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कविता
March 1, 2020 • चेतना उपाध्याय • कविताएँ

सोफे ने मेज से कहा

मेज ने बैठक के परदों से

त्योहारों पर मेहमानों का

इन्तज़ार हो रहा बरसों से

‘अतिथि देवो भव’, सीखा हमने

अपने पुरखों से

परिवार में सत्कार लगे अधूरे से

हमने बैठक कक्ष सजाया पूरे मन से

मिठाई, नमकीन, चरपरे और फलों से

इक थाल सजाया पूरे मन से

मेहमानों की आवा जाही चलती रही बरसों से

फिर मिठाइयों का अलग थाल

नमकीनों का थाल अलग से

मेवा मिश्री और फूलों को भी सजाया

अलग-अलग रूपों से

ज्यों ज्यों मेवा मिष्ठान्न लगे बढ़़ने

त्यों त्यों मेहमान लगे धीरे-धीरे घटने

मेज़़ पर मिष्ठान्नो के अम्बार हैं सजते

सोफे पर मेहमानों के साज़ नहीं बजते

त्योहारों पर मेहमानों की आवा जाही है रहती

होठों से झूठ के पुलिन्दे हैं बरसते

शब्दों के कटु दंश चीनी की चाशनी से रिसते

बैठक के परदे मेहमानों की आहट को तरसते

बैठक की दीवारों के कान शब्द भेदी बाणो से

आहत होने को धीरे-धीरे मचलते से

अपनी बंसी अपना राग बजता रहता धुन से

बैठक की दीवारें मेहमानों को तरसें

त्यौहार ही नहीं हर वक्त तरसें

और मानव प्रगति वादिता में महके