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कहानी
April 5, 2020 • रामेश्वर शर्मा

 

एक टुकड़ा सुख

यह शनिवार की शाम थी। यूनिवर्सिटी में उसकी क्लास दोपहर के पहले ही खत्म हो गयी थी। और वह जल्दी ही अपने फ्लैट में लौट आया था। लंच के बाद थोड़ी टी.वी. देखने के बाद उसने सोने की कोशिश की लेकिन नींद नही आयी। कुछ मन भी उदास लगा। अतः उस दिन वह जल्दी ही माल की तरफ आ गया। शाम को वह अक्सर माल रोड पर आता था। शिमला में उसे दो-चार साहित्यकार मित्र जानने लगे थे। कभी एक दो लोग मिल जाते तो वह उनके साथ काफी हाउस में जा बेठता। थोड़ी राजनैतिक या साहित्यिक चर्चा होती। फिर वह अपने फ्लैट की ओर लौट आता। कोई नहीं मिलता तो रिज या माल रोड पर एक दो चक्कर अकेला ही लगता। शाम काटने का उसका यही ढंग था।
आज क्योंकि वह जल्दी ही माल आ गया था। अतः अभी किस मित्र के मिलने की उम्मीद नहीं थी। इसलिये वह अकेले ही आशियाना में कॉफी पीने बैठ गया। आशियाना के शीशों की बड़ी-बड़ी खिड़कियों से रिज पर घूमते हुए तरह-तरह के टूरिस्टस देखना उसे अच्छा लगता था। पहाड़ी वेशभूषा में पहाड़ों की चोटियों की बैक ग्राउन्ड के साथ फोटो खिचाते हुए नवविवाहित जोड़े या घोड़ों पर राइड्स लेते हुए रंग बिरंगी पोशाक वाले बच्चे और इन सबके बीच ही बैंच पर बैठकर मूंगफली खाते कुछ स्थानीय लोग उसे काफी आकर्षित करते थे। आज भी कॉफी आर्डर करके वह ऐसे ही कुछ दृश्य देख रहा था जब उसकी नजर ली पर पड़ी।
ली जीन्स और टी-शर्ट पहने कंधे पर छोटा सा बैग लटकाए हुए कुछ बेपरवाह सी स्कैंडल पोइन्ट की तरफ चली जा रही थी। ली को उसने आज करीब पाँच साल के बाद देखा था। फिर भी उसे उसकी शक्ल सूरत में ज्यादा बदलाव नहीं लगा। ली से पिछले दिनों में उसका संपर्क भी न के बराबर ही था। फिर भी वह वेटर से कॉफी के लिये थोड़ा रूकने की कहकर ली से मिलने के लिये आशियाना से बाहर आ गया।
कहानी को आगे बढ़ाने से पहले ली और उसका संक्षिप्त परिचय । ली का पूरा नाम सरली था लेकिन सब उसे ली के नाम से ही जानते थे। ली से वह करीब दस साल पहले मिला था। वह उन दिनों लखनऊ यूनिवर्सिटी से पी-एच0डी0 कर रहा था। ली के पापा उन दिनों यूनिवर्सिटी के इंगलिश विभाग के हैड थे और वह उन्हीं के निर्देशन में पी-एच0डी0 कर रहा था। उसे अपने माँ-बाप की ज्यादा याद न थी। वह मामा-मामी के पास रहकर ही छोटे से कस्बे में पला बढ़ा हुआ था। मामा-मामी के पास रहकर बी0ए0 करने के बाद वह लखनऊ आ गया था और उसने टयूशन आदि करके यूनविर्सिटी से ही एम0ए0 किया था। फिर एक प्राइवेट स्कूल में टीचिंग करने के साथ ही पी-एच.डी. कर रहा था। वह एक साधारण सरल व्यक्ति था। उसकी जिन्दगी में न कोई खालीपन था न कोई बड़ी महत्वाकांक्षा।
ली के पापा उसकी निद्र्वन्द्वता से प्रभावित थे और इसीलिये वह उससे थोड़े इनफॉरमल भी हो गये थे। कभी-कभी वह गाइडेंस के लिये ली के पापा के पास उनके घर भी चला जाता था। ली की माँ नहीं थीं। ली और उसके पापा अलीगंज के अपने बंगले में रहते थे। साथ में एक आया थी जो कुकिंग और घर की देखभाल के साथ ली की देखभाल भी करती थी। एक ड्राइवर था जो दिन में गाड़ी चलाता और रात को बंगले के बाहरी हिस्से में बहैसियत चैकीदार रहता था। प्रोफेसर साहब के पास ज्यादा लोगों का आना जाना न था। इसीलिये कभी-कभी आने से ही वह ली और उसके पापा के साथ काफी घुल मिल गया था। कभी-कभी वह ली की उसके नोट्स आदि बनाने में भी मदद कर देता था। धीरे-धीरे ली उसके काफी करीब आ गई थी। उन दोनों के बीच एक ऐसा रिश्ता बन गया था जिसे न ठीक ढंग से परिभाषित किया जा सकता था और न ही दोनों में से किसी ने इस रिश्ते के बारे में सोचने समझने या जानने बताने की जरूरत समझी।
इसी बीच प्रोफेसर साहब को एक माइल्ड सा हार्ट अटैक हुआ। समय पर उपचार और ठीक सी देखभाल से प्रोफेसर साहब ठीक तो हो गये लेकिन मन में भविष्य के प्रति थोड़ी सी चिन्ता और आशंका जरूर जाग्रत हो गई और अगली गर्मी की छुट्टियों में उन्होंने एक उचित सा घर परिवार देखकर ली की शादी कर दी। ली तब तक एम.ए. कर चुकी थी। ली के ससुराल जाने के बाद भी वह प्रोफेसर साहब के पास आता रहता था। यहाँ तक कि अधिकांशतः वह प्रोफेसर साहब के घर ही रूक जाता था। ली ससुराल से नियमित रूप से अपने पापा की कुशल क्षेम पूछती रहती थी और समय मिलने पर कुछ समय के लिये लखनऊ भी आ जाती थी।
ली ने अपने पति या ससुराल के बारे में उसे कभी कुछ न बताया और न ही उसने कभी कुछ पूछा। अलबत्ता उसे स्वयं ही कभी-कभी यह अहसास जरूर हुआ कि ली अब उतनी निक्षल और निरर्दवद न रह गयी थी। दो साल इसी तरह बीत गये। उसकी पी-एच0डी0 पूरी हो चुकी थी और वह किसी अच्छी नौकरी की तलाश में था। इसी बीच प्रोफेसर साहब को एक बार फिर दिल का दौरा आया और इस बार वह दुनिया को अलविदा कह गये। ली तब अपने पति के साथ लखनऊ में ही थी। फिर कुछ दिन वहीं ठहर कर और बंगले का इन्तजाम करके अपने पति के साथ ससुराल लौट गई। वह अभी लखनऊ में ही था और कोई काम चलाऊ नौकरी कर रहा था। इस बीच उसके मामा-मामी ने किसी संबंधी की पुत्री मीता के साथ उसकी शादी करा दी थी। मीता के पिता किसी अच्छी सरकारी पोस्ट से रिटायर हुए थे और इलाहाबाद में सैटिल्ड थे। मीता उनकी एक मात्र संतान थी। मीता और उसके माँ-बाप की इच्छानुसार वह भी उनके साथ इलाहाबाद में ही रहने लगा। मीता और उसके माता-पिता काफी शिष्ट और अनुशासित व्यक्ति थे। कभी-कभी उसे लगता था कि मीता और उसके परिवार के साथ उसके संबंधों में वह स्वक्षंदता न थी जो वह ली और प्रोफेसर साहब के साथ महसूस करता था। ली कभी-कभी टेलीफोन पर उसके हाल चाल पूछ लेती थी।
इसी बीच करीब दो साल पहले शिमला यूनिवर्सिटी में उसे एक नियमित और अच्छी एसाइनमेंट मिल गई और वह इलाहाबाद छोड़कर शिमला आ गया था। मीता अपने माता-पिता के साथ इलाहाबाद में ही रहती थी और कभी-कभी शिमला आ जाती थी। छुट्टियों में वह भी इलाहाबाद चला जाता था। इस बीच ली के फोन कुछ ज्यादा अन्तराल के बाद आने लगे थे। हाँ, ली ने एक बार इतना जरूर बताया था कि वह अन्तिम रूप से अपना ससुराल छोड़कर लखनऊ वापस आ गयी है और दो मेडस के साथ लखनऊ में ही अपने पुराने बंगले में रह रही है। ली ने इस बारे में कोई वजह न उसे बतायी न ही उसने पूछा था। हालांकि ली ने बाद में इतना जरूर बताया था कि उसने पति के साथ सहमति से तलाक ले लिया था और लखनऊ रहने का फैसला कर लिया था। ली ने ऐसी कुछ उत्सुकता न जताई थी कि इस बारे में वह कुछ ज्यादा जाने या पूछताछ करे। वह खुद भी कुछ ज्यादा न पूँछ सका था न ही कुछ कह सका था। धीरे-धीरे ली से फोन कॉल का संबंध भी औपचारिक मात्र रह कर अन्त में लगभग समाप्त ही हो गया था। और इसके बाद वह अचानक आज रिज पर दिख गयी थी।
ली उसे सामने देखकर एकदम चैंक गई। ‘‘अरे, तुम यहाँ। तुम तो इलाहाबाद में सैटिल्ड हो गये थे, यहाँ कैसे?’’ ‘‘पूछना तो मैं भी यही सब चाहता हूँ पर चलो, यदि तुम एक दम व्यस्त न हो तो आशियाना में बैठकर कॉफी पीते हैं और तुमसे कुछ बातें भी कर लेंगे’’ ली की सहमति पर वह उसे लेकर आशियाना वापस आ गया और वेटर को कॉफी के लिया इशारा किया। तभी ली ने कहा कि वह दूर से चलकर आयी है और कॉफी के साथ कुछ खाने को भी लेगी। उसे लगा कि ली फिर से उतनी ही इनफॉरमल हो गयी थी जितनी वह पहले होती थी। उसने कॉफी के साथ ली की इच्छानुसार कुछ सैंडविज भी मंगा लिये।
पहले ली ही बोली ‘‘मेरी कहानी बहुत छोटी है इसीलिये मैं ही शुरू करती हूँ। इतना तो तुम जानते हो कि डायवोर्स के बाद मैं लखनऊ आ गयी थी। वहीं इग्नयू से जरनलिज्म में डिग्री हासिल की। बंध के नौकरी मैं कर न पाती। आजकल कुछ टी.वी. चैनल के लिये कान्ट्रेक्ट बेसिस पर कुछ स्टोरीज करती हूँ और चैनल्स को दे देती हूँ। यहाँ थ्रिल भी है और पैसा भी। कभी-कभी कुछ एडवैन्चर्स भी हो जाता है। ऐसे ही चल रहा है। आज भी नाथपा झाकड़ी प्रोजेक्ट पर एक रिपोर्ट बना कर लौटी हूँ। अपना सामान होटल में छोड़कर शिमला घूमने निकली थी। कल सन्डे शिमला में ही कहूंगी और सोमवार की सुबह ट्रेन से दिल्ली को निकलूंगी। शिमला में कोई और एन्गेजमेंट नहीं है अच्छा है तुम मिल गये।’’

‘‘बस, कुछ और नहीं बताओगी’’ उसने पूछा।


‘‘अपनी कहो। मेरे पास ज्यादा कुछ कहने को नहीं है। शादी के बाद मैंने जिन्दगी को गम्भीरता से समझने की कोशिश जरूर की। लेकिन सब कुछ उलझा उलझा सा लगा, जिन्दगी बिल्कुल मेरे समझ में नहीं आयी। डायवोर्स के बाद इतना समझ लो कि मैं डे टू डे बेसिज पर इन्सटैंट लाइफ जी रही हूँ। जेसा जीवन जिस पल मेरे सामने होता है उसे पूरी तरह जी लेती हूँ। न कुछ याद करने के लिये बचाती हूँ न कुछ भविष्य के लिये सहेजती हूँ। न कल के लिये कोई योजना, न आज के लिये कोई प्रसन्नता या पाश्चाताप।’’ इतना कहकर ली कॉफी सिप करने लगी।
अब उसे बोलना ही था। “मेरे पास तो तुम्हें बताने के लिये शायद इतना भी नहीं है। तुम जानती हो मेरी लाइफ शुरू से ही ईवेन्टलेस रही है। अब भी कुछ नही बदला। मीता मोस्टली इलाहाबाद ही रहती है। छुट्टियों में मैं भी चला जाता हूँ। कभी-कभी मीता भी दो-चार दिन के लिय शिमला आ जाती है। यूनिवर्सिटी के साथ ही रेजीडेंस मिला है। वहीं रहता हूँ। घर की साफ-सफाई और खाने-पीने का प्रबंध करने के लिये कैजुअल हैल्प है। कभी-कभी यूनिवर्सिटी की कैन्टीन या माल के किसी रेस्टोरेन्ट में खा लेता हूँ। दिन में यूनिवर्सिटी और लाइब्रेरी। शाम को कभी-कभी माल पर आ जाता हूँ। दो-चार साहित्यकार दोस्त हैं कभी-कभी मिल जाते हैं तो गपशप नहीं तो माॅल और रिज पर एक दो चक्कर और घर वापसी। बताने लायक जिन्दगी में कोई और बदलाव नहीं।’’ यह कहकर वह चुप हो गया। बात ली ने ही आगे बढ़ाई। ‘‘तुम तो बिल्कुल वैसे ही हो जैसे लखनऊ में थे देखों मैं कितना बदल गयी इस बीच। अच्छा छोड़ो, और हाँ, अगर तुम्हारे पास व्यवस्था हो तो मैं तुम्हारे साथ ही ठहरना चाहूँगी। कुछ पुरानी बाते करेंगे। अकेले रहना मुझे वैसे भी सुखकर नहीं लगता।’’
कॉफी खत्म होते ही उसने कहा ‘‘मेरे घर में दो बैड रूम हैं। तुम आसानी से मेरे साथ रह सकती हो लेकिन होटल जैसी सुविधायें तुम्हें वहाँ नहीं मिल पायेंगी। चाय में खुद बनाऊँगा और डिनर बाहर से मंगा लेंगे।’’
उसे पता था कि ली को उन सब चीजों से ज्याद फर्क नहीं पड़ता और न ही वह इन सब पर सोच-विचार कर सकती थी सो वे कॉफी खत्म करके, ली का सामान होटल से उठाकर यूनिवर्सिटी वाले फ्लैट में ले आये। जब तक ली वाश रूम से फ्रेश होकर चेंज करके वापिस आयी उसने बालकनी में दो चेयर रखकर आज का अखबार पलटना शुरू कर दिया था। ली के लौटने के बाद अखबार उसे थमाकर वह चाय के दो कप लेकर ली के साथ आकर बालकनी में बैठ गया। चाय खत्म करने के बाद, बात फिर ली ने ही शुरू की।
‘‘देखो बालकनी में बैठकर डूबते सूरज को तकते रहना अब मेरा शाम काटने का ढंग नहीं रहा। इस तरह की आदतें अब मेरे लिये बेमानी हो चली है। उम्र के इस पड़ाव पर मैं कोई पल इस तरह की फिजूलखर्ची में जाया नहीं कर सकती। तुम्हारे पास कुछ बीयर या व्हिस्की है। मैं कुछ संजीदा बात करना चाहती हूँ। और इसके लिये जरूरी है कि मैं पहले सच बोलने की ताकत जुटाऊँ। दिनभर मुखौटे लगाकर जीने में हम इन मुखौटों को अपना असली रूप समझने लगते हैं और उन्हीं मुखौटों की तरह हम बिहेव करने लगते हैं। ये मुखौटे हमें अपने से बहुत दूर ले जाते हैं। सच बोलने के लिये मैं इन मुखौटों को उतारना चाहूँगी अपने मूल स्वरूप में आने के लिये, इन मुखौटों को भूलकर। आइ वुड लाइक टू ड्रिंक’’।
ली को जितना वह जानता था, उसे ली की इस डिमांड पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ। ली कभी-कभी इसी तरह अनप्रिडिक्टेवली बिहेव करती थी। उसने कहा ‘‘तुम जानती हो मैं टी टोटलर हूँ। लेकिन आने जाने वाले दोस्तों के लिये कुछ एमरजेंसी स्टाक है, उसी शर्त पर कि मैं तुम्हें कम्पनी कोक से ही दे पाऊँगा।’’ ली थोड़ा सा मुस्कराई ‘‘नैवर माइंड’’ कहकर। उसने टेबिल पर ली के लिये बीयर की बोतल और ग्लास रख दिया। थोड़ी देर तक ली बीयर पीती रही। आँखे करीब-करीब मूंद कर जैसे ध्यान मग्न हो। वह भी धीमे धीमे कोक सिप करता रहा।
दो ग्लास बीयर पीने के बाद ली कुछ संयत हुई और बोली “देखो माइंड मत करना। अतीत पर पश्चाताप, भविष्य के नियोजन की ऊहापोह में मैंने काफी जिन्दगी व्यतीत की। मैंने कभी अपने वर्तमान से साक्षात्कार ही नहीं किया। अब अतीत हो या भविष्य, उसकी सार्थकता हमारे लिये उसके वर्तमान होने के पल से ही होती है। अतः जो लोग वर्तमान में नहीं जी पाते वे जीवन को सिर्फ दर्पण की परछाई की तरह पकड़ने में लगे रहते हैं। इसी बिंब और दर्पण की दूरी कम करने में लगी रही मैं। अब जब मुझे जीने की समझ आयी है तो मैं जीवन के लम्हों को टुकड़ा-टुकड़ा जीने में यकीन करने लगी हूँ मैं। जब किसी वर्तमान के पल से मेरी जिन्दगी के किसी अंश से मुलाकात हो जाती है तो मैं उस पल को पूरी आस्था और समर्पण के साथ जीने की ललक रोक नहीं पाती। तुम इसे मेरा भटकाव कहो या न बंध सकने की उदंडता, मेरे लिये मेरे जीवन की यही नियति है और यही परिणिती।
अक्सर ऐसा भी होता है कि हम जिन्दगी के लिये छटपटाते रहते हैं और जब जिन्दगी हमारे ठीक सामने होती है तो हम कतरा के निकल जाते हैं। कोई नैतिक मूल्य, कोई सामाजिक 
बंधन या धार्मिक आस्था हमें जिन्दगी के उस रूप से नहीं जुड़ने देती जिसके लिये हमने बरसों जग कर रातें काटी हों। मैंने अब अपने आपको इन सब बंधनों से मुक्त कर लिया है।
आज की तुमसे मुलाकात को ही लें, मेरे लिये यह
महत्वपूर्ण नहीं कि इतने दिनों तुमने क्या किया या कि हमनें क्यों इतने दिनों एक दूसरे के बारे में जानने की उत्सुकता नहीं जताई। मेरे लिये सिर्फ यह महत्वपूर्ण है कि अचानक मेरे मिलने पर तुम्हारे मन में कितना उत्साह जगा या थोड़ा सा समय मेरे साथ बिताकार तुम्हें कितनी खुशी मिली या मैं इस छोटे से समय में तुम्हें कितना पा सकी या फिर मैं तुम्हें कितनी देर तक अपने ऊपर केन्द्रित कर सकी। किसी का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करना मुझे उस पल को जीने की ऊर्जा देता है।’’
‘अरे तुम तो अब दार्शनिक भी हो गयी हो’ उसने बड़े सहज भाव से कहा। ली फिर थोड़ी सी संयत हुई और बोली ‘अरे नहीं, जीवन को जैसा भोगो और समझो, उसे उसी रूप में व्यक्त कर देना यदि दर्शन की परिभाषा में आता है तो तुम मुझे दार्शनिक भी कह सकते हों। वैसे मैंने सिफ अपने को व्यक्त करने में बनावट और दिखावट को अलग किया है। तुम्हें शायद अहसास न हो कि जब तुम पर किसी का ध्यान केन्द्रित न हो, जब तुम किसी को प्रेरणा और आकर्षण का केन्द्र न हो तो जीवन कितना बेमानी और महत्वहीन हो जाता है। जीवन सिर्फ दाल रोटी पर जिन्दा नहीं रहता। किसी का साहचर्य, किसी की संवेदना, किसी का समर्पण, किसी का अपनापन हमारे जीवन में क्या महत्व रखते हैं। अगर ऐसा न होता तो मैं तुम्हारे एक रस्मी इनवीटेशन पर तुम्हारे साथ रात गुजारने न चली आती। मेरे रहने खाने का बन्दोबस्त तो मेरे चैनल वालों ने कर ही दिया था।
देखो आदमी न यथार्थ पर जीता है न सपनों पर। यह सब कहने की बाते हैं। आदमी सिर्फ जीता है और हर हाल में जीता है। कहने को चाहे कोई कुछ भी कहे आदमी की जीने की लालसा कभी मरती नहीं। उन लोगों में भी नहीं जो पहाड़ से छलांग लगाते हैं या समुन्दर में कूद जाते हैं। वह लोग भी जीने का मोह छोड़ नहीं पाते जिनके जीवन के मूल्य व्यवहारिक गणित के अनुसार शून्य हो चुके हैं। भार उठाकर भी आदमी चलना चाहता है। सच पूछो तो मैं भी जीना चाहती हूँ। मेरी जीने की लालसा अभी मरी नहीं है।’’
‘‘तो फिर तुमने दूसरी शादी क्यों नहीं की’’ उसने थोड़ा सा सकुचा कर पूछा।
इस बार ली कुछ उत्तेजित हुई और कहा “फिर वही दकियानूसी सवाल? शादी तुम्हे एक अधिकार देती है। शादी में अधिकार वश मिले साहचर्य और समर्पण में देने वाले की भावनायें शामिल हो भी सकती हैं और नहीं भी। शादी द्वारा प्रदत्त साहचर्य और समर्पण में यदि देने वाले की भावनायें सम्मिलित भी हों तो भी पाने वाले के मन में ये आशंका तो निरंतर बनी ही रहती है कि यह समर्पण सिर्फ एक नैतिक, सामाजिक या जीव वैज्ञानिक उत्तरदायित्व का परिपालन मात्र ही न हो। और ऐसी आशंकाओं के चलते, चाहे वह निरमूल ही क्यों न हों, न तुम इस समर्पण को पूरी तरह जी सकते हों न तुम्हें वह आश्वस्ति मिल सकती है जो जीवन की सबसे बड़ी सुरक्षात्मक आवश्यकता है। तुम शायद मेरे सैंस ऑफ परफेक्शन से पूरी तरह परिचित हो। एक बूंद भर रिक्ति भी मुझे असहज कर देती है। ऐसी किसी आशंका को जीवनभर ढ़ोने के लिये मैं कभी अपने आप को तैयार न कर सकी।
और फिर, किसी को चाहने के लिये एक कंवारी मानसिकता की जरूरत होती है। उम्र के साथ-साथ हमारी यह मानसिकता प्रदूषित और कलुषित होती जाती है। और इसी के साथ हमारी किसी को चाहने की शक्ति भी कुंठित होती जाती है। उम्र के इस पड़ाव पर हम किसी को भोग तो सकते हैं, चाह नहीं सकते। याद है मुझे हार्डी पढ़ाते समय जब कभी तुम्हारी उंगलियाँ अनायास मुझे छू जाती थीं तो मन कैसा कैसा हो उठता था। मैं सारी रात उस स्पर्श को जीती रहती। अगले कुछ दिनों तक वह स्पर्श मैं अपने अन्दर समाये रहती जब तक ऐसा ही कुछ फिर न हो जाता। कितनी मासूम थी वह भावनायें, कितने कच्चे थे वह सपने? और आज जब मैं पूर्ण स्वतंत्र हूँ और तुम्हारे कंधों पर सिर टिका कर बीयर पी रही हूँ तो भी मैं अपने को उद्देलित महसूस नहीं करती। न मेरे अन्दर कोई हलचल है न आन्दोलन। सिर्फ तुमें इतने दिनों बाद मिलने की एक हल्की सी खुशी। जीवन के लम्बे अंतराल में एक लम्हें को तुम्हें पाने और बटोरने की एक आकांक्षा। उससे आगे कुछ नहीं। छोड़ो, तुम नहीं समझ सके ये सब न उस समय, न अब समझ पाओगे। नारी हृदय की कोमलता देखने समझने की चीज नहीं। इसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। इसीलिये मैंने शादी जैसे बंधन में दुबारा उलझना नहीं चाहा। मैं उनमुक्त जीवन देख चुकी थी जो मुझे भा भी गया था। जो मिल गया, पा लिया। कोई बंधन नहीं, कोई उत्तरदायित्व नहीं।
हमारे जीवन की संरचना में इतना महत्व उन चीजों का नहीं होता जो हमें प्राप्त हैं, जितना उनका जो हमें नहीं मिल पाती। ठीक है हमारे वाह्यस्वरूप का निर्माण तो उन्हें भौतिक सुविधाओं और उपलब्धियों पर निर्भर करता है जिन्हें हम प्राप्त कर पाते हैं। लेकिन हमारे मन में तो हमेशा उसी की कमी खटकती रहती है जिसे हम चाह कर भी पा नहीं पाते। हमारा अन्तरमन हमारे अपने बाहय से ज्यादा महत्वपूर्ण ही नहीं, अपितु हमारा ज्यादा निजी और अपना भी होता है। अन्तर मन को न कोई देख सकता है न छू सकता है। अतः यहाँ हम अपने आप को ज्यादा ईमानदारी और सच्चे मन से प्रस्तुत करते हैं। इसी लिये हमारा अपना अन्तरमन हमारे अपने व्यक्तित्व पर ज्यादा हावी हो जाता है।
मैं जानती हूँ तुम मीता के साथ सुखी हो, शायद संतुष्ट भी। लेकिन मैं यह भी जानती हूँ कि मीता का वैभव, उसकी सामाजिक मान्यताओं ने उसके ओढ़े हुए शिष्टाचार की परिधियों ने तुम्हारे मन की स्वच्क्षंदताओं को कहीं न कहीं से घेर भी रखा है। तुम्हारे अन्तर की स्वच्क्षंदताओं के इस गिरवीपन में तुम्हें अप्राकृतिक रूप से शिष्ट और संयत बना दिया है। कैसे जीते हो इतने नियमित और अनुशासित हो कर? इधर मेरे मन के खालीपन ने मुझे बिल्कुल भी असंयत और उच्छनखल बना दिया है। मैं सबके लिये सहज सुलभ हो कर रह गयी हूँ। सच पूछो तो मैं किसी की भी नहीं हूँ सिवाय अपने के। इसीलिये मैं इतनी अकथनीय असहज और अनप्रीडिक्टीबल हो चली हूँ। मैं वक्त को लमहों में जीती हूँ। वक्त का जो टुकड़ा मेरे सामने होता है मैं उसी में जीती हूँ उसी से मेरा सरोकार होता है। मैं वक्त या किसी स्थिति पर अपना आधिपत्य नहीं चाहती। वक्त का वह हिस्सा ही मेरा जीवन होता है जो मेरे सामने होता है। जिसे मैं पूरी शिद्दत से जी रही होती हूँ।
ऐसा मत सोचना कि अगली शाम मैं आज के तुम्हारे इन सानिन्धय के अनुभव को बार-बार जीने में बिताऊँगी। कल मैं एक नया जीवन जीऊँगी। आज से असंप्रक्त तुम से विरक्त। ऐसा मत सोचना कि मैं रीत चुकी हूँ। सिर्फ मेरे लिये अपने को उडेलने के ढंग बदले हैं। रही आज की बात, शाम गहरा चुकी है। तुम्हें भी एक स्वक्षंद और निरद्र्वन्द सुख की जरूरत है जिसे तुम चाहकर भी कभी ढूँढ न सके । मुझे भी तलाश है एक स्वतंत्र और उन्मुक्त पूर्ण सुख की, भले ही वह अस्थायी हो। रास्ते और ढंग अलग-अलग होने पर भी हमारी सब की चाह एक ही होती है। पूर्ण सुख, एब्सोल्यूट ब्लिस। सही क्या है गलत क्या है इस विवाद में उलझना समय और जीवन दोनों के साथ छलावा है। सच में तो यह सुख की पूर्णता पर ही प्रश्नचिन्ह है। बतौर समझौता तुम थोड़ा सा अपने आप को लचीला बनाओ। थोड़ा सा मैं अपने आप को अनुशासित करती हूँ। चलो हम एक साथ ही एक ही समय में अपने अपने ढंग से एक दूसरे में अपने-अपने सुख का हिस्सा तलाश करते हैं।’’
और इसी के साथ ही ली का चेहरा कंधे से लुढ़ककर उसके सीने पर आ गया।

-रामेश्वर शर्मा, आगरा, मो. 7042068926