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नेकी
September 16, 2020 • अनुवाद: नासिरा शर्मा • पुस्तक

जहां तक हो सके नेकी करो, यह नेकी कभी फल देगी

मैंन ऐसा सुना है कि उन दिनों जब बग़दाद बादशाह मुतावककिल की हुकूमत थी तो उनके पास फतेह नाम का एक लड़का था जो ज्योतिषियों के अनुसार बड़ा भाग्यवान, कला से परिपूर्ण और अच्छे दिनों का अधिकारी था। मुतावककिल ने उसको गोद ले रखा था और वह उनका बेटा बन कर जीवन व्यतीत कर रहा था। एक बार फतेह का दिल चाहा कि तैरना सीखे। उसकी इच्छा जानकर मुतावककिल बादशाह ने तैराकी के उस्तादों को फतेह को तैरना सिखाने का हुक्म दिया। फतेह तैरना सीख गया था पर अभी तैरने में निपुण नहीं हुआ था न ही पानी से उसका डर ही पूर्ण रूप से दूर हुआ था जैसाकि बच्चों की आदत होती है अपने को दिखाने की और प्रशंसा लूटने की, बस इसी जोश में एक दिन फतेह बिना उस्तादों के तैरने गया, आगे जाकर वह भंवर में फंस गया, बहुत प्रयत्न किया कि उस भंवर से निकल आए मगर उसकी सारी काशिशें बेकार गईं और उसने बचने की आस झोड़ कर हाथ पैर ढीले छोड़ दिये और लहरों के सहारे अपने बदन को पानी के हवाले कर दिया और मरने को तैयार हो गया।

बस्ती से बहुत दूर वीराने में बहता चला गया, एकाएक उमड़ती तुफानी बड़ी-बड़ी पानी की लहरों ने उसको नदी के किनारे बने गड्ढे की ओर उछालना शुरू कर दिया यह देख अगले थपेड़े पर उसने अपने को तैयार किया और लहरों के उछालने के साथ खुद भी उछला और उन गड्ढों में से एक में जाकर गिरा और वहीं बैठ गया और खुदा पर भरोसा करके सात दिन सात रात उसी में बैठा रहा।

पहले दिन ही मुतावककिल बादशाह को खबर मिल गई कि फतेह डूब गया है। सुनते ही तख्तशाही से उतर कर ज़मीन पर बैठ गया और तैराकों को बुला कर हुक्म दिया, “जो भी फतेह को मेरे पास ज़िन्दा या मुर्दा लाएगा, उसे सौ दीनारें इनाम में दूंगा”, उन्होंने सौगन्ध खाई कि जब तक वे उसे ढूंढ़ कर नहीं लाएंगे वह एक दाना भी जबान पर नहीं रखेंगे।

सारे ग़ोताख़ोर व तैराक नदी में कूद पड़े और फतेह को ढूंढने लगे। सातवें दिन उन तैराकों में से एक तैराक उस गड्ढे के पास पहुंचा। फतेह को देखकर वह खिल उठा बादशाह सलामत और फतेह से बोला, “मैं जाता हूं और फौरन ही नाव लेकर आता हूं।” सीधे महल की ओर तैरता हुआ गया और भागता हुआ बादशाह के पास पहुंचा और बोला, बादशाह सलामत अगर मैं फतेह को ज़िन्दा ले आऊं तो आप क्या देंगे?

बादशाह ने कहा, “पांच हज़ार दीनारें नकद इनाम में दूंगा।

मैंने उसे ढूंढ लिया है। अभी लेकर आता हूं। सिपाही नाव लेकर गये और फतेह को ज़िन्दा ले आए। बादशाह ने पहले बचनानुसार पांच हजार दीनार इनाम में दी फिर कहा, "फौरन खाना लाओ! सात दिन सात रात से भूखा होगा, मेरा बेटा!"

फतेह बोला, मेरा पेट भरा है।” मुतावककिल ने कहा, “क्या पानी से पेट भरा है?" नहीं!! मुझे इन सात दिनों में, हर रोज एक सेनी (थाली) में दस रोटी मिल जाती थी। बहते हुए थाल से मैं उचक कर दो तीन रोटी उठा लेता था। और उसी को खाकर ज़िन्दा रहा। हर रोटी पर लिखा रहता था “महोम्मद बिन हसन स्काफ।” यह घटना सुन कर बादशाह ने ढिंढोरा पिटवा दिया कि, “वह मर्द कौन है जो दज़ले में रोटी बहाता है। बादशाह उसके साथ अच्छा नेकपूर्ण व्यवहार करना चाहते हैं।

दूसरे दिन एक आदमी आया और बोला, “मैं ही वह आदमी हूं जो दज़ले में रोटी बहाता हूं।"

बादशाह ने पूछा, “लेकिन सबूत क्या है? कोई निशानी, कोई पहचान?"

“केवल यही पहचान है कि हर रोटी पर, “महोम्मद बिन हसन स्काफ” लिखा होता

"हूँ! “ठीक है, पहचान तो सही है! कितने दिन हुए तुम्हें नदी में रोटी बहाते?" बादशाह ने पूछा।

आदमी बोला, “बस! यही एक साल भर हुआ है।"

“मगर यूं रोटी बहाने से तुम्हारा क्या मतलब है?"

आदमी बोला, “मैंने सुना था कि नेकी कर दरिया में डाल यही एक दिन तुम्हें फल देगी।” मैं साल भर से यही कर रहा हूं। “जैसा सुना था तुमने वैसा ही किया और फल पाया भी।" बादशाह ने कहा

उसके बाद उसने अपने राज्य बागदाद में पांच गांव उसे बख्श दिये।

वह आदमी उन पांचों गांव का मालिक बन कर नेकी करके दिन गुज़ारने लगा। (क़ाबूसनामा)

अनुवाद: नासिरा शर्मा, नई दिल्ली, मो. 9811119489