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हाइकु-ग़ज़लें
December 20, 2019 • सूर्यनारायण गुप्त ‘सूर्य’ • ग़ज़लें

है साजिसों का/हर जगह जाल/मेरे देश में।

जीना हो गया/यहाँ अब मुहाल/मेर देश में।।

 

कौन दे यहाँ/तमाम ही बातों का/अब जवाब-

हर जगह/सवाल ही सवाल/ मेर देश में।।

 

घी व दूध की/बहती थी नदियाँ/जहाँ पे कभी-

सुखा कहीं तो/कहीं पे है अकाल/ मेर देश में।

 

कैसे आयेगी/सद्भावना यहाँ/हम सब में-

सर्वत्र फैला/आतंक व बवाल/मेरे देश में।

 

कीमत नहीं/श्रम की यहाँ कोई/आज देश में-

पर यहाँ हैं/तस्कर मालो-माल/मेरे देश में।

 

बनाया जिसे/अपना रहनुमा/दे कर वोट-

कर रहा है/मुझे ही वो हलाल/मेरे देश में।

 

आश्वासन का/लड्डू खिला-खिला के/भरमा दिये-

इसी प्रकार/बीते कितने साल/मेरे देश में।

 

देश में लगी/लूट-हत्या की होड़/हर ओर ही-

कैसे-कैसे हैं/भारत माँ के लाल/मेरे देश में।

 

घना तना है/कुहरा आकाश में/आज कितना-

उगा है 'सूर्य'/हो कर फटेहाल/मेरे देश में।

 

मौन है देश/अंधेरों के राज में/लूट मची है-

सिसकता है/ 'सूर्य' हो के बेहाल/मेरे देश में।

रोटी के लिये/रोटी की भाँति जली/यह जिंदगी।

बिन नमक/दाल के सम गली/यह जिंदगी।।

 

झूलसा जब/आकांक्षा की आग में/भ्रमित मन-

कडुआ-घूँट/पीकर के भी पली/यह जिंदगी।

 

किस-किस को/सुख बाटे सभी हैं/सुख-प्रत्यासी-

लूटा के सुख/दुःख-डगर चली/यह जिंदगी।

 

सामाजिकता/बिखरी, रो रही है/मानवियता-

टूटा प्रेम का/धागा और फिसली/यह जिंदगी।

 

रोता ममत्व/अपनत्व भी बिका/चन्द सिक्कों पे-

घुट-घुट के/झूठा रिश्ता निगली/यह जिंदगी।

 

खून बहाया/मिलकर सगों ने/जब भी मेरा-

अपमानित/घुट-घुट के जली/यह जिंदगी।

 

ख्वाब अधुरे/साधें हैं सुनी-सुनी/जीवन हारा-

ढलते 'सूर्य'/जैसी अब तो ढली/यह ज़िंदगी।

 

रोटी के लिये/रोटी के भंति जली/यह जिंदगी।

बिन नमक/दाल के सम गली/यह ज़िंदगी।।