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निज़ामी गंजवी
September 15, 2020 • अनुवाद: नासिरा शर्मा • पुस्तक

निज़ामी गंजवी : कवि निजामी का जन्म 535 हिज्री के लगभग ‘गंज’ में हुआ। उनकी मसनवी का प्रभाव ऐसा शायरी पर पड़ा कि बाद में आने वाले कवियों ने उनके अनुसरण में मसनवी लिखी जिस में ख्वाजू, जामी और वहशी इत्यादि हैं निज़ामी ने अलग अलग विषयों पर पाँच मसनवी लिखीं, मख़जन अल असरार, लैला व मजनूं, खुसरू व शीरिन, हफत पैकर (हफत गुम्बद) और सिकन्दर नाम जिसको ख़मसा कहा जाता है।

आधा पत्थर

एक था बादशाह फिरोजबख्त। बहुत बड़ा राज्य था उसका। एक-से-एक विद्वान उसके दरबार में थे। हर तरफ सुख और वैभव फैला था। फिर भी बादशाह और बेगम दुखी रहते थे। उनके कोई बच्चा न था। वे सोचते रहते, 'इतने बड़े राज्य को कोई वारिस नहीं।'

बादशाह साठ वर्ष का हुआ, तो उसके यहाँ एक लड़के का जन्म हुआ। सारा राज्य खुशी में झूम उठा। महीनों तक राज्य में उत्सव हुए। शहज़ादे का नाम रखा गया जाने आलम।

ज्योतिषियों ने बताया, “शहज़ादा सुख-चैन से राज्य करेगा। दिन दूनी, रात चौगुनी शोहरत बढ़ेगी। यह तीन ब्याह रचाएगा। पहली पत्नी का वह आदर नहीं करेगा। दूसरी, तीसरी सुख से रहेंगी। एक पक्षी के कारण शहजादे को बहुत दुःख उठाने पड़ेंगे।"

धीरे-धीरे दिन बीतने लगे। शहज़ादा जवान हुआ, तो बादशाह ने ब्याह कर दिया। उसकी पत्नी माहेतिलत बहुत सुंदर थी।

एक दिन जाने आलम और माहेतिलत घूमने निकले। रास्ते में एक बूढ़ा तोते. बेच रहा था। शहज़ादे को बोलने वाला तोता बहुत पसंद आया। उसने तोता खरीदा और महल में ले आया।

एक शाम शहज़ादा देर से शाही महल लौटा। देखा, माहेतिलत गुस्से में भरी . बैठी थी। वह बोली, “यह तोता बहुत खराब है। इसे यहाँ से दफा करो। यह कहता है कि कोई मुझसे भी अधिक सुंदर है।"

यह सुन, शहज़ादा हँस पड़ा। बोला- “छोड़ो, इन पक्षियों की बातों का बुरा नहीं मानते।" फिर तोते से पूछा, “कौन है माहेतिलत से सुंदर?"

तोता बोला, “पश्चिम की तरफ ज़रनिगार नाम का शहर है। वहाँ की शहज़ादी अंजुमन आरा संसार की सबसे सुंदर औरत है।"

यह सुनते ही शहज़ादा तोते से बोला, “तू मुझे रास्ता बता। मैं वहाँ जाऊँगा।"

पत्नी ने बहुत रोका, मगर शहज़ादा माना नहीं। उसने तोते का पिंजरा खोल दिया। तोता उड़ चला। आगे-आगे तोता, पीछे-पीछे घोड़े पर सवार शहज़ादा। चलते-चलते वे एक घने जंगल में पहुँचे। शहज़ादे को सामने से हरे कपड़े पहने हुए एक बूढ़ा आता दिखाई दिया। बूढ़े ने शहज़ादे को देखा, तो जंगल में आने का कारण पूछा। शहज़ादे ने उसे सारी दास्ताँ बता बता दी।

यह सुन, बूढ़ा बोला, “शहज़ादे, तुम्हारा भला इसी में है कि तुरंत यहाँ से लौट जाओ। आगे का रास्ता जादूगरों से भरा हुआ है।।"

शहज़ादा हठ का पक्का था। बोला, “मैं किसी भी तरह अंजुमन आरा की , एक झलक देखना चाहता हूँ।"

“तुम झलक ही देखना चाहो, तो मैं दिखा सकता हूँ। जरा आँखें बंद करो।"

शहज़ादे ने आँखें बंद कर लीं। उसे शहज़ादी अंजुमन आरा की एक झलक दिखाई दे गई। बूढ़े ने फिर रोका, मगर वह नहीं मानना।

चलते-चलते वह एक तालाब के किनारे पहुँचा। शहज़ादे को प्यास लग रही थी। तालाब के किनारे आया। पानी पीने झुका, तो उससे तालाब में अंजुमन आरा की सूरत दिखाई दी। बिना सोचे-विचारे वह तालाब में कूद पड़ा।

उसके कूदते ही तालाब गायब हो गया। अब वहाँ चारों तरफ रेगिस्तान नज़र आने लगा। शहज़ादा समझ गया कि वह किसी जादूगर के चक्कर में पड़ गया है।

शहज़ादा कुछ सोचने लगा। उसे भी जादू आता था। उसने तुरंत जेब से एक कागज निकाला। उसे सूरज की ओर करके मंत्र पढ़े।। रेगिस्तान फिर से तालाब में बदल गया।

शहज़ादे ने तालाब से बाहर आकर देखा, उसकका घोड़ा मरा पड़ा था। तोते का भी कहीं पता न था। निराश हो, वह पैदल ही तोते के बताए हुए रास्ते पर चल पड़ा।

भूख और प्यास से शहज़ादा परेशान हो गया। था। एक जगह बेहोश होकर गिर पड़ा। होश आया, तो देखा, वह एक महल में है। उसके आस-पास राजसी कपड़े पहने कुछ लोग खड़े थे। पास ही एक शहज़ादी भी खड़ी थी। वह वहाँ के बादशाह की बेटी मेहरनिगार थी।

बादशाह को भी शहज़ादे के वहाँ आने के कारण का पता चल गया था। वह भी जादू जानता था। जादूगरों का बादशाह शहपाल उसका गहरा मित्र था।

शहजादे की लगन देख, बादशाह बहुत प्रसन्न हुआ। शहजादे को लोहे का एक डंडा देकर बोला, “यह डंडा हमेशा अपने पास रखना। हर मुसीबत में तुम्हारे काम आएगा।" फिर उसने शहज़ादे को विदा कर दिया।

ज़रनिगार शहर वहाँ से सिर्फ चालीस कोस दूर था। जैसे-तैसे शहज़ादा वहाँ जा पहुँचा। पूछने पर पता चला कि एक जादूगर शहज़ादी अंजुमन आरा को उठाकर ले गया है।

यह सुनते ही शहज़ादा जादूगर के पड़ाव की ओर चल दिया। घने जंगल में डरावनी आवाजें गूंज रही थीं। रास्ते में हरे रंग का एक हिरन उछलकर उसके सामने से भागा। शहज़ादे ने तीर मारकर हिरन का खात्मा कर दिया तभी भयानक जंगल, गायब हो गया। हिरन जादूगर ही था। डरावनी आवाजें भी बंद हो गईं। शहज़ादे के सामने अंजुमन आरा खड़ी मुस्कुरा रही थी।

दोनों खुशी-खुशी अंजुमन आरा के पिता के पास आए। बादशाह ने बेटी की शादी शहज़ादे से कर दी। कुछ दिन वहाँ रह, शहज़ादा अंजुमन आरा के साथ लौट चला।

रास्ते में शहज़ादे ने मेहरनिगार से भी विवाह कर लिया। दोनों पत्नियों और अनेक दास-दासियों के साथ शहज़ादा लौट रहा था। एक रात उन्होंने जंगल में पड़ाव डाला। रात को एक दासी दौड़ती हुई आई। बोली, “अंजुमन आरा के पेट में बहुत दर्द है। अपनी लोहे की छड़ी फौरन दे दीजिए।"

शहज़ादा घबरा गया। उसने तुरंत छड़ी उसे दे दी। छड़ी पाते ही दासी का रूप बदल गया। वह जादूगरनी थी। उसने उन सबके आधे शरीर को पत्थर बना दिया।

मेहरनिगार के पिता का मित्र और जादूगरों का सरदार शहपाल वहाँ से जा रहा था। अपने दोस्त की बेटी का यह हाल देख, वह क्रोध से भर उठा। उसने जादूगरनी को युद्ध के लिए ललकारा।

दोनों में भयानक युद्ध होने लगा। अंत में जादूगरनी हार गई।

शहपाल ने लोहे का डंडा शहज़ादे को वापस दे दिया। बोला, 'बोला, “इसे अपने से कभी अलग मत करना।” यह कह, उसने उन सबको फिर से पूरा मनुष्य बना दिया।

शहज़ादा धूमधाम से अपने राज्य में पहुँचा। पुत्र को वापस वापस आया देख, बादशाह बहुत प्रसन्न हुआ।

अनुवाद: नासिरा शर्मा, नई दिल्ली, मो. 9811119489