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नरेंद्र मोहन की कविता : ज़िन्दगी का पर्याय
July 24, 2020 • सुषमा कपिल  • लेख


सुषमा कपिल 

'जितना बचा है मेरा होना'  नरेंद्र मोहन  के काव्य संकलन  की इस प्रस्तुति में पाठकों की पसंद की कविताएं  हैं।  मित्रों के अनुरोध को ध्यान में रखते हुए भी कई विशिष्ट कविताएं संकलित हुई हैं।   नरेंद्र मोहन  इस पुस्तक की भूमिका में अपनी कविताओं के बारे में ळिखते हैं, "जो हो, आप जानते हैं और मैं भी कि ऐसा कोई भी संकलन संपूर्ण नहीं हो सकता।  हाँ, आपकी दृष्टि से और एक हद तक मेरी दृष्टि में भी कल और आज की मेरी प्रिय कविताओं का यह एक संकलन हो सकता है।

नरेंद्र मोहन ने साहित्य की अन्य विधाओं (आलोचना, नाटक) पर लिखते हुए लम्बी कविता-यात्रा की है।  कविता विधा पर नये प्रयोग करते हुए उन्होंने  इसे नये आयाम देकर इस विधा को समृद्ध किया है।  इतने लम्बे कालखंड तक नरेंद्र मोहन का सृजन-कर्म में निरंतरता बनाए रखना ऐतिहासिक कार्य है क्योंकि कवि रुकता नहीं, ना ही उसकी गति मन्द होती है।  रचनाकार का लगातार लिखना जोखिमपूर्ण ही सकता है।  लिखते- लिखते Dead end आ जाता है पर कवि एकरूपता तथा एकरसता के बोझ से कविता को बचाता हुआ आगे बढ़ता है। वह दायरों में सिमटा न रहकर कविता के क्षेत्र में नयी राहें, नवीन सम्भावनाएँ और विशाल फलक खोजने में कामयाब हो जाता है इसीलिए उसके काव्य-कोष में जीवन के यथार्थ से जुड़ी विसंगतियों को चित्रित करती द्वन्द्व पूर्ण  कविताएं हैं, चित्रों, रंगों के माध्यम से कथ्य की शैली है, नृत्य को कथ्य में मूर्त्त करने की शैली है, पुतुल-कला से अभिव्यक्ति की शैली है, इन्हे माध्यम बना कर कविता की आत्मा में पिरोया गया है और उसमें जान डाल कर जीवन्त किया गया है।  यह विविधता नरेंद्र मोहन की कविता-यात्रा में हुआ अभिनव प्रयोग है।

कविता के क्षेत्र में नरेंद्र मोहन की पहचान "विचार" कविता से बनी।  कवि ने कविता में नये प्रयोग किए हैं और आज भी कर रहे हैं। उनकी कविताओं में कई मूडस-शेडस अपना प्रभाव छोड़ते हैं।

कवि ने रचनाकार के रूप में एक मोड़ पर जैसे यू टर्न ले लिया और उनकी कविता नये विचारों से जुड़ कर नृत्य और चित्रकला की ओर मुड़ गयी।  यह परिवर्तन ऐसा है जो नये अनुभवों अभिरुचियों को अभिव्यक्ति देने में समर्थ हुआ।

नरेंद्र मोहन की कविता में पाठक दाखिल होते रहे हैं और कविताओं  को परखते रहे हैं और उनकी धुरी में बने केंद्रीय रूपक खोजते रहे हैं और इन प्रश्नों के उत्तर तलाशते रहे हैं कि क्यों आग, नदियाँ और पेड़ उनकी कविताओं में बार-बार आते हैं, क्यों उनके साथ स्मृतियों के वर्तुल और साहचर्य जुड़ते हैं।

उनकी कविताएं वादों के दायरों से मुक्त हैं।  मार्क्सवादी, लेनिनवादी, प्रगतिवादी और जनवादी विचार धारा की अपेक्षा  आज का सच उनकी कविता में उभरा  है।  उल्लेखनीय यह है कि कवि ने कविता का मुहावरा खुद गढ़ा है। नरेंद्र मोहन बहुआयामी प्रतिभा से सम्पन्न कवि, आलोचक और नाटककार हैं।  कविता में एस्थेटिक्स को बदलने का परामर्श पुराने प्रतीकों तथा बिम्बों को यथावत न रख सौंदर्य चेतना के नये साँचे गढ़ने का वे आग्रह करते हैं।  नरेंद्र मोहन की कविता सामाजिक सरोकारों से जुड़ी कविता है जिसमें जीवन का यथार्थ सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक विडम्बनाओं के साथ अभिव्यंजित हुआ है।

"जितना बचा है मेरा होना" काव्य-संकलन की कविताएं राजनीतिक विसंगतियों और विद्रूपताओं की अभिव्यक्ति करती हैं।  नेताओं-और व्यवस्था पर कवि का आक्रोश 'दीवारें कँपाती हँसी', 'हँसी फूटने पर', 'हँसते-हँसते', विसंगति, 'इस हादसे में', 'दुख है!' कविताओं में व्यक्त हुआ है।  असल में नरेंद्र मोहन का काव्य निरपेक्ष दृष्टि का प्रतिपादन करता है वह किसी भी राजनीतिक दल का समर्थन या असमर्थन नहीं करता और सत्ताधारी निरपेक्ष नहीं रहता।इसी कारण वह अपने हितों और स्वार्थों को साधने के लिए  परस्पर भिड़ाने का काम करता है नरेंद्र मोहन ऐसे नेताओं पर व्यंग्य करते हुए ' 'इस हादसे में' कविता में कहते हैं-'पर सम्मोहन टूटने के बाद/भूकम्प आया/चीज़ें बजबजा उठीं/उलट-पुलट गईं/और आप यह जुगाड़ बैठाते रहे/आपका हाथ कहीं न दिखे/पूरे हादसे में! राजनीतिक हालातों से चिन्तित और विक्षुब्ध होकर नेताओं पर  विक्षोभ व्यक्त करते हुए  कवि कह उठता है  -'लेकिन मुझे इस हालत में पहुँचा कर/आप निर्लिप्त और निरापद बने रहेंगे/और मैं शान्ति-पाठ करता रहूँ/यह मुमकिन नहीं!'

सामाजिक, राजनैतिक संरचनाअस्त-व्यस्त और विकृत हो चुकी है। नरेंद्र मोहन की दृष्टि के अनुसार हास्यस्पद स्थितियों और विडम्बनाओं  को स्वीकारा  नहीं जा सकता है।  ऐसे माहौल में सत्य के लिए प्रतिबद्ध व्यक्ति को लज्जित होना सीखना पड़ रहा है। विवश मन:स्थिति की पीड़ा को उदघाटित  करती 'सेवकराम' कविता में सेवकराम ऐसे नेताओं का और शक्ति सम्पन्न लोगों का प्रतिनिधित्व करता है जो वाक् पटु और हाज़िरजवाब हैं, संवाद रसिया हैं,बातों के बादशाह हैं किसी का सीधा खड़ा दिखना सेवकराम जैसे लोगों को बर्दाश्त नहीं उनका कद दैत्यकार हो गया है।इस सम्बन्ध में कवि सेवक बने नेताओं पर कटाक्ष कसते हुए कहता है-'वह जानता है यही है सेवक की शक्ति का रहस्य/और हुंकारता हुआ टूट पड़ता है/'राम'और 'राज्य' के विरोधियों पर/बीरबल लगे या हनुमान//उसे साधना है काम/राजा राम बरकत दें'

'हथेली पर अंगारे की तरह' कविता आगजनी, हत्याकांड और बलात्कार के जलते माहौल से संतप्त होकर लिखी कविता है। कवि सौंदर्य और कला को भी बचाना चाहता हैपर सत्ताधारियों द्वारा फैलाई अव्यवस्था तथा अराजकता से बेचैन हो कर कह उठा है 'मेरे साथियों को आग में झोंक कर/तुम मुझे शांत और निर्विकार रहने की सलाह/ दे रहे हो/कविता में/ जब कि मैं महसूस कर रहा हूँ/कविता को/ हथेली पर अंगारे की तरह!' 'कवि के सामने हिंसा, रक्तपात और आगजनी की घटनाएं रोज़ घट रही हैं भयावह परिवेश है। 'मुझे कल्पना दो' कविता में राजनीतिक विद्रूपताओं को देख कर नरेंद्र मोहन कहते हैं 'मेरा संकट दृश्य का नहीं/दृश्य के सामने गूंगा हो जाने का है/मुझे कल्पना दो, कालिदास!/मुझे कल्पना दो! आपातकाल की घुटन और उसके बाद का राजनीतिक परिदृश्य  कवि की कविताओं में चित्रित होता है।

विभाजन के दर्द, संताप और संत्रास का  बिम्ब प्रस्तुत करने वाली कविताएं हैं जैसे- 'वह घर', 'दिल्ली में लाहौर, लाहौर में दिल्ली' 'मैं ही मरा हूँ आसपास'। इन कविताओं में विभाजन की त्रासद, टूटने बिखरने की विवशता पूर्ण और तनावपूर्ण  दशाओं का अंकन हुआ है  जिसमें आम आदमी की व्यथा और छटपटाहट बोलती है कवि के अकेले का दर्द न होकर समूची मानव जाति का दर्द इन कविताओं में गुंथा है जिन्होंने विभाजन का संत्रास झेला और भोगा है। कवि इस संत्रास का भोक्ता है।  -'अँधेरे में साया/ अँधेरे में चीख/ दिल्ली में लाहौर/ लाहौर में दिल्ली/ खींचता लाहौर/ भींचता दिल्ली/ दोनों से निर्वासित/ दोनों से जुदा/ अपने को खोजता/ एक घर तलाशता/ हाँफ - हाँफ जाता'।  इन पंक्तियों में लय और ध्वनि का संयोजन अपूर्व और बेमिसाल है।  काव्यात्मक भाषा में निर्विकार ढंग से कहा गया यथार्थ, विभाजन का दंश  सहृदय को डसता है।  सीधे सरल शब्दों में कवि के भीतर व्याप्त हाहाकार, व्यथा पाठक तक सहज सम्प्रेषित होती हैं। सम्प्रेषणीयता की दृष्टि से भी कवि की कविताएं उत्कृष्ट हैं।

बाल्यावस्था में आगजनी, मारकाट, रक्तपात, लाशों के भयावह दृश्यों, दहला देने वाली चीखें उसके भीतर ज़िंदा हैं उसकी स्मृतियों में नत्थी हैं।  इन दृश्यों ने उसे भीतर तक रौंदा है।  अपने घर से टूटने, उखड़ने की असंख्य लोगों की पीड़ा, टीस नरेंद्र मोहन की बन गई  है और विभाजन की त्रासदी के विविध पैटर्न काल के अंतरालों को चीरते हुए अभिव्यंजित हो गये हैं। इन कविताओं में कवि की आत्मा और अनुभूति के स्पन्दनों की तरंगें और ध्वनियां सहज सुनी जा सकती हैं।  'सृजन का मुहूर्त' कविता में विभाजन से पूर्व का दृश्य है जब बाहर करफ़्यू है 'शूट एट साइट' का आर्डर है हवा में एक गोली घूम रही है आसमान में थरथराहट है ऐसे भयावह परिवेश में रात के बारह बजे प्रसव पीड़ा से माँ कराह रही है कवि के जन्म की घड़ी आ गयी है पर करफ़्यू को रौंद कर कौन आएगा- 'पकड़ो,मारो, काटों की हिंसक बुलंद आवाज़ें/आती हैं मुझ तक/गर्भ के अँधेरे को चीरती और/माँ की कँपकँपी/तेज करंट सी कँपा जाती है मुझे'

सामाजिक जीवन में व्याप्त विसंगतियों  से भी कवि चिंतित है । 'रक्तपात' कविता ऐसी कविता है जिसमें   कवि दोहरे व्यक्तित्व से व्यथित है, इस कविता में कवि का वैयक्तिक समष्टि के दुख से जुड़ गया है । आम आदमी की वेदना और छटपटाहट 'रक्तपात' कविता में व्यक्त हुई है-'खुला आम रास्ता बंदगी में झुकते हुए/पाबंदी में/खुला आम रास्ता है और/चुना हुआ रास्ता दाएँ-बाएँ में पिचक कर/संकरा होता जाता है दिनों-दिन' बिलकुल यही पीड़ा 'कहाँ ख़त्म होती है बात!' कविता में हृदयस्पर्शी ढंग से प्रखरता सहित प्रतिफलित हुई है । विघटित होते मूल्यों के प्रति बेचैनी, कवि के अन्तर्द्वन्द्व केसाथ उभरती है। आधुनिक परिवेश में मूल्यगत अवमूल्यन के यथार्थ को जीवन्त और सजीव   करती है-'मरना और बचना/कितना अलग-अलग कितना समान है/इस माहौल में/आतंकित-सा/अपने सत्य के लिए लज्जित होना सीख रहा हूँ'   कवि जीवन के प्रति आशान्वित और सकारात्मक है वहीं जीवन में बदलाव और परिवर्तन का हिमायती है।  वह पुरानी रुढ़ियों, मान्यताओं और ढाँचों के फ्रेम से  बाहर आकर जीवन में आस्था और विश्वास चाहता है।  "जैसे हम पाते हैं प्रेम" कविता में कवि का यही दृष्टिकोण लक्षित हो रहा है- "उन चीजों से बाहर आना/ जिनकी हमें आदत पड़ गई हो/ उन ढाँचों को तोड़ना/ जो हमारे भीतर खप गये हों/सुरक्षित जगह से बाहर आना/ खुले मेंजहाँ चित्र और शब्द हों/ फिर भी न हों पहले जैसे/ एक भरोसा हो"  एक ही राह पर चलते चले  जाने  के कारण और हर आँधी से खुद को बचाने की आदत ने उसे ऐसी हवेली में लाकर खड़ा कर दिया है  जहां से रास्ते बन्द हो गये हैं आशा की किरण तब दिखाई देती है जब अजीबोगरीब हवेली में एक खिड़की खुली दिखाई देती है- एक खिड़की खुली है अभी"  में प्रतीकात्मकता तथा सांकेतिक शब्दों का प्रयोग करके अनन्त सम्भावनाओं की अभी भी खिड़कियां खुली होने का संकेत करता है। कविता में कवि कहता है- "घुप्प अँधेरे में/ देखता हूँ/ सीढ़ीनुमा एक खिड़की/ खुलती हुई/ आसमान की तरफ"

नरेंद्र मोहन की कविता में सांस्कृतिक विकास के  लिए गहरे स्तर पर चिन्ता व्यक्त होती है।  कवि का बचपन लाहौर में बीता है। रावी नदी वह बचपन में लाहौर में छोड़ नहीं आया है अपितु उससे विरत और अलग होने के लिए विवश होना पड़ा है पर रावी से असम्पृक्त वह कभी नहीं हो पाता है क्योंकि रावी से  बाल्यकाल से गहरा, आत्मीय, प्रगाढ़ सम्बन्ध रहा है,नदी से मिला ममत्व और स्मृति उसे उद्वेलित करती है उसे विस्मृत  न कर  पाने की व्यथा कविता में  वैचारिक संवेदना और गहनता के साथ उभरती है।तेज़ रफ़्तार और यान्त्रिक जीवन शैली ने हमें संवेदनहीन बना दिया है नदी जो जीवन दायिनी है उससे हमारा आत्मीय सम्बन्ध नहीं रहा। सांस्कृतिक धरोहरों की रक्षा और उसकी स्वच्छता और शुचिता की अवहेलना का परिणाम नदियों का प्रदूषित होना है। कवि युग दृष्टा है और युग सृष्टा है उसे नदी की तलाश है।  एक नदी उसे शुरू-शुरू में दिल्ली में दिखती  थी अब क्यों नहीं दिखती। 'क्या नदी मर चुकी है?' कविता में कवि का मानसिक द्वन्द्व बड़े ही मार्मिक  ढंग से बिम्बित हुआ है-'आप हैरान हैं और भौंचक से देखते हैं/इन्तज़ार और रफ़्तार के बीच स्तब्ध/शहर के‍ अहसास में/क्या नदी मर चुकी है?'

पर्यावरण, परिवेश और सांस्कृतिक विकास  को लेकर कवि की सजगता और चिन्ता 'पेड़' कविता के माध्यम से सामने आयी है। कवि  का देश, पेड़, नदी से  प्रगाढ़ सम्बन्ध रहा है । इस कविता में नरेंद्र मोहन ने प्रकृति के दोहन की विडम्बना संवेदनशीलता से व्यक्त की है जिसमें कवि का असीमित काव्य कौशल कलात्मकता से उभर कर आया है।  जिसमें सरलता, संक्षिप्तता के साथ-साथ सघनता और सांकेतिकता प्रभावी ढंग से व्यक्त होती है-'पितामह/मुझे जड़ें दो जलाने के लिए ‌.....' एक वाक्य में व्यंजना और व्यंग्य और उसमें गहरे अर्थों की अनेक छायाएं,ध्वनियाँ  सामाजिक,सांस्कृतिक पतन की विडंबना को अभिव्यक्त ही नहीं करती बल्कि सांस्कृतिक विकास और उत्थान के लिए कटिबद्ध होने के लिए उत्प्रेरित करती हैं।

कवि के वैयक्तिक दुख, संताप और चिंताओं और द्वन्द्व को अभिव्यंजित करती कविताएं भी उभरी है  पिता के प्रति गहन प्रेम 'क्या यह गिद्ध तुम्हारी भविष्यवाणी में शामिल था?' कविता में प्रकट होता है।   पिता के अन्तिम समय कवि पिता के साथ है। पिता की मृत्यु के अहसास से गुजरना, स्मृतिहत होना और पिताविहीन होने को महसूस करते हुए पुत्र  के शोकाकुल होने,जड़ और निस्पन्द होने की अवस्था कारुणिक है-'वह खोद रहा है और नोच रहा है/मेरे भीतर पिता की जड़ें/मैं उनकी मौत के अहसास से गुज़र रहा हूँ/मैं स्मृतिहत हो रहा हूँ/मैं पिता विहीन हो रहा हूँ'

छोटे बच्चों के संवेदनशील मन पर तस्वीर में मृत पड़े बच्चों को देखकर क्या प्रभाव पड़ता है,नरेंद्र मोहन की 'चुप्पी' कविता में मनोवैज्ञानिक चित्रण हुआ है । इस कविता में पिता अपनी भूमिका तथा दायित्व के प्रति बेहद    सजग दिखाई देता है,वह अपने तीन साल के बच्चे को मार-काट की हृदय विदारक तस्वीरों से दूर रखने के लिए उसका ध्यान खिलौनों की ओर आकर्षित करता है इस डर से कि कहीं हिंसा के दृश्यों को देखकर वो हँसना या बोलना ही न भूल जाए-'मैं देखता हूँ/वह चुप है वह कुछ पूछता क्यों नहीं/क्या उसने वह तस्वीर देख ली है?

पत्नी की मृत्यु के पश्चात विरही कवि का आत्मीय एवं प्रगाढ़ प्रेम खुशबू , अँधेरा-उजाला जैसी कविताओं में बिम्बित हुआ है।  पत्नी के निधन के पश्चात कवि जैसे टूट गया, जड़-सा हो गया, उसे लगा उसका अस्तित्व मिट गया । पत्नी के वियोग और विछोह से संतप्त मनोदशा में लिखी कविताएं ऐसी हैं जिनमें पत्नी के अभाव का दुख पराकाष्ठा पर है- "पूरे घर को उजलातावह दीया नहीं होगा/ जो मेरे लिए बराबर जलता रहा"

पुतुल-कला के माध्यम से नरेंद्र मोहन की अभिव्यक्ति ने जैसे नये द्वार खोले हैं।  परिवेश और व्यवस्था के प्रति चिंता और तनाव पुतुल कविताओं के माध्यम से - 'पुतली-नाच',  ‘मुर्दा या ज़िंदा', 'मेरा नाचना', 'खंभे मुँह ताकते रहे' में प्रकट हुआ है। इन कविताओं में स्थितियों, विवशताओं तथा तनावों से घिरा व्यक्ति कई रूपों में नज़र आता है। कवि ऐसी विडम्बना पूर्ण स्थितियों पर चोट करता है- "लाशें गिरती हैं- गिरें! / बम फटते हैं- फटें!/ नौटंकी जारी है- तो!" क्रोध और करुणा, गुस्सा और चुप्पी  के समीकरणों ने उनकी कविता को नया अंदाज़ दिया है। पुतुल कला के माध्यम से कवि ने अव्यवस्था की तीखी और खुल कर भर्त्सना की है जिसके के कारण अभिव्यक्ति में पैनापन आ गया है।

चित्र-कला और चित्र प्रदर्शनियों से नरेंद्र मोहन प्रभावित हुए। चित्रों में उकेरे अनूठे विचार,भाव, प्रकृति, रंग  बिम्ब में कवि तन्मय होता है और चित्रों में अन्तर्निहित सत्य से हतप्रभ और सम्मोहित होकर उस का शब्द-चित्र प्रस्तुत करता है।  कवि कला और स्मृति का सह-संयोजन तीव्रता से अनुभव करता है और छायाएं शब्द रूप में  ढालता है। कवि स्वयं अनुभव करता है कि मूर्ति, पेंटिंग, छाया-चित्र और नृत्य‌-प्रयोग के सामने खड़े होकर उसके भीतर का "मैं" और का और महसूस करता है।             

रंग और चित्र कला से प्रभावित होकर लिखी कविताएं 'रंग बनती चट्टानें', 'रंग-आलाप', 'अवचेतन' ' जैसे हम पाते हैं प्रेम',' रचना- क्षण,'  ' कँपकँपाती रंग परते , 'रंग बोलने लगे', ' अब', ' मृदंग की थाप हैं'।अब" कविता इस दृष्टि से बहुत विशिष्ट है। सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक परिवेश और तंत्र की उठा-पटक और असंगति को अपनी तूलिका से रंग देने वाले चित्रकार की अपनी क्षमता है, कवि ऐसे चित्रों के कलात्मक सौष्ठव से जहाँ प्रभावित होता है वहाँ उसकी बेचैनी, तिलमिलाहट प्रश्नाकुलता के साथ रूपायित हुई है अपने सामने के परिदृश्य की तपन, विद्रूपता  और चित्र में प्रर्दशित  बिडम्बना की एकरूपता उसे झंझोड़ती है।  " पूरे तंत्र को/ कैनवस को/ मुट्ठी में भींचता/ एक अघोरी तांत्रिक/ हँसी को घोर अट्टहास में बदलता/ यह तुमने क्या बना दिया"

नरेंद्र मोहन की नृत्य-कला पर शब्दबद्ध हुई और चित्रित  कविताएं इस कला की ऊपरी परतों को ही नहीं अपितु इसके बहुआयामी तथा भीतरी स्वरूप को खोज रही हैं। नृत्य-मुद्राओं और नृत्य-गति की बारीकियां कवि के शब्द-विधान में ढल कर जैसे चित्रित हो उठी हैं। ।  इन कविताओं को पढ़ कर ऐसा प्रतीत होता है कि कवि ने नृत्य को कला के रूप में समझा भी है और विस्तृत अध्ययन भी किया है। नृत्य एक कला है और कला अपने आप में गर्भित।  इसकी अपनी छटाएं हैं रंग हैं। 'एक नृत्य लगातार', ' नाच', ' नृत्य-छवि''नृत्य- भाषा', 'क्या करूँ', ' अलात-चक्र' नृत्य-कला से सम्बन्धित कविताएं हैं।  नृत्य, संगीत, धुन, लय, ताल वेश- विन्यास, प्रकाश-व्यवस्था के समन्वय के अतिरिक्त अनेक विविध पहलुओं पर दृष्टि रखते हुए, नर्तकी की बाहरी भंगिमाओं को और नृत्य में सम्पूर्ण आत्मा की एकतान, एकाकार अवस्था को नरेन्द्र मोहन ने दक्षता से शब्दों में बांध कर उस समग्र सौन्दर्य को जीवन्त कर दिया है निस्संदेह नृत्य-कला का ऐसा अभिनव प्रयोग और परिकल्पना हिन्दी कविता के इतिहास में दो कलाओं की विशेषताओं का परस्पर घुल जाना और निखर आना उत्कृष्ट और अनूठा भी है।

'एक नृत्य लगातार' कविता का उदाहरण-' एक गूँज की अनन्त ध्वनियाँ/ एक रंग की हज़ारों छायाएँ/ आँखो में, ओठों में, कटि में, घुंघरूओं में/ पूरी देह-भाषा में/ एक नृत्य लगातार' "अवचेतन "कविता  में जैसे अपने शब्द-विधान से चित्र बन गया है।' पहाड़ियों पर चिनार के झुरमुट हैं/ जलते हुए/ एक दूसरे पर उठी चट्टानें हैं/झुलसी हुई/ और नदियों में आग है'

"शब्द : एक आसमान" कविता में कवि के लिए शब्द में झांकना और उड़ना अपने होने को अनन्त में पाना है। शब्द कवि की मुक्ति का रास्ता है। दृश्य से बाहर होते जा रहे शब्द में कवि की जान है-'लौटता हूँ शब्द में/शब्द में एक कुआँ है/जिस में झांकता हूँ/शब्द में एक समुद्र है/जिस में उतरता हूँ/शब्द में एक आसमान है/जिस में उड़ता हूँ'  नरेंद्र मोहन अपनी कविता के कथ्य और शिल्प के प्रति अत्यंत सजग और गम्भीर रहे हैं और उसे परिष्कृत करने  में वे पूरा वक्त लगाते हैं। विचार हों या भाव अनुकूल और सटीक शब्द की खोज उनके कवि-कर्म का हिस्सा है। कवि अपनी कविताओं में अतीत को  सम्मलित करता है आज को रचता है।  कवि प्रतीकों, मिथकों के माध्यम से धरती की जड़ों तक पहुँचता है।         

आज की नयी पीढ़ी से कवि का विशेष जुड़ाव है।  नयी पीढ़ी भी कवि से जुड़ी हुई है और कवि द्वारा स्थापित काव्य-भाषा के प्रातिमानों से प्रभावित हो कर निर्देशन पाती रही है ।  कवि भाषा के प्रति बहुत सतर्क और जागरूक है और  काव्य-भाषा की तलाश में रहा है।  वह नयी भाषा गढ़ना चाहता है, भाषा में हरकत पैदा करना चाहता है, भाषा को ज़िंदा रखना चाहता है और उसे भ्रष्ट होने से बचाना चाहता है।  भाषा के प्रति चिन्ता कई कविताओं में प्रकट होती है- भाषा-कर्म, मुझे कल्पना दोशब्द: एक आसमान आदि । कवि सरल शब्दों का प्रयोग करता है,  'भाषा अचानक काठ कैसे हो गयी  कविता  में कवि की चिन्ता अंकित है - ' भाषा को ज़िंदा करने/ यानी भाषा के ज़रिए ज़िंदा महसूस करने की/ राह में कभी अड़ता है सर कभी कुर्सी कभी हैसियत/ कभी तीनों एक साथ'  कवि की काव्य-भाषा के गहरे अर्थ आसमान जैसी व्यापकता और खुलापन देते हैं इसी प्रकार  उनकी कविताओं मे "हँसी" तथा "आग" शब्द का प्रयोग  ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा साहित्यिक विभिन्न सन्दर्भों में हुआ है।  "हँसी" कभी चरित्र की विक्षिप्तावस्था को प्रकट करती है कभी खिसियाहट को व्यक्त करती है, कभी व्यवस्था, सत्ता का पर्दाफाश करती है - 'न बम फेंका, न गोली चलाई।/ सिर्फ़ हँसा था और पकड़ लिया गया था।कवि ने भाषा को भाव और अभिव्यक्ति के स्तर पर सक्षमता प्रदान करने के लिए व्यंग्य, बिम्ब, प्रतीक, फंतासी, संवाद योजना नाटकीयता का प्रयोग  किया है। शब्द के  सार्थक और कारगर प्रयोग का उदाहरण- "लौटता हूँ शब्द में शब्द में एक कुआँ है/ जिसमें झांकता हूँ/ शब्द में एक समुद्र है/ जिसमें उतरता हूँ/ शब्द में एक आसमान है/ जिसमें उड़ता हूँ"।  कवि भाषा में कृत्रिमता, बनावटीपन  तथा अलंकरण स्वीकार नहीं करता। उनकी भाषा बोलचाल की भाषा है जिसमें शब्द पानी के समान  बहते हैं।    

आग, नदियाँ, हँसी और पेड़  शब्द कवि की कविताओं में बार-बार आते हैं, और उसके साथ उसकी स्मृतियों के वर्तुल बनते हैं ये साहचर्य कैसा है? उसके उत्तर कविताओं में मिलते हैं जहाँ अर्थों के स्तर  की व्यापकता नरेंद्र मोहन की अभिव्यक्ति को उत्कृष्ट और उच्चकोटि का बनाती है।  'हँसते- हँसते' कविता में कवि कहता है-सन्नाटा तानाशाह की जान है/ और हँसी सन्नाटे के सीने में धँसता हुआ तीर/ हँसते- हँसते जान  ले लोगे क्या ?'

'अग्निकाण्ड जगहें बदलता' नरेंद्र मोहन की बहुचर्चित लम्बी कविता है।  इस कविता के बीज उनके बचपन के कड़वे, झकझोरने वाले तथा हिला देने वाले अनुभवों में अन्तर्भुक्त हैं, जिन झेले सन्तापों  की अमिट छाप उनके भीतर अंकित हो गई है ।  व्यक्ति का दुख, रोदन, हाहाकार, चीत्कार और रक्तपात निरन्तर कवि के मन को मथते और उद्विग्न करते रहे हैं,  इन स्मृतियों ने हमेशा उसे विचलित किया है।  जिन असंख्य लोगों ने विभाजन का सन्त्रास झेला है उस आम आदमी की निरीह अवस्था, उसकी बेचारगी नरेंद्र मोहन की मनोदशा के माध्यम से स्पष्ट होती है जिसमें भारत विभाजन की त्रासद स्थितियों की विद्रूपता इस कविता में सजीव हुई है। यह लम्बी आत्मकथात्मक कविता मानवीय मूल्यों के ह्रास को रेखांकित करती है।  "सच सच बताओ,हनीफ!/क्या तुम्हारी आँखो में खून नहीं उतर आयेगा/ जब कोई तुम्हारे सामने/ तुम से वह जगह झपट ले"  विभाजन पर यह पहली लम्बी कविता है जिसके वर्णन का प्रकार घटनात्मक है। कवि की अनुभूति में सच्चाई है, द्वन्द्व समय के अन्तरालों को पार करता हुआ भी कवि के अन्तर्मन से लिपटा हुआ है। अभिव्यक्ति का कौशल समष्टि की पीड़ा मूर्त्त कर सका है। भाषा का सार्थक प्रयोग है। कहीं-कहीं चित्रमयता और प्रतीकात्मकता है।  कवि इतिहास से जुड़ी घटनाओं को  तथा यूसुफ़ की यातना, पीड़ा, प्रताड़ना को चित्रित करता है। नरेंद्र मोहन के उस्ताद यूसुफ  इस कविता के केन्द्रीय पात्र  हैं।   विभाजन के समय और उसके पश्चात के  विद्रूप हालातों में यूसुफ उभरते हैं।  साम्प्रदायिकता की आग धर्म के नाम पर अलग-अलग जगहों पर नज़र आती है इस आग के विभिन्न रूप कविता  में उभरते हैं।

 ‘खरगोश चित्र और नीला घोड़ा' कविता में 'खरगोश' फ्रेम तोड़कर खतरे का सामना करने के लिए बेचैन है।  यह प्रेम के अनुभव पर लिखी कविता है जिसमें साम्प्रदायिक विद्वेष की आग है।  कविता की विशेषता यह है कि प्रेम की लपट सलमान और सुचित्रा में मृत परम्पराओं को कचरे में जलाने की शक्ति पैदा करती  है।  'वे जानना चाहते हैं इस मुस्कराहट का रहस्य/ वे फ्रेम को उसके गिर्द खड़ा करने का/प्रयत्न करते हैं बार-बार/ समझाने की सभी कोशिशें बेकार'  चित्र में 'भूकंप' दृश्य का प्रतीक है। 'कांपने लगी रेखाएं और रंग' भयावहता का,'कचरे को जलाती एक लपट' दोनो तरफ आकांक्षाओं के पूर्ण होने के लक्ष्य का प्रतीक है।

कवि की कविता समय और युग की वास्तविक स्थितियों, परिस्थितियों तथा सामाजिक सरोकारों के ताप में तप कर  ढलती है।  उसका द्वन्द्व, तनाव, तर्क और विचार से जुड़  कविता में अभिव्यंजना पाता  है।  कवि सनातन मूल्यों तथा आदर्शों के लिए बेचैन और आकुल रहा है जिसकी अनुगूँज बादल की गर्जना के समान समूचे काव्य के नेपथ्य में सुनायी देती है। नरेंद्र मोहन की कविता समस्त दायरों  को समेटती हुई युगीन दायरों से बाहर आकर शिखर छू चुकी है फलस्वरूप नरेंद्र मोहन का काव्य  कालजयी बन गया है।