ALL संपादकीय पुस्तक कहानी कविताएँ ग़ज़लें लघुकथा लेख पत्रांश साहित्य नंदनी बिरासत
कोरोना गाथा
May 1, 2020 • राकेश गौड़ • लघुकथा

   राकेश गौड़


कोरोना की गरीब मार


करीब एक साल पहले की बात है है। शाम की सैर करने के लिए आज पार्क की और ना जाकर मेरे पैर यकायक सोसाइटी के मेन गेट के तरफ मुड़ गए।  शायद दिमाग में कुछ समय पहले तक हो रही बूंदाबांदी रही होगी और यह सोच कर कि पार्क में कीचड़ होगी इसलिए सड़क पर घूमना ही उचित लगा। गेट से निकलते ही बड़ी मधुर बांसुरी की धुन सुनाई दी, सोचा कि मंदिर मेँ कोई आरती से पहले बजा रहा होगा।  मगर जैसे ही मैं मंदिर के सामने पहुंचा तो सड़क के दूसरी और फुटपाथ पर बनी एक अकेली झुग्गी  के  बाहर बैठे एक अधेड़ व्यक्ति को बांसुरी बजाते हुए पाया।  हालांकि इस तरफ से पैदल कम ही निकलना होता था फिर भी कुछ समय पहले जब मैं यहाँ से पैदल गुजर रहा था तो इसी व्यक्ति को झुग्गी  के बाहर बैठे देख कर अनायास ही पूछ बैठा, "क्यों भाई इन फ्लैट्स के सामने फुटपाथ पर झोंपड़ी बनाकर रहने की अनुमति कैसे मिल गयी ?" यह सवाल सुनकर एक बार तो वह चौंक गया फिर सहमते हुए बोला , "बाबू क्या बताएं, करीब बीस साल पहले जब ये फ्लैट बन रहे थे तो यहां ठेकेदार ने कुछ झुग्गियां मजदूरों के रहने के लिए डलवा दी थी।  जब काम ख़त्म हुआ तो साड़ी झुग्गियां तोड़ दी गयी लेकिन एक झुग्गी चौकीदार के लिए छोड़ दी गयी।  मेरे पिताजी  को ठेकेदार ने खाली  फ्लैट्स की देखभाल के लिए रख लिया और वे इस झुग्गी में रहने लगे।  कुछ साल बाद जब इन मकानों में लोग आकर रहने लगे,  सोसाइटी के गेट लग गए और सिक्योरिटी भी आ गयी तो एक दिन पी डब्ल्यू डी के अधिकारी इस झुग्गी को तोड़कर फुटपाथ में मिलाने के लिए आ गए।  पिताजी उनसे हाथ जोड़कर बिनती करने लगे, ' बाबू जी हम आपकी सेवा में सालों रहे हैं, रहने का कोई ठिकाना नहीं है, दिन भर काम करने के बाद रात को सोने के के लिए एक छत मिली  है, इसे मत छीनिये।  आप किसी से पूछ लें, हम किसी को तंग नहीं करते बल्कि सोसाइटी के लोगों के छुटपुट काम ही करते हैं।' पता नहीं क्या सोच कर वे लोग झुग्गी को वैसे ही छोड़ गए और मेरे पिताजी यहीं रहने लगे।  मैं भी कुछ साल बाद अपने पिताजी के पास आ गया और उसी ठेकेदार के पास मजदूरी करने लगा।  करीब पांच साल पहले मेरे पिताजी दिल्ली छोड़ कर बिहार में हमारे गांव वापस चले गए।" मैं बिना कुछ कहे मुस्कुरा कर आगे बढ़ गया। हाँ, बातों बातों में राम प्रसाद ने अपनी आत्मकथा मुझे सुना दी।  

पिछले करीब एक महीने से कोरोना वायरस  नामक महामारी ने भारत सहित पूरे विश्व को अपनी चपेट में ले लिया था।  लॉकडाउन के चलते घर से निकलना भी दूभर था।  ऐसे ही एक दिन शाम को नजदीक की मार्किट से खाने पीने का कुछ जरूरी सामान लेने के लिए पैदल ही निकल पड़ा।  मंदिर के सामने से निकलने लगा तो अनायास ही मेरी निगाह उस झुग्गी की तरफ  गई।  वहां दरवाजे पर ताला लटका हुआ था।  मैं मार्किट से सामान लेकर जब वापिस आ रहा था तो देखा कि झुग्गी का दरवाजा खुल गया  था  और बाहर वही व्यक्ति सिर झुकाये बैठा था। मैंने पूछा, " क्यों भाई राम प्रसाद आज बांसुरी चुप क्यों है?" मुझे देख कर राम प्रसाद सकपका गया  और हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया।  वह  रुआंसा होकर कहने लगा, "बाबू जी, क्या बताऊँ   कुछ माह पहले ही मेरा बेटा गाँव से यहाँ आ गया था।  उसके पास ड्राइविंग लाइसेंस था और इसी सोसायटी में एक साहब ने अपनी गाड़ी चलाने के लिए उसे रख लिया था।  जिंदगी आराम से गुजर  रही थी।  अभी पिछले सप्ताह ही साहब विदेश से वापस आ रहे थे।  मेरा बेटा एयरपोर्ट से साहब को लाने के लिए गाडी लेकर गया और उन्हें घर छोड़ कर वापस आ गया लेकिन कल अचानक पता चला कि साहब की तबियत खराब हो गयी और उन्हें और उनके परिवार के सभी लोगों को अस्पताल पहुँचाया गया।  मेरे बेटे को भी ढूंढते हुए पुलिस यहाँ आयी थी और उसे भी अस्पताल ले गए हैं।  सुना है, एक बीमारी है-कोरोना, जो दूसरे देशों से आयी है और हमारे साहब को भी उसी ने जकड लिया है।  मेरे बेटे की भी जांच हो रही है।  अब उसे चौदह दिन तक अस्पताल में रखा जाएगा।  बाबू जी, सुना है बड़ी खतरनाक बीमारी है।" मैंने उसे सांत्वना देने की कोशिश दी लेकिन शब्द नहीं मिल रहे थे।  मैं सिर्फ इतना ही कह पाया, "राम प्रसाद, भगवान पर भरोसा रखो, सब ठीक हो जाएगा" मगर मेरा मन इस बीमारी की गंभीरता को लेकर आशंकित था।  

पूरी सोसाइटी में यह खबर फैल गयी।  उस झुग्गी के सामने से निकलने वाला हर व्यक्ति आशंकित निगाहों से झुग्गी की ओर देखता था।  कुछ लोगों ने तो दबी जुबान से राम प्रसाद को वहां से भगा कर झुग्गी तुड़वाने की सलाह देनी शुरू कर दी थी। राम प्रसाद का बेटा  अस्पताल में आइसोलेशन में  था और उस की हालत पर कड़ी निगाह रखी जा रही थी।   इस बीच इस बीमारी ने महामारी का रूप ले लिया और भारी संख्या में अन्य राज्यों से राजधानी में नौकरी करने आये लोग काम न होने की वजह से अपने अपने प्रदेशों को लौटने लगे और इस कारण संक्रमण बढ़ता चला गया। चौदह दिन बाद राम प्रसाद का बेटा नेगेटिव रिपोर्ट के साथ अपनी झुग्गी में वापस आ गया।  राम प्रसाद को झुग्गी से निकालने की बात भी आयी गयी हो गयी।  उत्सुकता वश मैं भी वहां पहुँचा  तो देखा कि राम प्रसाद बांसुरी पर एक सुरीली धुन बजा रहा था। मुझे देखकर वह बांसुरी एक ओर रख कर हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।  उसके चेहरे पर एक मुस्कान थी।  इतने में कुछ और लोग भी वहां आ गए और राम प्रसाद से बात करने लगे।  मेरे एक पडोसी ने दबी जुबान में कहा," पासपोर्ट की खता थी, राशन कार्ड दर बदर हो गए"। मैं  इस टिप्पणी पर कोई प्रतिक्रिया  न देकर, राम प्रसाद की पीठ थपथपा कर वापस चल दिया।  

नई दिल्ली, मो.  9818974184