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पुस्तक समीक्षा
June 22, 2020 • डा. कृष्ण गोपाल मिश्र • साहित्य नंदनी

समीक्षक - डा. कृष्ण गोपाल मिश्र, अवधपुरी, भोपाल, म. प्र., मो. 9893189646

‘नंददास’: एक प्रामाणिक प्रस्तुति

मध्यकालीन भक्त कवि ‘नंददास’ पर डा. व्यासमणि त्रिपाठी की सद्य: प्रकाशित अनुसंधान परक कृति हिन्दी समीक्षा में एक बड़े अभाव की पूर्ति करती है। कृष्ण भक्त कवि नंददास पुष्टिमार्गीय भक्तों में अग्रणी और अष्टछाप के कवियों में विशिष्ट हैं किन्तु जिस प्रकार विशाल वटवृक्ष की छाँह अन्य महत्त्वपूर्ण वनस्पतियों को पनपने का समुचित अवसर नहीं देता; जिस प्रकार किसी अत्यंत प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तित्व की तेजस्विता अन्य व्यक्तियों के आभा मण्डल को पूर्णतया प्रकाश में नहीं आने देती उसी प्रकार महाकवि सूरदास के विपुल सृजन-संवलित प्रभाव ने अन्य अष्टछाप-कवियों को यथोचित यश-प्राप्ति से वंचित किया। परिणामतः नंददास, छीतस्वामी आदि अन्य रचनाकारों पर शोध-अनुसंधान के क्षेत्र में कार्य अपर्याप्त रहा और उनका प्रदेय प्रायः अमूल्यांकित रह गया। डा. व्यासमणि त्रिपाठी ने अत्यंत परिश्रम पूर्वक नंददास पर सामग्री संकलित कर उनके साहित्यिक-सामाजिक अवदान को रेखांकित कर निश्चय ही महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।

‘नंददास’ शीर्षक से रचित समीक्ष्य-कृति ‘साहित्य अकादमी, नई दिल्ली’ से प्रथम बार सन् 2018 में प्रकाशित हुई है। साहित्य अकादमी ने ‘भारतीय साहित्य के निर्माता’ कृति-श्रृंखला के अन्तर्गत इस ग्रंथ को प्रकाशित किया है। हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के अल्पख्यात किन्तु महत्त्वपूर्ण रचनाकारों को प्रकाश में लाने का यह प्रयत्न सर्वथा श्लाघनीय है। अध्यवसायी और शोध-समीक्षा को समर्पित लगनशील लेखकों के सक्रिय सहयोग से इस सारस्वत अनुष्ठान की लक्ष्य-प्राप्ति सुनिश्चित है। डा. व्यासमणि त्रिपाठी ने अकादमी के उपर्युक्त उद्देश्य की पूर्तिहेतु यथासंभव उत्कृष्ट प्रयत्न किया है। इसलिए यह ग्रंथ सृजनात्मक एवं शोध-समीक्षात्मक दृष्टि से अत्यधिक उपादेय बन पड़ा है।

प्रस्तुत ग्रंथ में ‘जीवन-वृत्त’, ‘कृतित्व’, ‘दार्शनिक विचार’, ‘भक्तिभावना’, ‘आचार्यत्व’, ‘काव्य-कला’ और ‘उपसंहार’, शीषकों से कुल सात अध्याय हैं। इन अध्यायों के अन्त में परिशिष्ट के अन्तर्गत आधार भूत-साहित्य और सन्दर्भ-ग्रंथों का उल्लेख कर डा. त्रिपाठी ने अनुसंधानकार्य को अधिकतम प्रामाणिक प्रदान करने का प्रयत्न किया है। उन्होंने आधारभूत साहित्य के अन्तर्गत समीक्ष्य कवि नंददास की चतुर्दश कृतियों का उल्लेख किया है- ‘गोवर्धन लीला’, ‘रूक्मिणी मंगल’, ‘श्याम-सगाई’, ‘भंवरगीत’, ‘रूप मंजरी’, ‘रस मंजरी’, ‘विरह मंजरी’, ‘मान मंजरी’, ‘अनेकार्थ मंजरी’, ‘रास पंचाध्यायी’, ‘सिद्धांत पंचाध्यायी’, ‘सुदामा चरित’, ‘भाषा-दशम स्कंध’, एवं ‘पदावली’। उल्लेखनीय संदर्भग्रंथों की श्रृंखला में ब्रजरत्नदास कृत ‘नंददास-ग्रंथावली, ‘डा. दीनदयालु गुप्त कृत ‘अष्ट छाप और वल्लभ सम्प्रदाय’, ‘श्याम सुन्दर लाल दीक्षित कृत, ‘कृष्णभक्ति काव्य में भ्रमरगीत’ डा. धीरेन्द्र वर्मा कृत ‘ब्रजभाषा व्याकरण’, ‘डा. विजयेन्द्र स्नातक कृत ‘राधाबल्लभ सम्प्रदाय और साहित्य’ आदि ग्रंथ रेखांकनीय है।

समीक्ष्य: ग्रंथ के प्रथम अध्याय में डाॅ. त्रिपाठी ने नंददास की जन्मतिथि, जन्मस्थान, एवं अन्य जीवन संबंधी तथ्यों पर गहन अध्ययन प्रस्तुत किया है। उन्होंने न केवल नंददास की रचनाओं में प्राप्त अन्तः साक्ष्यों की गंभीर गवेषणा की है अपितु डाॅ. श्याम सुन्दर दास, डाॅ. विजयेन्द्र स्नातक, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल आदि महत्त्वपूर्ण लेखकों द्वारा लिखित साहित्योतिहास परक ग्रंथों में अंकित तथ्यों का भी युक्तियुक्त विश्लेषण किया है। निष्कर्ष: निरूपण के संदर्भ में डाॅ. त्रिपाठी अत्यंत सावधान रहे हैं। जिन संदर्भों में अन्तः साक्ष्यों और बाह्य-साक्ष्यों के मध्य उचित सामंजस्य एवं सुसंगत प्रामाणिकता सिद्ध हुई है उन्हीं में उन्होंने स्पष्ट निष्कर्ष अंकित किए हैं किन्तु जहाँ संशय की स्थिति निर्मित हुई है वहाँ उन्होंने अपनी ओर से हठपूर्वक कोई निष्कर्ष स्थापित करने का लेशमात्र प्रयत्न नहीं किया है। नंददास की मृत्यु के संदर्भ में प्रस्तुत उनकी निम्नांकित पंक्तियों इस ओर संकेत करती हैं- ‘‘दो सौ बावन बैष्ठावन की वार्ता’ के अनुसार नंददास की मृत्यु अकबर के जीवनकाल में वीरवल की मृत्यु से कुछ समय पूर्व हुई। इस संबंध में एक घटना का उल्लेख किया जाता है कि एक बार...... ऐसे में नंददास की मृत्यु संवत् 1640 विक्रमी अर्थात् 1583 ईसवी के आसपास हुई होगी। इस संबंध में जब तक कोई पुष्ट प्रमाण नहीं मिल जाता तब तक हमें इस पर भरोसा करना ही पड़ेगा।’’ ‘‘(नंददास पृष्ठ 16)। भविष्य के अन्य अनुसन्धानात्मक निष्कर्षों की आवश्यक स्वीकृति के लिए ऐसी समीक्ष्यकीय उदारता विरल है किन्तु प्रस्तुत ग्रंथ के निष्कर्ष इस लेखकीय औदार्य से समृद्ध है अतः महत्त्वपूर्ण हैं।

महान कृष्णभक्त कवि नंददास की रचनाओं के संदर्भ में विद्वान एकमत नहीं है। अतः डाॅ. त्रिपाठी ने द्वितीय अध्याय में ‘गार्सा द तासी’, ‘शिवसिंह सेंगर’, ‘जार्जग्रियर्सन,’ ‘ब्रजरत्नदास’, ‘मिश्रबन्धु’ आदि विद्वानों के मतों पर गंभीरतापूर्वक विचार कर उनकी रचनाओं का समीक्षात्मक परिचय प्रस्तुत किया है। यह अध्याय डाॅ. त्रिपाठी की समीक्षात्मक-सामार्थ्य का परिचायक है। निम्नांकित पंक्तियाँ इस संदर्भ में दृष्टव्य हैं- ‘‘.......भाषा, भाव और अभिव्यंजना की दृष्टि से नंददास के पदों की रमणीयता देखते ही बनती है। यद्यपि उन्होंने कुछ चयनित विषयों पर ही पदों की रचना की है लेकिन उनसे ही उनकी प्रतिभा और भाषित क्षमता का पता चल जाता है। अलंकर तथा रस योजना से भाव-सौन्दर्य में अभिवृद्धि हुई हैं सरलता, सरसता, प्रभावात्म्कता, चित्रमयता और मनोहरता की दृष्टि से नंददास की पदावली एक उत्कृष्ट रचना है।’’ -(नंददास/पृष्ठ 77)। अध्ययन जनित स्पष्ट निष्कर्ष, व्याकरण सम्मत भाषिक प्रयोग, प्रभावपूर्ण वाक्य विन्यास एवं तथ्य संगत विश्लेषण के कारण डाॅ. त्रिपाठी की समीक्षा शैली प्रभावित करती है।

समीक्ष्य-ग्रंथ के तृतीय अध्याय में कविवर नंददास की दार्शनिक मान्यताओं का अध्ययन किया गया है। समीक्ष्य कवि के दार्शनिक विचारों पर विमर्श प्रस्तुत किया गया है। समीक्ष्य कवि के दार्शनिक विचारों पर विमर्श प्रस्तुत करते हुए डा. व्यासमणि त्रिपाठी ने ब्रह्म, जीव, जगत, माया और मोक्ष पर नंददास के मत प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने नंददास की कृति ‘सिद्धान्त पंचाध्यायी’, ‘अनेकार्थ मंजरी’ आदि में प्रस्तुत उद्धरण देकर अपने विश्लेषण को पुष्ट किया है। चतुर्थ अध्याय में नंददास की भक्ति-भावना को पुष्टिमार्गीय भक्ति-सिद्धांतों के निकर्ष पर परखकर प्रस्तुत किया गया है। इस संदर्भ में माधुर्यभाव-संबलित भक्ति का वैशिष्ट्य विशेष रूप से रेखांकनीय बन पड़ा है।

भक्त कवि नंददास के कृतित्व, दर्शन और भक्तिभाव पूरित व्यक्तित्व पर दृष्टिपात करने के उपरान्त पंचम अध्याय में डाॅ. त्रिपाठी ने उनके आचार्यत्व पर विचार किया है और नंददास की रचना ‘रसमंजरी’ के अधार पर नायिका भेद, ‘रूप मंजरी’ एवं रास-पंचाध्यायी के आधारपर ‘श्रृंगार रस’ आदि की युक्तियुक्त विवेचना करते हुए उनका समर्थ आचार्यत्व प्रतिपादित किया है। उनका निभ्रान्त मत है कि ‘‘नंददास भक्त और कवि ही नहीं बल्कि एक आचार्य भी थे। उन्होंने काव्यशास्त्र का विधिवत अध्ययन किया था। साहित्यानुरागियों को काव्य-रीति की शिक्षा देने के लिए उन्होंने अनेक ग्रंथों की रचना की थी। रस की प्रतिष्ठा, नायक-नायिका भेद, विप्रलेभ श्रृंगार सम्बंधीकुछ नवीन उद्भावनाएँ, पर्याय कोष आदि का निर्माण नंददास के आचार्यत्व की प्रतिष्ठा के निकर्ष हैं।’-(नंददास/पृष्ठ 113)

षष्ठ अध्याय में नंददास की काव्यकला का मूल्यांकन करते हुए भाषा-सौष्ठव, आदि बिंदुओं की कसौटी पर समीक्ष्य काव्य की गुणवत्ता को परखने का सफल प्रयत्न किया है। उनका विचार है कि ‘‘नंददास की अनुभूति जितनी गहन गंभीर, उत्कृष्ट एवं उदात्त है उतनी ही उत्कृष्टता एवं उदात्तता उनकी अभिव्यक्ति में भी है। उनका काव्य-प्रधान होकर ही अनुभूति पक्ष को श्रेष्ठत्व प्रदानकरता है। उनकी भाषा में वह सौष्ठव विद्यमान है जो काव्य-रसिक को सहज ही अपनी ओर आकृष्ट करने में सक्षम है।’’ (नंददास-पृष्ठ 128)। अंतिम सप्तम अध्याय उपसंहार में नंददास के व्यक्तित्व और कृतित्व का सारगर्भित संक्षेप प्रस्तुत हुआ है। लेखक ने पूर्व वर्णित अध्यायों के समेकित निष्कर्ष निरूपित करते हुए ग्रंथ की रचना-योजना पूर्ण की है। इस प्रकार समीक्ष्य कवि नंददास पर नाति विस्तृत किन्तु सारगर्भित ग्रंथ लिखकर डाॅ. व्यासमणि त्रिपाठी ने एक ओर नंददास के साहित्यिक प्रदेय का युक्तियुक्त मूल्यांकन किया है तथा दूसरी ओर अपनी भावायित्री प्रतिभा सफलता पूर्वक प्रमाणित की है। नंददास की भक्तिभावना, सुचिन्तित दार्शनिकता, कारयित्री मेधा और जीवन रेखा को समझने की दृष्टि से इस ग्रंथ का महत्व सर्वथा असंदिग्ध है और इसकी सृष्टि की प्रयोजनगत सफलता में डाॅ. त्रिपाठी के समीक्षकीय श्रम की सार्थकता सन्निहित है। अतः यह ग्रंथ पठनीय होने के साथ ही संग्रहणीय भी है।

पुस्तक का नाम: ‘भारतीय साहित्य के निर्माता- नन्ददास

प्रकाशक: साहित्य अकादमी, रविन्द भवन, 35 फिरोजशाह मार्ग, नई दिल्ली 11001

प्रकाशन वर्ष 2018

मूल्य: 50/-