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April 5, 2020 • सूर्यनारायण रणसुभे • लेख

सूर्यनारायण रणसुभे, लातूर, मो. 9423735393

 

इलाहाबाद के वे दिन

हिंदी साहित्य को समर्पित 

डाॅ. सूर्यनारायण रणसुभे जी के उच्च शिक्षा काल के संस्मरण

1960 में भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने पूरे देश भर में से हिंदी में उच्चशिक्षा लेने हेतु जिन दस छात्रों को चुना था, उनमें से मैं एक था। मैं मूलतः विज्ञान का छात्र रहा। सन् 1960 में पूरे कर्नाटक राज्य में मल्टीपरपज एच.एस.सी. परीक्षा में मैं विज्ञान विषय में प्रथम था। इसके अलावा भाषा विषयों में (मराठी-हिंदी-अंग्रेज़ी) मैं भी सर्वप्रथम था। मुझे मेडिकल में प्रवेश मिल सकता था। परंतु घोर दरिद्रता के कारण उच्चशिक्षा लेना भी मुझे संभव नहीं था। ऐसे में हिंदी विषय में उच्चशिक्षा हेतु मेरा चुनाव हुआ। सन् 1960 में इस शिष्यवृत्ति की राशि प्रतिमाह 75/- रु. थी। उस वक्त मॅट्रिक उत्तीर्ण व्यक्ति को सरकारी नोकरी में मुश्किल से 60-70 रु. वेतन मिलता था। इस कारण इस शिष्यवृत्ति को स्वीकारने का निर्णय मैंने लिया। केवल इस शिष्यवृत्ति के कारण ही उच्चशिक्षा के दरवाजे मेरे लिए खुल गए। सन् 1960 से 1963 तक घर पर रहकर, शिष्यवृत्ति की पूरी राशि घर पर देकर मैं स्नातक कक्षा- हिंदी ऐच्छिक विषय लेकर उत्तीर्ण हुआ। अब स्नातकोत्तर की पढ़ाई कहाँ करें? भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने एक विकल्प हम शिष्यवृत्ति धारकों के सम्मुख यह रखा था कि अगर हम हिंदी प्रदेश में जाकर एम.ए. करेंगे तो शिष्यवृत्ति में 25/- रु. की बढोत्तरी होगी। एम.ए. करने के लिए शिष्यवृत्ति की राशि थी 100/- प्रतिमाह। और हिंदी प्रदेश से करेंगे तो 125/- रु.। मैंने परिवारवालों से यह कहा कि मैं हिंदी प्रदेश में ही जाऊँगा वह इसलिए कि मुझे अबकी तुलना में 50/- रु. प्रतिमाह अधिक मिलेंगे। मैं घर पर प्रतिमाह 75/- भेजा करूँगा और 50/- रु. में गुजारा करूँगा। 50/- अधिक मिल रहे हैं। इसलिए मैं इलाहाबाद गया। इलाहाबाद वि.वि. चुनने का एक अन्य कारण यह था कि मेरे एक मित्र चंद्रकांत गर्जे एम.ए. हिंदी करने हेतु एक वर्ष पूर्व इलाहाबाद पहुँच गए थे। उनके ही मार्गदर्शन पर मैंने इलाहाबाद जाने का निर्णय लिया।

इलाहाबाद जाने का मेरा निर्णय बहुत ही उचित था, ऐसा आज पीछे लौटकर देखने के बाद लगता है। सन् 1963 से करीब 1970 तक इलाहाबाद हिंदी साहित्य का मुख्य केंद्र था। यहाँ छायावादं के तीन प्रमुख कवि थे- सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा तथा डॉ. रामकुमार वर्मा। यहीं से नई कविता का आंदोलन शुरू हुआ। डॉ. जगदीश गुप्त यहीं से प्रति वर्ष ‘नई कविता’ का संग्रह निकालते थे। ‘परिमल’ का ग्रुप उन दिनों यहाँ सक्रिय था। प्रगतिवादी काव्याधारा के अनेक लेखक यहाँ थे। नई कहानी के कहानीकार- मार्कंडेय, दूधनाथ सिंह यहाँ थे। नाटककार डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल तथा एकांकीकार डॉ. रामकुमार वर्मा भी यहीं पर थे। लखनऊ से अमृतलाल नागर, यशपाल अक्सर यहाँ आया करते थे। अन्य विषयों के दिग्गज भी इस वि.वि. में थे। उन दिनों यह वि.वि. पूर्व का ऑक्सफोर्ड कहलाया जाता था। भारत के सभी प्रदेशों के छात्र यहाँ उच्चशिक्षा हेतु आया करते थे। मेरी कक्षा में उडिसा, केरल, आंध्र, कर्नाटक के छात्र तो थे ही।

बचपन से ही मैं पढ़ाकू के रूप में प्रसिद्ध था। जब 1960 में भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने मुझे शिष्यवृत्ति प्रदान की, तभी यह स्पष्टं हुआ कि अब मुझे हिंदी . साहित्य के क्षेत्र में ही सक्रिय होना है। हिंदी ही मुझे रोजगार देगी। परिणामतः सन् 1960 से 1963 के बीच मैं हिंदी साहित्य के अधिकांश श्रेष्ठ लेखकों की सभी रचनाओं को पढ़ गया था। सौभाग्य से गुलबर्गा के सरकारी कालेज के ग्रंथालय में तथा वहाँ के स्थानिक राजस्थानी ग्रंथालय में हिंदी का विपुल साहित्य था। सन् 1960-63 के बीच (आयु 18 से 21) मैं संपूर्ण प्रेमचंद, संपूर्ण प्रसाद, यशपाल, नागर, अज्ञेय की अधिकांश गद्य रचनाएँ पढ़ चुका था। महत्त्वपूर्ण कवियों के अधिकांश काव्यसंग्रह मैं पढ़ चुका था। इस पढ़ाई का मुझे फायदा यह हुआ कि इलाहाबाद पहुँचने पर जिन साहित्यकारों से मैं मिलता रहा, उनकी रचनाओं से मैं पाठक के तौर पर परिचित था। हिंदी विभाग में अपने-अपने विषय के दिग्गज कार्यरत थे। एक वर्ष के भीतर ही इन सभी प्राध्यापकों के मैं निकट संपर्क में आया। उनका स्नेह मुझे अंत तक मिलता रहा। भाषाविज्ञान पढ़ाने के लिए विश्वविख्यात कोषकार डॉ. हरदेव बाहरी थे। डॉ. रघुवंश और डॉ. जगदीश गुप्त काव्यशास्त्र पढ़ाते थे। हिंदी साहित्य का इतिहास डॉ. रामकुमार वर्मा और प्रेमचंद विशेष लेखक के रूप में- डॉ. . लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय जी पढ़ाते थे। डॉ. वार्ष्णेयजी को छोड़कर अन्य सभी के निकट जाने का, अवसर मुझे मिला। कक्षा के सहअध्यायी उडिसा के अर्जुन शतपथी, केरल के शिवशंकर पिल्लै, कर्नाटक के मनोहर जोशी मेरे आत्मीय मित्र रहे। उनका संपर्क तब से आज तक निरंतर बना रहा। इनमें से डॉ. अर्जुन शतपथी तीन वर्ष पूर्व चल बसे। जब मैं एम.ए. द्वितीय वर्ष में गया, तथा प्रथम वर्ष में आंध्र के टी. माचिरेड्डी आए तथा उपेन्द्रनाथ अश्क के पुत्र नीलाभ भी। नीलाभ के कारण अश्कजी के घर पर मैं और माचिरेड्डी अक्सर जाते। सिविल लाईन पर अश्क जी की प्रकाशन संस्था थी, उनका बहुत बड़ा मकान भी वहाँ था। कौशल्याजी अपने बेटे नीलाभ के इन मित्रों का आतिथ्य काफी स्नेह से करती। कई स्वादिष्ट, गरमागरम चीजें हमें वे खिलाती। और अश्क अपनी दक्षिण यात्रा के अनुभव हमें सुनाते।

इन दो वर्षों में पढ़ाई तो मैं जम के कर रहा था। परिणामस्वरूप एम.ए. प्रथम वर्ष में मैं कक्षा में संभवतः तीसरे स्थान पर था। एक हिंदीतर भाषी प्रदेश का छात्र कक्षा के 70-80 हिंदीभाषी छात्रों से स्पर्धा कर प्रथम श्रेणी के अंक मिलाता है- यह उन दिनों विभाग में चर्चा का विषय बन गया। प्रथम श्रेणी के अंक केवल चार छात्रों को प्राप्त थे उनमें से दोनों हिंदीतर भाषी प्रदेश के थे। प्रेमकांत टंडन और गीता गुप्ता- तथा अर्जुन शतपथी और मैं- ऐसे ये चार छात्र थे। द्वितीय वर्ष में आने के बाद मेरी ओर देखने की सबकी दृष्टि ही बदल गई। जिन लेखकों, अध्यापकों, कवियों और व्यक्तियों के निकट संपर्क में मैं आया और जिनका स्नेह मुझे मिलता रहा, उनसे संबंधित संस्करण मेरे जीवन की अक्षय निधि रही हैं। इनके संपर्क के कारण मेरा व्यक्तित्त्व अधिक संपन्न बन गया। साहित्य के प्रति मेरी समझ अधिक स्पष्ट होने लगी। आज मैं जो कुछ भी हूँ वह इनकी सीख, संस्कार और शिक्षा के कारण ही। इनमें से दो-एक को लेकर कुछ कटु अनुभव भी हैं। इनमें से अधिकांश के साथ मेरे संपर्क तब से आज तक रहे हैं। इनमें से कुछ चल बसे। जब तक वे जीवित थे, उनके साथ मेरा पत्रव्यवहार चलता रहा। ..

वि.वि. के निकट कटरा नामक चैराहे पर पं. मदन मोहन मालवीय छात्रावास था और शायद आज भी है। यह छात्रावास हिंदू होस्टल के नाम से ही जाना जाता था। आज क्या स्थिति है पता नहीं। होस्टल क्या था, छात्रों की एक छोटी-सी नगरी ही थी। करीब 250-300 छात्र यहाँ रहते थे। इसी होस्टल में मुझे, शतपथी, पिल्लै और जोशी को प्रवेश मिला। अन्य छात्रावासों की तुलना में यह सस्ता भी था। उन दिनों इस छात्रावास में समाजवादी विचारों से प्रेरित, प्रभावित छात्र ही अधिक थे। डॉ. राममनोहर लोहिया अक्सर वि.वि. में आते। तथा वि.वि. के अतिथि निवास में रूकते। उन दिनों रैगींग का बहुत बोलबाला था। हम लोग काफी घबरा गये थे। किसी ने हमसे कहा कि यहाँ- इस छात्रावास के छात्रों के छात्रनेता फलां कमरे में रहते हैं उनसे आप मिलिए। वे आपकी सहायता करेंगे। मैं, शतपथी और पिल्लै उनसे मिलने गए। नाम-प्रदेश के बाद उन्होंने हमारी बिरादरी अर्थात् जाति पूछी। शतपथी ब्राह्मण थे, पिल्लै भी उच्च जाति के थे पर मैं तो शूद्र . वर्ण का था। पिछड़े वर्ग का। उन्होंने मुझे कहा कि यहाँ अगर तुम्हें कोई जाति पूछे तो कहना कि मैं महाराष्ट्र के छ. शिवाजी की जाति का हूँ। मैंने कहा कि मैं तो उनकी जाति का नहीं हूँ। तो उन्होंने कहा यहाँ भयंकर जातिवाद है। अगर इन जातिवादी मानसिकता के छात्रों को पता चल जाए कि तुम शूद्र जाति के (आज की भाषा में ओबीसी के) हो तो तुम्हें यहाँ रहना मुश्किल कर देंगे। मैं लोहियावादी हूँ। मैं जाति बाती मानता नहीं। परंतु मेरे मानने न मानने से क्या होगा? भीड़ के सम्मुख कुछ नहीं चलता। शिवाजी की जय बोलो और आराम से रहो। शतपथीजी ने कहा कि यह रैगिंग की बला क्या है? हम चारों तो बहुत घबरा गये हैं। तो उन्होंने हमारे कमरों के नंबर लिख लिए और कहा कि रात में तुम्हें कोई परेशान नहीं करेंगा। आपकी सुरक्षितता अब मेरी जिम्मेदारी है। नेता की इस बातचीत के कारण ही मेरे मन में डॉ. लोहिया के प्रति उनकी विचारधारा के प्रति जिज्ञासा निर्माण हुई। बाद के दो वर्षों में लोहियाजी को कई बार सुनने का मौका मिला, उनसे बातचीत का भी मौका मिला।

एम.ए. की कक्षा के लिए ट्युटोरियल की व्यवस्था भी थी। संभवतः दस छात्रों का एक ग्रुप बनाया जाता और एक प्राध्यापक को इन दस की जिम्मेदारी सौंपी जाती। वह उन्हें कुछ गृहपाठ देते। डॉ. हरदेव बाहरीजी हमें मार्गदर्शन करने आते। एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि आप हिंदी उपन्यासों की एक सूची बनाकर ले आओ। अगले सप्ताह जब वे कक्षा में आए. तब मैंने अपनी नोटबुक उनके सामने रख दी। करीब 400-500 उपन्यास, उनके लेखक, उपन्यास कब छपा आदि की सूची मैंने बनाई थी। उसे देख वे आश्चर्यचकित हुए। और मुझ पर विशेष ध्यान देना उन्होंने शुरू किया। उन दिनों उपेन्द्रनाथ अश्क जी के मकान पर नई कहानी के दर्जनों लेखक किसी साहित्यिक चर्चा हेतु इकट्ठे हुए थे। नीलाभ ने इसकी सूचना हमें दी थी या स्थानिक समाचार पत्र से पता चला था- अब याद नहीं। इतने नये लेखक वहाँ आ रहे हैं, इसलिए मैं शतपथीजी के साथ वहाँ चला गया। दिसम्बर का या  जनवरी का महीना था, भयंकर ठंड थी। वहाँ जितने लोग उपस्थित थे, उनमें से मैं ही एक ऐसा था जिसके बदन पर न स्वेटर था, न कोई गरम कपडा। ठंड से मैं काँप रहा था। भीतर जाने के बाद स्थिति सामान्य हो गई। कार्यक्रम करीब 1-1.30 बजे रात खत्म हुआ। बाहर भयंकर ठंड थी। 

डॉ. हरदेव बाहरी जी ने मुझे देखा। उन्होंने मुझसे कहा, “स्वेटर-वेटर पहनकर निकलना था।’’ ‘‘मैंने कहा, मेरे पास यह सब नहीं है। शतपथीजी ने कहा, कि यह बहुत गरीब घर से आए हैं। बाहरी अपना लंबा ओव्हर कोट निकालकर मेरे बदन पर ओढने लगे कहने लगे कि इसे पहनकर जाओ। मैंने दो-दो स्वेटर पहने हैं। कल ले आना। मैंने पूरी विनम्रता से वह ओव्हरकोट लौटाया और मैंने कहा, कि मैं इसे आसानी से सह लूँगा। जवान हूँ। इसकी जरूरत आपको अधिक है।’ उन्होंने शतपथीजी से पूछा ‘इसके पास रजाई वगैरे है या नहीं?’ शतपथीजी ने कहा, ‘न कंबल, न रजाई। एक सोलापुरी चादर ओढ़कर यह सोता है।’ इसे सुन बाहरीजी गंभीर हुए और मौन भी। इस घटना के बाद उन्होंने मुझ पर अधिक ध्यान देना शुरू किया। 

एम.ए. की परीक्षाएँ खत्म होने के बाद, जब हम चारों अपने-अपने प्रदेशों में लौटनेवाले थे, तब डॉ. बाहरीजी ने हम चारों को अपने घर भोजन हेतु बुलाया। बढ़िया पंजाबी भोजन उन्होंने खिलाया। निकलते समय उन्होंने कहा- “सुनो, दो वर्षों के भीतर आप चारों ने बहुत कोशिश से इस जुबान पर अधिकार प्राप्त कर लिया है। जब नये आए थे, तब तुम लोगों के हिंदी उच्चारण में और अब के हिंदी उच्चारण में काफी फर्क हो गया है। हिंदी भाषियों की तुलना में तुम्हारे हिंदी के उच्चारण निर्दोष, मानक और सहज हैं। अब अपने प्रदेशों में जाकर हिंदी पढ़ाने का काम करोगे। (उन दिनों हिंदी में उच्चशिक्षा प्राप्त। व्यक्ति के लिए एक ही क्षेत्र उपलब्ध था- अध्यापन का।) कक्षा के बाहर आने के बाद छात्रों से अपने प्रदेश की भाषा में बात करोगे। हिंदी केवल कक्षा तक सीमित रह जाएगी। परिणामतः इतने परिश्रम से जो भाषा तुम्हारी जुबान पर चढ़ गई है, वह दो तीन वर्षों में। अशुद्ध हो जाएगी। हिंदी शब्दों के उच्चारण पर प्रादेशिक भाषा का लहजा हावी हो जाएगा। मैं भी हिंदीतर भाषी ही हूँ। बहुत प्रयत्न से मैंने इस भाषा पर अधिकार प्राप्त कर लिया है। अगर अपनी इस भाषा को सुरक्षित रखना चाहते हो तो आज मुझे यह वचन दो कि अपने छात्रों से, विभाग के अन्य सहयोगियों से, कक्षा में और कक्षा के बाहर हिंदी में ही बातचीत करोगे। इसके दो फायदे हैं। एक- उन छात्रों को शुद्ध और मानक उच्चारण और मानक भाषा सुनने को मिलेगी और वे तुमसे हिंदी में ही बोलने का प्रयत्न करेंगे।’’ हम सबने उन्हें यह वचन दिया कि हम ऐसा ही करेंगे। मुझे यह कहते हुए फक्र है कि अपने 37 वर्षों के अध्यापन कार्य में मैंने अपने छात्र-छात्राओं, सहयोगियों से कभी भी मराठी में बातचीत नहीं की। इसका अर्थ यह नहीं कि मेरी मातृभाषा मराठी के प्रति मेरे मन में अवहेलना है। घर पर तथा सार्वजनिक जीवन में मैं मराठी में ही बोलता हूँ। मराठी में मैंने काफी लेखन भी किया है। मराठी में व्याख्यान भी देता हूँ। परंतु छात्रों के साथ हिंदी में ही बोलता रहा हूँ। मेरे कई ऐसे छात्र और छात्राएँ- जो अब अवकाश ग्रहण कर चुके/चुकी हैं, आज अपने पोते-पोतियों के अथवा बेटे-बेटी, पति के साथ मुझे मिलने घर आते हैं तो मेरे साथ वे हिंदी में बोलेंगी और दूसरे ही क्षण मेरी पत्नी के साथ मराठी में। डॉ. बाहरीजी को मैंने जो वचन दिया था, उसे मैंने पूरी ईमानदारी के निभाया है। इससे मेरा ही बहुत फायदा हुआ है।

डॉ. बाहरीजी अक्सर यह कहते कि हिंदीतर भाषियों के उच्चारण हिंदीभाषियों की तुलना में अधिक मानक होते हैं। संस्कृत को लेकर भी वे यही कहते। शुरुआत के दिनों में मुझे और शतपथीजी को इसका अनुभव हुआ भी। हमारे विभागाध्यक्ष डॉ. रामकुमार वर्मा थे। अधिकांश छात्र कहते डॉ. बर्मा। 

वाष्र्णेय जी का उच्चारण बाणेय और भाषा का उच्चारण भासा करते हैं। खैर डॉ. बाहरीजी ने मुझ पर पुत्रवत् प्रेम किया। उनकी यह कतई इच्छा नहीं थी कि मैं महाराष्ट्र लौट जाऊँ। उन्होंने मुझसे दो-तीन बार कहा कि यहीं रहो, मेरे मार्गदर्शन में शोध करो, शिष्यवृत्ति की व्यवस्था करता हूँ। और शोधकार्य के बाद इसी प्रदेश के किसी वि.वि. में नियुक्त भी करता हूँ। पर मुझ पर पारिवारिक जिम्मेदारियाँ इतनी थी कि मैं लौट आया।

जिस हिंदू होस्टल में मैं रहा करता था, वहाँ उन दिनों एक नियम था कि अगर कोई भूतपूर्व छात्र- जो अपनी छात्रावस्था में इसी होस्टल में रहा करता था, वह बाद के जीवन में वर्ष में दो बार कभी भी दो या तीन दिन के लिए इस छात्रावास के उसी कमरे में रहकर अपने छात्रजीवन को फिर से जी सकता है। पता नहीं, अब वह नियम है कि नहीं? मेरी शिक्षा पूरी होने के बाद छात्रावास ने जो पत्र हम लोगों को दिया उसमें यह स्पष्ट निर्देश था कि आप भविष्य में कभी भी यहाँ एक-दो दिन के लिए आकर रह सकते हैं। बशर्ते कि इसकी सूचना एक माह पूर्व दे दें। इस नियम के कारण सुमित्रानंदन पंत प्रतिवर्ष एक-दो दिन के लिए इस छात्रावास के उस काल के अपने कमरे में रहने के लिए आते। छात्रों से घंटों गपशप लड़ाते। अपने छात्रजीवन के किस्से-कहानियाँ बतलाते। अपने मित्रों की याद करते। वे पहली बार जब आए तब मैं और शतपथीजी उनसे घंटों बातचीत करते रहे। वे मुझसे कहते कि हमारे पूर्वज मूलतः महाराष्ट्र के थे। इसीलिए तो पंत शब्द मेरे नाम के साथ जुड़ा। वे गोविंद वल्लभ पंत तथा अन्य अनेक पंतों के नाम लेते। संभवतः पानीपत युद्ध की असफलता के बाद महाराष्ट्र के सैनिक अपने प्रदेश में लौटे नहीं। पहाड़ों में चले गए। वहीं बस गए। इसलिए पंतजी कहते अधिकांश श्पंतश् पहाड़ी प्रदेश से ही हैं। मेरे साथी पिल्लै और माचिरेड्डी की ओर देखकर वे अपनी दक्षिण यात्रा के अनुभव सुनाते। उनकी कविताओं को लेकर हम उनसे ढेरों प्रश्न करते। इन्हीं दो वर्षों के बीच उन्होंने वि.वि. की ओर से आयोजित व्याख्यानमाला में छायावादोत्तर कविता पर तीन व्याख्यान दिए। अपने इन व्याख्यानों में उन्होंने यह प्रमाणित किया कि छायावादी कविता उनकी ही कविताओं से आरंभ हुई, प्रगतिवादी कविता भी उन्हीं से आरंभ हुई और नई कविता की शुरुआत भी उन्हीं से हुई। बाद में उनके ये तीन व्याख्यान ‘छायावाद का पुनर्मूल्यांकन’ शीर्षक से प्रकाशित भी हुए।

हम चारों की यह प्रतिक्रिया थी कि पंत सर्वाधिक सुंदर और आकर्षक व्यक्तित्त्व के धनी हैं। संभवतः उन दिनों उनकी आयु 65-70 रही होगी। तब भाी इतना सौंदर्य! भरी जवानी में क्या स्थिति होगी?

छात्रावास में उन दो वर्षों में कैलाशनाथ काटजु भी रूके थे। उनसे स्वतंत्रता आंदोलन पर घंटों बहस हम लोगों ने की। शहर में महादेवी वर्मा, अमृतराय तथा अन्य कई साहित्यकार रहते थे। दो वर्षों के भीतर तीन-चार बार हम लोग प्रयाग महिला विद्यापीठ गए। महादेवी वर्मा से मिलने। उनके कार्यालय में हम उनसे मिले। बहुत ही प्रसन्न और तेजःपुंज व्यक्तित्त्व था उनका। बात-बात पर वे हँसती थी। उड़िसा के रीति-रिवाजों को लेकर हमारे साथी अर्जुन शतपथीजी से उन्होंने ढेरों प्रश्न पूछे। विशेष रूप से महिलाओं की स्थिति को लेकर। दक्षिण में स्त्रियों की शिक्षा को लेकर जानने में उनकी रूचि थी। उनका व्यक्तित्त्व ही कुछ ऐसा था कि उनके सम्मुख नतमस्तक होने की इच्छा होती थी। इलाहाबाद में जहाँ कहीं उनके व्याख्यान होते हम लोग वहाँ पहुँचते। धाराप्रवाह संस्कृतनिष्ठ हिंदी में जब वे बोलती तो लगता कि वाणी की देवी सरस्वती ही मानो बोल रही है। हालाँकि मैं उस आयु में नास्तिक विचारधारा के निकट पहुँच चुका था। बावजूद इसके महादेवी के वक्तृत्त्व की तुलना मैं किसी और से कर ही नहीं पाता था। संभवतः तीसरी बार जब हम उनके यहाँ पहुँचे तो मुस्कुराकर कहा- दक्षिण-पश्चिम और पूर्व भारत इकठे यहाँ आया है। वे यह जानने भी उत्सुक होती कि इतने सुदूर प्रदेशों से हिंदी पढ़ने हेतु इलाहाबाद को ही आपने कैसे चुना? शतपथीजी ने तुरंत कहा- यहाँ महादेवीजी और पंतजी हैं इसलिए हमने इलाहाबाद को चुना तो इसे सुन वे लगातार हँसती रही।

ठीक इसी तरह हम लोग एक बार अमृतरायजी के यहाँ पहुँचे। संभवतः एक या दो वर्ष पूर्व ‘कलम का सिपाही’ प्रेमचंद प्रकाशित हो चुकी थी। इलाहाबाद आने के पूर्व ही मैं उसे पढ़ चुका था। उसमें कुछ चुने हुए सूक्ति की तरह के वाक्य मैंने (1962 में शायद) कलकता से प्रकाशित होनेवाली साहित्यिक पत्रिका ‘ज्ञानोदय’ को भेज दी थी। और उसमें वह छप भी चुकी थी। कलम का सिपाही को साहित्य अकादेमी का पुरस्कार भी मिल चुका था। इन सारे संदर्भो के साथ हम उनके यहाँ पहुँचे। उनके बंगले का नाम था- धूप छाँह। हमारा तो ध्यान नहीं था, परंतु जब हम लौटने लगे तब वे हमें छोड़ने के लिए बंगले के बाहर आए। और उन्होंने कहा कि देखो मैंने अपने बंगले का नाम क्या रखा है। धूूप छाँह- क्यों पता है? पिताजी जिंदगीभर धूप में रहे उनके कारण आज हम लोग छाँह में जी रहे हैं, इसलिए। गोरे-चिट्टे अमृतराय का व्यक्तित्त्व बहुत प्यारा था। वे बोलते भी बहुत ही सुंदर!

हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग का विशाल हिंदी ग्रंथालय हमारे लिए बहुत प्रेरक सिद्ध हुआ। दशहरे की छुट्टियों में सभी छात्र अपने-अपने गाँव चले जाते। हममें से केवल दो- पिल्लै और मैं-छुट्टियों में घर नहीं जाते। तो इन छुट्टियों में मैं दस से करीब पाँच तक सम्मेलन के ग्रंथालय में अध्ययन हेतु जाता। दर्जनों पुस्तकें मैंने यहाँ बैठकर पढ़ी हैं। विषय के नोटस् भी लिए हैं। सम्मेलन में निरंतर साहित्यिक कार्यक्रम हुआ करते थे। ऐसे ही एक कार्यक्रम में लखनऊ से यशपालजी आए थे। पूरे सूट-बूट में। हिंदी के यही एक लेखक थे जो पूर्णरूप से अंग्रेजी वेशभूषा में आए थे। उनके व्याख्यान काफी विचारोत्तेजक होते। कहीं पर भी जोश नहीं, आक्रामकता नहीं। अत्यंत संतुलित ऐसी वाणी में अपनी बात को समझाने की वे कोशिश करते। 

यहीं पर अमृतलाल नागर को भी सुनने का मौका मिला। नागर जी के व्याख्यान में व्यंग्य की मात्रा भरपूर होती। संभवतः अपनी सृजन-प्रक्रिया को लेकर वे बोले। तब तक उनका प्रसिद्ध उपन्यास ‘नाच्यो बहुत गोपाल’ प्रकाशित नहीं हुआ था। अमृत और बूंद के ही संदर्भ उनके व्याख्यान में थे।

परिमल की एक दो गोष्ठियों में भी हम लोग पहुँचे थे। मुझे ठीक से स्मरण नहीं है परंतु श्री लक्ष्मीकांत. वर्मा को मैंने वहीं पर सुना है शायद। छात्रावास से थोड़ी दूरी पर इलाहाबाद का प्रसिद्ध और विशाल बगीचा था। इसमें ही हिंदुस्तानी अकादमी का कार्यालय और संभवतः नृत्य-नाट्य अकादमी भी थी। चंद्रशेखर आजाद का पुतला भी। हम मित्रों की यह अत्यंत प्रिय जगह थी। करीब-करीब रोज शाम हम यहाँ जाते।

अश्कजी के घर में आयोजित नई कहानी के लेखकों के जिस जमघट का मैंने उल्लेख किया, वहाँ पहली बार मैंने राजेंद्र यादव, कमलेश्वर, कृष्णा सोबती, मार्कंडेय तथा अन्य कई लेखकों से मिला। बाद के जीवन में राजेंद्र यादव और कमलेश्वर से लगातार संपर्क रहा। राजेंद्र यादव ने मुझे हंस में छापा तो कमलेश्वर ने सारिका में मेरी लघुकथाएँ प्रकाशित की। मेरे आग्रह पर ये दोनों अलग-अलग वर्षों में लातूर आए। कमलेश्वर तो दो बार आए। लातूर में चल रही हिंदी गतिविधियों को लेकर वे मुझसे बोलते। मृत्यु के पूर्व उन्होंने जो अंतिम पत्र लिखा वह लातूर जिला हिंदी साहित्य परिषद को प्रोत्साहित करने हेतु। उनकी मृत्यु के बाद उनका यह पत्र उनकी पत्नी ने परिषद को भेज दिया इस टिप्पणी के साथ कि उनका लिखा यह अंतिम पत्र है।

1964 में जब मैं एम.ए. द्वितीय वर्ष का छात्र था, तबकी दो महत्त्वपूर्ण घटनाओं ने मेरी समझ को और अधिक व्यापक बनाया। वि.वि. अनुदान आयोग ने इस वि.वि. को एम.ए. हिंदी के पाठ्यक्रमों में समानता लाने हेतु तथा शोध कार्यों (पीएच.डी.) पर राष्ट्रीय स्तर पर नियंत्रण रखनेवाली अथवा मार्गदर्शन करनेवाली किसी एक राष्ट्रीय संस्था की निर्मिति के संबंध में चर्चा करने के लिए विशेष अनुदान दिया था। 1964 तक देश के जितने भी वि.वि. में हिंदी विभाग था, उनके अध्यक्षों को इसके लिए निमंत्रित किया गया। यह चर्चा तीन दिनों तक चलनेवाली थी। इन सबकी व्यवस्था वि.वि. के किसी छात्रावास में की गई थी। इस चर्चा को सफल बनाने हेतु विभाग ने हम छात्रों में से कुछ को चुनकर स्वयंसेवक के रूप में कार्य करने हेतु जिम्मेदारी सौंपी थी। चुने गए छात्रों में मैं भी एक था। हमारी ही कक्षा के प्रेमकांत टंडन हमारे प्रमुख थे। तीन दिन तक सबेरे 8 बजे से रात के 8 बजे तक हमें सक्रिय होना था। अतिथियों को स्टेशन से ले आना, उन्हें उनके कमरे में सामान के साथ पहुँचाना, रोज सबेरे कमरे पर चाय-नाश्ता पहुँचाना, चर्चासत्रों में उपस्थित रहना, हमारी जिम्मेदारी थी। यहीं पर मैंने हिंदी के कई दिग्गजों को सुना, उनके साथ वार्तालाप की।

डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ. नगेंद्र, डॉ. विजयपाल सिंह, डॉ. राधाकृष्ण मुदालियार, डॉ. चंद्रहासन। करीब 70-75 हिंदी विभागाध्यक्ष उपस्थित थे। हिंदी शोधकार्य पर केंद्रीय समिति गठन की जाए, तथा प्रत्येक वि.वि. उनको यहाँ पंजीकृत करने उत्सुक छात्रों के शोधविषयों की सूची भेज दें। यह समिति इन विषयों की छानबीन करेंगी। उसके बाद वह उस विषय को मान्यता देगी। तभी उस विषय पर शोध की अनुमति उस छात्र को दी जाए- इस आशय का वि.अ.आ. का प्रस्ताव था। इस प्रस्ताव का जबरदस्त विरोध डॉ. नगेंद्र ने किया। इस प्रकार की समिति का अर्थ है वि.वि. के विभागों की स्वायत्तता पर आक्रमण तथा शोधकार्य करनेवाले अनुभवी शोधमार्गदर्शकों की योग्यता पर प्रश्नचिह्न! वि.अ.आ. के अधिकारी ने यह स्पष्ट किया कि कृषि तथा कुछ विज्ञान विषयों के लिए इस प्रकार की एक केंद्रीय समिति वर्षों से कार्यरत हैं। इस प्रकार की समिति से शोध-विषयों की पुनरावृत्ति नहीं होगी। स्तर बना रहेगा। डॉ. नगेंद्र ने कहा कि साहित्य तथा अन्य समाज-विज्ञान के विषयों में और विज्ञानविषयक विषयों में गुणात्मक अंतर है। यहाँ एक ही विषय पर भिन्न-भिन्न आयामों से काम हो सकता है, होता भी है। तथा एक ही आयाम के और भी कई सूक्ष्म आयाम हो सकते हैं। इसी परिचर्चा में रीतिसाहित्य के, सनातनी विचारों के एक आचार्य उपस्थित थे। अब मैं उनका नाम भूल रहा हूँ। उन्होंने एम.ए. के पाठ्यक्रमों में से प्रेमचंद को निकाल देना चाहिए- ऐसा सुझाव दिया। उनके अनुसार प्रेमचंद जातिवादी लेखक हैं। उनकी भाषा साहित्यिक भाषा नहीं है। ब्रज तथा अवधि का साहित्य ही सच्चा हिंदी साहित्य है। इन दो में लिखित साहित्य ही पाठ्यक्रम में होना चाहिए। वे खड़ी बोली का भी विरोध कर रहे थे।

प्रेमचंद हिंदी के लेखक ही नहीं है, वे तो उर्दू के लेखक हैं ऐसा भी उन्होंने कहा। उनकी बात खत्म होते ही केरल से आए प्रो. चंद्रहासन जी अध्यक्ष की अनुमति से मंच पर गए। इस आचार्य महोदय के वक्तव्य पर उन्होंने केवल एक ही वाक्य में अपनी प्रतिक्रिया दी और पूरे सभागार में लगातार तालियाँ बजती रही। उन्होंने कहा- “अगर प्रेमचंद हिंदी के लेखक नहीं हैं, अगर उन्हें पाठ्यक्रम में पढ़ाना बंद ही करना है, तो आज से तमाम हिंदीतर भाषी प्रदेशों की ओर से हिंदी को सलाम तथा बिदाई भी।’’ इस परिचर्चा में एक अद्भुत और विलक्षण व्यक्तित्त्व से मेरी भेंट हुई। वे थे तत्कालीन कर्नाटक वि.वि. धारवाड़ से आए डॉ. राधाकृष्ण मुदालियार। भारत के संविधान में उल्लिखित 18 भाषाओं के जानकार। इसके अलावा चार विदेशी भाषाएँ भी वे जानते थे। इन 22 भाषाओं को वे जानते ही नहीं थे, अपितु इनमें वार्तालाप भी कर सकते थे। इन भाषाओं को लिख, पढ़ सकते थे। उनके परिचय में यह सब कहा गया। परिचर्चा की रिपोर्टिंग के लिए इलाहाबाद के कुछ पत्रकार भी आते थे। दूसरे दिन लीडर इस अंग्रेजी समाचारपत्र में तथा स्थानिक हिंदी समाचारपत्र में यह खबर छपी कि 22 भाषा बोलनेवाले एक विद्वान इलाहाबाद आए हैं। यह खबर इलाहाबाद वि.वि. के तत्कालीन उपकुलपति ने शायद पढ़ ली। शायद उसी शाम वे मुदालियार से मिले भी। क्योंकि दूसरे दिन वि.वि. में अध्ययन हेतु आए विभिन्न प्रदेशों के छात्रों को सिनेट हॉल में उपस्थित रहने के लिए कहा गया। प्रत्येक भाषा के एक या दो छात्र। मराठी भाषिक के रूप में मैं, कन्नड भाषी श्री मनोहर जोशी, उड़िया भाषी अर्जुन शतपथी, मल्यालम भाषी शिवशंकर पिल्लै- एक ही कक्षा के हम चार तथा अन्य प्रादेशिक भाषा के छात्र भी उपस्थित थे। थोड़ी ही देर में उपकुलपति डॉ. राधाकृष्ण मुदालियार के साथ हॉल में आए। संयोजक ने प्रत्येक भाषा के छात्रा को एक पंक्ति में खड़े होने के लिए कहा। आश्चर्य कि 16 भारतीय भाषाओं के छात्र एक पंक्ति में खड़े हो गए। बाद में जर्मनी, रूसी, फ्रेंच भाषा जाननेवाले छात्र भी पंक्ति में आए। उपकुलपति वास्तव में मुदालियार जी की परीक्षा ही ले रहे थे। ये दोनों प्रत्येक छात्र के पास जाते, उसे उसकी मातृभाषा पूछते और कहते कि इनसे अपनी मातृभाषा में बातचीत करो। आश्चर्य कि मुदालियार जी प्रत्येक के साथ उसकी मातृभाषा में इतनी सहजता से वार्तालाप करते कि लगता ही नहीं था कि प्रयत्नपूर्वक बोल रहे हैं। हम सबके साथ वे हमारी मातृभाषा में बोलते रहे। उनकी मातृभाषा शायद तमिल थी, या कन्नड़। पर उनके उच्चारण से लगता था कि उनकी मातृभाषा वही है जो मेरी मातृभाषा है। संभवतः दूसरे दिन छात्रों के सम्मुख मुदालियार जी का व्याख्यान रखा गया जिसमें वे यह बतलाते रहे कि इतनी भाषाएँ उन्होंने अब कैसे लिखने-पढ़ने-बोलने सीख ली। बाद के जीवन में मैं उनके साथ पत्रव्यवहार करता रहा। 18 भारतीय भाषाओं में लिखा उनका एक काव्य संकलन उन्होंने मुझे भेजा था। प्रत्येक भाषा में लिखी कविताओं के विषय अलग थे। मुझे दुःख इस . बात का हुआ कि हिंदी के विभागाध्यक्षों ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया। अनेक भाषाएँ ये जानते जरूर हैं, परंतु साहित्य की इनकी समझ सामान्य-सी है- ऐसी इन दिग्गजों की प्रतिक्रियाएँ थी। खैर 

सन् 1964 में हिंदीतर भाषी प्रदेशों में- विशेष कर तमिलनाडु में हिंदीविरोधी आंदोलन ने उग्र रूप धारण किया। क्योंकि संविधान के अनुसार. 1965 से पूरे देश का प्रशासकीय कारोबार हिंदी में शुरू होने जा रहा था। अंग्रेजी का उपयोग पूर्णतः बंद किया जानेवाला था। इस कारण बंगाल और तमिलनाडु में इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई। आंदोलन ने हिंसात्मक रूप धारण किया था। हम हिंदीतर भाषी काफी चिंतित और परेशान थे। क्योंकि इस विरोध के कारण हिंदी भाषी प्रदेशों में हिंदी का अध्यापन ही अगर बंद किया जाएगा तो हमारी स्थिति क्या होगी। हम तो इसी उम्मीद से हिंदी एम.ए. कर रहे थे कि तुरंत कहीं प्राध्यापक या अध्यापक बन जाएँगे। यूँ मुझे बहुत परेशानी होने की जरूरत नहीं थी। क्योंकि शिष्यवृत्ति स्वीकार करने के पूर्व एक बाँड पेपर मुझसे लिखवा लिया गया कि एम.ए. की पढ़ाई खत्म होने के बाद कम-से-कम दो वर्ष मुझे सरकार की सेवा में जाना पड़ेगा। बावजूद इसके इस उग्र आंदोलन के कारण संभवतः सारी स्थितियाँ बदलेगी- ऐसा भय लग रहा था। हिंदी पर आए इस संकट को लेकर चर्चा करने हेतु प्रयाग हिंदी साहित्य सम्मेलन ने एक विशाल सभा का आयोजन किया गया था। जिसमें सभी हिंदीतर प्रदेशों के दिग्गज काँग्रेसी नेता इस विषय पर बोलनेवाले थे। उड़िसा के बिजु पटनाईक, महाराष्ट्र के काकासाहब गाडगिल, इतने दो ही नाम याद हैं- आए थे। तमिलनाडु से कोई काँग्रेसी. नेता आए नहीं थे। संभवतः उन्हें आने से रोक दिया गया था। हमारे छात्रावास में समाजवादी विचारधारा के जो छात्र नेता थे, उन्होंने एक दिन हम चारों को बुलाकर यह कहा कि तुम चार विभिन्न प्रदेश से आए हो। अंग्रेजी में एक निवेदन तैयार कर लीडर प्रेस में दे दो। जिसमें यह लिखो कि इस आंदोलन के पीछे उस प्रदेश की गंदी राजनीति है। आम आदमी तो अंग्रेजी का विरोधी ही है। हम हिंदीतर प्रदेश के छात्र प्रातिनिधिक रूप से यह कह रहे हैं कि हमारे प्रदेशों का हिंदी को विरोध नहीं है। एम.ए. प्रथम वर्ष के लिए आए माचिरेड्डी भी हमारी टीम में शामिल हुए। अर्जुन शतपथीजी ने अंग्रेजी में ड्राफ्ट तैयार किया। हम सबने उसपर हस्ताक्षर किए तथा लीडर (तत्कालीन प्रसिद्ध अंग्रेजी दैनिक, जो इलाहाबाद से निकलता था) में दे आए। दूसरे दिन हमारा यह निवेदन छपा। उसी दिन तत्कालीन प्रसारण मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी इलाहाबाद आई थी। उस छात्रनेता ने हमसे कहा कि शाम को आप पाँचों आनंदभवन जाओ और इंदिराजी से मिलो। उनकी सूचना के अनुसार हम पाँचों वहाँ पहुँचे। वहाँ उनसे मिलनेवाले की कोई भीड़ नहीं थी। हम पाँचों भीतर गए। अपना परिचय दिया तो तुरंत उन्होंने कहा कि हाँ, मैंने अभी थोड़ी देर पहले आपका निवेदन पढ़ा है। बैठिए। हिंदी की स्थिति को लेकर करीब आधा घंटा वे हम पाँचों से बोलती रही। और कहा कि देखें, संसद इसमें से क्या रास्ता निकालता है।
इलाहाबाद से संबंधित ये सुखद स्मृतियाँ जिस प्रकार हैं, वैसे एक अत्यंत दुःखद स्मृति भी इसके साथ जुड़ी हुई है। यह स्मृति मेरे अपने व्यक्तिगत जीवन से जुड़ी हुई है। बहुत उम्मीदें लेकर, शिष्यवृत्ति मिलती है, इसलिए मैं इलाहाबाद गया था। वहाँ जाने के बाद तीसरे ही महीने शिक्षा मंत्रालय दिल्ली से यह पत्र आया कि मंत्रालय भविष्य में आपको शिष्यवृत्ति नहीं दे पाएगा। मैं तो पूरी तरह टूट गया। हालाँकि बी.ए. में हिंदी में मुझे प्रथम श्रेणी के अंक मिले थे। मेरे दूसरे साथी श्री मनोहर जोशी जिन्हें मेरे बाद शिष्यवृत्ति मिली थी, उन्हें तो हिंदी में केवल 50ः अंक थे। उन्हें शिष्यवृत्ति मंजूर हुई थी। शिष्यवृत्ति में से प्रतिमाह मैं घर पर रु. भेजनेवाला था, अब तो मुझे ही यहाँ जीना संभव नहीं था। सहजता से मिलनेवाली डाकघर की नौकरी अस्वीकार कर मैं यहाँ आया था। घंटों मैं रोता रहा। मेरे साथी मेरी यह स्थिति देखकर परेशान थे। वे भी तो क्या कर सकते थे। सभी तो सामान्य घर से ही आए थे। परिवार में हम दस लोग थे। पाँच भाई, तीन बहनें, माँ-पिता। अकेले पिता कमानेवाले। बड़ी मुश्किल से उन्हें प्रतिमाह 40-50 रुपये मिलते थे। पूरा यह परिवार मुझे लेकर सुनहरे सपने देख रहा था। और मुझ पर संकट। ऐसी अवस्था में भी मैंने शिक्षा मंत्रालय को एक पत्र लिखा, जिसमें मैंने यह स्पष्ट किया कि केवल शिष्यवृत्ति के कारण ही मैं इतनी दूर आया हूँ। किस कारण मेरी शिष्यवृत्ति नामंजूर हो गई इसका कारण भी नहीं बताया गया है आदि-आदि। एक पत्र मैंने मेरे शहर के स्वतंत्रता सेनानी तथा सरकारी म.वि. गुलबर्गा में कार्यरत स्मृतिशेष भाऊसाहेब देऊळगावकर को भी लिखा और उनसे निवेदन किया कि गुलबर्गा के सांसद को इसमें ध्यान देने के लिए वे कहें। चारों मित्र मेरा खर्च वहन कर रहे थे और दुःखभरे शब्दों में यह भी कह रहे थे कि अधिक से अधिक. एक माह हम तुम्हारी मदद कर सकेंगे। आगे हमें भी संभव नहीं। भविष्य के प्रति इस अनिश्चितता के कारण एक दिन मैंने कमरे में एक चिठ्ठी रखकर फाफामाऊ की ओर निकल पड़ा। मैंने चिठ्ठी में लिखा था कि “अब तक आपने जो मुझे सहायता की है, उसके लिए धन्यवाद अब मैं हमेशा के लिए इस संसार से विदाई ले रहा हूँ। आत्महत्या के सिवा मेरे सम्मुख कोई दूसरा रास्ता नहीं है।’’ फाफामाऊ यह एक बड़ा पुल है। ऊपर से बसें गुजरती हैं, बीच में से रेल और नीचे गंगा का विशाल पात्र। उस पुल पर से मैं खुद को गंगा में सौंप देनेवाला था। तैरना तो मुझे आता नहीं। इस पुल पर से लोग आत्महत्या करते हैं- ऐसा मैंने सुन रखा था। निकलते समय में मेरे इन मित्रों के कमरे में जाकर रोते हुए उनसे विदाई ली। और मैं तेज कदमों से निकल पड़ा। शपतथी जी को शंका आई। वे तुरंत मेरे कमरे में पहुँचे। मेरे रूममेट जोशी वहाँ थे। उन्होंने जोशी से पूछा रणसुभे कहाँ गया है। उसने कहा पता नहीं। पर मुझसे भी रोते हुए उसने विदाई ली। पता नहीं कैसे शतपथी जी का ध्यान मेरी चिठ्ठी पर गया। पढ़कर वे परेशान हो गए। दोनों तुरंत हमसे एक वर्ष सीनियर चंद्रकांत गर्जे के यहाँ आर्यसमाज कटरा गए। मेरी चिठ्ठी उन्हें बताई। वे भी घबरा गए। तीनों किराए से साईकिल लेकर फाफामाऊ की ओर निकले। बीच रास्ते में उन्होंने मुझे रोका। गर्जेजी से मेरे आत्मीय संबंध थे। हम कॉलेज मेट भी थे। उन्होंने मुझे थप्पड लगाई और. कहा कि मैं जब तक यहाँ हूँ, तुम्हें मरने नहीं दूंगा। मैं उनसे गले लगाकर लगातार रोता रहा। सड़क के किनारे हम सभी खड़े थे। मुझे रोता देखकर लोग इकट्ठे होने लगे। शतपथी जी ने कहा अब चुपचाप हमारे साथ चलो। डबल सीट से हम लोग पहले आर्य समाज पहुँचे। गर्जे ने मुझसे कहा कि देखो, मेरे घर की हालत तुम जानते ही हो। वे उन दिनों डॉ. रघुवंशजी के मार्गदर्शन में पीएच.डी. कर रहे थे। मुझे तुमसे थोड़ी अधिक शिष्यवृत्ति मिलती है। इसके अलावा वि.वि. मैं मराठी भी पढ़ाता हूँ। तुम्हारा पूरा खर्च मैं करूँगा। जो भी मिल रहा है, उसमें हम दोनों निभाएंगे। फिर से ऐसी कोशिश नहीं करनी है। शतपथीजी ने भी कहा कि मुझसे जितना होगा मैं भी कुछ सहायता करूँगा। इस समय तक मैं सामान्य स्थिति में आ गया था। लगातार रोने से दुःख का तनाव भी कम हुआ था। घर पर मैं सहायता नहीं कर सकता था। दो-तीन दिन बाद पिताजी को विस्तार से मैंने सारी स्थितियाँ स्पष्ट की। पिताजी भाऊसाहब देऊलगांवकर जी से मिले। मेरा पत्र भी उन्हें मिला था। तत्कालीन सांसद स्वतंत्रता सेनानी और देऊलगांवकर जी आत्मीय मित्र थे। देऊलगांवकरजी ने सांसद महोदय को सारी स्थितियाँ विस्तार से बतलाई और कहा कि इस होनहार लड़के को शिष्यवृत्ति मिलने की व्यवस्था करो। सांसद महोदय ने व्यक्तिगत रूप से इसे गंभीरता से लिया। वे शायद केंद्रीय शिक्षा मंत्री से मिले। चक्र घुमने लगे। केवल एक तकनीकी दिक्कत के कारण शिष्यवृत्ति नामंजूर हुई थी। करीब दो माह बाद शिष्यवृत्ति मंजुरी का पत्र मिला जनवरी में। शिष्यवृत्ति की राशि इकट्ठे 31 मार्च के पूर्व भेजी जाएगी- ऐसी सूचना दी गई। मार्च 1964 तक का मेरा सारा खर्च चंद्रकांत गर्जे वहन करते रहे। शिष्यवृत्ति की राशि मिलने के बाद मैंने उन्हें उनकी पूरी राशि लौटा दी। अगर उस दिन शतपथीजी दौड़धूप न करते तो मैं शायद ही यह दिन देख पाता और गर्जे मेरी सहायता न करते तो...खैर

मेरे जीवन में इलाहाबाद के इन दो वर्षों की क्या उपलब्धियाँ रही, इस पर जब मैं सोचने लगता हूँ तो लगता है कि साहित्य के क्षेत्र में मैंने जो कुछ भी काम किया, उसके मूल में इलाहाबाद के ये दिन ही तो थे। यहाँ जाने के पूर्व मेरी जो हिंदी थी, वह वास्तव में हिंदी नहीं थी- डॉ. हरदेव बाहरी के शब्दों में वह दखनी थी। जिस प्रदेश में मेरा बचपन बीता और स्नातक तक की पढ़ाई जहाँ हुई वह गुलबर्गा निजाम रियासत का एक हिस्सा था। और तब के निजाम रियासत की अर्थात् हैदराबाद रियासत की जनभाषा दखनी ही थी। दखनी से हिंदी की ओर मेरी यह जो भाषिक प्रगति हुई, उसके मूल में इलाहाबाद के वे दिन ही थे। इलाहाबाद के कारण ही मुझे अर्जुन शतपथीजी, माचिरेड्डी जैसे हिंदीतर भाषी प्रदेश के मित्र मिले, ठीक उसी तरह राजेश्वरी प्रसाद खरे, प्रेमकांत टंडन, आस्थाप्रसाद द्विवेदी, शिवशंकर पांडेय जैसे मित्र। मनोहर जोशी तथा चंद्रकांत गर्जे तो मेरे बचपन के तथा महाविद्यालयीन जीवन के मित्र थे जो मेरे साथ इलाहाबाद में पढ़ाई हेतु आए थे। डॉ. हरदेव बाहरी, डॉ. जगदीश गुप्त, डॉ. रघुवंशजी जैसे विद्वान प्राध्यापक। बाद के जीवन में भी इनसे मिलना होता था। इनमें से डॉ. हरदेव बाहरी जी का अत्यधिक स्नेह मुझे मिला। सत्यप्रकाश मिश्र भी मेरे क्लासफेलो थे। बाद में वे इसी विभाग के अध्यक्ष भी बने। परंतु अपनी छात्रावस्था में उनकी कोई विशेष पहचान नहीं थी। करीब 70-80 छात्रों में से वे भी एक छात्र थे। इतना ही। आश्चर्य यह कि उन दिनों हमारी कक्षा में करीब 30-35 छात्राएँ भी थी। इलाहाबाद ने ही मेरी साहित्यिक समझ को अधिक समृद्ध किया। डॉ. जगदीश गुप्तजी के कारण तत्कालीन नई कविता- नई कहानी- के प्रति आकर्षण बढ़ा। हिंदी के दिग्गज साहित्यकारों के संपर्क में मैं आया। इस सबका अच्छा असर बाद की मेरी अध्यापन शैली पर हुआ। अध्यापन का कार्य कितना चुनौती भरा है- इसका अहसास हुआ। अध्यापन पर न्याय करने हेतु कितना कठोर परिश्रम करना पड़ता है- इसका अहसास. मुझे यहाँ हुआ। डॉ. रघुवंश जी हमें कहते कि किसी भी रचनाकार की एक रचना पढ़कर. उस रचना का विवेचन-विश्लेषण करना बेमानी है। इसके लिए जरूरी है कि उसकी समग्र रचनाओं को अध्यापक पढ़े। उनके इस वाक्य का इतना गहरा संस्कार मुझ पर हुआ कि मैंने अपने अध्यापकीय जीवन में इस सूत्र का ज़िंदगी भर पालन करता रहा। सौभाग्य से जिस. म.वि. में मैं अध्यापक बना, वहाँ ग्रंथालय में पुस्तकें मँगवाने की मुझे पूरी छूट थी। इस कारण जितने भी लेखकध् कवि/नाटककार पाठ्यक्रम में लगाए गए उन सबकी समग्र रचनाएँ मैं मँगवाता था और उन्हें पूर्ण रूप से पढ़ने के बाद ही उस रचना पर बोलता।

इलाहाबाद के हिंदी विभाग में उन दिनों संभवतः 20-25 प्राध्यापक थे। हमारा संपर्क तो केवल 7-8 प्राध्यापकों से हुआ। क्योंकि यही लोग स्नातकोत्तर कक्षाओं को पढ़ाया करते थे। डॉ. रामकुमार वर्मा, डॉ. हरदेव बाहरी, डॉ. रघुवंश, उमाशंकर शुक्ल, शैलकुमारी, डॉ. जगदीश गुप्त, डॉ. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय और डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी। इनमें से प्रत्येक अपने विशेष क्षेत्र के जाने माने विद्वान थे। डॉ. रामकुमार वर्मा को छोड़कर किसी में भी न अहंकार था, न पद प्रतिष्ठा की लालसा। सब अपने-अपने क्षेत्र में पूरी निष्ठा से काम कर रहे थे। इसका कहीं गहरा प्रभाव मेरे अचेतन मन पर हुआ होगा। व्यक्ति की सही पहचान किसी पद से नहीं होती, अपितु उसके काम से, उसके आचरण से होती है इसका अहसास मुझे यहाँ हुआ। इसी कारण मैंने कभी भी पद के लिए, पुरस्कार के लिए, प्रतिष्ठा के लिए, आर्थिक फायदे के लिए कोई प्रयत्न नहीं किया। अपनी 37 वर्ष की सेवा में मैं 28 वर्ष विभाग में तीसरे स्थान पर था। कई स्थानों से मुझे प्राचार्य या विभागाध्यक्ष के रूप में बुलावाः आया पर मैं सहजता से इन निमंत्रणों को नकारता रहा। इलाहाबाद के इन प्राध्यापकों, लेखकों, कवियों से मैंने सीखी विनम्रता, सहजता, स्पष्टता और कठोर परिश्रम करने की वृत्ति। मेरे व्यक्तित्त्व को आकार दिया है इलाहाबाद ने। मेरे विचारों को दिशा मिली है इलाहाबाद से ही। इलाहाबाद ने ही मुझे प्रखर बौद्धिक दृष्टि दी। प्रतिकूल स्थितियों में संघर्ष करने की जिद्द भी।