ALL संपादकीय पुस्तक कहानी कविताएँ ग़ज़लें लघुकथा लेख पत्रांश साहित्य नंदनी बिरासत
कविता
May 1, 2020 • मुकेश
मुकेश
 
नसीब कुछ अपना ऐसा यारा
दूर दूर तक नही किनारा ,
टूट ना जाऊँ बह ना जाऊँ 
समय की इतनी तेज है धारा |
 
तालाब अगर जीवन बन जाये 
तो लहर कहाँ से आयेगी ,
किनारों से टकराकर उमंगे 
रो रो कर मर जायेगी |
 
दर्पन भी अब रूठ गया है 
काफी कुछ पीछे छूट गया है ,
कहती हैं उभरती चेहरे पे लकीरे 
अब अपना वक़्त भी बीत गया है |
 
हर वक़्त की अपनी अभिलाषा है  
हर वक़्त की अपनी नई भाषा है ,
हर वक़्त बीत ही जायेगी 
यही वक़्त की अपनी परिभाषा है |
 
तु अपने दुखों से दुखी है जितना 
उससे ज्यादा वो है परेशान ,
ये कर्म क्षेत्र है भाई मेरे 
यहाँ राम की भी बनी रामायण|
 
इस चाँद की भी अजब कहानी है 
हर युग की पहचान है ये 
कभी है आधा कभी अमावश 
कभी रात की जान है ये |
 
बनवारीपुर, बेगूसराय (बिहार) 
Mob. 7549650492