी के यहाँ चले जाएँ?'

'अरे-रे! यह भी कोई पूछने की बात है! जरूर हो आओ| अब मैं इन दोनों के पास हूँ न!'

जय और छाया बाहर को निकले ही थे कि शिप्रा पूछ बैठी, 'ममी, ये लोग कहाँ जा रहे हैं?'

'कौन लोग?

'मामा और मामी!'

'तुम्हारी मामी अपनी ममी के पास जा रही है। जिस तरह से तुम अपनी ममी के लिये उदास हो जाती हो, उसी तरह से मामी भी अपनी ममी के लिये उदास हो रही थी| तुम लोगों की वजह से वह अपनी ममी के पास भी नहीं जा पाती न!'

'हमारी वजह से!' शिप्रा जैसे चौंकती हुई बोली, 'मामी तो हर सप्ताह अपनी ममी के पास जाती है।'

'हर सप्ताह! कैसी बात करती हो!'

'हाँ! अभी परसों ही तो मामी लौटी हैं।'

'ये कैसे हो सकता है!' मैं शिप्रा की बात पर अविश्वास जताती बोली, 'पिछले डेढ़ माह से ममीपापा यहाँ नहीं हैं, फिर मामी तुम्हें कैसे छोड़ कर जा सकती है?'

शिप्रा के जवाब से पहले अर्शी बोल पड़ा था, 'मामी हमें शर्मा अंकल के यहाँ छोड़ जाती हैं। शर्मा अंकल हमें बहुत डांटते हैं। पिछली बार हमारी पिटाई भी हो गई थी ममी! लेकिन तब हमने सॉरी कह दिया था कि हम आगे से डिब्बे में से बिस्किट लेकर नहीं खाया करेंगे।'

‘नहीं ममी, शर्मा अंकल बहुत अच्छे हैं। जब मुझे गुदगुदी करते हैं तो मुझे बहुत मजा आता है।'

'झूठ! बिल्कुल झूठ!' अर्शी जैसे फट सा पड़ा, 'अगर तुझे मजा आता है तो उस रोज इतना चिल्लाई क्यों थी तू!'

ये कैसी असलियत मेरे सामने खुल रही थी| मन तो हुआ, देव से सारी बात फोन पर बता दूँ। मैं अकेली इस बात को झेल ही नहीं पा रही थी| जय और छाया से सीधे बात कर पाने की हिम्मत ही नहीं है| पापा-ममी कब आएँगे, इसका अभी कुछ अता-पता नहीं।

यों देव से कहने का मतलब यही होगा कि मैं खुद ही अपने माँ-बाप और भाई-भाभी की तौहीन करने जा रही हूँ!

काफी सोच-विचार के बाद इस निर्णय पर पहुंची थी कि मौका लगते ही अकेले में भाभी को ही समझा दूंगी।

पच्चीस दिन की छुट्टियाँ मैंने सोचा था, बहुत लम्बी होंगी। लेकिन वक्त के आगे मैं फिर हार गई शिप्रा के आगे आह भरते हुए कहा था, 'बस तीन दिन और रह गए हैं मेरी छुट्टियाँ खत्म होने में।'

'उसके बाद?

'उसके बाद मुझे जाना होगा।'

'तुमने मुझसे प्रॉमिस किया था ममी कि अब तुम हमें छोड़कर नहीं जाओगी।'

'नौकरी पर तो जाना ही है बेटे!'

'नौकरी पर क्यों जाते हैं ममी?' शिप्रा के इस सवाल पर मैं हंस पड़ी, नौकरी पर जाने से पैसा मिलता है। उन्हीं पैसों से तो ढेर सारी चीजें लाती हूँ तुम्हारे लिये। और फिर भविष्य के लिये पैसा ही तो चाहिए।'

'पैसा...!' शिप्रा ने दवे-से कहा था और झट से अपने कमरे की ओर भाग गई। अगले ही पल वह लौट आई थी| उसके हाथ में मिट्टी की गुल्लक देख मैं कह उठी, 'हाँ-हाँ! इधर लाओ अपनी गुल्लक, मैं कॉयन्स डालती हूँ।

'नहीं ममी! पैसा मुझे नहीं, पैसा तो आपको चाहिए।' शिप्रा ने पटाक से गुल्लक जमीन पर दे मारी, 'आपको पैसा चाहिए न ममी! आप मेरे सारे पैसे ले लो, लेकिन प्लीज़ आप नौकरी पर मत जाओ| हम आपके बिना नहीं रह सकते। देखो, मैंने अब तक ढेर पैसे जमा कर लिये हैं, मैं सब आपको दे दूंगी।'

शिप्रा का ऐसा विद्रूप रूप मैं पहली बार देख रही थी| उसके इस व्यवहार से मैं पूरी तरह से टूट गई। लगा, अब जाना भी चाहूँ तो नहीं जा पाऊँगी| पलभर में मेरी टाँगें और पाँव बिल्कुल बेजान हो आए| अब तो एक कदम भी नहीं चल पाऊँगी मैं|

मेरी पूरी रात आँखों में कटी| मैंने रातभर में यह निर्णय ले लिया था कि सुबह उठते ही दो काम करूँगी। एक तो देव को फोन पर स्पष्ट कह दूंगी कि मैं नौकरी छोड़ रही हूँ। दूसरे, डायरैक्टर साहब को फोन पर ही इत्तला कर दूंगी कि मैं रैजीग्नेशन लैटर भेज रही हूँ।

लेकिन मेरे सुबह उठने से पहले दरवाज़े पर कॉलबेल हुई, तो मैंने उनींदी आँखों से दरवाजा खोला था। दरवाजा खोलते ही मैं हत्प्रभ रह गई। सामने देव खड़े थे।

'आप!' मैं चौंकती-सी बोली।

'मेरे आने पर इतना चौंकने वाली क्या बात है?'

'नहीं, ऐसा नहीं है!' मैं झेंपती हुई बोली, 'आप तो पन्द्रह तारीख को आने वाले थे।"

'हा! सोचा, दो दिन तुम्हारे साथ और रह लूँगा| तुम्हें सोलह तारीख सुबह ही तो जाना है।'

'अब केवल दो दिन और नहीं, तुम चाहो तो सारी उम्र मेरे साथ रह सकते हो।' मुझे इनकी बात-से-बात करने का मौका मिल गया।

'क्या मतलब?' इनका चौंकना स्वाभाविक था।

'अरे अन्दर तो आओ! मैं भी क्या सुबह-सुबह ले बैठी।' आप बाथरूम में चलकर ब्रश कीजिए, मैं चाय लेकर आ रही हूँ।'

बैग ड्राईंगरूम में ही रख ये टॉयलट की ओर बढ़ गए। फ्रेश होकर लौटे तो मैं डाईनिंग पर चाय के इन्तजार में बैठी थी| इनका चेहरा देख मैं हैरान थी| मेरी इतनी बड़ी बात के बावजूद इनके चेहरे पर कोई उत्सुकता नहीं। वैसे यह कोई नई या बड़ी बात नहीं थी मेरे लिये। अकसर ऐसा होता आया है| मेरी पहाड़ जैसी समस्याओं को सुनकर भी इन्होंने ठहाके लगाए हैं, 'बस इतनी-सी बात थी!' इनका पैट वाक्या है यह| मुझे सन्नाटे में देख कह उठते हैं, 'छोटी-छोटी बात पर चेहरा ऐसे बना लेती हो जैसे मुर्दाघाट से लौटी हो!' मैं अकसर इन बातों से टूटी हूँ। आँखों से नहीं तो दिल से रोयी हूँ| अगर मेरी वे समस्याएँ इस आदमी के लिये छोटी थीं, तो उनमें भी इसने कौन-सा साथ दिया मेरा| मैं स्वयं ही उनसे लड़ती रही।

ये चुपचाप चाय सिप किये जा रहे थे। मैं अपने द्वन्द्व को झेलती भूल ही गई कि मेरे आगे भी चाय का कप रखा है।

'चाय बहुत गर्म है क्या?' इन्होंने कहा तो मैं जैसे धरातल पर गिरी, 'नहीं तो!'

'बच्चे कब उठते हैं?' चाय खत्म हो गई तो इन्होंने पूछा था।

'आजकल मस्ती में हैं। आठ बजे के बाद ही उठते हैं| आज तुम जाकर उठा लो न!'

'मैं जानता था, तुम्हारे होते ये इसी तरह बिगड़ेंगे।' देव बेडरूम की ओर बढ़ते बोले|

यह वाक्य मज़ाक में कहा गया है या फिर सच में मुझ पर आक्षेप लगाया गया है, मैं बात को पूरी तरह से पकड़ नहीं पाई।

कमरे में पहुँच ये अर्शी के साथ बैड पर बैठ गए थे| मैं शिप्रा के बालों पर हाथ फेरती बोली, 'देखो बेटे, पापा आए हैं।'

बच्चे गहरी नींद में थे| मैं शिप्रा के पास बैठ इनसे मुखातिब हुई, ‘शिप्रा कुछ परेशान है।'

'क्यों, क्या हुआ?

'भैया-भाभी इन्हें कुछ निगलैक्ट कर रहे हैं।'

'मतलब?'

'कल ही दोनों बता रहे थे कि भाभी कई बार इन्हें शर्मा अंकल के यहाँ छोड़कर चली जाती हैं।'

'जब बच्चे तुम्हारे साथ थे तो तुम कितने घण्टे इन्हें पड़ौसियों के यहाँ छोड़ शॉपिंग के लिये चली जाती थी, याद है तुम्हें?

इनके दो टूक जवाब ने पलभर के लिये मुझे पूरी तरह से विध्वंस कर दिया। लेकिन अगले ही पल मैं सीधे विषय पर आ गई, 'देव, मैं नौकरी छोड़ रही हूँ। शिप्रा अब बड़ी हो रही है, मैं इसे अकेला नहीं छोड़ना चाहती।'

'तुम नौकरी छोड़ रही हो!' देव ने एक-एक शब्द को चबाते हुए जिस हेय दृष्टि से मेरी ओर देखा, मैं बुरी तरह से आतंकित हो आयी। ये उसी रौ में बोले, 'मैं जानता हूँ, तुमने कभी दिमाग से काम नहीं लिया, वरना इतनी घटिया बात कभी न करती| तुम मेरी कमाई पर ऐश करना चाहती हो या फिर तुम्हें अपने ही माँ-बाप, भाई-बहन पर सन्देह होने लगा है। केवल मेरी तन्ख्वाह पर कितना बना लोगी? बच्चों की पढ़ाई, बच्चों का भविष्य, उसकी कोई परवाह है तुम्हें?'

बच्चों का भविष्य! मेरा मन चीत्कार उठा| बच्चों का वर्तमान ही नहीं है, तो उनका भविष्य क्या होगा! राघव और शर्मा जैसे कई चेहरे मेरे सामने अट्टहास कर उठे थे। लेकिन मैं समझ गई, देव मेरी इस बात को कभी स्वीकार नहीं करेंगे| अर्थ उनके लिये सबसे महत्त्वपूर्ण है। मेरे एक शब्द और पर वे मुझे जलालत की गर्त में फेंक देंगे| तब नहीं सह पाऊँगी मैं| मुझे वापस जाना पड़ेगा| यह व्यक्ति जो मेरा पति होने का दम्भ भरता है, मेरे ऊपर अपनी कमाई का एक पैसा लगा पाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।

मुझे लगा था, शिप्रा की उस टूटी हुई गुल्लक की तरह मैं भी टूटकर पूरी तरह से बिखर गई हूँ। अब मैं न उनका वर्तमान समेट सकती हूँ, न उनका भविष्य!

लीजिए पेश है इक अफसाना आप सब की नज़र