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लघुकथा
October 6, 2020 • अर्चना ठाकुर • लघुकथा


अर्चना ठाकुर, कानपुर, मो. 6386585328

मुजरिम

नारी सुधार गृह की संचालिका अपने जिले की नई डीएम् महोदया के ठीक पीछे पीछे चल रही थी। पहले सुधार गृह की बिल्डिंग फिर वहां की सुविधाओं को दिखाते वह एक एक नारी का परिचय उन्हें देने लगी।

अब तयसमयानुसार चाय नाश्ते की टेबल पर डीएम् महोदया के साथ और भी गड्मान्य लोगों के वार्ता का समय था। चाय की चुस्कियां लेते डीएम् महोदया औपचारिक वार्ता करते संचालिका की ओर देखती हुई बोली ‘यहाँ ज्यादातर मुज़रिम महिलाएं है, उनके बर्ताव से मुश्किलें तो आती ही होंगी, मुझे लगता है बड़ा मुश्किल है इनको सुधारना और क्या जाने कैसे-कैसे माहौल से आती होंगी।’

संचालिका तपाक से अपनी सहमति देती हुई बोली –‘सही कह रही है आप – इनके माहौल का ही दोष होता है।’

और सभी भी डीएम् महोदया से इत्फ्फाक रखते उनकी हाँ में हाँ मिलाते है फिर वार्ता समाप्त कर नई डीएम् महोदया सरकारी वी आई पी गेस्टहाउस में रूकती है।

गेस्टहाउस की चमक-धमक देख मैडम का मुंह खुला का खुला रह जाता है, आज इस पद का उपयुक्त मज़ा आ रहा था। रात भर बढ़िया मेहमानमाज़ी का मज़ा लेती सुबह वहां से निकलने से पहले नया सफ़ेद चादर, तौलिया झट से अपने बैग में रखकर मुस्कराती बाहर की ओर निकल पड़ती है।

 

सहायता

निम्मी टी वी देख रही थी। पापा आकर अपना न्यूज़ लगा देते है। आखिर सब तरफ से लॉकडाउन के बाद कई कई घंटे न्यूज़ सुन सुन कर दुनिया का हाल जानते। सात वर्षीय निम्मी अभी भी टी वी की ओर टकटकी बांधे थी। अब मम्मी भी सब्जी काटते काटते वही आ गई थी। फिर कोई खबर देख एक दम से चिंहुक पड़ती है – ‘मम्मा ये देखो ये हमारी मालती अंटी है न!!’ सब चौंक कर टी वी के स्क्रीन में नज़रे गड़ा देते है। घर लौटते मजदूरों में से एक औरत प्रेस रिपोर्टर से अपना दर्द बयाँ कर रही थी, क्या करे काम नहीं तो पैसा नहीं तब क्या करते? कहा अब काम नहीं कराएँगे तब क्या करते चले आए अपने गाँव, फिर कैमरा उनके पैरो के छालों की ओर कर के रिपोर्टर अपनी रिपोर्ट पेश करता है। निम्मी अभी भी चहक चहक कर बोल रही थी – ‘देखो न मम्मी - आंटी ही है न?’ अपनी बात पर सहमति का इंतजार किए बिना वह बोलती रही – ‘मम्मा पर आंटी रो क्यों रही है – अब घर भी नहीं आती – आंटी तो बहुत अच्छी थी आप जब भी ऑफिस से देर से आती आंटी आपके आने तक मेरे साथ खूब खेलती – मैं जो कहती झट से बना देती – और उस दिन पापा..।’ अबकि अपने पापा का भी ध्यान अपनी बातों की ओर लगाने का प्रयास करती हुई –‘जब मेरे चोट लग गई थी आप दोनों घर पर नहीं थी तब आंटी  मुझे गोद में लिए लिए डॉक्टर के पास गई थी – मैंने बोला भी था आंटी आप मत रो मुझे दर्द नहीं हो रहा।’ निम्मी की बातों ने उसके मम्मी पापा के ह्रदय को झंझोर कर रख दिया। मम्मी झट से अपनी अलमारी की तरफ गई और अपनी डायरी ढूंढती  ढूंढती  मन ही मन खुद से बातें करने लगी ‘इसी डायरी में उसका अकाउंट नम्बर लिखा है – मैंने आखिर बुरे वक़्त के लिए ही तो खुलवाया था।’