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August 22, 2020 • डा. राजेश्वर उनियाल • कविताएँ


डा. राजेश्वर उनियाल, मो. 9869116784/8369463319,
email : uniyalsir@gmail.com

हे सूक्ष्म अतिसूक्ष्म दानव तू
महादानव भले हो जाएगा,
इस जग का स्वामी है मानव
क्या तुझसे वह डर जाएगा ।1।

तू यत्र तत्र सर्वत्र है पर
आभास तुझे यह कब होगा,
जिस जग में तू विचर रहा
उस जग में ही मिट जाएगा।2।

तू आदि ना तू कोई अंत यहाँ
तू भटकता सा रह जाएगा,
तेरा निदान भी है धरा यहीं
तू कब तक यूं बच पाएगा।3।

कर ना सका बरवाद कोई 
तू बरवाद क्या कर पाएगा,
सबको हमने मार भगाया
इतिहास पुनः दोहराएगा।4।

कुछ अपनों से हैं दूर हुए
कुछ नयापन अवश्य लगा,
कुछ भूले बिसरे याद किए
कुछ स्वप्न साकार होता लगा।5।

आशा की किरण जगाए हुए
भोर का सूरज जब आएगा,
विश्वास मन में हैं लिए हुए
अंधियारा तब छंट जाएगा।6।

मानव आज फिर एक हुआ 
जगमग जग करने लगा,
जल थल नभ चमक रहे
नवप्रभात है दिखने लगा।7।

तू काल बना महाकाल बना
पर अंत तेरा अब आएगा,
यह मृत्युलोक है रीत यहाँ
जो आया वो एक दिन जाएगा।8।

शब्दयुद्ध के बाण चलाकर
मानव तुझको ललकारेगा,  
तू रक्तबीज सा छा रहा पर  
वह अस्तित्व तेरा मिटाएगा।9।

यह सृष्टि बनाई है जिसने
अपनी लीला नई रचाएगा,
करुणा का सागर बनकर   
वह रूप नया धर आएगा।10।