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कर्मभूमि एवं अन्य उपन्यासों के वातायन से प्रेमचंद      
July 23, 2020 • आरती स्मित • साहित्य नंदनी


आरती स्मित, दिल्ली,
मो. 8376837119 

समय जब-जब करवट बदलता है, परिस्थितियाँ जब- जब  वेगवती होती हैं, इतिहास जब-जब कुछ नया रचने की माँग करता है, एक युगपुरुष पैदा होता है जो संक्रांत क्षणों को इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षरों से लिख जाता है और छोड़ जाता है अमिट छाप अपनी.... कालजयी हो जाता है। और आधुनिक हिंदी भाषा-साहित्य के इतिहास में भारतेन्दु हरिश्चंद्र, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के पश्चात  यदि कोई नाम आता है तो वह है कथाकार प्रेमचंद का, जिन्होंने गद्य साहित्य को नया जीवन दिया।

प्रेमचंद हिंदी कथा  जगत का एक ऐसा नाम है जिसे 7-8 वर्ष के बच्चे से लेकर 95 वर्षीय वृद्ध भी जानते हैं, जिन्होंने उन्हें पढ़ा ही नहीं, अपने-अपने अनुसार गुनने-धुनने का भी काम किया है और निष्कर्ष भी सुनाया है... 'प्रेमचंद हमारे टाइप के लेखक हैं, उन्हें समझने के लिए बहुत दिमाग नहीं लगाना पड़ता'। तो क्या प्रेमचंद की सभी रचनाएँ इतनी सरल है कि उसमें कोई गूढ़ार्थ नहीं, किसी विमर्श की गुंजाइश नहीं, उनकी कृतियों से संदर्भित किसी मुद्दे पर बहस की आवश्यकता नहीं ? क्या  वह आम जनों की पीड़ा या प्रसन्नता व्यक्त करती आम जनों की भाषा शैली में लिखी गई सर्व सुलभ पुस्तक है जिसे कोई भी, कभी भी और कहीं भी पढ़ सकता है और उससे उतना ही जुड़ सकता है जितना कि पुस्तकालय के वाचनालय में सिर खपाते अनुसंधित्सु या रसज्ञ -मर्मज्ञ सुधी पाठक! 

प्रेमचंद एक शताब्दी के बाद भी पाठकों के उतने ही प्रिय हैं, यह सुखद है। और प्रत्येक पाठक अपनी अपनी भाव भूमि पर इस अनूठे रचनाकार के साथ तादात्म्य भी स्थापित कर लेता है चाहे वह किसी प्र्देश या आयु का हो, यह बात और भी अधिक आह्लादित करने वाली है, किंतु जब हम प्रेमचंद के उपन्यास की गहरी छानबीन न करते हुए भी, सतही तौर पर ही सही उनमें व्यक्त घटनाओं, स्थितियों-परिस्थितियों की गलियों से और पात्रों के व्यक्तित्व से गुजरते हैं तो न चाहते हुए भी परकाया प्रवेश की स्थिति उत्पन्न हो जाती है और फिर हम परिवार और  समाज से संबद्ध  मूलभूतमूर्त-अमूर्त  समस्याओं से रू-ब-रू होते हैं,  और न सिर्फ रू-ब-रू होते हैं, बल्कि उस संघर्ष की पीड़ा भी झेलते हैं क्योंकि यह दुखद है कि जिन मुद्दों को प्रेमचंद ने अपनी कहानियों और उपन्यासों में उठाया था, वे मुद्दे -- वे समस्याएँ आज भी प्रासंगिक है, इन सौ वर्षों में भी हम समाज से उन समस्याओं का अंत  नहीं कर पाए। समय बदला है, व्यवस्था बदली है,  स्थितियाँ-परिस्थितियाँ भी बदली हैं किंतु समस्याओं ने इतनी गहरी पैठ बना ली है कि वे आज भी सचेत समाज के लिए प्रासंगिक मुद्दे हैं।

प्रेमचंद साहित्य इतना विस्तृत और व्यापक विमर्श की माँग करता है कि एक साथ सब पर संवाद  कर पाने  की बात कहना नदी के किनारे की सैर करते हुए नदी की गहराई को मापने की बात जैसा अयथार्थ होगा। केवल उपन्यासों पर भी पूरी बात कह पाना कठिन है, किंतु इनमें से कर्मभूमि एवं अन्य उपन्यासों के वातायन से लेखक ,विचारक, चिंतक प्रेमचंद को टटोलने की का मेरा लघु प्रयास बालुका राशि ढोने को उद्धत गिलहरी तुल्य होगा ।  

'कर्मभूमि' स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रवाद से संदर्भित महत्वपूर्ण कृति है। वैचारिक दृष्टि से परिपक्व यह उपन्यास, प्रेमचंद के अन्य उपन्यासों से कई मामलों में भिन्न और विशिष्ट है। इसकी सर्वोपरि विशिष्टता यह है कि यह आद्योपांत स्वतंत्रता संग्राम के कथानक से संबद्ध है.... यही इसका केंद्रीय कथानक है। इसके साथ ही स्त्री विमर्श, जाति-भेद, छुआछूत, वर्ग-भेद, पूंजीपतियों की शोषक प्रवृति और शोषित वर्ग की पीड़ा, छात्र -मनोवृति, दलित आंदोलन, तलाक़ की समस्या, किसान-समस्या आदि -आदि कितने ही मुद्दे इस एक कृति में उठाए गए हैं, मगर इतने सहज भाव से उन्हें कथानक की मूल धारा में पिरो दिया गया है कि सब एक ही नदी की छोटी छोटी धाराएँ प्रतीत होती हैं। सभी मुद्दों पर एक-एक कर दृष्टि डालने से पूर्व यह कहना अपेक्षित जान पड़ता है कि वर्तमान समय में राष्ट्र के संदर्भ में राष्ट्रवाद की भावना का ह्रास अवश्य हुआ है, किंतु शेष सामाजिक- राजनीतिक समस्याएँ अधिक ज्वलंत मुद्दों के रूप में हमारे समक्ष खड़ी हैं और इसप्रकार इस उपन्यास का प्रासंगिक होना दुखद और कष्टदायी है।

उपन्यास का कथानक परिवार से शुरू होकर समाज और संपूर्ण राष्ट्र तक व्याप्तता है और छोटी-छोटी घटनाओं को उनमें इस तरह गूँथता चलता है, मानो हाथ से बुना स्वेटर! एक सिरा खुला तो सब मेहनत बेकार। लाला समरकान्त सवर्ण पूँजीपति वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिन्होंने धन एकत्र करने में जान लगा दी, और चाहते हैं कि बेटा अमरकान्त भी धन के माहात्म्य को समझे। प्रेमचंद ने बिन माँ के पले बेटे अमरकान्त के व्यक्तित्व को इस तरह ढाला है, जिसमें विमाता की निष्ठुरता और पिता की भावनात्मक उपेक्षा के कारण  तिरस्कृत, तृष्णाकुल और क्षुब्ध संतान की मन: स्थिति पनपती है; जिसके लिए पिता ही उसकी समस्त खुशियों का शत्रु है और पिता की छांव में रहना जेल में रहने के समान है। प्रेमचंद ने बड़ी ही बारीकी से इस पारिवारिक समस्या का मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया और उसे सफलतापूर्वक अपने उस समाज के समक्ष परोसा है जहाँ संतान को कुलंगार घोषित किया जाता है। बचपन की मन: स्थिति बढ़ती उम्र के साथ किस तरह पोषित होती है, उससे संबंध किस तरह प्रभावित होते है.... एक सामान्य व्यक्तित्व किस तरह अपने अंदर असामान्य व्यक्ति को जाने-अनजाने पालता-पोसता चलता है, इस पर प्रेमचंद की पैनी नज़र पड़ी, अन्यथा वे मुख्य पात्र को वात्सल्य रस से विहीन पात्र के रूप में चित्रित न करते।

‘'ज़िंदगी की वह उम्र, जब इंसान को मुहब्बत की सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, बचपन है।’'(113)

'दुनिया में सबसे बदनसीब बह है , जिसकी माँ मर गई हो' (113)    

आगे चलकर, वर्षों बाद मन्नू भंडारी का 'आपका बंटी' बाल मनोविज्ञान पर आधारित उपन्यास के रूप में आता है। लगभग 85-86 वर्ष पूर्व इस उपन्यासकार ने उस समस्या को छुआ, जिसपर कभी किसी ने सोचा नहीं; और न सिर्फ छुआ बल्कि संपूर्ण व्यक्तित्व पर उसके दुष्प्रभाव को रेखांकित कर दिया है। युवक अमरकान्त पिता से पैसे माँगकर विद्यालय की फीस भरने से बेहतर पढ़ाई छोड़ देना चाहता है, क्योंकि उस धनराशि पर उसे अपना अधिकार महसूस नहीं होता, वह उसे भीख मांगने के समान तुच्छ कार्य प्रतीत होता है :

'आत्मा की हत्या करके पढ़ने से भूखा रहना कहीं अच्छा है'।

प्रेमचंद पाठक के समक्ष यह प्रश्न रखते हैं कि क्यों एक संपन्न पिता का पुत्र ऐसी हीन भावना से ग्रसित है ? वे चाहते हैं कि समाज युवा मन की उस कुंठा की तह तक जाए और उसका मनोविज्ञान समझे जिसकी नींव परिवार के बड़ों के आचरण से बचपन में ही पड़ती है और दिनोंदिन मज़बूत होती जाती है। दूसरी पारिवारिक समस्या 'अनमेल विवाह' है। प्रेमचंद ने एक ओर 'निर्मला' के माध्यम से आयु के स्तर पर अनमेल विवाह के दंश को उभारा है जिसमें निर्मला का जीवन नर्क से बदतर हो जाता है,घर क्लेश का संघ बन जाता है :

'दुखी हृदय दुखती हुई आँख है, जिसमें हवा से भी पीड़ा होती है'

'दहेज हो तो सारे दोष गुण हैं'

'जब युवक वृदधा के साथ प्रसन्न नहीं रह सकता, तो युवती क्यों किसी वृद्ध के साथ प्रसन्न रहने लगी?'

'संसार के सारे नाते स्नेह के नाते हैं। जहाँ स्नेह नहीं वहाँ कुछ नहीं '          

अलग अलग घटनाक्रम में व्यक्त ये पंक्तियाँ भावनात्मक स्तर पर इतनी यथार्थ और सशक्त हैं कि संबंध-सार इन्हीं में मिल जाता है।

दूसरी ओर कर्मभूमि में वैचारिक और भावनात्मक स्तर पर अनमेल विवाह के दंश को रेखांकित किया है। अपने घर में नाज़ों पली सुखदा 'बोल्ड' है। पूँजीपति मानसिकता के साथ पली- बढ़ी होने के कारण उसे ससुर समरकान्त गलत नज़र नहीं आते, उसे पति अमरकान्त में ही दोष दिखता है जो पिता के प्रति ऐसी भावना रखता है। सुखदा और अमरकान्त दोनों समृद्ध परिवार के होने के बावजूद दोनों की परवरिश का अंत: वातावरण अलग रहा, यही कारण है कि पति की भावुकता उसे नासमझी प्रतीत होती है और अमरकान्त को सुखदा एक दर्प का पर्याय लगती है जहाँ वह नेह की शीतल छांव की आशा नहीं कर सकता। विपरीत मानसिकता के कारण  दोनों का वैवाहिक जीवन नेह- भरा न होकर क्लेश -भरा होता है। पुरुष स्त्री का प्रेमिल रूप चाहता है किंतु यह नहीं चाहता कि वह उसके ऊपर अधिकार जताए या हुक्म चलाए, यही कारण है कि प्रेमिका जहाँ नेह का सुधारस प्रतीत होती है, पत्नी, जिसे उसके हृदय ने वरण नहीं किया, उसका अपने ऊपर अधिकार जताना पुरुष को असह्य होता है।जबकि स्त्री परिवार की मर्यादा का पाठ पढ़कर, समाज की इस परंपरा को नियति मानकर स्वीकारती रही है और हर हाल में पति के साथ रहना चाहती है। हालाँकि तलाक़ बिल उसी समय पास हुआ, जिसकी  चर्चा  उपन्यासकार ने नैना -सुखदा के संवाद के तहत की है :

" नैना : तुम कहती हो, पुरुष के आचार- विचार की परीक्षा कर लेनी चाहिए। क्या परीक्षा कर लेने पर धोखा नहीं होता ? आए दिन तलाक़ क्यों होते रहते हैं?

सुखदा : तो इसमें बुराई क्या है? यह तो नहीं होता कि पुरुष गुलछर्रे उड़ाए और स्त्री उसके नाम को रोती रहे।

नैना : प्रेम के अभाव में सुख कभी नहीं मिल सकता। बाहरी रोकथाम से कुछ न  होगा।"

सुखदा के इस कथन को 'गोदान' की मीनाक्षी में आधार मिलता है। मीनाक्षी केस जीतने के पश्चात पति के घर घुसकर  अपने प्रति हुए अन्याय का प्रतिकार करती है। जबकि 'कर्मभूमि तक आदर्श के मोहबंध से प्रेमचंद पूरी तरह आज़ाद नहीं होते, इसलिए हज़ार आरोप -प्रत्यारोपों के बावजूद सुखदा तमाम दुख सहकर भी विवाह के बंधन से स्वयं को मुक्त नहीं करती और आगे चलकर राष्ट्रहित में सुखदा के बदले रूप से प्रभावित होकर अमरकान्त उसके पास लौट आता है। किंतु सुखदा की अभिव्यक्ति बीसवीं सदी के तीसरे दशक की शिक्षित और अधिकार के प्रति जागरूक स्त्री की अभिव्यक्ति है जो प्रतिकार चाहती है।

प्रेमचंद विषम परिस्थितियों में तलाक़ के पक्षधर हैं किंतु अपने विस्तृत कथा-जगत में वे यही आकांक्षा रखते हैं कि पति-पत्नी परस्पर सामंजस्य स्थापित करके परिवार विघटित होने से बचाए रखे, ताकि बच्चों पर बुरा असर न पड़े। 'आपका बंटी' मूलत: तलाक़ की समस्या पर आधारित उस बच्चे की समस्या है जहाँ माता-पिता दोनों नई राह चुन लेते हैं और इस अलगाव में बच्चा बिखर जाता है। किंतु आज भी अलगाव या तलाक़ के बाद बहुत कम माएँ अपने बच्चे को अपने से दूर करना चाहती हैं, ख़ासकर जब उसे सही परवरिश की ज़रूरत होती है। बंगला कहानी 'आलोर आंधारी' इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। हाँ, वह स्थिति कई बार बनती दिखती है, जो स्थिति अमरकान्त की अपने पिता समरकान्त के बीच बार -बार उत्पन्न हो जाती है।

तलाक़ की समस्या को लेकर प्रेमचंद ने अपनी इस टिप्पणी में सूक्ष्म विवेचन करते हुए स्त्री- पुरुष के संबंध को एक नई परिभाषा दी है :

"ज्यों- ज्यों उनमें (स्त्रियों) में शिक्षा का प्रचार हो रहा है, उनमें अपनी वर्तमान अधोगति से विद्रोह उत्पन्न हो रहा है और तलाक़ की माँग उसी विद्रोह का सूचक है। पुरुष को अब उनसे समझौता करना होगा । उनकी शिकायतों की अवहेलना करके अब वे अपने पुरुषत्व को कलंक से नहीं बचा सकते।"    (विविध प्रसंग, भाग 3, पृ. 258)

उन्होंने अपनी टिप्पणी 'नारी जाति के अधिकार' में भी उन्होंने लिखा कि ''तलाक़ के समय स्त्री पुरुष की आधी जायदाद पाए और मौरूसी जायदाद हो तो उसका एक अंश।"

हिंदी साहित्य में प्रेमचंद का आविर्भावकाल भारतीय समाज में स्त्रियों और दलितों के लिए दोहरी गुलामी का काल था। इस समय स्त्रियाँ एक साथ उपनिवेशवाद और सामंतवाद की चक्की में पिस रही थी। विश्व इतिहास रहा है, गुलामी की क़ीमत हर समाज में स्त्रियों ने अधिक चुकाई है। कर्मभूमि की मुन्नी इसका जीवंत उदाहरण है।

प्रेमचंद युग दलित आंदोलन को हवा देने लगा था। अपनी कई कहानियों और  उपन्यासों में उपेक्षित, अवहेलित, अछूत माने जाने वाले दलित वर्ग को नायक बनानेवाले इस कलमकार  ने अपने उदात्त  मानवीय दृष्टिकोण और लेखकीय प्रतिबद्धता का प्रमाण दिया है। इस संदर्भ में  प्रेमचंद पर जितना गाँधी जी का प्रभाव था, उतना ही बाबा आंबेडकर का। दलितों द्वारा मंदिर प्रवेश का प्रसंग डॉ. आंबेडकर के नेतृत्व में संपन्न कालाराम मंदिर प्रवेश आंदोलन की ओर हमारा ध्यान खींचता है जिसकी चर्चा डॉ. अंबेडकर : लाइफ एंड मिशन में पृ. 22 पर की गई है :

"अछूतों  ने अपना कार्य आगे बढ़ाने के लिए नासिक के कलाराम मंदिर में प्रवेश की योजना बनाई। मई 1930  में मंदिर प्रवेश के लिए सत्याग्रह की योजना बनाई गई। अछूतों  ने कलाराम मंदिर में घुसकर पूजा करने का प्रण किया। ज़ोर-शोर के साथ नासिक में मंदिर प्रवेश का सत्याग्रह शुरू हो गया। डॉ. आंबेडकर ने बंबई से ही नासिक के कलाराम  मंदिर का संचालन किया था।"

'कर्मभूमि' की रचना इस आंदोलन के बाद हुई और इस उपन्यास में दलित वर्ग द्वारा मंदिर-प्रवेश का प्रभावशाली वर्णन है। ठाकुरद्वारे में कथा- वाचन के समय कुछ दलितों द्वारा सवर्ण भक्तों के जूते के पास बैठकर भी कथा सुनने पर कथावाचक ब्रह्मचारीजी की उक्ति :

ये दुष्ट रोज़ यहाँ आते थे । रोज़ सबको छूते थे। इनका छुआ हुआ प्रसाद लोग खाते थे। इससे बड़ा अनर्थ और क्या हो सकता है! धर्म पर इससे बड़ा आघात और क्या हो सकता है ?'(पृ. 114)

और लाला समरकान्त एवं सेठ धनीराम जैसे शोषक सवर्ण के उकसाने पर भक्तगण दलितों की पिटाई करते हैं। 

प्रेमचंद ने धर्म और दासता से संबद्ध जो विचार व्यक्त किए ,वे भी बाबा आंबेडकर के विचारों से प्रभावित प्रतीत होते हैं  :

'धर्म का काम संसार में मेल और एकता पैदा करना होना चाहिए'

'धर्म तत्व सब एक है' (पृ. 82)

' मज़हब आत्मा के लिए बंधन है' (83)

'भूखे पेट ख़ुदा की याद भी नहीं हो सकती'

'हकों के हिफाज़त के लिए कुर्बानियाँ देनी पड़ती है'(271)

'अन्याय करना जितना बड़ा पाप है, उतना ही बड़ा पाप अन्याय सहना भी है' (318)

'समता जीवन का तत्व है' (321)

'जागृति अन्याय को सहन नहीं कर सकती है' (322)

'गरीबों का रक्त जहाँ गिरता है, वहीं हरेक बूँद की जगह एक-एक आदमी उत्पन्न हो जाता है'(324)

डॉ. आंबेडकर ने मंदिर प्रवेश से अधिक  समता और नागरिक अधिकारों पर बल दिया था। उनके अनुसार,  "पददलित बराबरी और नागरिक अधिकारों के लिए लड़ रहे थे। यदि तुम कहते हो कि आपका धर्म हमारा धर्म है, तब आपके अधिकार और हमारे अधिकार समान होने चाहिएँ । क्या यह ऐसा ही है? .... जो धर्म अपने करोड़ों मानने वालों को बुरा समझता है, कुत्ते और जानवरों के मुक़ाबले और उनपर अनेक प्रकार की न ठीक होनेवाली आपत्तियाँ डालता है, धर्म नहीं। किसी भी गलत काम को धर्म के अंतर्गत नहीं लाया जा सकता। धर्म और दासता का कोई साथ संबंध नहीं है।" (धनंजय कीर - डॉ. अंबेडकर : लाइफ एंड मिशन, पृ. 92)

डॉ. आंबेडकर ने बार-बार समझाया था, " देवपूजा से ज़्यादा ज़रूरी है पेटपूजा के लिए अन्न पाना। अन्य लोगों ने अपना स्वार्थ साधा, इसलिए हमारी यह दुर्दशा हुई है। भगवान के भरोसे जीना मत सीखो, अपने बाजुओं के बल पर अपना काम करना सीखो।" (वसंत मून - डॉ. बाबा साहब अंबेडकर, पृ. 81)                        

प्रेमचंद का  साहित्य इन विचारों से अंटा पड़ा है। 'गोदान' दलित वर्ग की अंतर्पीड़ा और जागृति का बेहतर नमूना है। इस उपन्यास में में होरी धर्मभीरू गरीब किसान है, लेकिन उसका बेटा गोबर बदलते समय और परिवेश के  साथ जागरूक होता है। अन्य ग्रामीण एवं शहरी पात्र इस संदर्भ को उभारते हैं :

'दान और धर्म कोरा अहंकार है' (14)

'गरीबों में अगर ईर्ष्या और बैर है तो स्वार्थ के लिए या पेट के लिए' (14)

'हमारे मुँह की कोई रोटी छीन ले, तो उसके गले में उंगली डालकर निकालना हमारा धर्म हो जाता है (14)

जिनकी आत्मा में बल नहीं, अभिमान नहीं, वह और चाहे कुछ हो, आदमी नहीं है' (15)

' नीच कहने को नीच हैं, जो ऊँचे हैं, उनका मन तो और नीचा है'(104)     

'कर्मभूमि' में कई एक स्थलों पर दलित आंदोलन मुखरित है और इसका नेतृत्व किसी सवर्ण के द्वारा किया गया है। मंदिर में दलितों के प्रति हुई हिंसा से सवर्ण शांति कुमार आग बबूला हो उठते है और उनकी सोयी चेतना को झकझोरने हेतु व्यंग्य -वाक्य कहते हैं :

"और तुम धर्मद्रोहियों, तुम सबके सब बैठ जाओ और जितने जूते खा सको, खाओ। तुम्हें इतनी ख़बर नहीं कि यहाँ सेठ महाजनों के भगवान रहते हैं । तुम्हारी इतनी मजाल कि इन भगवान के मंदिर में क़दम रखो। तुम्हारे भगवान कहीं किसी झोपड़े या पेड़ तले होंगे। यह भगवान रत्नों के आभूषण पहनते हैं, मोहनभोग, मलाई खाते हैं। चीथड़े पहनने वालों और चबेना खाने वालों की सूरत वह नहीं देखना चाहते।" (पृ. 114)

उस सामंतवादी और उपनिवेशवादी काल में इतना स्पष्ट और धारदार व्यंग्य प्रेमचंद जैसा कलमकार के ही वश की बात थी। इस प्रसंग में शांति कुमार में प्रेमचंद  परकाया प्रवेश किया -सा जान पड़ते है और धर्म को पूँजी का दास बनाने के प्रतिकार हेतु उद्धत हो उठते हैं। एक स्थल पर शांति कुमार क्षुब्ध होकर धर्माचार्यों को चुनौती देते हैं :

"अंधे भक्तों की आँखों में धूल झोंककर ये हलवे बहुत दिनों तक खाने को न मिलेंगे महाराज, समझ गए ? अब वह समय आ रहा है, जब भगवान भी पानी से स्नान करेंगे, दूध से नहीं।" (पृ. 115)

'मंदिर किसी एक आदमी या समुदाय की चीज़ नहीं है' (पृ.115)

दलितों द्वारा मंदिर प्रवेश आंदोलन की भगदड़ में कई लोग घायल होते हैं, स्वयं शांति कुमार भी। सुखदा का इस आंदोलन में सक्रिय होना शिक्षित वर्ग की युवा पीढ़ी की सोच में सकारात्मक बदलाव का सूचक है। वहीं लाला समरकान्त, पंडे, पुजारी आदि धर्म के नाम पर प्रोपगैंडा फैलाने वाले विषधर हैं,जो स्वार्थ के कारण अलगाव की फसल बोते रहे। प्रेमचंद ने मंदिर प्रवेश को पूजा से अधिक समता के अधिकार से जोड़ा था।' विविध प्रसंग ,भाग 2,पृ. 445-446 पर अपने लेख 'हरिजनों के मंदिर प्रवेश का प्रश्न'  में प्रेमचंद ने इस संदर्भ में बाबा आंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए अपना भी मन्तव्य दिया था :

"डॉ. आंबेडकर ने गाँधी द्वारा चलाए जा रहे दलितों के मंदिर प्रवेश के अधिकार संबंधी आंदोलन से अपना मतभेद प्रकट करते हुए अपना मंतव्य प्रकट किया था कि अछूतों को मंदिर प्रवेश की उतनी ज़रूरत नहीं है जितनी इस बात की कि साधारण हिंदू उससे सज्जनता से व्यवहार करे और उन्हें अपने बराबर समझे....... लेकिन इस बात का क्या प्रमाण होगा कि हिंदू किसी अछूत से सज्जनता का व्यवहार कर रहा है। खाने-पीने की सम्मिलित प्रथा अभी तक हिंदुओं में ही नहीं है, अछूतों के साथ कैसे हो सकती है। शहर में दो-चार सौ आदमियों के अछूतों के साथ भोजन कर लेने से यह समस्या हल नहीं हो सकती। शादी- ब्याह इससे भी कठिन प्रश्न है। जब एक ही जाति की भिन्न- भिन्न शाखाओं में परस्पर शादी नहीं होती, तो अछूतों के साथ संबंध कैसे हो सकता है। ये दोनों ही प्रश्न बहुत दिनों में हल होंगे, अर्थात उस समय जब हिंदू भेदभाव मिटा देगा।" 

इसीप्रकार, अमरकान्त के नेतृत्व मेँ पहाड़ी गाँव के किसान का लगान के खिलाफ़ विद्रोह दरअसल दलित -विद्रोह है। वृदधा  सलोनी  का हाक़ीम सलीम द्वारा पीटे जाने पर उसके मुँह पर सारेआम थूकना अस्पृश्या के मन मेँ लंबे समय से अन्याय के प्रति उपजी घृणा और क्षोभ का प्रतीक है... अन्याय के प्रतिकार का प्रतीक है। दलित आंदोलन के इस स्वरूप को इतने प्रबल और मुखर रूप में अंकित करना प्रेमचंद जैसे कलम के निडर सिपाही से ही संभव था। 'गोदान' में अछूत सिलिया का सवर्णों के प्रति मुँहतोड़ ज़वाब और सिलिया के कुटुंबों द्वारा उसके भोगी  प्रेमी ब्राह्मण मातादीन को ज़बरन माँस- खिलाना, शोषण के  विरोध की उसी मानसिकता को पोषित करता है।                                                                             

यहाँ यह उल्लेख करना अनिवार्य जान पड़ता है, 1927 के 19-20 मार्च को महद में अछूत महासभा को संबोधित करते हुए डॉ. आंबेडकर ने जो कहा था, उसका सार है :

अछूत माने जाने वाले भाई -बहन ऊँच-नीच का विचार अपने दिमाग से निकाल दें; अपनी मदद आप करने, ज्ञान अर्जित करने तथा सम्मान से जीने की शपथ लें;  मुर्दा जानवर खाना छोड़ दें।

डॉ. आंबेडकर की ये तीनों बातें प्रेमचंद- साहित्य का हिस्सा हैं,  किंतु उन्होंने यह प्रश्न भी उठाया है ,"क्या हिंदू माँस नहीं खाते, मदिरा नहीं पीते, अशिक्षित नहीं हैं? ..... हैं फिर अछूतों के लिए प्रतिबंध का क्या मतलब हुआ ?"    

मैनेजर पाण्डेय के शब्दों में, "हिंदी नवजागरण के निर्माताओं में प्रेमचंद, निराला और राहुल सांकृत्यायन ही ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने अपने लेखन और चिंतन में हिंदी क्षेत्र की दलित समस्या से टकराने की कोशिश की है। हिंदी नवजागरण का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष स्वाधीनता की चेतना है। इस स्वाधीनता की चेतना से जहाँ दलितों का सवाल जुड़ा है, वहीं हिंदी नवजागरण की प्रगतिशीलता सचमुच दिखाई देती है, क्योंकि वहाँ साम्राज्यवाद से विरोध जुड़ा है। यह बात प्रेमचंद के लेखन में मिलती है... उनकी कथा रचनाओं में भी और वैचारिक लेखन में भी।" (मैनेजर पाण्डेय का साक्षात्कार : युद्धरत आम आदमी, दलित साहित्य अंक, पृ. 189)

प्रेमचंद ने कहीं लिखा भी था, "हमारा स्वराज केवल विदेशी जुए से भी, जो विदेशी शासन से अधिक घातक है,मुक्त होने पर ही संभव होगा।"

उनकी दृष्टि में,  'भारतीय राष्ट्रीयता की पहली शर्त देश को जाति और वर्ण व्यवस्था की कुव्यवस्था से मुक्ति' ही थी, जैसा कि उन्होंने उल्लेख किया है, "राष्ट्रीयता की पहली शर्त वर्ण-व्यवस्था, ऊँच -नीच के भेद और धार्मिक पाखंड की जड़ खोदना है।" प्रेमचंद केवल कलम चलाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री माननेवाले रचनाकारों में से नहीं थे। उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त पाखंड, कुरीति, अंधविश्वास, शोषण, लिंग- भेद, वर्ग और वर्ण-भेद तथा सांप्रदायिकता के विरुद्ध भीषण संघर्ष किया था। उन्होंने शोषित दलितों के लिए मंदिर जाने की अपेक्षा शिक्षा और जीवनयापन के लिए सुविधा मुहैया कराने पर ज़ोर दिया। 26 दिसंबर 1932 को अपने लेख 'पावन तिथि' में उन्होंने स्पष्टत: लिखा है, 'असल समस्या तो आर्थिक है'। उन्होंने हमेशा यही कोशिश की कि दलितों में शिक्षा का प्रचार-प्रसार व्यापक रूप में हो, ताकि वे अपने जीवन और अपने समाज को युगों से आच्छादित अंधकार से उबार सके और अपनी अर्थवत्ता को महसूस सकें। शिक्षित होकर ही वे अन्याय के विरुद्ध अपने मूक कंठ को वाणी दे सकेंगे और अपना अधिकार माँग सकेंगे। उन्होंने गाँधीजी के इस सुझाव के प्रति असहमति जताई, क्योंकि उन्हें एहसास था कि इससे दूरी और बढ़ेगी, घटेगी नहीं। उनका यह भी मानना था कि जिस छात्रावास में सवर्ण जातियों के बालक रहें, उन्हीं में हरिजन बालकों को भी उन्हीं सुविधाओं और बराबरी के साथ रखा जाय। ऐसा होने पर दलित छात्रों के मन में कुंठा न बनेगी और उनमें आत्मबल भी आएगा जो उनके विकास में योगदान करेगा। ('हरिजन बालकों के लिए छात्रावास'  : प्रेमचंद, विविध प्रसंग, पृ. 450 )   

'कर्मभूमि 'और 'गोदान' में अछूत / दलित समस्या पर विस्तार से विचार -मंथन किया है। कर्मभूमि का नायक अमरकान्त कथाकार की ही बोली बोल रहा है : "मैं जाति- पाति नहीं मानता, माताजी! जो सच्चा है, वह चमार भी हो तो आदर के योग्य है। जो दगाबाज, झूठा, लंपट हो, वह ब्राह्मण भी हो तो आदर के योग्य नहीं है।"(82)

 'गोदान' में ऐसे कई उद्धरण हैं :

'समाज व्यक्ति से ही बनता है और व्यक्ति को भूल कर हम किसी व्यवस्था पर विचार नहीं कर सकते।(पृ. 48)

'वह ज्ञान जो मानवता को पीस डाले , ज्ञान नहीं कोल्हू है'।(पृ. 166)

' हम सभी पहले मनुष्य हैं , पीछे कुछ और' (पृ. 137)

प्रेमचंद  दलित समस्या, किसान समस्या और राष्ट्रवाद के मुद्दे को एक साथ... साथ-साथ लेकर चले थे, क्योंकि जो शोषित है, प्रताड़ित है,व्यापक अर्थों में पददलित है। जातीय स्तर पर भी कर्मभूमि में दलित किसानों की व्यक्तिगत स्वाधीनता का आंदोलन राष्ट्रव्यापी आंदोलन से एकसार हो गया है। प्रेमचंद युग किसानों के दोहरे शोषण का साक्षी रहा है। एक ओर अंग्रेज़ी शासन का दबाव तो दूसरी ओर जमींदारों का ज़ुल्म। अन्न उपजानेवाला किसान अपने परिवार को भरपेट भोजन देने की सामर्थ्य भी नहीं जुटा पाता और रही-सही कसर साहूकार और महाजन पूरी कर देते हैं। बारदोली किसान आंदोलन का प्रभाव कर्मभूमि में दिखता है। संयुक्त प्रांत के किसानों के लगान-बंदी आंदोलन के प्रेमचंद प्रत्यक्षदर्शी रहे और शिद्दत से महसूस भी किया था। 'कर्मभूमि की रचना उसके बाद पूरी हुई थी। उन्होंने इस उपन्यास के मूल में 1929 के विश्वव्यापी आर्थिक संकट को केंद्र में रखा जिसका दुष्प्रभाव किसानों पर सबसे अधिक पड़ा था। आर्थिक मंदी के कारण उत्पन्न विकट संकट और लगानबंदी आंदोलन के दमन के लिए सरकार की दमन नीति की क्रूरता और नृशंसता का सजीव चित्र 'कर्मभूमि' में उपलब्ध है। रचनाकार ने आत्मानंद और अमरकान्त.... दो विरोधी व्यक्तित्व को इस आंदोलन का प्रतिनिधित्व सौपकर कथानक को नई गति दी है। दरअसल, यह युग किसान-जागृति का साक्षी युग भी था। प्रेमचंद रंगभूमि के रचनाकाल में ही इस सच को स्वीकार चुके थे कि जबतक ज़मींदारी व्यवस्था रहेगी, तबतक सामाजिक ढाँचे में कोई आमूल-चूल परिवर्तन संभव नहीं। प्रेमचंद की इस मानसिकता पर टालस्टाय का प्रभाव झलकता है। टालस्टाय किसानों के मामले में क्रांतिकारी थे और लेनिन ने उन्हें 'रूसी क्रांति का दर्पण' कहा था। प्रेमचंद किसान जीवन के कष्टकारी यथार्थ को गहराई से महसूसते थे।

प्रेमचंद भारतीय साहित्य के पहले ऐसे रचनाकार हुए जिन्होंने जमींदारी प्रथा को पूरी तरह खत्म करने की बात रखी। उन्होंने यह प्रश्न खड़ा किया कि किसान और सरकार के बीच तीसरे वर्ग (जमींदार) की आवश्यकता क्या है? वे अकेले ऐसे प्रखर चिंतक हुए जिन्होंने किसान-जीवन की सूक्ष्मतम समस्याओं को भी अपने चिंतन में शामिल किया और उसपर कलम चलाकर समाज और सरकार को सोचने पर विवश किया। डॉ. रामविलास शर्मा के अनुसार,

"हर कोई जानता है कि प्रेमचंद ने समाज के सभी वर्गों की अपेक्षा किसानों के चित्रण में सबसे अधिक सफलता पाई है। वे हर तरह के किसानों को पहचानते थे। उनके विभिन्न आर्थिक स्तर, उनकी विभिन्न विचारधाराएँ, उनकी विभिन्न सामाजिक समस्याएँ.... वे किसान के हर कोने से परिचित थे। जैसी उनकी जानकारी असाधारण थी, वैसा ही किसानों से उनका स्नेह भी गहरा था। किसानों के संपर्क में आनेवाली शोषण की जंगी मशीन के हर कल-पुर्जे से वे वाकिफ़ थे।" (प्रेमचंद और उनका युग : रामविलास शर्मा, पृ. 177)

यहाँ यह कहना अतिशय नहीं होगा कि तत्कालीन व्यवस्था के विरुद्ध, प्रेमचंद के क्रांतिकारी मन ने अपने उपन्यास 'कर्मभूमि' में दलित-समस्या के समानांतर ही किसानों की समस्या को समझा और अभिव्यक्त किया। उनकी दृष्टि में स्वराज का अर्थ था.... किसानों और दलितों का स्वराज। कलम इस सिपाही ने शोषण के दो प्रभावी तंत्रों को एक में गूँथकर प्रस्तुत किया और आगे चलकर इसी में स्वाधीनता के राष्ट्र व्यापी आंदोलन को भी जड़ दिया। शांति कुमार प्रेमचंद के प्रवक्ता प्रतीत होते हैं, 'न्याय यही है कि शोषण के किसी भी तंत्र को उखाड़ फेंका जाय।' 'कर्मभूमि' के किसान ऐसा करने को उद्धत भी होते हैं। प्रेमचंद इस सामाजिक विडंबना की ओर इशारा करते है कि जिस समाज में लोग भूखें हों, स्त्रियों के पास तन ढँकने को कपड़े न हो, उस समाज का एक व्यक्ति सोने के आसन पर बैठकर नाच देखता है और स्वयं को भक्त कहता हो। प्रेमचंद खुले तौर पर इस 'दलाल व्यवस्था' से भारतीय समाज को मुक्त देखना चाहते थे। मैनेजर पाण्डेय प्रेमचंद की इस प्रवृत्ति को स्पष्ट करने का प्रयास करते हैं कि प्रेमचंद सामाजिक बदलाव के पक्षधर थे। वे एक ऐसी व्यवस्था के निर्माण के आकांक्षी थे जिसमें सत्ता, मंदिर-मस्जिद या जमींदारों के हाथ में न होकर साधारण जनता के हाथ में हो। उसमें जाति प्रथा का ऐसा घिनौना दबाव न हो कि मुन्नी जैसी स्त्रियाँ घर वापस न हो सकें। 'कर्मभूमि' में मुन्नी का घर वापस न लौटना जातिप्रथा और सवर्ण मानसिकता की भयंकरता के कारण ही संभव होता है।

भारतीय स्वाधीनता संग्राम और राष्ट्रवाद एक दूसरे से संबद्ध हैं। गोया, भारतीय राष्ट्रवाद का जन्म ही स्वाधीनता संग्राम के बीच हुआ माना जा सकता है। प्रेमचंद राष्ट्र को लेकर सदैव सचेत रहे। उनके लेखन में राष्ट्र की अवधारणा राजनीति की अपेक्षा समाज और संस्कृति से संबद्ध है। किसी भी राष्ट्र की राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक स्थापनाएँ अपना विशेष महत्व रखती हैं। वे भारत के परिप्रेक्ष्य में जिस राष्ट्र की अवधारणा प्रकट करती हैं, वह धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र की अवधारणा हैं, वह भी किसान-मजदूरों के राष्ट्र का। स्वराज के प्रश्न पर प्रेमचंद का गहन चिंतन उनकी रचनाओं में परिलक्षित हैं। 'कर्मभूमि' में एक प्रसंग मुन्नी के बलात्कार का आता है। तीन गोरे सिपाही उसके साथ बलात्कार करते हैं। इस घटना पर प्रतिक्रिया व्यक्त करता नायक अमरकान्त कहता है,

" इन टके से सैनिकों की हिम्मत क्यों हुई? ये गोरे सिपाही इंगलैंड की निम्नतम श्रेणी के मनुष्य होते हैं। इनका साहस कैसे हुआ? इसलिए कि भारत पराधीन है। ये लोग जानते है कि यहाँ के लोगों पर उनका आतंक छाया हुआ है। वह जो अनर्थ चाहें, करें। कोई चूँ नहीं कर सकता।यह आतंक दूर करना होगा।इस पराधीनता की जंज़ीर को तोड़ना होगा।" (पृ. 19)

इस प्रसंग में अमरकान्त को अपना विचार-वाहक बनाकर प्रेमचंद मन्तव्य प्रकट करते है, अंग्रेज़ सभ्यता के खोल में एक बर्बर जाति है और इनका एकमात्र जवाब राष्ट्रीयता है जो इन्हें उखाड़ फेकेगी। प्रेमचंद के लिए स्वाधीनता भारतीय शोषित वर्ग के लिए अनिवार्य तत्व है। और यह स्वाधीनता न केवल उपनिवेशवाद से हो, बल्कि सामंतवाद से भी हो। वे इसी स्वाधीनता के लिए राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद की बात करते थे। वे यह मानते रहे कि धर्म और पंथ के नाम पर फैला द्वेष और अलगाववाद का विष राष्ट्रवाद को पनपने नहीं देगा। इसलिए अमरकान्त से उन्होंने यह प्रतिक्रिया व्यक्त कराते हैं : 'मैं प्रेम के सामने मज़हब की हक़ीक़त नहीं समझता, कुछ भी नहीं। (पृ. 57) प्रेमचंद के लिए राष्ट्रवाद महत्वपूर्ण था, किंतु धर्म और संप्रदाय के आधार पर विकसित संकीर्ण राष्ट्रवाद को उन्होंने कभी नहीं स्वीकाराऔर उसकी कटु आलोचना की।

'कर्मभूमि' में सामंतवाद और उपनिवेशवाद के विरुद्ध एक साथ लड़ाई छेड़ने की प्रवृत्ति दलितों के स्वाभिमान और सम्मान भावना तथा अंतस में प्रदीप्त मानवता का चित्रण करती है। प्रेमचंद की उक्ति, "हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हैं, उसमें तो जन्मगत वर्णों की गंध न होगी, वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा, जिसमें न कोई ब्राह्मण होगा, न हरिजन, न कायस्थ, न क्षत्रिय। उसमें सभी भारतवासी होंगे, सभी ब्राह्मण होंगे या सभी हरिजन होंगे।" ( क्या हम वास्तव में राष्ट्रवादी हैं? : विविध प्रसंग, भाग 2, पृ. 473)

'कर्मभूमि' स्वाधीनता आंदोलन पर केन्द्रित ऐसा उपन्यास भी है जो इस आंदोलन की शक्ति और इसमें शामिल लोगों के चरित्र का तीखा विश्लेषण प्रस्तुत करता है।इस उपन्यास में प्रेमचंद ने न तो किसी चरित्र का महिमा-मंडन किया है न अकारण चरित्र-हनन। इसकी ख़ासियत यह है कि यह एक ज़बर्दस्त सैलाब की तरह समस्त जनता को अपने भीतर समेट लेता है। छात्र, किसान, व्यापारी,  मज़दूर, शिक्षक, अवर्ण -सवर्ण स्त्रियाँ, लड़कियाँ,-- सभी इसके प्रवाह में बह चलते हैं। प्रेमचंद नायक अमरकान्त के साथ ही पाठकों को समाज के एक हिस्से --- लाला समरकान्त के मकान से उठाकर समाज के दूसरे हिस्से... सकीना के मुहल्ले में ले जाते हैं। फिर, वहाँ के वातावरण का चित्र  खींचते हैं : "गली में बड़ी दुर्गंध थी। गंदे पानी के नाले दोनों तरफ़ बह रहे थे। घर प्राय: सभी कच्चे थे। ग़रीबों का मुहल्ला था। शहरों के बाज़ारों और गलियों में कितना अंतर है! "(पृ. 24)

स्वाधीनता की ललक गरीबों में अधिक होती है और आहूत होने की प्रबल इच्छा भी। सकीना के इस कथन, "हाँ ग़रीबों के रूपए नहीं पूछे जाते, वहाँ ग़रीबों को कौन पूछेगा" के द्वारा प्रेमचंद ने समाज को यह एहसास दिलाया कि जिस देश कि जनता का अधिकांश प्रतिशत ग़रीब है, उन्हें अवहेलित करके, उनकी आत्मिक भागीदारी के बिना, उन्हें साथ लिए बिना लड़ी गई लड़ाई स्वाधीनता और राष्ट्रवाद की लड़ाई नहीं हो सकती। सकीना ने अमीर-गरीब शब्द प्रयोग किए, हिंदू या मुसलमान शब्द नहीं। 'गोदान' में भी अधिकांशत: 'ग़रीब'  शब्द का ही प्रयोग है।

प्रेमचंद कहा करते थे, "साहित्यकार के अंदर 'टीस अथवा पीड़ा' ही साहित्य की रचना करवाती है... साहित्यकार 'मानसिक पूँजीपति' है तथा वह पैदा होता है, बनाया नहीं जाता, लेकिन शिक्षा एवं जिज्ञासा से 'प्रकृति की इस देन को बढ़ाया जा सकता है।" यह भी कि "सत्य जहाँ आनंद का स्रोत बन जाता है, वहीं वह साहित्य हो जाता है।" (जीवन में साहित्य का स्थान : कुछ विचार, पृ. 83-84)

प्रेमचंद की जीवन-दृष्टि इतनी व्यापक थी कि मानव जीवन के प्रत्येक पक्ष की मेमोग्राफी करते हुए यथासंभव समस्या की शल्य चिकित्सा के द्वार भी उन्होंने खोले हैं। वे एक उच्चकोटि के रचनाकार और युग प्रवर्तक साहित्यकार इसलिए बन पाए क्योंकि उन्होंने अपनी जीवन-शैली की तरह ही अपने विचारों को भी पूर्णत: भारतीय रखा। भारतीय संस्कृति के गुणों-अवगुणों के  खाद-पानी से व्यक्तित्व को पकने दिया, उसके बाद महापुरुषों, सच्चे समाज सुधारकों के विचारों से अपनी बौद्धिकता को माँजा, उसे सही धूप-हवा दी और यही धूप-हवा उनकी लेखनी की स्याही बनी जिससे उन्होंने अविस्मरणीय इतिहास रच दिया। हिंदी साहित्य अपने इस प्रणेता का सदैव ऋणी रहेगा।