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पश्चिम की राजकुमारी, दक्षिण का राजकुमार
September 19, 2020 • अनुवाद: नासिरा शर्मा • पुस्तक

दक्षिण देश के बादशाह के एक बेटा था। राजा चाहता था कि आसपास के देशों में से उसका बेटा विवाह के योग्य सुन्दर शाहज़ादी को चुन ले, पर उसे कोई पसन्द ही न आती थी। आख़िर बादशाह को गुस्सा आ गया और उसने हुक्म दिया कि इसको पहाड़ की चोटी पर कैद कर दिया जाय।

इसी तरह पश्चिम देश के बादशाह की बहुत ही खूबसूरत बेटी थी। उसको जो भी देखने आता, वह कहती, “क्या पाना है ज़िन्दगी में शादी करके!" बादशाह यह सुनकर ताज्जुब करता। उससे जो हो सका उसने किया, पर शाहज़ादी किसी प्रकार राज़ी न हुई। आख़िर बादशाह ने बहाने से पहाड़ के ऊपर क़िले में उसे कैद करवा दिया।

लड़के के देश में एक परी रहती थी। वह रोज़ बियाबान की ओर जाती थी और शाम होते ही वह शहर की ओर लौटती थी। एक दिन रास्ते में यूँ ही घूमते-घूमते क़िले के अन्दर पहुँच गयी। देखती क्या है कि क़िले के अन्दर एक बेहद हसीन-सा जवान सोया हुआ है। एक शमा सिरहाने, एक शमा उसके पायताने जल रही है। यह देखकर उसका दिल अफसोस से भर आया, पर करती भी क्या! शहर लौट आयी।

लड़की के देश में भी एक परी रहती थी। रोज़ सुबह जंगल जाती, शाम को शहर लौट आती। एक दिन उस पहाड़ पर पहुँच गयी जहाँ शाहज़ादी कैद थी। क़िले के अन्दर उसने देखा कि एक सुन्दर भोली-सी लड़की सो रही है। एक शमा उसके सिरहाने और एक पैरों के पास जल रही है। यह देखकर वह स्वयं से बोली, “यह हसीना यहाँ क्या कर रही है?" करती भी क्या, ठहरकर शहर की तरफ लौट गयी।

बीच में दोनों परियों की आपस में मुलाक़ात हुई। वह परी जिसने जवान को देखा था, बोली, “मैं अभी एक क़िले में सोते जवान को देखकर आयी हूँ? आदमज़ाद के बीच ऐसा सुन्दर युवक मैंने आज तक नहीं देखा है।" जिस परी ने लड़की देखी हुई थी, बोली, “मैंने ख़ुद उस पहाड़ी पर सितारों की तरह हसीन लड़की देखी है। मैंने उसको सोते देखा पर जगाया नहीं।" ये दोनों परियाँ आपस में बहस करती रहीं कि उन्होंने जो देखा है, वही अधिक सुन्दर है। आख़िर तय किया कि लड़के-लड़की को एक जगह रखकर देखें कि कौन अधिक सुन्दर है। दोनों चलीं और लड़की के समीप पहुँच गयीं और लड़की को लेकर उड़ीं और लड़के के समीप पहुँचकर लड़की को लिटा दिया। दोनों थक गयी थीं। बोलीं कि यहीं सुबह तक एक-दूसरे के साथ उन्हें छोड़ जातें हैं, सुबह आकर अलग कर देंगे। थोड़ी देर बाद लड़के ने आँख खोली तो क्या देखता है कि सितारों के समान झिलमिलाती-सी भोली पवित्र-सी लड़की उसके बाजू में सोयी हुई है। अभी ठीक से देख भी नहीं पाया था कि लड़की अपने से जाग उठी। लड़के ने पूछा, “तुम कौन हो? यहाँ क्या कर रही हो?"

लड़की ने जवाब दिया, “यहाँ मैं कैद में हूँ, नहीं जानती क्या करूँ?” “मैं भी इसी मुसीबत में फँसा हुआ हूँ और समझ नहीं पा रहा हूँ क्या करूँ?"

उसी रात को लड़के-लड़की ने आपस में अंगठियाँ बदल लीं और साथ-साथ सोये। सुबह हुई तो परियाँ बोली, “चलो लड़की को वापस उसी जगह पर सुला आयें।" दोनों गयीं और उसी पहाड़ी पर जहाँ लड़की कैद थी, वापस सुला आयी। पौ फटते ही लड़के की आँख खुली तो पहलू में लड़की को न देखकर सोचने लगा, शायद सपना देखा है। इसी तरह जब लडकी उठी और बगल में लडके को न देखा तो मान गयी कि उसने भी ज़रूर कोई मीठा सपना देखा है।

दूसरे दिन दोनों देशों के राजाओं ने हुक्म दिया कि बस अब दोनों को काफ़ी सज़ा मिल चुकी है, दोनों को नीचे लाया जाय। लड़का अपने देश में और लड़की अपने देश में जा पहुंचे। दोनों बीमार पड़ गये। जितना दवा-इलाज़ होता, हालत और बुरी होती जाती। एक दिन राजकुमारी की दाई राजकुमारी के पास आयी और बोली, “मुझसे अपना दुःख कह दो जो भी तुम्हारे साथ हुआ हो?” लड़की बोली, “जब मैं कैद में थी तब एक दिन मैंने एक लड़के को अपने किनारे पाया। हम दोनों ने आपस में एकदूसरे के साथ जीने-मरने की क़सम खायी थी क्योंकि वह 'वही' था जिसका मुझे बरसों से इन्तज़ार था।” “चाहे जैसे भी हो मैं उसे ढूँढ़ निकालूंगी।" ।

दाई ने भेष बदला, मर्दाने कपड़े पहने और राजकुमार की दी हुई अँगूठी को लेकर चल पड़ी। जब दक्षिण देश में पहुंची तो देखा कि यहाँ सब काला लिबास पहने हुए हैं और दुःखी हैं। उसने पूछा, क्या बात है। एक शहरी ने जवाब दिया कि राजा का बेटा मरने के क़रीब है, कोई भी हकीम उसको ठीक नहीं कर पा रहा है। दाई जवान लड़के का भेस बदले हुए बोली, “मैं उसको ठीक कर दूंगा।” “क़िस्मत आजमाओ, जाने कितने जान गवाँ चुके हैं।” “मैं मौत से नहीं डरता और जानता हूँ कि मेरे हाथ से ही शाहज़ादे को ज़िन्दगी मिलेगी।" लोग उसको महल में ले गये और बादशाह से बोले, “यह मसाफ़िर अटल है कि वह शाहज़ादे को ठीक कर देगा।" बादशाह मान गया। दाई बोली, “मैं इलाज़ तब ही शुरू करूँगा जब कमरे में कोई न होगा।” सब राज़ी हो गये। दाई शाहज़ादे के क़रीब बैठ गयी और उसको देखती रही। फिर उठकर गयी और एक कटोरे में पानी भरकर लायी और उसमें शाहज़ादे की दी हुई अंगूठी डाल दी और वह पानी शाहज़ादे को पीने के लिए दिया।

पानी को पीते हुए शाहज़ादे की नज़र अंगूठी पर पड़ी तो पहचानकर बोला, "तुम कौन हो?” “मैं बहुत दूर से आयी हूँ। अगर तुम्हारा दिल चाहे तो मैं तुमको तुम्हारी प्रेयसी से मिलवा दूंगी।" उसी रोज़ शाहज़ादा ठीक हो गया और दूसरे दिन शिकार खेलने के लिए दाई के साथ चल पड़ा। दोनों बिना किसी को बताये पश्चिम देश की ओर चले। रास्ते में दाई ने कहा, “तुम राजा से कहना मैं हकीम हूँ और तुम्हारी लड़की को ठीक करने आया हूँ।" जब महल में पहुँचे तो राजा को ख़बर मिली कि जवान हकीम दूर से आया है मगर इस शर्त पर कि लड़की ठीक होने पर उसकी हो जायगी। राजा मान गया और लड़का शाहज़ादी के कमरे में गया और हुक्म दिया, कमरा खाली किया जाय। फिर अपना चेहरा उसके समीप किया। लड़की उछलकर बैठ गयी और देखा, उसका 'खोया हुआ' प्रेमी मिल गया है। बादशाह के पास ख़बर गयी कि शाहज़ादी ठीक हो गयी है। बादशाह ने हुक्म दिया, शहर में दीये जलाये जायँ और सात दिन तक ख़ुशी मनायी जाये। सात मास शाहज़ादा वहीं रहा। एक दिन शाहज़ादे ने बादशाह से कहा, “अब समय आ गया है कि मैं पत्नी-सहित अपने देश जाऊँ और अपने माता-पिता के दुःख को दूर करूं।"

दूसरे दिन शाहज़ादे का कारवाँ अपने गुलामों और कनीजों के साथ अपने देश की ओर चल पड़ा। चलते-चलते वह ऐसी जगह पहुँचे जहाँ एक झील हरे पेड़ों से ढकी थी। वह बोला, “कुछ दिन यहाँ पर आराम करेंगे।" खेमे डाल दिये गये। एक दिन शाहज़ादा शाहज़ादी के समीप लेटा था और आसमान की ओर देख रहा था। शाहज़ादी सो रही थी कि अचानक एक बडी-सी चिडिया उडती हई नीचे आयी और लडकी का गुलबन्द गले से नोचकर ले गयी। यह देखकर शाहज़ादा उसके पीछे भागा। भागते और पीछा करते हुए वह खेमे से बहुत दूर चला गया। शाहज़ादी सपने से जागी तो न गुलबन्द गले में था न पहलू में शाहज़ादा। शाहज़ादी समझ गयी कि शाहज़ादा हार के पीछे गया है। जब काफ़ी देर हो गयी तो शाहज़ादी ने शाहज़ादे का भेस बनाया और कनीज़ों के बीच पहुँच गयी।

उधर से एक अमीर गुज़रा और शाहज़ादे और खेमे को देखकर वह अपनी लड़की क़ासिद बादशाह को देने पहुंचा। शाहज़ादी ने डर से कि कोई पहचान न ले, लड़की को क़बूल कर लिया। रात हुई तो शाहज़ादी ने अमीरज़ादी से कहा, "जिस वक़्त बादशाह लौटें, पहली रात तो तुम उनके साथ सो जाना, फिर दूसरी रात को देखा जायगा।" फिर क़ासिद ने अपने पिता को पत्र लिखा, "मैं शाहज़ादे के संग एक हरे-भरे बगीचे में ठहरी हुई हूँ।"

उधर शाहज़ादा भागता रहा, भागता रहा, पर चिड़िया न पकड़ पाया। आख़िर एक जानवरों के बाड़े में पहुँचा और गड़रिये से बोला, “मैं तुम्हारे जानवरों की रखवाली करता हूँ, तुम मुझे रोटी और पानी दो।" गड़रिया मान गया। इस तरह से कुछ रोज़ गुज़र गये। एक दिन शाहज़ादा खेत खोद रहा था कि उसे एक छेद दिखा। उसने फावड़ा मारा तो उसमें एक गड्ढा दिखा। उसने फिर फावड़ा मारा तो उसमें घड़े दिखे जो जवाहरात से भरे थे। उसने उनको लिया और खेमे की तरफ चल पड़ा। खेमे में पहुँचा तो देखा कि सूरज की तरह हसीन एक लड़की पत्नी के पास बैठी है। पत्नी की इच्छा पर शाहज़ादा उस लड़की के साथ सोया और उस दिन से वह दो पत्नियों का पति हो गया। लड़की ने दोबारा बाप को पत्र लिखा कि इसके बाद हम लोग हर बदलते मौसम में नयी जगह जाया करेंगे।

अनुवाद: नासिरा शर्मा, नई दिल्ली, मो. 9811119489