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प्रेमचन्द-कफन (कहानी)
June 22, 2020 • लक्ष्मी पाण्डेय 'श्रीसूर्यम' • साहित्य नंदनी

लक्ष्मी पाण्डेय 'श्रीसूर्यम', कुलपति निवास के पास, कोर्ट रोड,10,सिविल लाइन सागर, म. प्र.-470001,
मो.-7067920078

 

'कफन' क्षरित मनुष्यता की कहानी है"

'पुस्तक संस्कृति के अप्रैल-जून 2018 के अंक में 'कफन' कहानी पर प्रेमचन्द साहित्य के अधिकारी विद्वान एवं शोधकर्ता डॉ. कमल किशोर गोयनका का आलेख पढ़ा।लेख का शीर्षक 'कफन मृत्यु नहीं जीवन की कहानी है' को तथा लेख के अंदर उनके लगभग सभी दृष्टिकोणों को पढ़कर अफसोस हुआ।गोयनका जी बुधिया के लिए कफन के पैसे देने और हमदर्दी जताने वाले सामाजिक वातावरण के आधार पर कहानी का आधा आकलन कर उसे संवेदनशील और मानवीय बताते हैं। वे कहते हैं-घीसू में हमदर्दी है उसकी औरत मरी थी तो वह तीन दिन तक उसके पास से हिला नहीं था.माधव का दो बार रोना भावावेग ही है क्योंकि -"हँसना और रोना मनुष्य की संवेदनशीलता के अंग हैं इस आदर्श वाक्य के लिए वे प्रेमचन्द तथा उनके 'गोदान' उपन्यास के पात्र प्रो. मेहता का हवाला भी देते हैं। इस तरह आकलन पूर्ण कर इसे जीवन की कहानी घोषित करते हैं।

गोयनका जी के दृष्टिकोण से क्षमायाचना पूर्ण असहमति व्यक्त करते हुए कहना चाहती हूँ कि -" 'कफन' एक स्त्री (बुधिया) के जीवन की विडंबना की कहानी है,यह घीसू और माधव के रूप में जीवन की विकृति और क्षरित मनुष्यता की कहानी है।" मैं साहित्यकार राजेन्द्र यादव से सहमत हूँ कि यह हृदय-स्तब्धता या विजड़ित संवेदना की कहानी है।राजेन्द्र जी के स्थापित आधारों – एक-आलू खाने के लालच में घीसू-माधव का बुधिया को तड़पते छटपटाते मरने के लिए छोड़ देना और दूसरा दोनों का कफन के पैसों से शराब पीना और मस्ती में झूमना-नाचना। दोनों आधार कहानी को विजड़ित संवेदना की कहानी सिद्ध करते हैं। गोयनका जी कहते हैं कि-" भले ही ये दोनों अमानवीय एवं संवेदनशून्यता की घटनाएँ हैं परंतु कहानी का सारा वातावरण ऐसा नहीं है।"

मेरा मानना है कि यह कहानी व्यक्तिप्रधान है।घीसू और माधव के चरित्र चित्रण के आधार पर ही इस कहानी का नामकरण हुआ है। दरअसल सदैव समृद्ध उच्च वर्ग को,जमींदारों,राजाओं को अंग्रेजों को ही शोषक अत्याचारी के रूप में देखा जाता है। प्रेमचन्द ने अपने साहित्य में इस यथार्थ को चित्रित भी किया है,किन्तु चूँकि प्रेमचन्द निष्पक्ष यथार्थवादी कथाकार हैं अतःउन्होंने अपनी दृष्टि उस दूसरे पक्ष पर भी डाली जो अपने आप को शोषित पीड़ित बताता है। माधव और घीसू के रूप में प्रेमचन्द शोषित पक्ष के ऐसे विकृत, अमानवीय संवेदनहीन,कुटिल,चोर, स्वार्थी,आत्मकेन्द्रित, अकर्मण्य लोगों को रेखांकित करते हैं जो मनुष्यता के नाम पर कलंक हैं। किन्तु अपनी दुरवस्था के लिए सामने वाले समृद्ध उच्च वर्ग पर आरोप लगाते हैं। इसलिए संवेदनशील ग्रामीण और जमींदार द्वारा कफन के लिए पैसे दिए जाने को कहानी का मुख्य बिंदु नहीं बनाया जा सकता,न ही इस आधार पर घीसू-माधव की अमानवीयता पर पर्दा डाला जा सकता है।समाज में ऐसे संवेदनशील लोग हर काल में हर जगह रहते हैं जो दुख में, मृत्यु जैसी घटना के समय तन-मन-धन से सहयोग करते हैं। घीसू-माधव की अकर्मण्यता से जमींदार ही नहीं,सारा गाँव परेशान और खिन्न है।वे एक घंटे के कार्य को समाप्त करने में पूरा दिन लगा देते हैं,उनकी इस कार्य शैली के कारण जब तक बहुत आवश्यक न हो लोग इन्हें काम के लिए नहीं बुलाते। ये एक- दो दिन काम करते हैं और फिर घर पर बैठे उस पैसे के खत्म होने तक कहीं काम करने नहीं जाते। पैसे खत्म होने पर चोरी करते हैं, किसी के खेत से आलू,गन्ने,चने आदि जो भी उपलब्ध हो चुरा लाते हैं। माधव की पत्नी बुधिया के आने के बाद ये और भी अकर्मण्य हो गए। वह बेचारी दूसरों के घर गोबर पाथना, भोजन बनाना,गेहूँ पीसने से लेकर जो भी काम मिले करके पैसे कमाकर लाती है और इनके पेट का नर्क भरती है।वही बुधिया जब प्रसव पीड़ा से छटपटाती है,रात भर तड़पती है, तब यह अहसास नहीं हुआ कि वह स्त्री प्रसव पीड़ा के साथ भूख की पीड़ा भी झेल रही है। भुने आलू उसे खिलाए जा सकते थे ताकि उसमें पीड़ा को सहने की शक्ति आए। क्या ये आस -पड़ोस से किसी वैद्य,किसी अनुभवी स्त्री को बुलाकर बुधिया की सहायता नहीं कर सकते थे?

घीसू कहता है कि उसकी औरत मरी थी तो वह तीन दिन तक उसके पास से हिला नहीं था ... अगर वह इतना अच्छा, संवेदनशील मनुष्य है तो क्या बहू के प्रति ( वह बहू जो रोज खटती कमाती और उसका पेट भरती है) उसका कोई कर्तव्य नहीं है? अगर माधव नहीं गया तो उसे छोड़कर वह वैद्य को बुलाने या गाँव वालों की सहायता माँगने चला जाता.... | क्यों नहीं गया ? क्योंकि माधव की तरह वह भी भुने आलू खाना ज्यादा आवश्यक समझता था कि कहीं माधव उसके हिस्से के या सारे आलू खा न जाए.. |अर्थात् दोनों बापबेटे केवल अपने पेट और भूख पर ही केन्द्रित थे पशु की तरह...। मनुष्य होते तो घीसू अपनी अगली पीढ़ी पोता या पोती के स्वागत के लिए बेचैन रहता,बहू को बचाने के सौ यत्न करता। माधव अपने बच्चे के लिए,पत्नी के लिए स्वयं उसकी सेवा में उपस्थित रहता, उसके सिर पर हाथ रखता तो कष्ट सहना उसके लिए आसान हो जाता क्योंकि पति के प्रेम और साथ से स्त्री बड़े से बड़ा कष्ट सह जाती है...। उसने ऐसा नहीं किया। प्रेमचन्द ने छटपटाती स्त्री की दशा का जितना करूण चित्रण किया है वह सचमुच पीड़ा के अतिरेक से हृदय को स्तब्ध कर देता है। पता नहीं गोयनका जी इस पर प्रश्नचिन्ह कैसे लगा सके ? 'हंस' के अंक  प्रेमचन्द की टिप्पणी का उल्लेख करते हुए गोयनका जी कहते हैं कि-" आदर्श साहित्य में बुद्धि और भावुकता का कलात्मक सम्मिश्रण होता है। इसमें दो राय नहीं किन्तु इस साहित्य को पढ़ने और समझने के लिए भी बुद्धि और भावुकता के साथ निष्पक्ष दृष्टि और गहन मानवीय संवेदना की आवश्यकता होती है।गोयनका जी लिखते हैं कि-" माधव के विचारों और व्यवहार में तो मनोभावों और मनुष्यता का रंग है वह पत्नी के प्रति कृतज्ञ है, क्योंकि उसके कारण ही उसे वह भोज मिला जो उम्र-भर न मिला था। वह 'दुख और निराशा' में चीख मार-मार कर रोता है। बची हुई पूड़ियाँ भिखारी को देने पर देने का गौरव, आनंद और उल्लास उसे पहली बार महसूस हुआ..आदि।” गोयनका जी की चिन्तन दृष्टि को पत्रिका के पृ. 6 पर दूसरे अनुच्छेद के माध्यम से समझा जा सकता है। वे गाँव और मधुशाला दो रंगमंचों की बात करते हैं।इसे संक्षेप में ही लिखूगी-माधव का कथन –"कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते जी तन ढंकने को चीथड़ा भी न मिले उसे मरने पर नया कफन चाहिए।"गोयनका जी इस कथन को व्याख्यायित करते हुए इस पर सहमति व्यक्त करते हैं।

गोयनका जी ने ठीक कहा-"यह हमारी सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था की विडंबना पर  गहरा व्यंग्य है। यह कहानी में पहला बौद्धिक हस्तक्षेप है। समाज जीवन से अधिक सम्मान मृत्यु को देता है।"ध्यान देने योग्य बात यहाँ यह है कि यह वाक्य यहाँ कौन कह रहा है ? कब और क्यों कह रहा है ? गोयनका जी को माधव घीसू का लाश को झोपड़ी में अकेले छोड़कर शहर कफन खरीदने जाना गलत नहीं लगा.क्यों ? क्या दोनों में से एक लाश के पास नहीं रूक सकता था ? दोनों भी रूक सकते थे, कोई ग्रामीण कफन खरीद कर ला देता... | ऐसे अवसरों पर अधिकतर पड़ोसी ही यह कार्य करते हैं। दोनों दिन-भर दुकान-दुकान घूमकर कफन पसंद करते हैं,यह भी अस्वाभाविक नहीं लगा ? अंततः कफन खरीदे बगैर मधुशाला जाकर शराब पीना, पूड़ियाँ खाना, नाचना-गाना-रोना, कबीर और अध्यात्म की बातें करना...यह सब शराबियों की नौटंकी और घृणित, कृत्रिम आचरण गोयनका जी को घीसू-माधव का संवेदनशील आचरण लगता है ? आश्चर्य है ? क्या बहू या पत्नी की लाश को झोपड़ी में लावारिस छोड़ कर शराब पीना मानवीयता और नैतिकता है ? क्या यह भारतीय संस्कृति है ? क्या यही अवसर था ब्रह्मानन्द प्राप्त करने का ? क्या 'कफन' के पैसों से जीवन भर का वांछित-इच्छित-काम्य भोज्य प्राप्त करना मानवीय आचरण है जैसा कि गोयनका जी की व्याख्या कहती है ? क्या 'कफन' के पैसों से खरीदी गई और भरपेट खाने के बाद बची पूड़ी का दान देकर गौरव और उल्लास प्राप्त करने की बात घृणित नहीं है ? शराबी क्या पीने के पूर्व और नशा उतरने के बाद वही रहता है ? आचार-व्यवहार में....जैसा कि घीसू-माधव आध्यात्मिक बातें करते हैं,बुधिया के प्रति कृतज्ञता और प्रेम दर्शाते हैं..यह सच होता तो क्या वे कफन के पैसों से शराब पीने आते ? लाश को ठिकाने लगाने के लिए कुटिलता पूर्वक यह भार गाँव वालों पर छोड़ देते ? और भी कितने ही प्रश्न उठते हैं...।

भारतीय धर्म और दर्शन को निष्पक्ष होकर निर्विकार मन और बुद्धि से पढ़ने और आत्म -सात् करने की आवश्यकता है। मनुष्य का शरीर पाने मात्र से ही हम मनुष्य कहलाने के अधिकारी नहीं हो जाते...। मनुष्य के लिए यह संसार एक कर्मभूमि है।हमें अपने कर्म से, अपने परिश्रम और संघर्ष से अपने लिए रोटी-कपड़ा और मकान अर्जित करना है |जो दिव्यांग (विकलांग) हों, अशक्त हों उनका भीख माँगना,याचना करना,दूसरों से, सरकार से अपेक्षा करना जायज़ है लेकिन घीसू-माधव जैसे मुस्टंडों को अगर मन भर भोजन और मन लायक कपड़ा नहीं मिलता तो यह उनकी अकर्मण्यता है जो दया के काबिल नहीं। हमारे देश में अपार संपदा और समृद्धि प्रकृति के ही पास है जो इससे लेना चाहता है,लेना जानता है, वह अपने पुरूषार्थ से इसे प्राप्त कर लेता है। जीवित व्यक्ति अपने पुरूषार्थ से भोजन-कपड़ा जुटाता है,उसे जुटाना चाहिए लेकिन मृत व्यक्ति पुरूषार्थ नहीं कर सकता, इसलिए उसके लिए 'कफन' मात्र एक अंतिम कपड़ा दूसरों को जुटाना पड़ता है क्योंकि भारतीय धर्म और दर्शन में जीवन की तरह मृत्यु भी एक उत्सव है। जन्म पर नए वस्त्र मिलते हैं तो मृत्यु पर भी मिलना चाहिए, इसमें अस्वाभाविक क्या है ? अपनी कायरता,अकर्मण्यता को छिपाने के लिए दुर्भाग्य की बात करना, सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था पर प्रश्न उठाना कहाँ का न्याय है ? समाज में जीवन का महत्व मृत्यु से कम है यह कहना भी अनुचित है क्योंकि जीवन को महत्व मिलता है मनुष्य के अपने कर्मों से, आचार-विचार-व्यवहार और पुरूषार्थ से... | यह तो समाज की मानवीय संवेदना और नैतिकता है कि वह पशुवत् जीवन व्यतीत करने वाले मनुष्यों की मृत्यु पर भी उन्हें आदर सहित अंतिम संस्कार कर उसे महत्व प्रदान करता है। मधुशाला का पूरा दृश्य प्रेमचन्द का मनुष्यता पर किया गया बेहतरीन व्यंग्य है। शराबियों की कृत्रिम संवेदना भावावेग,व्यवहार,विश्वास योग्य नहीं होता यह सभी जानते हैं।शराबी दया के पात्र नहीं होते,वे मूलतः कमजोर मनुष्य (आत्मिक रूप से कमजोर,शरतचन्द्र के पात्र देवदास टाइप )या घुटे हुए बदमाश और कुटिल,स्वार्थी,आत्मकेन्द्रित मनुष्य होते हैं जो यह नहीं सोचते कि जिन पैसों से शराब खरीद रहे हैं उनसे पत्नी-बच्चों के लिए मिठाई या उपहार खरीदे जा सकते हैं। बुधिया जीवन भर खटकर जिन मुस्टंडों का पेट भरती रही, अंतिम समय में उसके साथ नहीं थे। अपनी कमाई से उसका दाह संस्कार करना तो दूर गाँववालों से मिले कफन के पैसों से शहर जाकर मधुशाला में बैठकर ब्रह्मानन्द लूट रहे थे और गोयनका जी को यह अमानवीयता नहीं बल्कि उनकी जीवन भर की लालसाओं का पूर्ण होना लगता है और वे इसे ठीक समझते हुए लिखते हैं-"वास्तव में,जीवन ही श्रेष्ठ है और वही सत्य है।जीवन है तो अभिलाषाएँ और लालसाएँ भी होंगी और उन्हें पूर्ण एवं तृप्त करने के लिए उचित-अनुचित साधनों का उपयोग होता ही रहेगा।"

इसमें तो कोई दो राय नहीं कि 'जीवन श्रेष्ठ है और वही सत्य है।' अभिलाषाओं और लालसाओं को पूर्ण करने के लिए सत्य का,नैतिकता का,उचित मार्ग अपनाना या भ्रष्टाचार करके,गबन,चोरी,ठगी करके अनुचित मार्ग अपनाना भी समझ में आता है किन्तु उसमें मानवीय संवेदनाओं की चिनगारी तो बची रहनी चाहिए।मनुष्य और पशु के बीच विवेक और चेतना,संवेदना का ही तो अंतर है। पशु अपने साथी की मृत देह के पास पड़ी रोटी,भोज्य सामग्री खाता रहता है उसमें ज्ञान और चेतना नहीं है लेकिन मनुष्य कितना भी निरक्षर हो,अज्ञानी हो उसमें इतनी मानवीय संवेदना तो होती है कि वह अपने मृत प्रियजन की देह को लावारिस छोड़कर, उसके कफन के पैसों से अपनी उदरपूर्ति नहीं कर सकता, अभिलाषाओं की तृप्ति के लिए ऐसा सोचना भी उसे अमानवीयता लगेगी। प्रतिदिन वे उसी बुधिया की कमाई से पेट भर रहे थे, चोरी से खाद्यान्न जुटाकर खा रहे थे, निर्भय और स्वतंत्र थे,चाहते तो रोजी-रोटी कमाने उसी शहर में जा सकते थे जहाँ वह कफन के पैसों से व्यक्तिगत लालसाओं की पूर्ति कर रहे थे। उनके लिए –पारिवारिक दायित्व,सामाजिक मर्यादाएँ एवं नैतिक बोध" पूर्व में भी निरर्थक और प्राणहीन थे, अबजब मधुशाला में बैठे हैं तो यह सोचना भी बेकार है कि वे ऐसे किसी भाव से ग्रस्त हो सकते हैं। निर्मल वर्मा का यह कथन-" दो हिंदुस्तानी पियक्कड़ों का श्मशान की छाया में हुआ यह मुक्ति समारोह है। वे जैसे ही कफन के पैसों से शराब का कुल्हड़ मुँह में लगाते हैं उसी क्षण हिन्दी साहित्य में व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता का स्वाद चखता है। उन्हें यह मुक्ति और स्वतंत्रता बौद्धिक कौशल एवं आत्म छल से मिलती है।" गोयनका जी ने इसे अपने लेख में उद्धृत किया है तो जाहिर है वे इससे सहमत होंगे। इस वक्तव्य में निर्मल जी ने हिन्दुस्तानियों की धार्मिक मान्यताओं और परम्परा के प्रति उनकी निष्ठा और समर्पण पर अप्रत्यक्ष रूप से व्यंग्य किया है ऐसा प्रतीत होता है। पियक्कड़ों की निष्ठा और मानसिकता पीते ही यानी मद्यपान करते ही बदल जाती है क्योंकि वे मूलतः स्वार्थी और आत्मकेन्द्रित होते हैं। इसलिए निर्मल जी मुक्ति और स्वतंत्रता की बात भारतीय धार्मिक रीति-रिवाजों से मुक्ति के संदर्भ में करते हैं। सामान्यतः हिन्दु या भारतीय हिन्दु किसी निकट के सम्बन्धी, पति या पत्नी आदि की मृत्यु के बाद तेरह दिन तक विविध कर्मकांडों में व्यस्त रहता है, अशौच (अशुद्धि) की स्थिति होने के कारण तेरह दिन पूजा- पाठ बंद रहता है,तेरहवें दिन शुद्धि के बाद ही सामान्य जीवन का,दिनचर्या का आरंभ होता है। इन शोक के तेरह दिनों में जिन विधि-विधानों का पालन हर हिन्दु पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ करता है उसे निर्मल वर्मा का दृष्टिकोण बंधन और बेकार की परम्परा मानता है अतः श्मशान की छाया में अर्थात् घर (झोपड़ी में) पत्नी/बहू की लाश को अनाथ छोड़कर उसके कफन के पैसों से शराबखोरी करने वाले घीसू-माधव की पाशविकता, अमानवीयता उन्हें मुक्ति समारोह लगती है।

कफन परतंत्रता के युग में लिखी गई कहानी है। जब भारतीय समाज न केवल भौतिक, लौकिक स्वतंत्रता का प्रयास कर रहा था बल्कि अनेक महामना भारतीय समाज को रूढ़ियों हानिकारक परम्पराओं, धार्मिक अंधविश्वासों से मुक्ति दिलाने का प्रयास कर रहे थे। निर्मल वर्मा का कथन कि -" जैसे ही वे कफन के पैसों से शराब का कुल्हड़ मुँह में लगाते हैं, उसी क्षण हिन्दी साहित्य में व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता का स्वाद चखता है।" यानी प्रेमचन्द ने कहानी के माध्यम से भारतीय समाज को मृत्यु के अवसर पर सम्पन्न की जाने वाली क्रियाओं, रिवाजों पिण्डदान आदि से मुक्ति दिला दी यह दर्शाकर कि माधव -घीसू की जीवन भर की लालसा (छककर पीने और स्वादिष्ट भोजन करने की) पूर्ण होना कफन खरीदने और मृत्यु के अवसर पर किए जाने वाले कर्मकांडों से अधिक महत्वपूर्ण है।संभवतः निर्मल वर्मा का यही मन्तव्य है।

अफसोस कि प्रेमचन्द को निर्मल वर्मा ने ठीक से नहीं समझा, अपना दृष्टिकोण उन पर लाद दिया। यही कार्य कमलकिशोर गोयनका जी ने किया।बात स्पष्ट करने के लिए संदर्भो के बड़े होने पर भी उन्हें देना पड़ेगा। गोयनका जी ने लिखा है-"असल में भाग्यशाली तो घीसू-माधव हैं जो मौत की काली छाया में भी जीवन का सबसे बड़ा सुख और आनन्द खोज निकालते हैं...यद्यपि उनकी यह आनंदानुभूति अल्पावधि की है,परंतु वे क्षण उनके जीवन के सर्वोत्तम क्षण हैं,उनका यह सुख एकदम निजी है,वे ही उसके नियंता एवं नियोजक हैं।....प्रेमचन्द की कहानियों में यह व्यक्ति की निजी सत्ता का आरंभ है।"

गोयनका जी ने कफन के पैसों से शराब पीकर नशे में अध्यात्म और कबीर गाने वाले कामचोरों,आलसी,बेशर्म,हरामखोर और अमानवीय घीसू-माधव में ऐसी कौन सी दृढ़ता देख ली जिनके आचरण से कहानियों में व्यक्ति की निजी सत्ता का आरंभ घोषित कर दिया ? व्यक्ति की निजी सत्ता उसके पुरूषार्थ,सत्याचरण,परिश्रम और विवेकपूर्ण चेतना से स्वयं निर्णय लेने की प्रवृति से सिद्ध होती है या इस तरह कफन के पैसों से शराब पीने का घृणित अमानवीय निर्णय लेने से ? पियक्कड़ों का तर्क यह कि-"कफन रात में कौन देखता है ? मँहगा हो या सस्ता उसे तो लाश के साथ जल ही जाना है..कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते जी तन ढंकने को चीथड़ा भी न मिले उसे मरने पर नया कफन चाहिए ?"

घीसू-माधव का यह कैसा तर्क' और 'बुद्धिकौशल' है जिसके द्वारा वे व्यक्ति की निजी सत्ता का आरंभ दर्शा रहे हैं ? जबकि होगा यह कि नशा उतरते ही दोनों पुनः गाँव वालों के अवलम्ब पर,चोरी करके,ठगी करके जीवन यापन करेंगे...क्योंकि आत्मसम्मान जैसी चीज उनके पास है ही नहीं... परिश्रम करके कमाना उनके स्वभाव में नहीं...। गोयनका जी तुलसीदास की यह पंक्ति उद्धृत करते हैं

"तजि माया सेइअ परलोका/मिटहिं सकल भव संभव सोका।" और कहते हैं कि-"प्रेमचन्द की 'कफन' कहानी इसी मध्ययुगीन भक्ति-दर्शन के विरूद्ध आधुनिक चेतना की कहानी है कि परलोक की अवधारणा एवं विश्वास मिथ्या हैं, इसलिए उसकी कामना एवं उपासना निरर्थक है। हमें जीवन को ही सत्य मानना चाहिए।मैथिलीशरण गुप्त जैसा वैष्णव कवि भी भूतल को ही स्वर्ग बनाना चाहता है। प्रेमचन्द के समय में पश्चिम में ईश्वर की मृत्यु की घोषणा हो चुकी थी और अपने देहांत से पूर्व उन्होंने परिपूर्णानन्द वर्मा से कहा था कि उन्हें ईश्वर की सत्ता में विश्वास नहीं है,अर्थात् ईश्वर,परलोक या स्वर्ग के अस्तित्व में उनकी कोई आस्था नहीं थी।"

गोयनका जी का यह कथन, उक्ति, वक्तव्य या संदर्भ मानने,स्वीकार करने योग्य नहीं है। उन्होंने न केवल प्रेमचन्द को गलत समझा बल्कि गुप्त जी को गलत तरीके से उद्धृत किया है। क्या गोयनका जी यह कहना चाहते हैं कि- कफन के पैसों से शराब पीना, भुने आलू खाने की होड़ में बाप-बेटे का,प्रसवकाल में पीड़ा से छटपटाती बुधिया की चीखों को अनसुना करना, उसे मरने के लिए छोड़ देना,यह सब जो संवेदनहीनता एवं अमानवीयता का प्रमाण है यह आधुनिक चेतना है ? क्या आधुनिक चेतना मनुष्य से मनुष्यता छीन लेती है ? या इस तरह स्वार्थी-आत्मकेन्द्रित होकर केवल इस लोक के, वर्तमान क्षण के सुख को सार्थक करना,ब्रह्मानन्द पा लेना आधुनिक चेतना है ? क्या यह ब्रह्मानन्द है या होना चाहिए ? पत्नी का, बहू का रिश्ता क्या एक कुल्हड़ शराब से तोला जा सकता है ? क्या उसे अपनी भावी पीढ़ी या संतति के असमय गर्भ में ही समाप्त हो जाने की पीड़ा नहीं होनी चाहिए ? क्या घीसू-माधव जैसे लोग केवल मानव देह धारण करने के कारण ही मनुष्य कहे जाएँगे?

बेशक परलोक की अवधारणा एवं विश्वास को मानने या न मानने का हर एक का अपना अधिकार और चयन की स्वतंत्रता है किन्तु मनुष्यता की भी तो कोई परिभाषा होनी चाहिए ? रिश्तों का, संवेदनाओं का भी तो कोई मान-मूल्य होना चाहिए ? यह भारत है, पूर्व है,पश्चिम नहीं... | भारतीय संस्कृति धर्म और दर्शन पर आधारित है। यहाँ गीता का 'कर्मवाद' और 'भाग्यवाद' दोनों संतुलन बनाकर चलते हैं। कहा गया है-'भाग्यम् फलति सर्वत्र न च विद्या न च पौरूषम्’ किन्तु इस भाग्य के फलित होने के लिए 'कर्म' करने के लिए भी प्रेरित किया जाता है-'कर्मण्येवाधिकारस्ते।' मैथिलीशरण गुप्त ने भी सदैव सत्कर्मों के द्वारा,सदाचरण के द्वारा भूतल को स्वर्ग बनाने की बात की है ताकि मनुष्य भाग्य के भरोसे आलसी,अकर्मण्य होकर न बैठे वरना देश कामचोरों से भर जाएगा।विकास अवरूद्ध हो जाएगा।उन्होंने घीसू-माधव वाले ब्रह्मानन्द प्राप्ति के मार्ग को प्रश्रय और प्रोत्साहन नहीं दिया। स्वतंत्र होकर भी पश्चिम की मानसिक गुलामी करने वाले तथाकथित आधुनिकों ने सदैव पश्चिम की अवधारणा को ही सत्य और मानक माना। उन्होंने कहा–'ईश्वर मर गया' तो इन्होंने भी घोषणा को स्वीकार कर लिया,उन्होंने पद दिया-'उत्तरआधुनिकता तो इन्होंने भी इस विखण्डनवादी धारणा को स्वीकार कर लिया।यह नहीं सोचा कि उनकी संस्कृति का कोई इतिहास नहीं है, उनका ईश्वर उनकी मानसिकता में मरा हुआ है, तभी तो वहाँ परिवार और रिश्तों का निष्ठा और समर्पण का कोमल,सुंदर अस्तित्व नहीं है। वे लूटने -खसोटने, ठग लेने वाले लोग भारतीय संस्कृति और समृद्धि को चोट पहुँचाने, उसे क्षरित करने के लिए और भारतीय मानसिकता पर अपना आधिपत्य दर्शाने के लिए यह सब घोषणाएँ करते हैं।

आश्वस्तिकारक यह है कि पश्चिमी साहित्य-संस्कृति-सभ्यता के मानसिक गुलामों की संख्या अत्यल्प है इसलिए भारतीय संस्कृति को कोई हानि नहीं पहुंचा पाता,कम से कम इसे मिटाने का स्वप्न देखना तो असंभव है ही। रही बात प्रेमचन्द के ईश्वर की आस्था पर अविश्वास की.तो यह ईश्वर के प्रति क्षणिक नाराजगी रही होगी, उनका दृष्टिकोण या मानसिकता नहीं... |जिन अभावों में उनका जीवन बीता,जिस बीमारी से लड़ते,संघर्ष करते उनकी परमात्मा के घर वापसी हुई, उसके बीच में यह हारकर थककर कह देना कि "ईश्वर से मेरा विश्वास उठ गया, वह कहीं नहीं है, होता तो क्या यह अन्याय होने देता।" यह किसी भी बीमार,लगातार दुख-पीड़ा-अभाव झेलकर हार रहे व्यक्ति के द्वारा कहा जाने वाला सामान्य वाक्य है। यह अक्सर हम भी विपरीत परिस्थितियों में कह देते हैं किन्तु इसका मतलब यही होता है कि ईश्वर पर हमारी गहन निष्ठा है हम उसे सर्वस्व मानते हैं इसलिए अपेक्षा करते हैं कि वह हमें अन्याय से, दुख-पीड़ा से बचाएगा.... |जब ऐसा नहीं होता तो जैसे हम अपने पिता-पुत्र-परिजन से अपनत्व में लड़ते,नाराज होते हैं वैसे ही परमात्मा से भी लड़ते, नाराज होते हैं।

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के सम्बन्ध में कहीं पढ़ा था कि अंतिम समय में वे जब बनारस में किसी अस्पताल में थे तो कृष्ण से प्रार्थना करते थे कि जीवन से मुक्ति दे दो और जब ऐसा नहीं होता तो प्रतिदिन वे कृष्ण को अपनत्व में 'अहिरा' (अहीर) कहकर सम्बोधित करते हुए बड़बड़ाते थे कि-"अहिरा मनतै नइखे केतना मनावत हईं पर काहे के..।" अर्थात् अहीर यानी कृष्ण मान ही नहीं रहे हैं कितना मना रहा हूँ पर काहे को.वह सुनते ही नहीं...। अब यहाँ यह तो नहीं कह सकते कि आचार्य द्विवेदी कृष्ण को गाली देकर नास्तिकता सिद्ध कर रहे हैं... | स्पष्ट समझ में आता है कि कृष्ण के साथ उनका आत्मीय और पारिवारिक जैसा सम्बन्ध है,वे उनसे प्रेम,गुस्सा,लड़ाई सब कुछ कर-कह सकते हैं। ऐसा ही प्रेमचन्द के सम्बन्ध में भी कहा जा सकता है। वे आस्तिक थे।ईश्वर के प्रति उनमें आस्था-निष्ठा-विश्वास और समर्पण भाव था,इसमें दो राय नहीं...। यह उनके साहित्य से सिद्ध होता है। पंच-परमेश्वर' मंत्र, ईदगाह, गबन जैसी रचनाएँ इसके प्रमाण हैं। इस कहानी कफन' में भी वे 'देव योग' और 'पूर्व निर्धारित व्यवस्था के अनुसार जैसा पद प्रयोग करते हैं क्योंकि वे ईश्वर की सत्ता में विश्वास करते हैं।

प्रेमचन्द यथार्थवादी साहित्यकार थे।वे ‘पराधीन भारत के मरणासन्न समाज को मृत्यु के अंधकार –लोक एवं अस्तित्वहीन परलोक जो केवल विश्वास की कल्पना में है, से जीवन के आत्मसम्म उल्लास की ओर ले जाना चाहते थे लेकिन ऐसे नहीं जैसे घीसू-माधव का मार्ग था..बल्कि समाज को अंग्रेजों से, मृतप्राय रूढ़ियों और धार्मिक अंधविश्वासों से जो मनुष्यता की हानि करते हैं से मुक्ति दिलाकर ....अज्ञान और अशिक्षा, भूख-गरीबी-बेकारी के अंधकार से निकालकर उन्हें शिक्षित-आत्मनिर्भर और आत्मसम्मान से परिपूर्ण जीवन देकर...। जीवन तो श्रेष्ठ होता ही है अगर कर्मठ होकर आत्मसम्मान के साथ जिया जाए... | उसके लिए मृत्यु का अपमान करना संवेदनहीनता है | भारतीय संस्कृति, धर्म-दर्शन में मृत्यु भी एक उत्सव है, आदरणीय है, हम अपने पितरों के लिए वर्ष में एक पक्ष यानी पंद्रह दिनों का पितृ-पक्ष निर्धारित रखते हैं...ऐसे में जीवन को महिमामंडित करने के लिए यह तर्कपूर्ण शैली में सिद्ध करना कि घीसू-माधव ने जो किया ठीक किया...स्वतंत्रता का स्वाद चखा, व्यक्ति-सत्ता की स्थापना की...आरंभ किया तो ऐसे वाक्य मनुष्यता का अपमान है। साथ ही प्रेमचन्द के दृष्टिकोण को ठीक से न समझ पाने के कारण गलतबयानी उनका भी अपमान है। प्रेमचन्द व्यंग्यात्मकता का प्रयोग करते हैं।जनसाधारण में व्याप्त इस धारणा को कि समृद्ध उच्च जाति वर्ग, जमींदार, अंग्रेज, राजा ही शोषक होते हैं, दुख देते हैं को उन्होंने खंडित किया है कि व्यक्ति स्वयं के कर्मों से भी दुख-पीड़ा-अभाव-अपमान पाता है।पुरूष की अकर्मण्यता और पौरूषहीनता, संवेदनहीनता और स्वार्थ का फल उससे जुड़ी स्त्री को भी भुगतना पड़ता है। बुधिया की पीड़ा, अकाल मृत्यु उसके जीवन की विडंबना इस बात का प्रमाण है। प्रेमचन्द मानवता के पुजारी हैं गाँधी जी की तरह...वे कफन के पैसों से शराब पीने की घटना के द्वारा मुक्ति और स्वतंत्रता की घोषणा कैसे कर सकते हैं..? यह पश्चिमी सोच निर्मल वर्मा और गोयनका जी की अपनी सोच हो सकती है प्रेमचन्द की नहीं...। स्थापनाएँ करते हुए माननीय साहित्यकारों को यह सोचना चाहिए कि वे नयी पीढ़ी को क्या दे रहे हैं.? सिखा रहे हैं ? लिखने से पूर्व यह विचार आवश्यक है। 'मै' यह नयी स्थापना कर रहा हूँ जिससे मैं औरों से अलग स्थान पर प्रतिष्ठित हो जाऊँगा यह स्वार्थपूर्ण आत्मकेन्द्रित सोच है। साहित्यकार समीक्षक को 'स्वयं' के लिए नहीं, के मंगल के लिए स्थापनाएँ करनी चाहिए..।