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कहानी
April 5, 2020 • संगीता कुजारा टाक

 

बात एक रात की

क़ाज़ी के सामने बैठी-बैठी अनारा सोच रही थी... कितना तो आसान है जोड़ा बनाना... एक नर, एक मादा ही तो चाहिए। कुदरत ने तो इसे बहुत स्वाभाविक बनाया है फिर चाहे पक्षी हों या जानवर, सब तो खुद से ही  ढूँढ लेते हैं अपना-अपना जोड़ा, पर इंसान नाम की ज़ात में तो ये जोड़ा बनने की जो क़वायद है, इसमें जोड़े के अलावा, यानी लड़का लड़की को छोड़कर, बाकी सब, फिर चाहे वो माँ-बाप, भाई -बहन, रिश्तेदार हों या समाज या पूरा मुहल्ला, इस  में अपनी जान लगा देते हैं और फिर लड़का -लड़की को सामने बिठा कर दोनों की ‘हामी’ ले ली जाती है। जोड़ा बन जाता है। इसी क़वायद को सब ‘‘निकाह’’ कहते हैं। और  देखो न ! इस निकाह को तोड़ना, सिर्फ एक आदमी के हिस्से में, वो भी उसके सिर्फ ‘तीन बार तलाक़‘ कहने में......!!
उसकी नजर बगल में बैठे अपने शौहर इरफान की तरफ पड़ी। आँसुओ  से तर-बतर था उसका चेहरा !
‘गुलफाम’  क़ाज़ी  की आवाज से अनारा की तंद्रा  टूटी। सामने से एक खूँखार-सी शक्ल वाला मोटा आदमी दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए उनकी तरफ आया। अनारा और उसके शौहर की घिग्घी बँध गई। दोनों सिहर उठे।
क़ाज़ी मुस्कुरा कर कहने लगे- मियाँ ! यह मेरा बड़ा लड़का है। पर रूपयों  के बिना काम नहीं होगा और ‘इद्दत’ के बाद ये तलाक़ दे देगा। पिछले महीने ही इसने सायरा को तलाक़ दिया है।तुम लोग ख़ुशनसीब हो। ये ख़ाली है अभी।तुम इत्मिनान रखो।
.........इत्मिनान  ? इरफान सोचने लगा,कैसे रखेगा वह इत्मिनान,  इसको अपनी बीवी सौंपकर ? बड़े प्यार  से निकाह करके लाया था वह अनारा को।
इरफान को याद आया वह मनहूस  पल, जब तलाक़ की नींव पड़ी थी। कल रात की ही तो बात थी। रोज की तरह उसने अपने बूचड़खाने का काम खत्म कर, सारे रुपए गिनकर अपनी जेब में रखे थे और शराब की दुकान पर बोतल खरीदी थी। कल बहुत अच्छी कमाई हुई थी।
इरशाद उसके बचपन दोस्त था। उसका भी बूचड़खाना इरफान के बूचड़खाने जैसा बड़ा था।
कल उसने आने से मना कर दिया था सो इरफान ने अकेले ही सारी बोतल गटकने का इरादा कर लिया था। बोतल लेकर वह अंडे वाली दुकान पर चला गया। चार बॉयल्ड अंडे खरीदे और शराब बिना गिलास में डाले ही, अंडों के साथ गटक गया था। पूरा मूड खराब  कर दिया  था इरशाद ने। कहाँ तो सोचा था तीन पत्ती खेलने का! पिछला हिसाब भी तो चुकाना था। बड़ा जुआरी समझता है साला अपने आप को ! मन ही मन वो बुदबुदा भी रहा था।
उसे याद आया, अंडे वाले ने टोका भी था -‘‘क्या मियाँ! इरशाद भाई किधर ! आज अकेले !’’ इस सवाल से इरफान की त्यौरी चढ़ गई थी।
पता नहीं क्यों, अगर कोई उसकी बात न माने, तो गुस्सा उसकी नाक पर नहीं, सिर पर चढ़ जाता है।
इतना ही जवाब दिया था उसने- “साले को नहीं आना था, नहीं आया ...लौंडिया के पीछे पागल है!’’ और स्कूटर स्टार्ट करके घर की तरफ चला आया था।
रात का खाना  बनाना और बच्चों को पढ़ाई में मदद करना, अनारा की रूटीन में शामिल था। अनारा इरफान की पहली मुहब्बत थी और कितने जद्दोजहद के बाद उसकी बेगम बनी थी। मटन बिरयानी, बच्चों की आज की फरमाइश। उसने चखकर देखा, स्वाद.. लाजवाब और खुशबू माशाअल्लाह ! उम्मीद से ज़्यादा ज़ायकेदार पकी थी आज की बिरयानी मज़ा आ जाएगा आज इरफान  को, खुश हो कर अनारा अपने आप से बुदबुदाई और तैयार होने चली गई गुसलखाने। हाथ-मुँह धोकर, सज-संवरकर, इरफान का इंतजार वो ऐसे ही करती थी।कितना पीछे पड़ा था वो निकाह के लिए। बड़ी फूफू के बेटे अनवर मियाँ से लड़ाई भी कर ली थी। बड़ी फूफी और छोटी फूफी दोनों के बीच में बातचीत तक बंद हो गई थी निकाह को लेकर। फिर अब्बू ने समझाया था दोनों बहनों को, तब जाकर सुलह हुई दोनों में। दो बच्चे होने के बाद भी अनारा की मुहब्बत पहले जैसी थी, नई-नवेली-सी।
हट्टा-कट्टा शरीर, निर्ममता से भरा हुआ पेशा, ज़िद्दी तेवर और ऊपर से आस -पास जी-हज़ूरी करने वाले,मतलब निकालने वाले रिश्तेदार। ‘इरफान ! आज मटन भेज दो। इरफान ! आज चिकन भेज देना।’ आजकल इरफान कुछ खीझ-सा जाता है जब कोई उसकी बात नहीं मानता।  ऊपर से शगूफ्फा ये कि बगल  के होटलों  के मालिकों के लिए इरफान, ’इरफान साब’ हो गए थे।
उन्हें अपना मतलब जो निकालना था।
घर पहुँचते-पहुँचते इरफान पर शराब के साथ-साथ पैसों  का नशा भी हावी हो चुका था। दोनों जेबें ऊपर तक भरी हुई थीं।
इरफान के आँखों के आगे अनारा घूमने लगी..... नहीं..., अनारा नहीं,.... औरत...., नहीं ....औरत नहीं..., बदन....सिर्फ  बदन... औरत का....।
स्कूटर साइड में लगा कर, धड़धड़ाते हुए इरफान  घर में घुसा। न तो  पढ़ते हुए बच्चों की तरफ उसकी नजर पड़ी और न ही सुनाई दी उसे अनारा की गुनगुनाती आवाज़, जो आज बहुत खुश थी।
इरफान किचन की तरफ लपका और अनारा के  चेहरे  को अपनी तरफ खींचने लगा- क्या हुआ? आज तुमने फिर ज्यादा पी ली है’’, इरफान की लाल लाल आंखों की तरफ देखकर  अनारा ने सकपकाते हुए  कहा।
‘‘ऐ चल.....’’ अनारा के हाथों से करछुल छीन कर फेंकते हुए इरफान ज़ोर से बोला।
‘‘अरे बाबा! सुनो ! बच्चे कमरे में पढ़ रहे हैं ...अरे ...अरे..! बच्चों के सामने तुम  कुछ भी  करने लग जाते हो, ये मुझे बिल्कुल पसंद नहीं!” इरफान की बेजा हरकतों से परेशान अनारा ने हाथ छुड़ाते हुए कहा।
लेकिन शराब, ज़िद्द और गुस्से के काकटेल ने उसे शैतान बना दिया था।
‘‘ ..चल.... चल साली..... नखरा करती है ....बीवी है तू मेरी..... समझी..... हर बात  माननी होगी।”  लड़खड़ाती आवाज़ में, ज़ोर ज़ोर से  चिल्लाते हुए, अपने दोनों हाथों से अनारा को कसकर, पकड़कर उस की बातों को  अनसुना कर  इरफान उसे  घसीटने लगा।
‘‘या अल्लाह”! पागल हो गए हो क्या ? इरफान! क्या अनाप शनाप बक रहे हो !” कहते -कहते अनारा का रोना फूट पड़ा। घसीटने की वजह से उसका पैर किचन के दरवाजे से अड़ गया था और  उसमें से खून  निकल आया था, पर इरफान को तो जैसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था । वह अनारा को बेडरूम की तरफ घसीटता चला जा रहा था। नशे में चूर, बूचड़खाने के अभयस्त हाथों को याद  ही नहीं रहा कि हाथों में किसकी गरदन है जानवर की या बीवी की।
आँसू और खून से अनारा के  कपड़े और जमीन भींग रहे थे। दर्द से ज़्यादा अनारा का सीना बेइज्जती से छलनी हो  रहा था। बच्चों के सामने उसने इतना तो कभी नहीं मारा था!
बच्चे सहम कर कोने में छुप कर खड़े हो गए।
‘‘अब्बू! अम्मी को मत घसीटो’’ बड़ा बेटा ‘असद’ अपनी छोटी बहन ‘रानी’ को, अपनी छोटी-छोटी बाहों के बीच में छिपाकर  चिलाए जा रहा था और  ‘रानी’ रोए चली जा रही थी ‘‘अम्मी ...अब्बू ...अम्मी..अब्बू ....   . ....!!’’
मर्द! वो भी जवान, फिर गुस्से में आग बबूला हुआ, बूचड़खाने के अभ्यस्त हाथ, कान और आँखें। अनारा का रुदन और उसकी मिन्नत, उसे वहशी बनने से रोक नहीं पा रहा थे।
‘‘चल,  मेरी बात नहीं मानेगी..तो जाएगी कहाँ ? साली... तलाक दे दूँगा न,  तब सारे नखरे निकल जाएँगे तुम्हारे ....समझी....?’’ इरफान और भी ज़्यादा चिल्लाने लगा।
‘‘कहा न..... अभी नहीं.... बच्चे भूखे हैं ...उन्हें खाना खिलाना है।’’ ....अनारा ने पूरी  शक्ति से रोते-रोते हाथ  छुड़ाया  और उठ खड़ी हुई।
‘‘बात नहीं मानेगी?....नखरे दिखाएगी?......  मुझसे न कहेगी ?... मुझसे ! अभी मजा चखाता हूँ.।’’
“....झन ....झन ....झन..’’ ताबड़तोड़ सात-आठ थप्पड़ अनारा की गाल पर इरफान ने ऐसे जड़ दिए जैसे किसी मुजरिम को पीटा जाता है।
अनारा का हाथ अपने आप गाल पर चला गया। उसे लगा जैसे  इरफान के  पंजों के निशान उसके गाल पर मुहर की तरह छप गए हो। उसे लगा कि यह निशान उसके सब्र पर जुल्म का, उसकी आन पर बेइज़्जती का निशान है। हद हो  गई थी सहने की! किया क्या है मैंने ? सिर्फ अपनी मर्जी ही तो ज़ाहिर की थी। तड़प कर रह गई अनारा।
इरफान पहले भी  मारपीट किया करता था, लेकिन  अनारा की मिन्नतों पर शाँत भी हो जाया करता था पर आज तो जैसे वह जानवर बन गया था।
डर से सहमे बच्चे अनारा के पीछे पीछे रोते हुए चले जा रहे थे।
‘‘.. चल... चल बिस्तर पर .... चलती है कि नहीं.....’’,चिल्लाते हुए इरफान ने अनारा की चोटी पकड़नी चाही। पर नहीं, इस बार अनारा ने उसे अपने आप को छूने भी नहीं दिया और दूर छिटक गई और फिर चिल्ला कर कहा .‘‘सुन..इरफान,  यह वहशीपन अब नहीं सहूँगी। यह रोज-रोज की मारपीट  अब मुझसे नहीं सही जाती !’’
अनारा की प्रतिक्रिया इरफान की सोच से बाहर की बात थी। इरफान के तन -बदन में आग लग गई हो जैसे!  वह चिल्लाकर कहने लगा “साली ! जबान चलाती है  ...तलाक दे दूँगा तुझे ....तब समझ में आएगा.... तुझ जैसी बिखरी पड़ी हैं गली- गली .....’’ इरफान  की आँखों से खून उतर आया  और मुँह से थूक निकलने लगा।
‘‘...तो दे दे ... तू दे कर दिखा....!’’ पता नहीं कैसे कोमल, कमजोर अनारा ने बच्चों को अपनी  बाहों में लेते हुए शेरनी का रूप ले लिया। जैसे अब  वह अपनी इज्जत, आबरु की खुद ही पहरेदार हो गई हो।
गुस्से  और नशे से चूर, .......तड़.......तड़ ....तड़........अनारा के गाल पर थप्पड़ मारते हुए  इरफान ने कहा-‘‘तलाक........तलाक............तलाक........!!!’’
अवाक् अनारा ने इरफान की तरफ देखा, परायेपन की अंतहीन सीमा नजर आने लगी आज दोनों के बीच। एकदम से मुर्दा-सी शांत  हो गई थी  अनारा। दोनों बच्चों को पकड़ा और वह  कमरे में आ गई। अंदर से चिटकनी  लगा ली उसने, बच्चों को बिस्तर पर डाला और थपथपाने लगी। अब उसकी आँखों में न तो आँसू थे और न नींद। एक  सुनामी - सी आई और सब उजाड़ कर चली गई। उसकी आँखो के आगे सिर्फ 
अंधेरा था, घोर अंधेरा।
इस ‘तीन तलाक’ ने न जाने कितने परिवारों को तोड़ा है। मजहब की अच्छी चीजों से परहेज ! मर्दाना अहं और सहूलियतों के नाम पर कुरान की आयतें !! इस मर्दाना दुनिया में औरतों को इंसान समझने का सफर जाने कब पूरा होगा ? उसे अपने ऊपर रोष भी आ रहा था और रोना भी ! मुहब्बत अपना हिस्सा माँग रही थी और स्वाभिमान अपना। रात इसी खींचतान में कट गई।
सुबह बेजान-सी अनारा ने कमरे का दरवाजा खोला, तो देखा इरफान उकड़ू होकर, सिकुड़-सिमट कर बैठा हुआ था।जैसे साँप सूँघ गया हो उसे।
एक हाथ से सूटकेस और एक हाथ से बच्चों को पकड़ कर बाहर निकलने लगी अनारा तो इरफान को होश आया। वह झट से अनारा  के आगे खड़ा हो गया !
‘‘जाने दो मुझे!’’ अनारा ने सपाट आवाज़ में कहा।
“नहीं ...मैं तुम्हें कहीं नहीं जाने दूँगा।” इरफान की आवाज़ में नरमी थी और अधिकार भी।
“जाने दो इरफान ! अब मैं तलाकशुदा हूँ”।कहते-कहते अनारा की आँखों में आँसू आ गए।
“नहीं ‘आनी’’ ! मैं तुम्हें और बच्चों को कहीं नहीं जाने दूँगा।”अपनेपन से इरफान ने कहा। प्यार में अक्सर इरफान अनारा को ‘आनी’ कहा करता था। ‘‘कौन कहता है तुम तलाकशुदा हो। वह तो शराब और गुस्से के नशे में जाने  मैंने क्या कह डाला।” इरफान की आवाज में अब प्यार ही प्यार था। रात का वहशीपन न जाने कहाँ चला गया था।
‘‘जो होना था सो हो गया इरफान। तुमने मुझे कल रात तलाक़ दिया है। अब मैं और बच्चे यहाँ नहीं रहेंगे।’’ न चाहते हुए भी अनारा की आँखें बहने लगीं।
‘‘नहीं आनी ! मत जाओ न ! किसी ने नहीं सुना है कि मैंने तुम्हें तलाक़ दिया है। मैं किसी को नहीं बताऊँगा, तुम भी किसी को मत बतलाना।” इरफान की आँखों से भी आँसू बहने लगे, मुझे माफ कर दो आनी। किसी को भी  पता नहीं चलेगा। मत जाओ न ! मुझे माफ कर दो ! ‘‘इरफान रो-रोकर मिन्नतें करने लगा।
‘‘नहीं इरफान ! तुमने मुझे तलाक़ दिया है।मैंने और मेरे खुदा ने, दोनों ने सुना है। मैं कुरान से बँधी हुई हूँ। अब मेरा तुम्हारे साथ रहना नाजायज़ है। एक  रात में  तुमने तो मेरी दुनिया ही लूट ली।” रोती हुई अनारा जाने को हुई तो अचानक  इरफान ने आँखें पोंछते हुए कहा- ‘‘सुनो ! काजी के पास चलते हैं। वही कोई रास्ता निकालेंगे।’’
नजरें उठाकर अनारा ने इरफान  की तरफ देखा। इरफान की आखों में शर्मिंदगी तो थी ही, गुज़ारिश भी थी। बच्चों का प्यार था या इरफान से लगाव या फिर तलाक़शुदा औरत होने की कै़फियत का अहसास। पता नहीं क्या पर अनारा ने उसकी बात मान ली। बच्चों को बगलवाली ख़ाला के पास छोड़कर दोनों मियाँ- बीवी क़ाज़ी के पास आ गए।

काजी कह रहा था। ‘‘ठीक है न, इरफान मियाँ !कल अनारा बेगम का निकाह गुलफाम से करा देते हैं ‘‘हलाला’’ हो जाने के बाद यह फिर से तुम से निकाह कर सकेगी।’’ क़ाज़ी  की आवाज से इरफान अपनी सोच से बाहर आया जैसे किसी ने चिकोटी  काटी हो।

इरफान और अनारा एक दूसरे की तरफ देखने लगे उनके  चेहरों पर  बेबसी थी,पश्चाताप था, दुख था  ... और  ...और थे कई प्रश्न चिह्न ??? इरफान  ने सोचा  भी न था शराब, गुस्से और ज़िद्द के नशे में दिया गया ‘तलाक़‘ ये रंग  दिखाएगा।
अनारा के कानों में गुँजने लगे क़ाज़ी के कहे लफ्ज़ ‘‘हलाला...हलाला ....हलाला ......’’ और आँखो के आगे घुमने लगी हलाला होने की प्रक्रिया...निकाह होने के एक महीना बाद, जब वो महीने से होगी तभी उसका दूसरा पति अपनी इच्छानुसार उसे तलाक़ दे सकता है। अगर वो इंकार कर दे तो....अगर वो पेट से हो जाए तो.....अगर वो इरफान से ज्यादा पीने वाला हो तो....अगर वो मेरे बच्चों के साथ ज्यादती करे तो....तो..तो...तो...   !!! इस ‘तो’ से उसका सिर चकराने लगा! उसे लगा कि उसके बदन पर बहुत सारे साँप एक साथ लिपट गए हो। औरत होना तो कोई गुनाह नहीं। बीवी होना तो कोई गुनाह नहीं। मुहब्बत करना तो कोई गुनाह नहीं।
और हाँ ! अपनी मर्जी बताना भी कोई गुनाह नहीं।
अचानक होश आया हो जैसे, बंद पड़ा ताला खुल पड़ा हो अचानक जैसे, अनारा उठ खड़ी हुई झटके से। नहीं, ये शब्द  ‘हलाला’ उसके नाम के साथ नहीं जुड़ेगा।
इरफान, क़ाजी और क़ाजी का बेटा अनारा को जाते देखते -से रह गए।

संगीता कुजारा टाक, 
राँची, मो. 9234677837