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पत्रांश
February 26, 2020 • Devender Kumar Bahl • पत्रांश

अभिनव इमरोज़ का दिसम्बर अंक देवनागरी लिपि में लिखी गई ग़ज़ल केंद्रित शानदार अंक है। इधर हिन्दी में जो ग़ज़लें लिखी जा रही हैं उनमें साधारणत्व का राग है। बेशक, यह साधारण आदमी दुष्यंत की ग़ज़लों में भी मिलता है और खूब मिलता- नुमाइश में चीथड़े कपड़े पहने हुए वो शख़्स जिसका नाम हिन्दुस्तान है.....।

यही साधारणत्व का राग इस ग़ज़ल अंक में भी खूबतर है। कुलदीप सलिल, महेश अश्क, राजकुमारी शर्मा, धनसिंह खोबा, अनिरूद्ध सिन्हा द्विज, की ग़ज़लें आश्वस्त करती है। कुलदीप सलिल, अश्क और धनसिंह खोबा ने लम्बी बहर की गज़लों को सलीके से साधा है।

सवाल है कि ये तमाम अच्छी ग़ज़लों के बावजूद हिन्दी ग़ज़ल चर्चा विहिन क्यों है। सीधा सा जवाब है- अधिकांश हिन्दी ग़ज़लकार कवि सम्मेलनी हैं। जो नए लोग ग़ज़लें लिख रहे हैं वो भी इसलिए लिख रहे हैं कि ‘ग़ज़ल’ कवि सम्मेलनी मंच तक जाने की आसान सीढ़ी है। हिन्दी ग़ज़ल का पूरा परिदृश्य बाज़ारवादी है। सब अपना कच्चा माल (कमज़ोर ग़ज़लें) इसी कवि सम्मेलनी बाज़ार में खपा रहे हैं। इन तमाम वरिष्ठ और युवा ग़ज़लकारों को कोई फ़िक्र नहीं कि आलोचनाविहीन विधाएं, धीरे धीरे अराजक अवस्था तक जा पहुँचती है। कमज़ोर ग़ज़ल पर खूब तालियाँ जब बजती हैं तो वही ‘सशक्त ग़ज़ल’ हो जाती है। रचना की उत्कृष्टता का पैमाना जब तालियाँ हों तो फिर श्रेष्ठता कैसे तय होगी। हिन्दी के कवि सम्मेलनी ग़ज़लकारों के साथ यह दिक्कत है। इसलिए मंचीय ग़ज़लों में रूमान है, भावुकता है, सतही प्रेम है। और सबसे बड़ी बात इकहरापन है। लेकिन वो जो इंटेनसिटी, घनत्व और कथ्यगत एकाग्रता होनी चाहिए, उसका संकट होता है।

कवि सम्मेलनों से किसी को गुरेज़ नहीं। कोई बंदिश भी नहीं। लेकिन आत्ममंथन जरूरी है कि धन कमाकर, रचना को खो देना आपको कैसा लगता होगा।

हिन्दी के तमाम ग़ज़लकार चाहते हैं कि उनकी ग़ज़लें आलोचना के केंद्र में रहें। लेकिन यह काम करे कौन ? बैकेट का एक नाटक है- ‘वेटिंग फ़ाॅर गोदो’। गोदो का इंतज़ार! गोदो यानी गाॅड! हिन्दी के वरिष्ठ कनिष्ठ सभी ग़ज़लकार किसी गोदो (आलोचक) की इंतज़ार में हैं कि बाहर से, कहीं से आएगा और उनकी ‘ताली बजाऊ ग़ज़लों’ पर गम्भीरता से लिखेगा।

यही वजह है दोस्तो! हिन्दी ग़ज़ल को गम्भीर विधा के रूप में नहीं देखा जाता।

कवि सम्मेलनों से ज़्यादा ज़रूरी है कि हिन्दी ग़ज़ल पर विचार गोष्ठियाँ हों! बेबाक बातचीत हो।

आफरीन बहल साहब! एक साल में अपने दूसरा ग़ज़ल अंक प्रकाशित किया है। और कुछेक बहुत अच्छी ग़ज़लें भी छापी हैं। यह अंक कुलदीप सलिल महेश अश्क, धनसिंह खोबा, अनिरूद्ध सिन्हा, राजकुमारी शर्मा द्विज की ग़ज़लों से आश्वस्त करता है।

आप अपनी तरह की शख़्यिसत है और अपने मिज़ाज के सम्पादक।

-ज्ञानप्रकाश विवेक, बहादुरगढ़ मो. 9813491654

आप जी से मिलने के लिए हम तरस ही गए।पर हम कसर निकाल ही लेते हैं- गर्दन झुकते हैं और दिल के आइने में दीदार कर ही लेते हैं। जवाब, अभी-अभी गर्दन झुकायी और नज़र आ गए। सोचा, क्या पेश किया जाए लो जी में आया क्यों न एक चिट्ठी आप के नाम रवाना कर दी जाए। हालांकि चिट्ठी लिखने-लिखाने के दिन लद गए... न, न, न, लद कैसे जाएंगे जब तक आप जैसे लोग हैं, संपादक हैं चिट्ठी को सम्पादकीय और सम्पादकीय को चिट्ठी बना देने वाले। आप की सोहब्बत और खुलूस का क्या कोई जवाब है ?

‘मुश्किल नहीं कुछ भी अगर ठान ली जाए’ शे’र का यह टुकड़ा पढ़ता/सुनता हूँ तो और बातों के साथ आप की याद भी ताज़ा हो जाती है। बहल ने जो ठान लिया, करके दिखा दिया। लोग बाग़ हतप्रभ से सोचते हैं दो-दो मासिक पत्रिकाएँ निकालना एक अकेले शख्स की करामत कैसे/क्योंकर हो गयी। और

इधर आप की सोहबत का असर देखिए- कि मेरी चार किताबें एक साथ आ गयीं। दो चिट्ठी के साथ भेज रहा हूँ और बाकी, खैर छोड़िए। कब तक टालेंगे आप- इस घर की तरफ़ आप के कदम बढ़ने ही हैं।

-नरेन्द्र मोहन, दिल्ली, मो. 9818749321

पुष्पा जी को समर्पित- (पुष्पा राही)

तुमने तो केवल दो ही,

पर मैंने तीन मनाये,

अर्ध रात्री को जन्म हुआ

बारह थे बज पाये।

पंडित बोला ब्रम्ह मुहूर्ततक

तिथि वही कहलाती,

अतः तीन नवम्बर ही

जन्म पत्री है बतलाती।

अस्पताल में अर्ध रात्रि को

दिवस बदल जाता है।

इसलिए चार नवम्बर मेरा

जन्म दिवस कहलता है

तिथि की तो बात ना पूछो

भाई दौज जब आती,

टीका भाई का, और जन्म दिन

दोहरा लाभ कराती।

कभी नहीं है कटा केक

दावत भी याद नहीं आती।

किन्तु शुभ कामना सभी

मुझ पर बरस बरस जाती।

-रानी सरोज कुमारी गौरिहार, आगरा, मो. 9319380708

आप इस जमाने के ऋषि हैं- दधिचि की तरह अपना सब कुछ निछावर कर ‘अभिनव इमरोज़’ का इंद्रधनुष हमें दे रहे हैं।

साधुवाद।

अगस्त अंक में प्रकाशित लेख नासिरा शर्मा का और कृष्ण भावुक काजी नजरूल इस्लाम ने बड़ी जानकारी दी, कहानियों में रश्मि रमानी, कृष्णा अग्निहोत्री और रेनुयादव ने बहुत झकझोरा अंतस भकभका गया। मन प्रमुदित हुआ एक टीस के साथ आपका संपादकीय ऋषित्व परम्परा का उदाहरण है और सभी कविताएँ मन को भायीं। बधाई! -शिवप्रसाद कमल’, चुनार

‘अभिनव इमरोज़’ का अक्टूबर अंक (2019) एक नए प्रयोग के साथ आया है। ईरान के सूफियों-संतों की मस्नवियों, ग़ज़लों, कहानियों ने निःसंदेह भारतीय साहित्य एवं दर्शन को काफी सीमा तक प्रभावित किया। जहाँ तक मुझे ज्ञात है सन् 623 ई. से प्रारंभ सूफी मत इस्लाम के उत्तरवादी संस्करण के रूप में अरब  में प्रवर्तित और फारस में विकसित हुआ। यह मत विश्वास एवं प्रेम के पंखों पर उड़कर प्रियतम का सानिध्य प्राप्त करता है। मैंने कहीं पढ़ा था की अबू यजादि पहला साधक था जो रहस्य के पंखों पर उड़ता था। इसने सूफी दर्शन में ‘फना’ (आत्मा का विलयन) और वकार परमात्मा में स्थिति का विकास किया। दूसरे युग (871 ई. से 1000 ई.) में अल जुनैद शेख, अबुल हुसैन नूरी नेसूफी साधना को आगे बढ़ाया। इसके तीसरे चरण को अध्यात्म काल (1000-1500 ई.) कहते हैं। इस काल में अल कुरैशी एवं अल गजाली ने नैतिक, आध्यात्मिक, और रहस्यात्मक पक्षों का भाष्य कर इस्लाम से ऐक्य स्थापित किया। इस काल में सूफी साधना ने शायरी का रूप ले लिया। इस सूफी मत ने हिन्दी

धर्म को काफी हद तक प्रभावित किया। अब भी इसका प्रभाव देखा जा सकता है अजमेर में मुइनुद्दीन चिश्ती को दरगाह पर एवं अन्य सूफियों को दरगाहों पर दोनों वर्गों के लोगों की भीड़ जियारत के लिए होती है।

श्रीमती नासिरा शर्मा ने अथक प्रयास करके ईरान की इन कहानियों का वास्तविक अनुवाद करके ‘अभिनव-इमरोज़’ के  अक्टूबर अंक को मालामाल किया है। इतना मेहनत का काम नासिरा शर्मा जी ही कर सकती हैं। इस अंक में हकीम नेजामी गंजबी, शेख फरीउद्दीन अत्तार, ख़्वाजे किरमानी और जामी को स्थान मिला है। उपरोक्त सभी सूफी संत अलग-अलग काम के हैं। इतनी बेजोड़ स्थापना, चयन, संपादन के लिए मेरेे पास अभिव्यक्ति के शब्द नहीं है कि मैं नासिरा शर्मा जी का शुक्रिया अदा कर सकूं। इतना कह सकता हूं कि पुराने दस्तूर को नए लिवास में प्रस्तुत कर नासिरा जी ने बड़ा काम किया है। उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं और सभी लाजवाब हैं। साहित्य

साधना अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं और सभी लाजवाब हैं। साहित्य साधना में अपनी जिन्दगी को समर्पित करने वाली नासिरा जी का मैं एक बार फिर इस्तकबाल करता हूँ और अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूं। और इस आयोजन के लिए श्री डी.के. बहल संपादक अभिनव इमरोज़ को धन्यवाद देता हूँ। -शिवप्रसाद ‘कमल’, चुनार

‘अभिनव इमरोज़’ के बारे मे आप को पत्र लिखने के बाद ‘साहित्य नंदिनी’ का अक्टूबर 2019 का अंक मिला। आनंद एवं आभार।

‘हिन्दी बाल साहित्य का इतिहास’ पर समीक्षात्मक लेख का वास्तव में एक महत्वपूर्ण समीक्षा है। इस के अलावा ‘चर्चा: जीवन के स्पंदन की’, मन्नत टेलर्स कहानी संग्रह एवं सुषमाबेदी जी के ‘इतर’ उपन्यास की समीक्षा रोचक है।

‘साहित्य नंदिनी’ के गुणवत्ता युक्त प्रकाशन के लिए आपको साधुवाद।

-चन्द्रकान्त मेहता, पूर्वकुलपति, गुजरात विश्वविद्यालय, मो. 9824015386

आप के द्वारा सप्रेम प्रषित अभिनव इमरोज का अक्टूबर, 2019 अंक मिला। आनंद एवं आभार।

स्तरीय, सामग्री, और वह भी नावीन्य के साथ, अभिनव इमरोज की अपनी विशिष्ट पहचान है। ‘खुसरू और शिरीन,’  बकताश और राबे, हुमाइ व हुमाइन, अनुदित फारसी लघुकथाएँ आदि सभी साहित्यिक सामग्री संतोषप्रद है। हमारा हार्दिक साधुवाद स्वीकार करें। नये साल की शुभकामनाएँ।

-चन्द्रकान्त मेहता, पूर्वकुलपति, गुजरात विश्वविद्यालय, मो. 9824015386

 

‘अभिनव इमरोज‘ व ‘साहित्य नंदिनी‘ पढ़ीं, हर रचना उत्कृष्ट है व दिल पर दस्तक देती है।मै भी आपकी कृपा से कविताएँ, कहानियाँ आदि लिखती हूँ तथा अब तक मेरी छः पुस्तकें छप चुकी हैं।इसके अतिरिक्त मेरी कुछ कहानियाँ पुणे के रेडियो स्टेशन से भी प्रसारित की जा चुकी हैं तथा कुछ कहानियाँ, कविताएँ तथा लेख देश के समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं में भी छप चुके हैं।

मेरे लेखन को भी यदि आपकी पत्रिका में स्थान मिल सके तो मुझे हार्दिक प्रसन्नता होगी। मैं आपसे यह जानना चाहती हूँ कि आपकी पत्रिका के लिए लिखित सामग्री भेजने के क्या नियम कायदे हैं। आशा है, आप मेरा मार्गदर्शन अवश्य करेंगे। धन्यवाद!

       -अलका अग्रवाल, पुणे, मो. 9325014141

‘अभिनव इमरोज़’ पत्रिका नियमित प्राप्त हो रही है,

धन्यवाद आभार, पत्रिका का हर अंक विशेषांक रहता है आपकी लगन, मेहनत को नमन। आपके प्यार, स्नेह की खुशबू पत्रिका में समाहित है। संपादकीय में आपका चित्र धीर, गंभीर, दरवेश सा व्यक्तित्व लगता देखकर ऐसा लगता है कि हमारा कोई अपना ही शुभचिंतक है। बिना किसी भेदभाव के नई प्रतिभाओं को पत्रिका में सम्मान जनक स्थान देना, यह खूबी आप में है। आपके स्नेहाभाव के प्रभाववश कभी दिल्ली आया तो सबसे पहले आपके दर्शन का आकांक्षी हूँ, आशीर्वाद मिलता रहे।

पत्रिका का अक्टूबर अंक का आवरण पृष्ठ ही चित्ताकर्षक है, प्रेम आधारित कहानियों ने प्रभावित किया। नासिरा शर्मा जी का संपादन सराहनीय रहता, अंक संग्रहणीय बना दिया है।

नवंबर अंक का बाल विशेषांक मन को छू गया। बाल साहित्य आजकल कम लिखा जा रहा है। अंक के रचनाकारों में दिविक रमेश, करुणापाण्डेय, दीपक मंजुल सरोजनी प्रीतम, माला वर्मा की कविताएँ अच्छी लगी। कहानी में ‘टिनी मिनी प्ले’ का तो जवाब ही नहीं। लघुकथा ‘वृद्धाश्रम’ में एक नया सोच विचार है, काश ऐसा भी हो।

हृदय से आपका आभार एवं पत्रिका दिन-ब-दिन प्रगति के सोपान पर अग्रसर होती रहे, हार्दिक मंगल-कामनाएँ।

प्रभावशाली है पत्रिका अभिनव इमरोज़

मनमोहक छवि देखा करता हूँ रोज़

शिव डोयले विदिशा

‘अभिनव इमरोज़-साहित्य नंदिनी’ हिन्दी मासिक, वंसतकुंज नई दिल्ली। जीवन के हर पृष्ठ पर भरे हम ऐसे रंग जो भी देख कह उठे हमें हमें भी कर लो संग, जीवन में आते रहे पतझड़ और वसंत,दोनों में संभल रहेहो दुःखों का अंत।

संवादक जी उक्त दोनों ही पुस्तक में बाल दिवस पर विशेष प्रकाशन कर हम पाठकों के लिए बहुत ही मार्ग दर्शन

प्रेरणादायी एवं चिंतन मननीय भी है। क्योंकि ये बाल समय सबसे है उत्तम ममता पिता का प्यार और भाई-बहन का लाड़ दुलार। सुन्दर सुन्दर चाँद का मुखड़ा। कोई कहता है जिगर का टुकड़ा। भोलापन है न कोई गम लाड़-प्यार में है सर्वोत्तम।

-खुशाल सिंह कोलिय, फतेहपुर सीकरी, उत्तरप्रदेश

आपके द्वारा सम-सामयिक एवं सारगर्भित कहानियों से ओतप्रोत सम्मानित पत्रिका ‘अभिनव इमरोज’ का सितम्बर 2019 अंक भिजवाने के लिए सविनम्र हार्दिक-आभार। इस अंक का संपादकीय लेख तो आपके वैदुष्य का दृढ़ दुष्टांत है।

प्रस्तुत अंक की लगभग सभी कहानियाँ जीवन से प्राप्त अनुभूतियों की चित्रशाला है, जहाँ अनुभूतियों का वैविध्य अनेक रंगों में उपस्थित है। लेखकों ने अपनी कहानियों को पारदर्शिता एवं अभिव्यक्ति की कलात्मकता से सहज-स्रपेष्य बनाया है।

कुल मिलाकर प्रस्तुत कहानी अंक निर्दोष मुद्रण तथा स्तरीय सामग्री - दोनों की दृष्टियों से न केवल पठनीय है वरन् संग्रहणीय भी’ ऐसी उत्तम प्रस्तुति के मूल में आपका संपादन-कौशल के साथ-साथ श्रम और शाश्वत साहित्य-सेवा भावना भी दृश्यमान है। अतः मेरी ओर से आपके साथ पूरे ‘अभिनव इमरोज’ परिवार को दीपावली एंव छठ की शत्-शत् शुभकामनाएँ समर्पित है।

-सीताराम पाण्डेय, मुजफ्फरपुर, मो. 9386752177

आप द्वारा प्रेषित साहित्य नंदिनी-अभिनव इमरोज़ का रजिस्टर्ड पार्सल मिला। आपके इस सहयोग हेतु परिषद परिवार व इन्दुमती पुस्ताकालय आभारी है।

-जूड़पुर, नामनगर विधमौवा, जौनपुर, उत्तर प्रदेश