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कविताएँ
October 29, 2020 • रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ • कविताएँ

रामेश्वर काम्बोज हिमांशु’,
email : rdkamboj@gmail.com,
Mob. 9313727493

 

जगमग तारे

अम्बर में थे

अब तक हँसते

जगमग तारे

 

आज उतरकर

खेल रहे

धरती पर सारे

 

बहुत घना

फैला अँधियारा

दीपक लाए

हैं उजियारा

द्वार हमारे

 

उड़त-उड़ते

नील गगन में

जैसे उतरें

हंस सुनहरे

पंख पसारे ।

***

जंगल में

बहुत भीड़ ये जब से आई जंगल में

जमकर सबने धूल उड़ाई जंगल में

हुआ रात भर धूम-धड़ाका होटल में

नाचे-गाए छुटे पटाखे होटल में

शोर बहुत था पेड़-पहाड़ी काँप उठे

बाघ घड़ीभर सो न पाए जंगल में

झीलों में भी कूड़ा-कचरा भर डाला

बोलो कैसे प्यास बुझाएँ जंगल में

 

छुपें कहाँ हम पेड़ घने सब काट दिए

झाड़ी तक भी नजर न आए जंगल में

भूखा-प्यासा बाघ सभी से पूछ रहा

'मेरा घर था- तुम क्यों आए जंगल में?’

***

 

नन्हे बच्चे

सूरज मुझको लगता प्यारा

लेकर आता है उजियारा

सूरज से भी लगते प्यारे

टिम-टिम करते नन्हे तारे

 

तारों से भी प्यारा अम्बर

बाँटे खुशियाँ झोली भर-भर

चन्दा अम्बर से भी प्यारा

गोरा-चिट्टा और दुलारा।

 

चन्दा से भी प्यारी धरती

जिस पर नदियाँ कल-कल करतीं

पेड़ों की हरियाली ओढ़े

हम सबके है मन को हरती

 

हँसी दूध-सी जोश नदी-सा

भोले मुखड़े मन के सच्चे

धरती से प्यारे भी लगते

खिल-खिल करते नन्हे बच्चे

 

इन बच्चों में राम बसे हैं

ये ही अपने किशन कन्हाई

इन बच्चों में काबा-काशी

और नहीं है तीरथ है भाई