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माना मुझे नसीब तेरा दर नहीं हुआ
December 14, 2019 • विनोश प्रकाश गुप्ता • ग़ज़लें

माना मुझे नसीब तेरा दर नहीं हुआ

मेरा जुनूने1-इश्क़़ भी कमतर नहीं हुआ

 

नदियाँ नज़र बचाके सब आपस में मिल गई

कमज़ोर फिर भी कोई समुन्दर नहीं हुआ

 

भटका तो हूँ तलाश में, मंज़िल की उम्र भर

लेकिन कमाल ये है कि बेघर नहीं हुआ

 

मलबे तले दबी हुईं लाशों को देखकर'

हैरत2 की बात ये है, मैं पत्थर नहीं हुआ

 

घर फूंकने की अब तो, रिवायत है भीड़ की

अच्छा हुआ जो ज़द में मेरा घर नहीं हुआ

 

मुस्तैद आदमी के पसीने से ये दयार

ज़रख़ेज3 हो न हो कभी बंजर नहीं हुआ

 

जब से हुआ ख़िलाफ़ हवेली के मैं 'शलभ'

सर को नसीब कोई भी छप्पर नहीं हुआ