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पारो उत्तरकथा उपन्यास : प्रणय, प्राण और प्रारब्ध का एक दस्तावेज़ीय अवलोकन
July 23, 2020 • सुदर्शन प्रियदर्शिनी • साहित्य नंदनी


सुदर्शन प्रियदर्शिनी, यू.एस.ए., ईमेल: sudershen27@gmail.com

 

आकाश से उतारे गए तमाम पवित्र ग्रन्ध और इंसानी कलम से लिखी गयी सभी पुस्तकों के पृष्ठ पर पृष्ठ उलटते जाइये, संसार के इतिहास पर नज़र डालिये, ललित कलाओं का जायज़ा लीजिये, संस्कृति समाज और धर्म की विभिन्न मंज़िलों का सूक्ष्म अध्ययन कीजिये - हर जगह, हर क्षेत्र में, हर देश में और हर काल में विधाता की सुन्दरतम रचना नारी का उल्लेख है। कहीं उसे ईश्वर का वरदान कहा गया है, कहीं धरती की सुषमा और कहीं स्वर्ग की जान। कवियों ने उसके रूप से अपनी कविता की दुकानें सजायीं हैं। चित्रकारों ने उसके सौष्ठव को केनवस पर उतारा है। मूर्तिकारों ने उसकी सौम्याकृति को पत्थरों में ढाला है। संगीतकारों ने उसके माधुर्य को सुरों में उभारा है। संक्षेप में, नारी का जन्म समय की सबसे बड़ी आवश्यकता थी। टेढ़ी-तिरछी, उल्टी-सीधी, फीकी-सीठी जिंदगी को- एक रंग, एक रूप, एक मिठास, एक आकर्षण, एक लालित्य, एक लावण्य, एक संतुलन की आवश्यकता थी।

पुरुष सत्ता समाज में पुरुषों की दोरुखी और दोगली चालों ने महिलाओं की मिट्टी पलीद करके रख दी। वह कुरूप होती है तो सुरूप की इच्छा करता है। सुरूप होती है तो अशिक्षित होने का ताना देता है। शिक्षा से सज्जित होती है तो उसके हाथ से क़लम छीनकर चिमटा और फुकनी थमा देता है। यह है उस नारी की कहानी- जो शताब्दियों से पुरुष की क्रूरता का शिकार रही है। क्रूरता की सीमा सिर्फ यहीं तक नहीं होती बल्कि शारीरिक व मानसिक यातनाएँ देने में भी पुरुषों को सुख की अनुभूति होती है।

इतिहास साक्षी है जब-जब नारी द्वारा अपनी आवाज बुलंद करने की कोशिश की गई है, तब-तब इस समाज ने उसकी आवाज की गूंज को दबाने का भरसक प्रयास किया है। जिस तरह एक पुरुष को अपने निर्णय लेने की स्वतंत्रता होती है, वैसी स्वतंत्रता एक नारी को नहीं दी जाती। पुरुष कभी भी इस समाज के हाथों खिलौना नहीं बना बल्कि महिलाओं को हमेशा मिट्टी की बेजान मूरत समझता रहा है। इसी के चलते वह महिलाओं की भावनाओं को लहूलुहान करता रहा है। उनकी इच्छाएँ, उनके सपने, उनके जीने की चाह, उनकी तमन्नायें, उनकी बेबकियाँ, उनकी मोहब्बतें व उनके ख्वाबों को पुरुषों द्वारा पैरों तले रौंदा गया है। यहाँ तक कि उनकी पसंद-नापसंद व जीवन साथी के चुनाव को लेकर भी सैकड़ों सवाल उठाए जाते हैं और अंत में उनकी मर्जी के बिना उन्हें एक खूटे से बाँध दिया जाता है।

ऐसे ही खूटे से बँधी नारी की कहानी 'पारो-उत्तरकथा' उपन्यास में वर्णित है, जिसे अमेरिका की प्रवासी लेखिका सुदर्शन प्रियदर्शिनी द्वारा बुलंद आवाज व जज्बातों के साथ बेबाकी से मुखरित किया गया है।

कथानक का प्रारंभ पारो द्वारा देवदास को खोजने से होता है। पारो देवदास से बात करना चाहती है, उससे मिलना चाहती है, अपनी व्यथा बताना चाहती है, अपने मन की पीड़ा को उजागर करना चाहती है। देवदास के कंधे पर अपना सर रखकर अपने मन का बोझ हल्का करना चाहती है लेकिन देवदास का वजूद न पाकर पारो कहती है कि 'देवदास तुम दिखाई क्यों नहीं दे रहे हो?' इस पर देवदास कहता है- 'तुम्हारे और मेरे बीच यह आत्म-अनात्म का पर्दा है पारो! यह अंतरिक्ष और वह पृथ्वी ! यह पूरी कायनात हमारे बीच प्रहरी बनकर खड़ी है पारो ! कैसे आऊँ तुम तक?'

ऐसी विवशता, ऐसी बेचैनी व ऐसी अनेक बाधाएँ एक प्रेमिका को अपने प्रेमी से मिलने नहीं देती और उसके जीवन जीने के अर्थ को बदल देती हैं। ऐसी विरह वेदना में आत्मा तभी तड़पती है, जब वह परमात्मा से नहीं मिल पाती है। यहाँ पर उपन्यासकार प्रेमी व प्रेमिका के मिलन की तड़प को न दिखाकर आत्मा को परमात्मा से मिलने की चाह में तड़पता दिखाती है।

इस आध्यात्मिक प्रेम की चरम सीमा के साथ-साथ सामाजिक ताना-बाना भी बुना गया है। जिस समय पारो अपने इष्टदेव (देवदास) से बंद आँखों के सहारे मिलन की अनुभूति प्राप्त करती है तभी रायसाहब (पारो के पति) के द्वारा पारो को प्रताड़ना देने का कार्य शुरू कर दिया जाता है। उसे भूखा रखना, बात-बात पर जलील करना, कटु बातें बोलना, तीखे व्यंग्य कसना, गरीबी का ताना देना और हर वक्त आलोचना करके यह एहसास दिलाना कि 'तुम जैसी गरीब, असहाय, लाचार महिला से शादी करके हमने एहसान किया है और तुम उस एहसान के तले दबी रहो व कभी सर ऊपर उठाकर बात न करो।'

इस पर लेखिका रायसाहब की माँ के द्वारा ही सवाल दाग़ती है कि 'क्या गरीब हो जाने से स्त्री की मर्यादा कम हो जाती है ? क्या ग़रीबी उसके सारे हुकूक (अधिकार) खत्म कर देती है? कहते हैं कि पुरुषसत्तात्मक समाज में सिर्फ पुरुषों को ही सारे अधिकार होते हैं। महिलाओं की थोड़ी सी सुबुहाट भी उन्हें पसंद नहीं होती। तभी तो अपनी माँ की बात सुनकर रायसाहब कहते हैं कि 'मैं पुरुष हूँ.... पराए मर्द का अस्तित्व क्यों सहूँ...?' इसलिए रायसाहब पारो को पत्नी का अधिकार नहीं देते।'

रायसाहब के इस दुर्व्यवहार के कारण लीलामई (रायसाहब की माँ) सोचती है कि वह कैसे इतने सालों से इन दीवारों के बीच इस ऊँची महलनुमा कोठी में एक अतृप्त आत्मा सी भटकती रही है। अंदर से ध्वस्त लेकिन किसी दुर्ग के समान अपने आप को संभालती हुई, लड़ती हुई आज तक पिंजरे में फड़फड़ा रही है।'

पिंजरे से मुक्त होने को आतुर लीलामयी के माध्यम से सुदर्शन प्रियदर्शिनी यह बताने का प्रयास करती हैं कि आत्मतत्व सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर परम सत्ता में विलीन होना चाहता है। परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग तय करने में सदियाँ लग जाती हैं। इसे चाहे कर्म की लीला, जन्म की लीला कहें या फिर जन्म और मरण के बीच अभिशप्त समय के बीत जाने देने की लंबी प्रतीक्षा करें। इस सांसारिक दीवारों के पार तक पहुँचने के बीच शताब्दियाँ लग जाती हैं। इन पीड़ा के पहाड़ों पर न जाने कितना चढ़ना, उतरना और लांघना होता है। इस संसार से उस संसार तक पहुँचने के लिए कई बार लहूलुहान भी होना पड़ता है।

अपनी लहूलुहान भावनाओं को समेट कर नारी हर रोज मरकर भी नहीं मर पाती। ढीठतायी की हद तक जीती चली जाती है। नारी को बचपन से ही नारीत्व की घुट्टी पिलाकर उसे एक स्थिति विशेष में गढ़ दिया जाता है कि 'वह दासी है, पति का घर उसका अंतिम पड़ाव है और अंतिम छोर है। उसको लांघना नरक में जाने के बराबर है क्योंकि उसका दर्जा दोयम ही है।

सदियों से नारी की इस त्रासदी के कारण ही 'पुरुष अपने सत्ता के आतंक से औरत का तन ही नहीं लूटता बल्कि मन-मानस प्राण सब कुछ खसोटता है। यही बात उपन्यास में रायसाहब की माँ के मुख से कुँवर साहब (पति) के लिए विवशता के स्वर में मुखरित होती है कि 'क्या उन्होंने कभी मेरी इच्छायें जानी या मेरे प्यार को समझा? कभी मेरी ओर आँख भर कर देखा तक नहीं। जब कभी देखते तो केवल अपनी किल्लोलो के लिए, अपनी भूख के लिए, वह भी कभी-कभी अपनी उस ऊदबिलाव सी आँखों वाली छन्नों के सामने मुझे निरावरण करके मेरा उपहास उड़ाने के लिए।'

कहते हैं कि प्यार तो स्त्री और पुरुष में अंतर नहीं करता। प्यार समाज की बनी बनाई इमारतों पर नहीं लिखा जाता। उसका तो अपना एक फ़लक होता है, फिर ये पुरुषों ने प्यार के कौन से तरीके अपनाए हैं? इन्हीं सवालों के साथ उपन्यास में पारो के 'अस्तित्व का संघर्ष' चित्रित किया गया है।

देवदास तो अपने कर्तव्य पथ पर चलकर अपना दायित्व पूरा करता है। 'वह पारो को लेकर जिया व पारो को लेकर मरा। यही तो जीवन का मुक्ति मार्ग होता है। जब व्यक्ति अपने निर्धारित मार्ग पर चलकर अंतिम पड़ाव पर पहुँच जाता है, तब उसकी मुक्ति हो जाती है। प्यार की मुक्ति... प्यार से मुक्ति.... मोह से मुक्ति.... संसार से मुक्ति।'

उस पारो का क्या ? जो अपनी माँ के अहम के सामने अपना जीवन न्यौछावर कर देती है, जो अपने हाथों ही अपने प्रेम की बलि चढ़ा देती है। देवदास अपना दायित्व निभा कर अमर हो जाता है लेकिन पारो पूछती है - 'यह कौन सा दायित्व था प्यार का देव कि मेरी चौखट पर आकर अपने प्यार का बलिदान करना ? कैसी प्रताड़ना है यह प्यार की ? कैसी अवहेलना है यह नैतिकता की ? जिस पारो की मान-मर्यादा तुम्हारे लिए सब कुछ थी, उसी को रौंद दिया- लोगों के पैरों तले।'

इतना सुनते ही देव की आत्मा कुछ क्षणों के लिए तिरोहित होने लगी और सोचने लगी कि यही नियति में लिखा था। प्रेम को तो देवत्व का स्थान दिया गया है पर युगों-युगों से इस प्रेम की भावना को ताड़ना ही मिली है, तिरस्कार मिला है। शरीर के वाहन पर चढ़कर इसकी अन्विती होती है। क्या यही इसका दोष है? 'प्राप्ति की तृप्ति क्या इसकी नियति नहीं है ? शरीर गौण भी हो जाए तब भी सच्चा प्यार अवहेलना ही झेलता है।'

दूसरी तरफ पारो सोचती है कि 'यह जीवन, यह ताम-झाम, जिसे उसके प्यार को ठुकराने के लिए और अपना स्वत्व का अहं रखने के लिए उसकी माँ ने जुगाड़ा था। शायद वही सत्य है, कल्पना मिथ्या है। देव की परछाई भ्रम है। प्यार एक छलावा है। अतीत व्यतीत हो गया। यह वह सत्य है जिसे हाथ में मसल-मसल कर भी कुछ हाथ नहीं आएगा। उस पर देव का आग्रह बार-बार उसके मानस पर दस्तक देता है और कहता है पारो - रम जा! अपने नये जीवन में, अपना ले रायसाहब को।'

लेखिका यहाँ पर इस प्रसंग से यह दिखाने का प्रयास करती है कि जब तक आत्मा सांसारिक बंधनों से मुक्त नहीं होती, तब तक वह परमात्मा के लिए भटकती रहती है। साथ ही यह भी दिखाने का प्रयास किया गया है कि पुरुष तो हमेशा पुरुष ही होता है। अगर वह पुरुष तत्व प्रकृति में विलीन हो भी गया, फिर भी वह नारी के ऊपर अपना वर्चस्व बरकरार रखने की चेष्टा रखता है। देव का पारो की चौखट पर आकर मरना और अब पारो की रक्त धमनियों में बहकर उसकी हर सांस को महकाना, जिससे वह जी कर भी नहीं जी पा रही है। सांस लेती हुई एक बेजान पुतला बन गई है।

लेखिका यह भी बताने का प्रयास करती है कि क्या नारी का अपना कोई वजूद नहीं है ? क्या वह स्वयं कोई निर्णय नहीं ले सकती है ? इन्हीं सब ज्वलंत प्रश्नों से तंग आकर पारो आधुनिक नारी के स्वर में कहने लगती है कि मुझे नहीं सुननी किसी की आवाज़ - 'न माँ की, न देव की और न देव के पिता की, केवल अपने अंदर की आवाज़ सुननी है।'

पारो के अंतर्मन से यही आवाज आती है कि क्या सपने कभी पूरे होते हैं ? क्या सारी इच्छाएँ पूर्ण होती हैं- कदापि नहीं। सभी की पतंग कभी न कभी कटती तो ही है ? मैं कोई अपवाद नहीं हूँ। फिर भी मुझे घर मिला है, पति मिला है, माँ जैसी साँस मिली है और बच्चे.... मैं उन सबको अपनाकर एक घर बना सकती हूँ, अपना सपना पूरा कर सकती हूँ, क्या हुआ जो मेरे सपनों की मेहराब यथार्थ से हटकर है।

पारो अपने अतीत को भूलकर वर्तमान में एक नए जीवन की राह पर चलना तो शुरु कर देती है लेकिन उस राह पर काँटों की चुभन उसे फिर अतीत में वापस लाकर खड़ा कर देती है क्योंकि रायसाहब (पारो के पति) व पारो के बीच एक अनचाही दूरी थी, रोष था, उलाहने थे और एक अनव्य चिंता जो किसी शिष्टाचार की सीमा को लांघकर हाथ लपकाकर एक दूसरे को अपने नज़दीक नहीं खींच सकती थी। दोनों के बीच की सड़क भी इतनी चौड़ी थी और उस पर दुविधाओं की, विरोधाभासों व दूरियों की सघन भीड़ थी- जिन्हें पाटना भी आसान नहीं था। एक किनारे पर खड़े होकर दूर दूसरे किनारे वाला आवाज नहीं सुन सकता। कच्चे घड़े को पकड़ कर तैरना आवश्यक है जो दोनों के लिए असंभव था क्योंकि दोनों के अपने व्यवधान थे, दायरे थे पूजा या अर्चना की सीमा तक फैली हुई चेतन आस्था थी जो छोटी नहीं हो सकती थी।

कहते हैं कि स्त्री त्याग की मूरत होती है। पारो भी यही सोचती है कि उसे भी इन विरोधाभासों के बीच से राह निकालनी है। इस सारी उपेक्षा, ताड़ना-प्रताड़ना के बीच रहना है, जो है वही वरदान है। उसे ही शिरोधार्य करके चलना है, यही मेरा भाग्य है।'

आखिरकार एक स्त्री ही जीवन की नौका पतवार को बढ़ाने में अपने को समर्पित कर देती है। अपने अरमानों को दफ़न कर देती है और जुट जाती है- परिवार बनाने में। उपन्यासकार पारो के द्वारा स्त्री की अस्मिता पर सवाल उठाती हुई पारो के मुख से कहलवाती है कि 'सारी नारी जाति की क्या एक ही दिनचर्या है? घर, पति और बच्चे, कितना परंपरागत और घिसा पिटा व्यसन है- सदियों से चला आ रहा है। उस पर पति को प्रसन्न रखने के लिए उसकी तरह-तरह से मान मनौतियां, चिरौरियां- क्या है यह जिंदगी ? कहाँ है उसमें मित्र सा साथ, सौहार्द, प्यार या अपनापन ?'

सच तो यही है कि सदियों से स्त्री को पुरुष की दासी ही समझा गया। उसे हमेशा पुरुषों से कमतर ही आंका गया। उसे प्रयोग की वस्तु समझकर हेय दृष्टि से ही देखा गया। इन सभी के बीच नारी ने क्या खोया, क्या पाया? इसका अंदाज़ा पुरुषों को नहीं है। धीरे-धीरे नारी अपनी गरिमा खोती गई। एक समय के बाद पुरुष उसे अपने पैरों की जूती' समझने लगा और यह सोच विकसित कर ली कि हाड़-मांस जितना सुंदर होगा उतनी ही वह छूने योग्य भोग्या है, सहलाने योग्य पर आदर योग्य नहीं।' इस तरह पुरुषों द्वारा नारी की बाहरी चमड़ी की कीमत लगाना शुरू कर दिया गया जिसके कारण वह अवहेलनाओं एवं अत्याचारों का सबब बन जाती है।

इस कोमल हाड़-मांस के पुतले के बीचो-बीच कहीं मानव नाम का जीता जागता हृदय भी होता है जो आहे भर सकता है, जो दुःख सकता है, अकेले में रो सकता है या अपनी पीड़ा में सिसकियाँ भी भर सकता है, पर यह वेदनाएँ पुरुष के वर्चस्व के नीचे गौण हो जाती हैं। उपन्यास में नारी के आत्मसम्मान पर पुरुष (रायसाहब) के द्वारा चोट करता यह प्रसंग बड़ा ही मार्मिक प्रतीत होता है- जब रायसाहब पारो से कहते हैं - 'तुम इस हवेली की ठकुराइन हो, हमने तुम्हारी कीमत दी है और तुम्हें इतनी ऊँची जगह भी।'

इतना सुनते ही पारो तिलमिला उठती है। उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचती है। वह रोती है, बिलखती है और सोचती है कि वह सिर्फ एक खरीदी हुई गुड़िया है और एक किराये की आया है, बाकी सब आडंबर है।'

उपन्यास में पारो की यह बात सुनकर मन अंदर से यह सोचने पर विवश हो जाता है कि नारी इस स्तर तक कैसे पहुँची ? किसने पहले पहल उसको माँ की उच्चता से नीचे लाया होगा? किसने पैरों से दतकारा होगा ? किसने 'यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमते तत्र देवता' जैसी उक्ति को सर्वप्रथम नकारा होगा ? किसने उसे खरीद-फरोख्त की वस्तु बनाकर सर्वप्रथम कोठे पर सजाया होगा ? क्यों उसे किसी शिला का अभिशाप देकर अहिल्या बना कर छोड़ा गया। बात सिर्फ यहीं तक खत्म नहीं होती। अपने वैवाहिक जीवन की सार्थकता भी उसे बच्चा पैदा करके सिद्ध करनी पड़ती है अन्यथा वहाँ से भी अपध्वस्त कर दी जाती है।

इन्हीं सब उधेड़बुन के बीच पारो अपने आप को जीतने की खातिर सारा गरल पी लेने का साहस जुटाती ही है कि तभी रायसाहब कुछ न कुछ ऐसा कह देते हैं कि उसकी साधना, उसका धैर्य, उसका अपनापन मिट्टी में मिल जाता है। आज भी रायसाहब ने उसे कौड़ियों के मोल खरीदी हुई बताकर उसके अस्तित्व की जड़ें फिर से भुरभुरी कर दी।

इस समाज की यही दास्तां है कि अगर नारी सब कुछ भूल कर आगे बढ़ना भी चाहे तो समाज उसे ताने दे देकर जीने नहीं देता है बल्कि उसके आत्मसम्मान को भी चोट पहुँचाता है। आज पारो भी यही महसूस कर रही है कि वह आज के इस पड़ाव पर किस पारो को जिए, वह पारो- जो देवदास के साथ मर चुकी है या उस पारो के साथ जिसने देव की माँ का दंभ तोड़ने के लिए या अपनी माँ की झूठी अहमन्यता के समक्ष अपनी बलि दे दी थी- या उस पार्वती के साथ जिसे पहले ही दिन पति ने अपनी नकार का निर्णय दे दिया था।'

अपने जीवन से निराश पारो कहीं एकांत में रोना चाहती थी। किसी के कंधे पर सर रखकर अपना बोझ हल्का करना चाहती थी लेकिन वह हवेली की ठकुराइन थी, रायसाहब की पत्नी थी और दो बच्चों (महेन और कंचन) की माँ थी। उसे कहाँ रोने का हक़ था? अपनी पीड़ा के साथ अंदर ही अंदर घुटना उसकी नियति बन गई थी। जिस कारण उसके अंदर कितने काँच के महल छिन्न-भिन्न हुए, कितने सूरज बुझे, कितने चाँद अमावसी हो गए, कितने तारों की बारात लौट गई और कितनी सांसें गले में अटकी, कितने आँसू बरौनियों से लौटे व कितने आँसुओं के छूट अंदर घोटे गए।

इतना सब सहने के बाद पारो एक चट्टान बन जाती है जो हर तूफान से टकराने को तैयार है। हर परिस्थितियों का सामना करने को तैयार है। यहाँ तक कि रायसाहब के अहं के भ्रम को तोड़ने को भी तैयार है। जब रायसाहब द्वारा पारो से यह पूछा जाता है कि 'क्या वह उस देवदास को जानती थी जो उनकी हवेली की चौखट पर आकर दम तोड़ गया था।' पारो का जवाब था- 'हाँ! और मैं अपने देव को उतना ही जानती हूँ जितना कि आप अपनी राधा (रायसाहब की पत्नी) को जानते हैं।' इतना सुनते ही रायसाहब हतप्रभ हो जाते हैं और कहते हैं कि 'राधा मेरी पत्नी थी। मेरे और राधा के बीच पवित्रता थी। मुझे उस प्यार की कोई ग्लानि नहीं है बल्कि वह आज तक मेरी शक्ति है। पार्वती, तुम कैसी अवैध बातें करती हो?'

किस तरह से एक क्षण में ये पुरुष वैध और अवैध का निपटारा कर देते हैं। किस तरह से रायसाहब अपने पुरुषत्व के अहं में अपने प्रेम को बुलंदी की हुँकार से स्वीकार करते हैं और पारो के प्रेम को नकारते ही नहीं बल्कि उसे रत्ती बराबर अहमियत भी नहीं देते हैं।

पारो की व्यथा, उसका स्वत्व, उसकी दृष्टि बीच अधर में त्रिशंकु की तरह लटकी है जो न तो धरती को स्वीकार है, न आकाश को, न समाज को और न ही इस छोटे से परिवार की परिधि को कि उन सबका सीना फाड़ कर वह उसमें अपनी सच्चाई रख सके, पर नियति का लिखा कोई नहीं टाल सकता। नियति को कुछ और ही मंजूर था। तभी तो एक दिन रायसाहब पार्वती से कहते हैं कि 'पार्वती! तुम मेरी कंचन (रायसाहब की बेटी) को बचा लो। उसे उस नर्क से निकाल लो। उसके जीवन में खुशियाँ भर दो। इतना कहते-कहते रायसाहब पारो के नज़दीक आ जाते हैं। पारो भी रायसाहब की नज़दीकियों से अचंभित होकर पीछे हट जाती है। रायसाहब पारो का हाथ आना चाहते थे लेकिन पारो कंचन के पास चली जाती है। उधर कंचन भी अपनी जिंदगी में बहुत उथल-पुथल देख चुकी थी। उसके अंदर भी दुःखों का भँवर मंडरा रहा था। बचपन में ही पिता ने उसे त्याग दिया था। राधा के दुनिया से चले जाने के बाद वह माँ का ममत्व भी नहीं पा सकी और अब पति के जाने का गम। इतनी छोटी उम्र में इतना सब कुछ झेल रही थी, कंचन।

एक नारी को अपने छोटे से जीवन में पता नहीं क्या-क्या झेलना पड़ता है ? क्या-क्या सहना पड़ता है ? बस समाज के डर से। आज तक पल्ले नहीं पड़ा कि सामाजिकता क्या है ? क्या सामाजिक होकर ही व्यक्ति पूर्ण होता है ? क्या यही मुक्ति है ? क्या यही वास्तविक भक्ति है या जीवन का परम सत्य है ? क्या बिना सांसारिक या सामाजिक हुए मनुष्य धर्म नहीं निभाया जा सकता ?

इन्हीं ज्वलंत मुद्दों को लेकर उपन्यास की कहानी आगे बढ़ती है और संवेदनाओं के धरातल पर खड़े होकर पारो अपने कर्तव्य मार्ग पर चलने को तैयार हो जाती है और कहती है कि 'मैं सीप में मोती की तरह संजोकर रखूगी कंचन को। जो प्यार, जो मनुहार इसकी माँ इसे नहीं दे सकी, जिस नकार की नोक पर इसके पिता ने इसे रखा। उस सबका अस्तित्व मैं नगण्य कर दूंगी। यह मेरी परीक्षा के लिए वरदान है।'

यह जरूरी भी नहीं कि हमें जीवन में सब कुछ मिल जाए। जो मिला है उसी में संतोष करना भी सीखना होता है। आज पारो के साथ भी यही स्थिति है। उसे एक निराशा, एक अतृप्ति के बदले ऊपर वाले ने भरपूर दिया है। अब इसे स्वीकारना ही उसकी नियति है। उधर रायसाहब भी कंचन के पहाड़ जैसे दुख से एक बार फिर बुझ जाते हैं। उनकी सारी कायनात चक्कर खाने लगती है। लगता है- जैसे भूकंप आ गया हो और सारा धरातल डोलने लगा हो। इस डूबती नैया को पार्वती जैसी पतवार तो मिल गई लेकिन सेतु तो रायसाहब को स्वयं ही बाँधना है।

वैसे तो रायसाहब भी राधा के साथ प्रेम में इतने बँधे हुए थे कि दूसरे विवाह के बंधन के प्रति उनकी नितांत प्रतिबद्धता या तृष्णा नहीं थी लेकिन लोगों का मुँह बंद करने के लिए वह शादी के लिए हामी भरते हैं। 'लोग यहाँ तक कहने लगे कि अब इसे कोई अपनी बेटी क्यों देगा? एक तो बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम और ऊपर से इसकी पत्नी ने आत्महत्या की है।' इस तरह के सामाजिक आरोपों से बचने के लिए रायसाहब पार्वती की मुँह बोली रकम देकर उसको खरीदने को तैयार हो जाते हैं- सिर्फ अपनी झूठी आन-बान-शान के लिए।

देव के माता-पिता को उनकी ऊँचाई की खोखली गरिमा का एहसास कराने हेतु पारो की माँ अलभ्य संपदा, मान और गरिमा वाला घर ढूँढती है। जब लड़के वाले अपने बेटे की बोली लगा सकते हैं- 'नकदी, गहने, सोना, चाँदी, आदरभाव, आवभगत और उस पर उम्र भर लड़की वालों को नीचा दिखाने का लाइसेंस उन्हें हासिल हो सकता है तो फिर इसके उलट अगर बेटी बेच दी तो बेटी वाले अधम हो जाते हैं। इसी तरह पारो भी विगत कल की नारी से आगे बढ़ते हुए सोचती है कि 'उसकी माँ ने कोई छोटा काम नहीं किया है बल्कि समाज की उस पुरानी परंपरा को उनके समांतर ला खड़ा किया है। लड़के और लड़की के भेद को समाप्त किया है। अगर लोग संतान के रूप में लड़के माँग सकते हैं तो लड़की को माँगने का भी कारण पैदा हो जाना चाहिए। यही मेरी माँ ने किया है।'

उधर रायसाहब सोच रहे थे कि उम्र के इस पड़ाव (40-50 वर्ष) पर खड़े होकर जिंदगी को फलते फूलते देखा जा सकता है। सधे हुए पैरों से फूलों की सेज पर भी उतरा जा सकता है। चढ़ते हुए उबाल की आग को हाथों में लेकर सहलाया या मसला भी जा सकता है। जिंदगी की वास्तविकता से परिचय प्राप्त किया जा सकता है। जिंदगी को और भी निकटता से परखा जा सकता है। रायसाहब ने सोचा पार्वती की माँ को पैसे की आवश्यकता है। वे लोग बेटी बेचने वाले हैं। उनका स्तर और सोच भी छोटी होगी और पार्वती को जैसे-तैसे अपने हाथ में रखा जा सकता है। उसे जैसे चाहे घुमाया जा सकता है। यह उनकी भूल थी। पार्वती उन आम लोगों में से नहीं थी। 'उसमें चरित्र की गरिमा है, धैर्य है, स्थिति को समझने और उससे लड़ने का साहस भी है। उसे मामूली घराने की लड़की कहकर नकारा नहीं जा सकता।'

पत्नीत्व का पद न देने की घोषणा पर भी वह चुप और गंभीर रही। उसने न कोई हंगामा किया, न ही परिवार की गरिमा पर आँच आने दी। अपना कर्तव्य बड़े धैर्य और प्यार से निभाती रही। सबके साथ उसका व्यवहार सहज एवं आदरपूर्ण ही रहा, इसलिए आज रायसाहब पारो के सामने मूकदर्शक बनकर अपने, अपने परिवार व बच्चों के लिए भीख माँगते हैं।

पुरुष भी कितना स्वार्थी होता है कि उसे जब जिस कंधे की आवश्यकता हुई- उसे अपना लिया और जब आवश्यकता नहीं तो उसे नकार दिया। पता नहीं हमारे समाज में यह कैसी विडंबना है ? एक नारी के यातना शिविर से गुज़रने पर शरीर, मन और आत्मा सब के सब छिलते ही हैं। हर नए क्षण का भोग भोगे हुए दुःख से कम पीड़ा नहीं देता। पीड़ा का हर क्षण अपने आप में पीड़ादायक होता है। सह जाने की क्षमता से आँसुओं का खारापन कम नहीं हो जाता। घुटने में चोट लगे या बाजू में उनकी पीड़ा अपने समय में वैसी ही होगी जैसी पहली बार हुई।

यह सच है कि नारी ही घर को थामकर रख सकती है। अगर घर को जोड़ने वाली नारी न हो तो अब तक यह संसार रसातल में विलीन हो गया होता। वह अपने कोमल स्पर्श से ही घर की दीवारों को व चूल्हे की नरम आग को बचाए रखती है और इसकी जड़ों में सौंधी सुगंध भरती रहती है। उसी से घर महकता है, सुवासित होता है और घर में रहने वालों का जीवन संवरा रहता है। नारी अगर नारी बनकर रहे तो घर स्वर्ग अथवा घर नर्क से भी बदतर हो सकता है। कितने ही घर सास-बहू के आंतरिक कलहों के कारण घर की सीमाओं को लहूलुहान कर जाते हैं। कई बार ध्वंस इतना प्रलयकारी हो जाता है कि कुछ नहीं बचता, इसलिए कहते हैं कि 'घर को बनाने वाली भी औरत है और अपनी नकारात्मक शक्ति से तबाह करने वाली भी औरत ही है।'

रायसाहब भी एकाएक पार्वती को मन ही मन सराहने लगते हैं। उसकी विवेक शक्ति का लोहा मानने लगते हैं। पार्वती कितनी बुद्धिमत्ता और भावनाओं से ओतप्रोत है कि वह अपने विवेक से किसी को भी पटखनी दे सकती है। इस तरह उपन्यासकार ने यहाँ पर नारी के विवेक की सराहना की है। सदियों से चली आ रही मानसिकता को तोड़ते हुए नारी को बुद्धिमान व विवेकपूर्ण दिखाने का भरसक प्रयास किया है। साथ ही कंचन (रायसाहब की बेटी) के द्वारा बेमेल विवाह तथा विधवा विवाह की पारंपरिक मान्यताओं का खंडन किया है। समाज की रूढ़िवादिता व अंधविश्वास के चोंचलों पर भी करारा प्रहार किया गया है। अतः नारी को दासता की बेड़ियों से आज़ाद कराकर उसके सपनों को पंख देने का प्रयास सराहनीय है। तभी तो पारो अपने त्याग व कर्तव्य पथ पर चलकर रायसाहब को अपना मुरीद बना लेती है। एक समय जिस रायसाहब ने उसे पत्नी का दर्जा देने से नकार दिया था, आज वही खुली बाँहों से उसका स्वागत करने को तैयार हैं। वह किसी जंगल में प्यासे भटक गए हैं और अपना रास्ता भूल गए हैं। अपने जीवन में उन्हें एक अधूरापन झलकता दिखाई देता है, जो उन्हें कहीं पहुँचने नहीं देता। वह अपने अंदर ही अंदर उस अधूरेपन के लिए छटपटाते रहते हैं।

यह खेल मनसा-वाचा-कर्मणा का है। केवल बाहरी निर्णय लेने से उसका निर्णय नहीं हो जाता। यही नहीं, उस रास्ते पर चलने के लिए न जाने कितने कल्प लग जाएं, जब सचमुच यह अंतरंगता का मिलन हो। हमारे अंदर बसी अतृप्ति की हूक ही हमारी प्राण शक्ति है जो हमें उठाती-बिठाती और उछालती रहती है।

अंत में, पारो के पदचिन्ह उसके अकलुषित सौंदर्य को कुंठित करने को तैयार हो जाते हैं। पारो जैसे ही रायसाहब के कमरे की देहरी पर पाँव रखती है - 'तभी हवा में धुंघरू बज उठते हैं। देव की आँखों में, रायसाहब के आँगन में आलता लगे पाँव की झलक झिलमिलाने लगती है। हर श्रृंगार के फूल झर-झर झिलमिलाने लगते हैं और एक महक सन्नाटे में खिलखिला उठती है। रायसाहब अपनी बाँहें फैलाकर मुस्कुराते हुए कहने लगते हैं- 'आओ पार्वती, आओ!'

इस तरह सुदर्शन प्रियदर्शिनी द्वारा यही दिखाया गया है कि पारो के भाग्य में यही लिखा था। यही उसकी नियति थी। जो हुआ उसके अतिरिक्त कुछ और हो ही नहीं सकता था। रायसाहब के प्रति वितृष्णा भी निर्धारित थी। देव से अलग होना भी उसका अपना भाग्य था। ललाट पर लिखी विरह की लकीर इतनी लंबी थी कि उसके समक्ष कोई लकीर बड़ी नहीं हो सकी। जिस अतीत को हम हर समय तराशने का संकल्प लेते रहते हैं, वह अधिकतर मिथ्या ही रहता है। हमारा दंभ ही उस मिथ्या संकल्प को अपनी बगल में दबाए रहता है और उस दिशा में अपना पुरुषार्थ दिखता रहता है जो अधिकतर व्यर्थ जाता है। जो होना होता है, वह होकर रहता है। जो भाग्य में मिलना होता है, मिलकर रहता है। पारो के भाग्य में वैभवशाली जीवन लिखा था- 'वह देव के माध्यम से नहीं तो रायसाहब के माध्यम से मिला। प्यार के माध्यम से नहीं, अधिकार के माध्यम से मिला। प्रारब्ध लिखने वाले की कलम की स्याही में प्यार के कतरे सूख गए थे। उसकी जगह स्याही की कालिमा में इस जन्म के लिए विरह का विष घुल गया था।'

इसी विष को पीकर ही पारो एक दिन इस चक्कर से मुक्त होगी। इसी से देवदास को निर्वाण मिलेगा और रायसाहब को नए जीवन का वरदान। पारो को अपने पैरों में चुभे हुए काँटों को निकालकर रायसाहब को समझाना होगा कि 'स्त्री का प्यार या पुरुष का प्यार किसी तराजू का मोहताज नहीं होता बल्कि यह आत्मा परमात्मा का मिलन होता है।'

उपन्यासकार यह सभी बातें पारो के द्वारा समझाने में सफल होती है जिससे 'पारोउत्तरकथा' उपन्यास की सार्थकता आज के समय में सिद्ध हो जाती है।

सदफ इश्त्याक (शोध छात्रा)

हिंदी विभाग, कला संकाय दयालबाग शिक्षण संस्थान, आगरा

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