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हत्यारा समाज
November 6, 2020 • राकेश गौड़ • बिरासत


राकेश गौड़, नई दिल्ली, मो. 9818974184

कुछ साल पहले, पढ़ा होगा आपने अखबार में; करने के बाद बहुत विचार-विमर्श
जन्म पूर्व बच्चों का लिंग परीक्षण,;अपराध घोषित कर दिया, सरकार ने
क्यों, क्योंकि एक सर्वेक्षण में; लगा था ये पता
कि लिंग परीक्षण में मिले; अधिकाँश कन्या भ्रूणों की
भावी माताओं ने; करवा दी थी ह्त्या

छपते रहते हैं, ऐसे भी समाचार; कुंवारी कन्याएं कर रही हैं आत्महत्या
कारण, है क्या बताने की आवश्यकता; वही सामजिक रोग, जो फैल गया बुरी तरह
माता-पिता की; दहेज़ न जुटा पाने की विवशता

एक और समाचार; आज भी छपता है बार-बार
माँ, बेटे, ननद व देवर ने; दहेज़ न मिलने के कारण
जला कर कर दी; बहू की हत्या

क्या भ्रूण ह्त्या; कुंवारी कन्याओं द्वारा आत्महत्या
और, ससुराल में वधू की ह्त्या में; नही है कोई अंतर?

क्यों नहीं है अंतर? भ्रूण ह्त्या की जाती है गर्भ में
मगर, आत्म ह्त्या करने वाली कन्याएँ; पिता के घर पलती हैं कई साल
मोह लेती हैं सारे परिवार को; मगर जब अचानक होता है उनका सामना
माता-पिता की विवशता से; दहेज़ रूपी विभीषिका से
तो वे, लटक जाती हैं पंखे से

मगर विवाह करके तो; पिता अपने कलेजे के टुकड़े को
सौंप देता है, अनजान हाथों में; एक विश्वास के साथ
उसी पिता की मुँह माँगा दहेज़; न जुटा पाने की मजबूरी करवा देती है हत्या बेटी की

सोचता हूँ, जन्म पूर्व लिंग परीक्षण पर; क्यों लगाया जाये प्रतिबंध
भ्रूण हत्या, क्या आत्महत्या; या नृशंस हत्या से भी जघन्य है?
मगर दूसरे ही पल, आता है विचार; भ्रूण हत्या भी है, घोर अनैतिक अनाचार
अगर इसी तरह, होते रहे भ्रूण परीक्षण; और होती रही भ्रूण हत्याएँ व गर्भपात
तो वह दिन दूर नहीं जब; बिगड़ जाएगा जनसंख्या का अनुपात
आज मिलते नहीं कन्याओं के लिए वर; कुछ वर्षों बाद, वर के लिए कन्याएं हो जाएंगी दूभर

आज देश को आधुनिक व विकसित बनाने का हो रहा है प्रयास
पर, क्यों ना हम पहले पा लें मुक्ति, सदियों से चली आ रही
उन सडी गली मान्यताओं से; जिनके चलते वंश चलाने के लिए
बेटे की अनिवार्यता हो
मृत्यु के बाद मुखाग्नि के लिए भी; पिता को चाहिए बेटा
बेटी चाहे योग्य हो कितनी; मानी जाए अभिशाप

प्रगति और विकास का नारा; तभी होगा सार्थक
जब बेटी बेटे के भेद को; समाज मान ले निरर्थक
अन्यथा होती रहेंगी ऐसे ही भ्रूण हत्या
बेटियां करेंगी आत्महत्या; जलाई जाएंगे बहुएं
और कहते रहेंगे हमारे कर्णधार ; हमने दिलाए हैं
स्त्री पुरुषों को सामान अधिकार