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कोरोना गाथा
May 1, 2020 • राकेश गौड़ • कहानी

 राकेश गौड़

मजदूरों पर राजनीति

दिल्ली के श्रम मंत्री, कृष्ण राव  के कार्यालय के फ़ोन की घंटी थमने का नाम ही नहीं ले रही थी।  उनके  पी ए,  शर्मा  जी, एक फ़ोन रखते  तो दूसरी  घंटी बज उठती थी।  दरअसल पिछले एक महीने से कोरोना वायरस महामारी फैलने के बाद दिन ब दिन हालात बद से बदतर होते जा रहे थे।  सरकार की भरपूर कोशिशों के बावजूद विदेश से आयी यह बीमारी आम जनता में भी फैल रही थी।  ग़रीब तबके के लोग भी संक्रमण का शिकार हो रहे थे।  लॉकडाउन की घोषणा व सरकारी, प्राइवेट कार्यालय, उद्योग और निर्माण संबंधी कार्य बंद होने के कारण लोगों का अपने अपने राज्यों में पलायन शुरू हो गया।  सबके मन में भय था कि यदि  लॉकडाउन लम्बा चल गया तो  खाने के भी लाले पड़ जाएंगे, किराए के लिए भी पैसे नहीं बचेंगे इसलिए उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार आदि के लोग अपने गाँव वापस जाने लगे।  यह और बात है कि भारी संख्या में इस पलायन के चलते कितने ही लोगों ने संक्रमण फैला दिया।  इतने लोगों के दिल्ली से जाने के बावजूद लाखों श्रमिक यहाँ थे जिनको अपनी दैनिक जरूरतों को पूरा करने में आर्थिक संकट का सामना करना पड़  रहा था।  यही कारण था कि विभिन्न श्रमिक संगठन,यूनियन के नेता, श्रमिक  और मीडियाकर्मी श्रम मंत्री के कार्यालय से श्रमिकों के लिए राहत राशि की घोषणा व अन्य सुविधाओं के बारे में जानना चाह रहे थे।   विभिन्न श्रमिक संगठन यह दबाव बना रहे थे कि श्रमिक कल्याण बोर्ड  के कल्याण कोष  से पंजीकृत श्रमिकों को राहत राशि तुरंत प्रदान की जाए।  अब शर्मा जी के लिए भी इन सबको समझाना मुश्किल हो रहा था।  

मंत्री जी ने शर्मा जी को निर्देश दिया कि श्रम  आयुक्त और विभाग के सभी उच्चाधिकारियों की एक मीटिंग फ़ौरन बुलाई जाये।  शर्मा जी ने मंत्री कार्यालय के कर्मचारियों को मीटिंग नोटिस जारी करने के लिए कह दिया।  मंत्री जी जब मुख्य मंत्री  के साथ मीटिंग के लिए निकल गए तो शर्मा जी  लंच करने बैठ गए।  लंच के बाद शर्मा जी अपनी ही कुर्सी पर दस-पंद्रह  मिनट के लिए आंखें मूँद कर सुस्ता लेते  थे।  आज जैसे ही उन्होंने आँखे बंद की तो लगभग दो वर्ष पहले की एक घटना उनकी आँखों के आगे घूम गयी। पंद्रह वर्ष तक सत्ता में रहने के बाद द ग्रैंड ओल्ड पार्टी को हरा कर अन्ना हज़ारे के इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन से जन्मी पार्टी भारी  बहुमत से जब सत्ता में आयी तो अलग अलग पृष्ठभूमि से आये हुए लोगों को  मंत्रिमंडल में जगह मिली।  जनता की इस पार्टी से बहुत अपेक्षाएं थी।  कृष्ण राव ने अन्ना आंदोलन में तो अग्रणी भूमिका निभायी ही थी लेकिन वह उससे पहले भी इलाहाबाद विश्विद्यालय में छात्र नेता के तौर पर बहुत सक्रिय रहे।  वह आल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन में सक्रिय रहे और इसीलिए उनका झुकाव कम्युनिस्ट विचारधारा की ओर था।  मजदूर  वर्ग से उनकी विशेष सहानुभूति थी।  श्रम मंत्री का कार्यभार मिलते ही उन्होंने उच्च अधिकारियों की मीटिंग बुलाकर श्रम  विभाग के कार्यों की समीक्षा की व श्रमिक कल्याण से जुड़े सभी मुद्दों पर विशेष ध्यान देने पर जोर दिया।  

श्रम विभाग की समीक्षा होने के बाद मंत्री जी के सचिव ने उनका ध्यान निर्माण मजदूर कल्याण बोर्ड में संचित लगभग 1600  करोड़ रुपये की उपकर निधि (सेस फण्ड ) की ओर आकर्षित किया।  बोर्ड के इस फण्ड में निर्माण क्षेत्र में कार्य कर रही कंपनियों व ठेकेदारों द्वारा एक निर्धारित राशि निर्माण मजदूरों  के लिए विभिन्न कल्याण योजनाओं के संचालन के लिए जमा की जाती है।  सन 2002  में इस बोर्ड ने कार्य करना शुरू किया।  बोर्ड के नियमानुसार निर्माण क्षेत्र में कार्यरत मजदूरों जैसे मिस्त्री, प्लम्बर, इलेक्ट्रीशियन, पेंटर, दिहाड़ी मजदूर  आदि को बोर्ड में पंजीकृत किया जाना चाहिए तभी उन्हें सेस फण्ड से कल्याण राशि स्वीकृत की जा सकती है।  बोर्ड के गठन के बाद सेस फण्ड में पैसा तो जमा होना शुरू हो गया क्योंकि बिना इसके बिल्डिंग प्लान स्वीकृत नहीं होते थे और निर्माण कार्य शुरू नहीं किया जा सकता था।  इस कारण निर्माण कार्यों में लगी बड़ी बड़ी निर्माण कंपनियों और प्राइवेट ठेकेदारों ने बोर्ड के अध्यक्ष, जो सत्ताधारी पार्टी समर्थित ट्रेड यूनियन के एक नेता थे, को प्रत्येक बिल्डिंग प्लान की स्वीकृति के लिए एक निश्चित राशि पहुंचनी शुरू कर दी, साथ ही बोर्ड के फण्ड में भी वे सेस की राशि जमा करवा देते थे।  बोर्ड के अध्यक्ष रणबीर सिंह की मजदूरों के पंजीकरण और नई कल्याणकारी योजनाएं बनाने में कोई विशेष रूचि नहीं थी, उन्हें तो एक पद, कार्यालय, गाड़ी और मजदूर  संगठनों से  उगाही की चिंता थी।  इस कारण दस सालों में कुछ हज़ार श्रमिकों का ही पंजीकरण किया गया और गिनी चुनी कल्याणकारी योजनाओं में  कुछ ही पंजीकृत श्रमिकों को कल्याण राशि स्वीकृत की गयी थी।  कृष्ण राव जी की मजदूरों के प्रति सहानुभूति और उनके लिए कुछ कर गुजरने का जज़्बा ही था कि  उन्होंने इस बोर्ड की कमान अध्यक्ष के रूप में स्वयं संभाल ली।  

लगातार मीटिंग के दौर और उनमें अधिकारियों को मंत्री जी द्वारा सख्त निर्देश दिए जाने का यह असर हुआ कि लाखों श्रमिकों का पंजीकरण हुआ और अनेक  कल्याणकारी योजना  बनाकर उन्हें लागू करने के नियम कायदे बना दिए गए।  इन योजनाओं के अंतर्गत श्रमिकों को अपने  या आश्रित बच्चों  के विवाह, प्रसूति और बच्चों की उच्च शिक्षा आदि के लिए अनुदान राशि  स्वीकृत की जाती थी।  श्रमिकों का  पंजीकरण  कम्पनी, ठेकेदार या किसी निर्माण श्रमिक यूनियन  के सत्यापन के बाद ही किया जाता था।  दिहाड़ी मजदूर कोई और रास्ता न देख कर यूनियन के प्रतिनिधियों की शरण में चले जाते थे जो उनका सत्यापन करने बदले कुछ सेवा शुल्क वसूल लेते थे और विभाग के अधिकारियों तक उनका फॉर्म पहुंचा देते थे।  कुछ नेताओं ने इसमें भी अतिरिक्त आय की संभावना ढूंढ ली।  उन्होंने विभाग के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों से मिलकर कुछ रुपयों की खातिर सब्ज़ी का रहड़ा लगाने वाले, रिक्शा चालकों आदि का भी निर्माण श्रमिक के रूप में बोर्ड में पंजीकरण करवा दिया।  भ्रष्ट प्रशासन तंत्र और यूनियन की मिली भगत के चलते कुछ श्रमिकों को बोगस क्लेम भी सेस फण्ड से दिलवा दिए। पिछली सरकार में बोर्ड के अध्यक्ष रहे, रणबीर सिंह, मंत्री जी कार्य प्रणाली को देखकर हतप्रभ थे।  वैसे भी अब वह विपक्ष की राजनीति कर रहे थे और मंत्री जी  पर वार करने का मौका ढूंढ रहे थे। अपने कार्यकाल में उन्होंने स्वयं  केवल अपने समर्थकों का पंजीकरण करवाया और उन्हें बोगस क्लेम भी दिलवाये मगर अब उन्हें इस मुद्दे को उछाल कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने  और मजदूरों से उगाही  की संभावना दिखाई दे रही थी।  

कुछ माह पूर्व उन्होंने अपने पूर्व परिचित अधिकारियों से मिलकर पंजीकृत श्रमिकों और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पाने वाले कुछ श्रमिकों की सूची प्राप्त कर ली।  प्रेस कांफ्रेंस करके उन्होंने कृष्ण राव पर यह आरोप लगाया की उन्होंने निर्माण मजदूरों के नाम पर  अपनी पार्टी के समर्थकों  का पंजीकरण करवाया और उन्हें विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं में राशि आबंटित की।  एक शिकायत उन्होंने केंद्र सरकार को भी भेज दी, जहाँ से भ्रष्टाचार  निरोधक शाखा को इस मामले की जांच के आदेश दे दिए गए ।  जांच शुरू होते ही  बोर्ड का काम ठप्प हो गया।  रोज अधिकारियों को जांच के लिए भ्रष्टाचार  निरोधक शाखा में बुलाया जाने लगा।  नए पंजीकरण रुक गए और भयभीत अधिकारियों ने पुराने क्लेम भी लंबित कर दिए।  इन सब का नतीजा यह निकला कि हज़ारों पंजीकरण रद्द कर दिए गए और लंबित क्लेम भी फाइलों में बंद पड़े रहे,  मतलब बोर्ड का कामकाज  लगभग ठप्प  ही हो गया।  राजनीति  के नए नए खिलाडी कृष्ण राव भी इन हालातों को देखकर काफी क्षुब्ध थे लेकिन उनका वश नहीं चल रहा था।  अचानक शर्मा जी को चपरासी की आवाज़ सुनाई दी, "सर, मंत्री जी आ गए और आपको बुला रहे हैं।" शर्मा जी उठे और नोटिंग पैड लेकर मंत्री जी के कक्ष की ओर चल पड़े।  

अगले दिन बोर्ड की मीटिंग में काफी हंगामा हुआ और आरोप प्रत्यारोपों की झड़ी लग गई।  बोर्ड की स्थापना के समय रणबीर सिंह ने अपने चहते यूनियन नेताओं और अधिकारियों को सदस्य बना दिया था।  हालांकि कृष्ण राव ने बोर्ड का पुनर्गठन किया लेकिन इस बार भी रणबीर सिंह अपने कुछ चहेते लोगों को बोर्ड में शामिल करवाने में सफल हो गए।  उन सदस्यों का रुख कुछ ज्यादा ही उग्र था।  मंत्री जी कुछ देर  तो सुनते रहे फिर उन्होंने उन सदस्यों को आड़े हाथ लिया, " आप लोग तो रहने ही दें।  जार याद कीजिये, पिछले दस सालों में आपने कितने पंजीकरण किये और कितने श्रमिकों को अनुदान राशि स्वीकृत की? हमने बोर्ड के पुनर्गठन के बाद न केवल पंजीकरण को गति दी बल्कि नई नई योजनाएं लागू की और उनके अंतर्गत अनुदान राशि भी स्वीकृत की।  आप लोगों ने तो पंजीकरण करवाने  और अनुदान राशि स्वीकृत करवाने के नाम पर भी बेचारे मजदूरों से पैसा ऐंठा।" तभी श्रम आयुक्त बोल उठे ," सर, पिछले दो सालों में हमने न केवल लाखों पंजीकरण किये बल्कि हजारों श्रमिकों को करोड़ों रूपये अनुदान राशि भी स्वीकृत की।" शर्मा जी भी समर्थन में सिर हिला रहे थे।  जैसे ही श्रम आयुक्त ने अपनी बात पूरी कि शर्मा जी बोले," सर, मैंने ही कितने मजदूरों के मामले विभाग में फ़ोन कर कर के सुलझाए हैं। एक मजदूर के बेटे ने तो मुझे फ़ोन करके बताया कि उसके पिता पेंटर हैं और उसने बोर्ड से मिली उच्च शिक्षा अनुदान राशि से न केवल अपना ग्रेजुएशन कोर्स पूरा किया बल्कि अपने भाई की स्कूल की फीस देने में भी मदद कर दी।  ऐसे ही कितने  ही उदाहरण और भी हैं।" मंत्री जी कहने लगे ,"आप में से ही कुछ लोगों ने अपने निहित स्वार्थों  के चलते बोर्ड की कार्यप्रणाली को लेकर अनावश्यक विवाद खड़ा कर दिया।  नतीजा आप सबके सामने है, अब इस संकट की घड़ी में भी हम इनके लिए कुछ नहीं कर पा रहे हैं। खैर, इन सब बातों को छोड़िये और बताईये कि कोरोना वायरस  महामारी से पैदा हुए इस संकट में  मजदूरों को तुरंत राहत देने के लिए क्या कर सकते है। इस  बारे में आप ही कुछ सुझाव दीजिये ।"

काफी चर्चा के बाद  सर्वसम्मति से बोर्ड से यह प्रस्ताव पारित किया कि जिन श्रमिकों का पंजीकरण भ्रष्टाचार निरोधक शाखा की जांच में वैध पाया गया है,  उनको बोर्ड के कोष से तुरंत  5000 /- रूपये प्रति सदस्य राहत राशि प्रदान की जाए।  इसके अलावा जितने भी पंजीकरण लंबित हैं उनका निपटारा भी तुरंत किया जाए और पंजीकृत होते ही सदस्यों को तुरंत राहत राशि दी जाए।  कोरोना वायरस के कारण घोषित लॉक डाउन  के मद्देनज़र यह फैसला भी लिया गया कि  विभिन्न मजदूर संगठनों के सहयोग से एक विशेष पंजीकरण अभियान चलाया जाए।  मंत्री जी अपने पिछले अनुभव को ध्यान में रखते हुए मजदूर संगठनों को यह चेतावनी भी दे दी कि अगर किसी का भी सत्यापन गलत पाया गया तो उसकी जिम्मेदारी सत्यापन करने वाले संगठन की होगी और उस संगठन को ब्लैकलिस्ट कर दिया जाएगा। उन्होंने अधिकारियों को भी पूरी ईमानदारी के साथ काम करने की सख्त हिदायत दी।  मंत्री जी ने बोर्ड में यह प्रस्ताव मजदूरों की परशानियों को ध्यान में रखते हुए पारित करवाया था लेकिन मीटिंग से बाहर आते हुए कुछ मजदूर संगठनों के नेताओं के चेहरों पर कुटिल मुस्कान दिखाई दी ।  जल्द ही उन मजदूर यूनियन नेताओं की मुस्कान का राज भी खुल गया।  रणबीर सिंह ने मंत्री जी को फ़ोन किया और मजदूरों के लिए राहत राशि की स्वीकृति के लिए धन्यवाद दिया । फिर उन्होंने मंत्री जी  से मिलने का समय माँगा।   रणबीर सिंह द्वारा खड़े किये विवाद को देखते हुए एक बार तो मंत्री जी कुछ सोच में पड़ गए मगर फिर शर्मा जी को उन्हें बुलाने के निर्देश दे दिए।  रणबीर सिंह अकेले मंत्री जी  के चैम्बर में मीटिंग के लिए आये थे।  कुछ देर बाद ही मंत्री जी ने शर्मा जी को बुलवा भेजा।  जब शर्मा जी मंत्री जी के चैम्बर में पहुंचे तो उन्होंने बड़े आवेश  में मंत्री जी को कहते सुना," रणबीर सिंह जी, आपने पहले ही बोर्ड के लिए इतनी मुसीबतें खड़ी कर रखी हैं।  मैं  कुछ कहता नहीं हूँ तो इसका मतलब यह नहीं है कि मुझे कुछ पता नहीं है।  आपकी यूनियन और आपके साथियों ने जो फर्जीवाड़ा आपके कार्यकाल में किया था उसके कारण बोर्ड का काम पहले ही  ठप्प हो चुका है।  अब आप मुझे फिर मजदूरों का पंजीकरण करने के लिए बड़ा अजीब सुझाव दे रहे  हैं।  क्यों आप इस संकट की घड़ी में भी मजदूरों के बहाने अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाह रहे हैं? कुछ तो शर्म करो और इन मजदूरों पर रहम खाओ।"  और फिर शर्मा जी की ओर देख कर कहने लगे, ' " शर्मा जी, रणबीर सिंह जी को बाहर तक छोड़ आओ। "  जब शर्मा जी वापस आये तो मंत्री जी  बोले , "सुना आपने, ये रणबीर सिंह अब भी बाज़ नहीं आ रहा है।  कह रहा था कि  आप यूनियन द्वारा सत्यापित सभी मजदूरों का बिना किसी जांच के पंजीकरण करवा दें तो आपको हरेक पंजीकरण और स्वीकृत अनुदान पर आपको भी 'कमीशन' दिलवा देंगे।  पता नहीं शर्मा जी, कब तक हम लोग इस देश की गरीब जनता के सहारे अपनी रोटियां सेंकते रहेंगे? खैर छोड़िये, आप श्रम आयुक्त से मेरी बात करवाइए।"  मंत्री जी ने श्रम आयुक्त को सख्त हिदायत दी," बोर्ड ने हाल ही में जो फैसला लिया है उसे लागू करने में अगर मेरे पास किसी भी अधिकारी या यूनियन के खिलाफ  एक भी शिकायत आती है तो मैं  उन्हें बख्शूंगा नहीं।   आप स्वयं सारे कार्य का निरीक्षण करें और मुझे रोज़  रिपोर्ट भेजें।" फ़ोन की घंटी फिर बजी, शर्मा जी ने मंत्री जी को फ़ोन देते हुए बताया,"सर, गोबिंद पुरी  लेबर चौक से एक मजदूर बात करना चाह रहा है।"  मंत्री जी ने फ़ोन कान से लगाया तो उधर से आवाज़ आयी, " मंत्री जी आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।  हमारे लेबर कैम्प  के 50 मजदूरों के फार्म प्रधान जी ने दफ्तर में जमा करवा दिए हैं।  उनका कहना है की जल्द ही हमें राहत का पैसा मिल जाएगा।  भगवान आपका भला करें।  आपने हमारे बच्चों को भूखा  मरने से बचा लिया।" मंत्री जी ने सिर्फ इतना कहा,"कोई बात नहीं भैय्या, ये तो हमारा फ़र्ज़ है।  कोई दिक्कत हो तो तुम सीधे मुझे फ़ोन कर सकते हो।" फ़ोन रख कर मंत्री जी कुछ संतोष के भाव से बोले, "शर्मा जी, एक कप चाय तो पिला दो।"

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