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प्रांत प्रांत की कहानियां – अनुवादिका देवी नागरानी; एक नज़र (समीक्षक) – मंजु महिमा
October 25, 2020 • मंजु महिमा • साहित्य नंदनी

अनेकानेक शुभकामनाओं के साथ


मंजु महिमा, हिंदी और राजस्थानी की कवयित्री,
अनुवादिका  और वरिष्ठ शिक्षाविद्, अहमदाबाद (गुज.)
मो. 992522107
Email ID : manjumahimab8@gmail.com

नववर्ष 2020 के प्रारंभ होते ही मुझे सुविख्यात ग़ज़लकारा एवं कथाकारा साथ ही बेहतरीन अनुवादिका देवी जी का डिजिटल उपहार मिला| वह था उनके द्वारा विभिन्न भाषाओं से हिन्दी में अनुवादित पुस्तक 'प्रांत प्रांत की कहानियाँ' तथा इसके साथ आए पत्र में इस पुस्तक को पढ़कर अपने प्रतिभाव लिखने का स्नेह भरा आदेश भी।

वसुदेव कुटुम्बकंके भाव से अनुप्रेरित विभिन्न भाषाओँ से अनुदित बेहतरीन कहानियाँ

अभी तक मैंने अंग्रेज़ी और हिन्दी की ही कहानियाँ पढ़ी थीं, जिनमें कुछ पाश्चात्य और भारतीय परिवेश पृष्ठभूमि में रहता आया है, पर देवी जी ने अनुवाद के लिए विभिन्न भाषा, प्रान्त और वहाँ के लेखक तथा उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि को देखते हुए कुछ  कहानियों का विलक्षण चयन किया है. ‘वसुदेव कुटुम्बकं’ के भाव से अनुप्रेरित विभिन्न भाषाओं की कहानियों के मुक्ताओं को हिन्दी के धागे में पिरोते हुए देवी जी ने निसंदेह ही एक अनमोल ‘कौस्तुभ-हार’ तैयार किया है. यह मैंने इन कहानियों को पढ़कर जाना है.

इस पुस्तक में कुल 19 कहानियाँ हैं- जिनमें 3 कहानियाँ उर्दू भाषा की, 2-2 कहानियाँ पश्तु, बराहवी, पंजाबी और अंग्रेज़ी की तथा इनके अतिरिक्त मेक्सिकन, ईरानी, सिन्धी, ताशकंद, बलूची, रूसी, मराठी और कश्मीरी भाषा की 1-1 कहानी भी सम्मलित है. इस प्रकार इन कहानियों का फलक बहुआयामी है. वैश्विकता के चंदोवे के तले बैठ हम एक ही स्थान से पूरे योरोप के साहित्य का रसास्वादन कर पाते हैं..वह भी अपनी चिर-परिचित भाषा में..इसके लिए देवी जी निश्चय ही अभिनंदनीय हैं..हिन्दी साहित्य उनका ऋणी रहेगा. वस्तुत: अनुवाद ही वह माध्यम है जो विभिन्न भाषाओं में संप्रेषणीयता का सेतु निर्मित करता है. 

पुस्तक में चयनित विभिन्न कहानियाँ हमें न केवल वहाँ के यथार्थ से, मानवीय संवेदनाओं और वहां के लोगों की सोच से परिचित करवाती हैं, वरन हमें विभिन्न लेखकों के भाषा-शिल्प, विभिन्न मौलिक बिम्ब, विशिष्ट भाव-बोध से भी रूबरू करवाती है, उस प्रांत के सामाजिक परिवेश, आर्थिक-स्थति, संस्कृति-संस्कार आदि की भी झलक दिखाती हैं.

कथासंग्रह की पहली कहानी मेक्सिकन है, जिसमें वहाँ के सरकारी कर्मचारी और वहाँ की सरकारी व्यवस्था की एक छवि नज़र आती है- नगर के मेयर का दाँत डॉक्टर द्वारा निकालने के पश्चात् जाते जाते मेयर डॉक्टर से कहता है-

“बिल भेज देना.”

“किसके नाम, तुम्हारे या टाउन कमिटी के नाम?”

(एक व्यंग्यात्मक स्वर)

मेयर ने बिना डॉक्टर की ओर देखे ही क्लिनिक का दरवाज़ा बंद किया| जाली के दरवाज़े से, बाहर की ओर से उसकी आवाज़ आई- ‘कोई फ़र्क नहीं पड़ता,एक ही बात है!’

कहानी का यह अंतिम सम्वाद कितना कुछ पाठकों के लिए छोड़ जाता है...

बराहवी कहानी ‘आखिरी नज़र’ कहानी में एक बिम्ब देखिए-

‘उतार की तरफ़ लुढ़कने वाला पत्थर भी आखिर एक जगह पर आकर रुकता है. हाँ, बिलकुल उसी तरह सोच भी लुढ़कने वाले पत्थर की तरह कहीं न कहीं जाकर रुक जाती है.’

लुढ़कने वाले पत्थर के साथ आदमी की सोच का जोड़ना ,एक नवीन बिम्ब कहा जा सकता है.

बलूची कहानी ‘क्या यही ज़िन्दगी है’ में बिम्बात्मकता और भाषाई प्रयोग देखिए.....

‘सूरज ढलकर क्षितिज पर झुक रहा था.....खूब बूंदा-बांदी और मूसलाधार बारिश हुई. ओले तड़तड़ाने लगे.बारिश ने यूँ समांबाँधा कि जैसे आज ही टूटकर बरसना है.....भेड़-बकरियों ने सहमकर ज़ोर-ज़ोर से मिमियाना और डकारना शुरू कर दिया. अमीर अपने पक्के घरों में और गरीब अपने झोपड़ों में फटे-पुराने कपड़ों में दाँत बजा रहे थे. अपनी गिरी हुई झोपड़ियों से आग की तमन्ना लिए दाँत बजाते, बगलों में हाथ दे,सहमें हुए सर्दी का दुःख झेल रहे थे. यूँ लगता था कि ये कहावत सही ही है-‘गुलाबी जाड़ा भूखे-नंगों की रजाई है.’

इसमें कहावत और मुहावरे का प्रयोग कुछ भिन्न प्रकार का है. इस कहानी में सघन मार्मिकता के साथ वहाँ की यथार्थता की भी अभिव्यक्ति हो रही है. 

ईरानी कहानी ‘बिल्ली का खून’ आसपास घटी घटना को लेकर लिखी गई है, जिसमें संवेदनशीलता है.

पंजाबी कहानी ‘द्रोपदी जाग उठी’ नारी विमर्श की कहानी है जो पंजाब की सामाजिक पृष्ठ भूमि को दर्शाती है.

बलूची कहानी ‘तारेक राहें’ वहां की राजनीति का छिछला रूप और अपराधीकरण मुद्दा उठाती है.

इसी प्रकार हर कहानी कुछ ना कुछ कहती है. इनकी पृष्ठभूमि पृथक होते हुए भी इन कहानियों में बहुत से अनछुए सच हैं, मानवीय प्रश्न हैं, साथ ही स्त्री, प्रकृति और तत्कालीन राजनीतिक-सामाजिक स्थति बयां हुई है इसके अलावा  इन कहानियों  का सबसे बड़ा स्वर मानवता के कलुष का उभर कर आया है.

डॉ.कविता वाचक्नवी हयूस्टन अमेरिका से इन कहानियों के संबंध में लिखती हैं-

‘विविध देशों, सभ्यताओं और भाषाओं में लिखी होने के बावज़ूद एक बात जो समान है कि ये सभी मानवजीवन की दुरूहता और जटिलताओं को व्यक्त करती हैं. संवेदना के स्तर पर विश्वमानव और विश्वमानस समान है, उसके सुख-दुःख, आवश्यकता-अभाव,संवेग-पीडाएं एक समान हैं, परिस्थितियाँ, घटनाक्रम, स्थान, काल और नाम भले भिन्न-भिन्न होते हैं.’

लाज़वाब बात यह है कि देवी जी ने, जो अनुवाद कला में पारंगत हैं, इतनी खूबसूरती से अनुवाद किया है कि पढ़ते समय हमें तनिक भी अंदाज़ नहीं होता कि ये कहानियाँ मूलरूप से किसी अन्य भाषा में लिखी गईं हैं. वे पूर्णत: समर्पित भावना से अनुवाद करती हैं|

उनकी यह भावना उन्हीं के शब्दों में समझे तो- ‘मेरी दिली ख्वाहिश है कि सिन्धी व् अन्य प्रांतीय भाषाई सौहार्द अदब-अदीबों के बीच पनपता रहे और भाषाई सीमाएं सिमट कर एक आंचल तले फलते-फूलते मुक्त फिज़ाओं को महकाती रहे.’

अब तक  देवी जी के 18 कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं- जिनमें सिन्धी से हिंदी, हिंदी से सिन्धी और उर्दू से हिंदी अनुवाद भी हैं. इस प्रकार हम देखते हैं कि देवी जी न केवल हिन्दी साहित्य में ही योगदान नहीं दे रही बल्कि सिन्धी और उर्दू साहित्य को भी नवाज़ रही हैं.

मेरी कामना है कि ‘प्रांत प्रांत की कहानियाँ’ जन-जन तक पहुँचे और सब इन्हें  पढ़कर विभिन्न देशों के लेखन से, वहाँ के साहित्य से, वहाँ के परिवेश से परिचित हों.

साथ ही मेरी अशेष शुभकामनाएँ हैं कि देवी जी की यह सृजनशीलता आगे भी बनी रहें, वे शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहकर हम सभी को प्रेरित करती रहें और हिन्दी, उर्दू और सिन्धी साहित्य में अभिवृद्धि करती रहें..आमीन..

देवी नानगरानी, मुम्बई, मो. 9987928358