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कलीलो दमना
September 15, 2020 • अनुवाद: नासिरा शर्मा • पुस्तक

कलीलो दमना : वास्तव में कलीले व दमने पंचतंत्र की कहानियां हैं जो अनु शेरवाने सासानी के समय में बरजबिए तबीब के द्वारा भारतवर्ष से ईरान गई थी और संस्कृत से पहलवी भाषा में अनुवाद हुईं फिर पहलवी से अब्दुला-बिन अल-मुक़फा ने अरबी में अनुवाद किया। बिखरी हालत में मिलती हैं। फिर ईरान के प्रसिद्ध कवि रूदकी ने फारसी काव्य में इसे अनुवाद किया। फिर छटी सदी के आरम्भ में इसे अबुल उदसे फारसी गद्य में मोहम्मद बिन अब्दुलहमीद मुंशी ने अनुवाद किया। यह अनुवाद बड़ा जनप्रिय बना, फिर यह सिलसिला चल पड़ा कि हर बादशाह अपने काल में पंचतंत्र (कलीले व दमने) की कहानियों को थोड़ा घटा-बढ़ाकर अपने नाम से छपवाता। इस तरह से इस पुस्तक को अनेक नाम मिले।

कलीलो दमना के कई अध्याय हैं। जिस में से एक ख़ुद बरजुए तबीब ने अपने बारे में लिखा है। बाद में किस्से हैं जो जानवरों व परिन्दों के हैं। कलीलो दमना नसरूल्लाह के अनुसार सोलाह अध्याय हैं जिस में से दस हिन्दुस्तान से और बाकी छह ईरानियों द्वारा बढ़ाए गए हैं।

पानी की बूंदे

एक व्यापारी था जिसके पास ढेरों भेड़ें थीं जिनकी देखभाल के लिए उसने एक आदमी को नौकर रख लिया। यह नौकर बहुत सीधा-साधा, ईमानदार आदमी था। वह दिन भर भेड़ों को चराता और जितना भी दूध दुहता उसको बड़ी ईमानदारी से अपने स्वामी के पास ले जाता। दूध की भरी बाल्टियों में वह व्यापारी पानी मिलाता और फिर बेचने के लिए कहता। यह रोज़ का मामूल था।

बेचारा नौकर यह देखकर दुखी होकर एक दिन बोला, “स्वामी! इन्सानों के साथ यह काम न करो!! यह अमानत में ख्यानत करना है। ऐसा करने वाला मरने के बाद कष्ट झेलता है।"

धर्मभीरू नौकर की बातों से उसके कान पर जूं न रेंगी और वह बराबर दूध में पानी मिलाता, दोनों हाथों से पैसे बटोरता हुआ सुखी जीवन बिता रहा था। इत्तफाक से एक दिन नौकर उन भेड़ों को चराता हुआ दूर निकल गया, लौटते-लौटते अंधेरा होने लगा। नौकर ने वहीं ठहर कर एक सूखी बरसाती नदी में भेड़ों को बिठा दिया और स्वयं एक चट्टान पर चढ़ कर सो गया।

वसंत ऋतु थी। एकदम से काले-काल बादल घिर आये और मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। और इतनी तेज़ लगातार बारिश की चोटों से बेचारी भेड़ें परेशान हो गईं और सूखी नदी में बाढ़ आ गई। पानी ढाल होने के कारण तेज़ी से ऊपर से नीचे की ओर बहने लगा और अन्त में भेड़ें डूब कर मर गईं। सारी रात बारिश होती रही। सुबह को जब वह नौकर अपने मालिक के पास गया तो उसके हाथ खाली देख कर मालिक ने प्रश्न किया, "क्या बात है? आज दूध क्यों नहीं लाए?" नौकर ने जवाब दिया, 'स्वामी! मैं सदा आपको दूध में पानी मिलाने से मना करता था पर आपने मुझ नादान की बातों पर ध्यान न दिया और बराबर अमानत में ख्यानत करते रहे। कल रात वह सारा पानी जो आपने दूध के दाम से लोगों के हाथों बेचा था, जमा होकर बारिश बन कर भेड़ों पर बरस पड़ा और सबको बहा ले गया। कलील दमने

अनुवाद: नासिरा शर्मा, नई दिल्ली, मो. 9811119489