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पुत्रवधु
June 7, 2020 • इश्तियाक़ सईद

   इश्तियाक़ सईद

प्रोफेसर मदनलाल खुराना के स्थिर जीवन के जोहड़ में शान्ति शर्मा ने वासना की कंकरी उछाल कर अशान्ति फैला दी थी।

शान्ति शर्मा प्रोफेसर की भूतपूर्व छात्रा थी। तीन वर्ष पुर्व बी-ए की डिग्री प्राप्त कर घर बैठ गई थी। कुछ दिनों पुर्व न जाने कैसे और कब प्रोफेसर से आ मिली,कब हवास पर छाई,कब वासना बन कर रोम-रोम में समा गई,उन्हें कुछ नहीं याद! यह भी नहीं कि पहले किस ने किस को निर्वस्त्र किया था। उन्होंने कभी इन बातों को याद रखना चाहा भी नहीं। यदि याद्दाश्त में कुछ सुरक्षित रखा तो बस शान्ति शर्मा की चंचलता,अल्ल्हड़ता और उसका मादक शरीर जो उनकी विरक्त जीवन तथा ढलती उम्र के लिए विशेष उपहार की भांति है। जो उमंग,कसक,तड़प और जोश की सूरत उनके मन की मदिरालय को आबाद किए हुए है,अथवा उनकी मानसिकता,आत्मवाद और कामुकता को तृप्ति प्रदान कर रही है। इसी कारण उसे जब भी अपने से अलग करके सोचते तो जीवन नीरस लगने लगता। यही हाल शान्ति शर्मा का भी था,क्योंकि दोनों ही एकदूसरे के लिए अनिवार्य हो चुके थे तथा एकदूसरे के बिना अधुरा पन महसूस करते थे। यदि एक दो दिन किसी कारणवश शान्ति प्रोफेसर से न मिल पाती तो उसका वह सारा दिन व्याकुलता में गुज़रता। यही अवस्था प्रोफेसर की भी होती। जब प्रतीक्षा कठिन हो जाती तो वह सीधे उसके घर जा पहुँचते।

शान्ति अपने माता-पिता की इकलौती सन्तान थी। इस लिए उनके निकट प्रोफेसर का उनके घर आना जाना किसी सम्मान से कम न लगता। उन्हें अपनी बेटी पर गर्व भी होता कि यह सम्मान उन्हें उसी के चलते प्राप्त होता है। वह समझते थे कि प्रोफेसर उनकी बेटी की प्रतिभा अथवा असाधरण जे़हानत से आकर्षित हैं,और उसे अपनी पुत्री की तरह मानते हैं। ज़ाहिर है वह उनसे इसी प्रकार की बात-चीत करते रहे होंगे।

प्रोफेसर दिल-फेंक,आशिक़-मिज़ाज अथवा कामुकता के शिकार हों ऐसा क़तई न था। बल्कि वह ऐसे लोगों में से थे जो हर समय गंभीरता ओढ़े रहते हैं। अल्बता वह सठिया ज़रूर गए थे। यानी उनकी उम्र जीवन कुन्डली के साठवें घर में प्रवेष कर चुकी थी। पत्नी साथ जीवन-मरन की प्रतिज्ञा दस वर्ष पुर्व ही तोड़ कर अपने दोनों कलेजे के टुकड़ों रश्मी और रिषभ के सिर से ममता की छाया और पति के जीवन से सभी रंगारंगी बटोर कर चुपचाप परलोक सिधारी थी। पत्नी की इस अचानक जुदाई से वह ऐसे बिखरे कि सिमटना मोहाल था। कालेज जाना तो दूर खाने-पीने तक की सुध न रहती। हाँ! उन्हें कुछ होश था तो बस बेटी रश्मी का,जो उम्र की रथ पर सवार दिन-ब-दिन जवानी की देहरी़ से क़रीब होती जारही थी। ख़ैर से वह अब अपने घर-बार की हो गई है और दो बच्चों की माँ भी बन चुकी है। रिषभ कमप्यिुटर इन्जिनियर है और एक निजी कम्पनी में मुलाज़िम है। प्रोफेसर ख़ुद आगमी वर्ष स्वैच्छिक सेवानिवृति प्राप्त कर जीवन के शेष दिन शान्ति से सुख भोग रहे हैं।

इधर लगातार कई दिनों से वह शान्ति का दर्शन पा न सके थे। दरस की प्यास शदीद और इन्तज़ार जब आँख का काँटा बन गया तो सीधे उसके घर जा पहुँचे। पता चला वह गत दस दिनों से मलेरिया से पीड़ित है। ख़ैर अब कुछ राहत है लेकिन दुर्बलता ऐसी कि उठना बैठना मोहाल। वह जैसे ही उसके बेडरूम में प्रवेष किए,उन्हें देखते ही शान्ति की निराश आँखें चमक उठीं और बीमार मुर्झाया चेहरा खिल गया। मारे ख़ुशी के उठ बैठने का जी करने लगा,किन्तु उस में इतनी क्षमता कहां थी। परन्तु उसने अपनी दृष्टि कुछ इस अन्दाज़ से उन पर केंद्रित कर दिया मानो वह स्वयं को सहारा देकर उठाने हेतु उनसे चिरोरी कर रही हो। इस बीच वह उसकी नाड़ी देखने के लिए उस पर झुके थे कि उसने झट उन पर गलबहयाँ डाल दीं और अपने तपत-सुलगते अधरों को उनके होटों में धंसा दिया। फिर उसके अधर उनके होटों से इस भांति बातें करने लगे मानो बेताबियों की सारी दास्तान कह सुनाना चाहते हों। उसकी इस अनुचित व्यवहार से वह लज्जित हो उठे और खुद को उसकी पकड़ से छुड़ाते हुए बुदबुदाए। ‘‘शान्ति प्लीज़,मौक़ा की नज़ाकत को समझो‘‘

‘‘समझ रही हूं सर,मम्मी की उपस्थिति हमारे बीच दीवार बनी हुई है। मैं तो ईश्वर से प्रार्थना कर रही हूं कि वह थोड़ी देर के लिए ही सही किसी काम से बाहर चली जाएँ और हम एकदूसरे में......!‘‘

शान्ति की पकड़ से छुट कर वह सोफे पर बैठे ही थे कि मिसेज़ शर्मा चाय नमकीन की सेनी लिए कमरे में आ धमकीं। प्रोफेसर का जी धक से हो गया और चेहरे पर हवाईयाँ उड़ने लगीं। वह सोचने लगे कि यदि मिसेज़ शर्मा कुछ पल पहले आ जातीं तो.......? हालांकि मिसेज़ शर्मा उन की इस अवस्था से कतई अन्जान थीं। बहरहाल,चाय की चुसकियों के दौरान औपचारिक बातें होने लगीं। फिर मिसेज़ शर्मा अपने घराने और शान्ति से संबंधित बातों की गठरी खोल बैठीं। बातों ही बातों में उसके ब्याह का चर्चा छेड़ दिया। कहने लगीं ‘‘प्रोफेसर साहब,हम पिछले तीन महिनों से शान्ति के लिए वर खोज रहे हैं,पर! अच्छे लड़कों का तो जैसे काल मालूम होता है,याकि हमारे संबंध ही ऐसे लोगों से नहीं हैं। आप सामाजिक व्यक्ति हैं,अच्छे बुरे लोगों के संपर्क में रहते हैं,देखिये न कोई मुनासिब लड़का हमारी शान्ति के लिए।‘‘

इससे पहले कि वह इस संदर्भ में कुछ कहते,शान्ति झट बोल पड़ी थी।

‘‘सर,अपनी ही कालोनी में देखियेगा,ताकि शादी के बाद भी मैं आप से क़रीब रहूँ।‘‘

उस रात प्रोफेसर सो नहीं सके थे। नींद की देवी जब भी उन पर मेहरबान होने को होती शान्ति का कहा उनके मस्तिष्क में गूँजने लगता और वह चौंक के उठ बैठते। इसी उधेड़बुन में रात का कई पहर बीत गया। शायद अंतिम पहर में सोचों की उँगली थामे धीरे-धीरे फ्लेशबैक में चले गए।

होटल मेघदूत के आलिशान कमरे में डन्लप के नर्म व गुदाज़ बिस्तर पर शान्ति वस्त्रहीन अवस्था में उनकी बाँहों में सिमटी भावनात्मक स्वर में कह रही है। ‘‘जी तो चाहता है सर,जवानी की सभी घड़ियाँ आप की बाँहों में बिताऊँ। आप ऐसे ही मेरे आवेश के तारों को छेड़ते रहें। और मैं....मैं आप की मर्दानगी से आनंदित होती  रहूँ।‘‘

उसका यह वाक्य जैसे ही उनके कानों से टकराया,नसों-नाड़ियों में एक अन्जानी सी लहर दौड़ गई। दिल की धड़कनें बे-रब्त होने लगीं। परन्तु उन्होंने अपनी इस दशा को उस पर प्रकट होने नहीं दिया। बल्कि उसके रेश्मी बालों से खेलते हुए गंभीर स्वर में पूछा। ‘‘शान्ति,तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि हम जो कर रहे हैं यह पाप है ?‘‘

‘‘ऊँ हुं‘‘ उसने सिर हिला कर नकार दिया।

‘‘क्यों ?‘‘

‘‘क्योंकि सेक्स नेचर की देन है। शास्त्रों ने तो इसे स्वर्गिक आनन्द कहा है। संभोग करने वाले चाहे कितना ही गैरतमंद और होशमंद हों इस दौरान संतुष्टि की यात्रा पर होते हैं। उनकी यह यात्रा उन्हें भक्ति की ओर लेजाती है। बताईये ऐसे में पाप की कल्पना कहाँ रह जाती है ? वैसे भी सर,मेरे अपने दृष्टिकोण के अनुसाऱ यह केवल हमारी शारीरिक ज़रूरत है। आप मर्द हैं......आप को मेरी जवानी चाहिए। मैं औरत हूं........मुझे आप की मर्दानगी की तलब है।‘‘

‘‘Oh my sweet heart ‘‘ उसके इस फलस्फा पर वह चहक उठे थे,साथ ही उनके होंट उसके अधरो पर झुकते चले गये और आवारा छुवन,यौवन की उँचाईयों पर उन्मादित होता गया। वह इस अचानक हल्ले के लिए तैयार न थी,फिर भी उनकी छुवन के वाद्य यन्त्र ने उसके शरीर के कसे हुए तारों को झंझना दिया और उसका कोमल शरीर उनकी बाँहों के घेरे में फड़फड़ाने लगा था। उनका यह कामुक हल्ला इतना तीव्र......इतना वहशियाना था कि शरीर का पोर-पोर उधेड़े दे रहा था। बसकि वह जीत की धुन में उसके शरीर की सरहदों को पार करते चले जारहे थे,पल भर दम लेने को भी न ठहरे,जब तक अपनी जीत का पताका उसकी संतुष्टि के अटारी पर न लहरा दिया। वह भी आत्मसमर्पण की दशा में अपने शरीर को ऐसे ढीला छोड़ दी थी मानो स्वयं को पराजित मान ली हो। चार छः मिनट दोनों ऐसे ही बिस्तर पर उधड़े-उधड़े बिखरे-बिखरे से रहे। फिर किसी तरह शान्ति ख़ुद को बटोरते समेटते हुए फुसफुसाई। ‘‘सर‘‘

‘‘ऊँ‘‘

‘‘आप लिपटन टायगर चाय का इस्तेमाल करते हैं ?‘‘

‘‘क्यों ?‘‘

‘‘क्योंकि आप की मर्दानगी टायगर की तरह दम से दहाड़ती मालूम होती है। यकिन जानिए मेरा कलेजा काँप उठता है।‘‘

‘‘आखि़र ऐसा क्या है मुझ में ?‘‘

‘‘बहुत कुछ है......इस उम्र में भी आप में नवयुवकों से कहीं ज़्यादा मर्दानगी का जोश है।‘‘

‘‘नवयुवकों से ज़्यादा मर्दानगी से क्या मुराद ? जबकि मर्दानगी ही नवयुवकता का एक रूप है।‘‘

‘‘यदि यह सत्य है तो एसी मर्दानगी गैस के खाली सिलिन्डर की भांति है।‘‘

‘‘क्या ??‘‘ प्रोफेसर पूर्ण रुप से प्रश्न बन गये।

‘‘हाँ सर.....मुझे तो अपने हमजोलियों से कहीं अधिक तृप्ति आप से मिलती है।‘‘

‘‘ ले...ले...लेकिन.....लेकिन तुम यह कैसे कह सकती हो ?‘‘ उनके स्वर में बौखलाहट आगई थी।

‘‘आज़माया है मैं ने....... एक दो को नहीं,दसियों कों‘‘

‘‘यानी.......यानी कि तुम उनके साथ..........!‘‘

‘‘Oh Yes.....शायद पहले भी आप से कह चुकी हूँ कि मेरे निकट ज़िन्दगी मौत का Ignore किया हुआ एक पल है। तो क्यों न मैं इस पल को अधिक से अधिक भोगूँ।

प्रोफेसर चौंक उठते हैं और फ्लेश ब्रेक हो जाता है। वह फटी-फटी आँखों से शून्य में घूरने लगते हैं और धीरे-धीरे शून्य सिनेमा के परदे में परिवर्तित हो जाता है। फिर उस पर क्लोज़ शाट में शान्ति की छाया उभरती है। वह निर्वस्त्र चारों खाने चित पड़ी है और उसके शरीर से आग की लपटें उठ रही होती हैं। दृश्यZoom back होता है और Foreground में दुल्हा दुलहन दिखाई पड़ते हैं जो Slow motion में शान्ति के शरीर से उठने वाली आग की लपटों के गिर्द फेरे ले रहे होते हैं। जैसे-जैसे उनके फेरे की गिनती बढ़ती है उनके चहरे बदलने लगते हैं। अंतिम फेरे पर दुल्हन शान्ति का......दुल्हा प्रोफेसर का रूप धारण कर लेता है। इसी पल प्रोफेसर की बेटी रश्मि अपने दोनों नन्हें मुन्नों की उँगली थामे शान्ति के रूबरू आ खड़ी होती है,और उनका यह सुन्दर सपना इस तरह ग़ायब हो जाता है जैसे बिजली गुल होने पर टेलीविज़न स्क्रीन से चित्र।

सुबह होते ही प्रोफेसर बिना सोचे समझे शान्ति के घर जा पहुँचते हैं। डोर बेल की आवाज़ पर मिसेज़ शर्मा आँखें मीजती हुई दरवाज़ा खोलती हैं और अपने समक्ष प्रोफेसर को देख सिर से पाँव तक आश्चर्य में डूब जाती हैं। ‘‘प्रोफेसर साहब आप!‘‘

वह चुपचाप निढ़ाल क़दमों से अन्दर आते हैं और ख़ुद को सोफे पर गिराते हुए पुछते हैं।

‘‘शर्मा जी कहाँ हैं ?‘‘

‘‘वह तो सो रहे हैं‘‘ कहते हुए मिसेज शर्मा उनकी आँखों में झाँकती हैं। ‘‘अरे! आप की आँखें.....लगता है सारी रात आप जागते रहे हैं।‘‘

‘‘हाँ.....रात शान्ति के ब्याह को लेकर उलझा रहा.....आपने कहा था न,कि मैं उसके लिए लड़का देखूं ?‘‘

‘‘तो देखा आपने ?‘‘ मिसेज़ शर्मा जानने के लिए उत्सुक हो जाती हैं। ‘‘कौन है ? करता क्या है ? मिन्स प्रोफेश्न.......फैमली बैकग्राउन्ड क्या है ?(बैडरूम की ओर देख कर) अजी सुनते हो,उठो जल्दी.....देखो प्रोफेसर साहब आए हैं,हमारी शान्ति के लिए लड़का देख रखा है इन्होंने (प्रोफेसर की ओर घूम कर) सच! कितना ध्यान करते हैं आप हमारी शान्ति का,आप.....आप बहुत ही महान हैं।‘‘

‘‘महान नहीं,भगवान हैं भगवान‘‘ शर्मा जी निद्रासी आवाज़ में कहते हुए आते हैं।

‘‘भगवान तो आप हैं शर्मा जी,एक लक्ष्मी स्वरूप कन्या के पिता जो हैं। यदि आप दोनों पति-पत्नी को आपत्तिन हो तो मैं शान्ति को अपने घर.......मतलब कि....मेरे बेटे को तो आप लोग जानते ही हैं,और...‘‘

‘‘बस-बस,इस से बढ़ कर ख़ुशी और क्या हो सकती है हमारे लिए।‘‘ शर्मा और मिसेज़ शर्मा दोनों हर्ष व उल्लास से झूमने लगे। ‘‘हमारी शान्ति आप के घर जायेगी तो हमें ऐसा आभास होगा जैसे अपने ही घर में है,हमारे साथ।‘‘

फिर क्या था,आनन फानन में लग्न की शुभ तिथि निकाली गई और बड़ी ही धूमधाम से शान्ति प्रोफेसर के बेटे रिषभ से ब्याह दी गई। वह प्रोफेसर के घर आकर बहुत ख़ुश थी। रिषभ भी शान्ति जैसी उत्साही जीवन-साथी पा कर फूले न समाता था,इसी कारण ब्याह के दूसरे ही दिन अपनी दिल वाली दुल्हनिया को लेकर हनीमून मनाने महाबलेश्वर चला गया। प्रोफेसर चाहते हुए भी उसे रोक न सके,और भीतर ही भीतर ऐँठ कर रह गए। ख़ैर दिन तो जैसे तैसे कट गया,परन्तु रात काटे न कटती थी। वह जैसे ही आँखें मूँदते उन्हें रिषभ और शान्ति का वजूद तृण मणि की भाँति आपस में ऐसे लिपटा दिखाई देता मानो दोनों एकदूसरे में समा जाना चाहते हों। ऐसे में उन्हें शान्ति बे-वफ़ा महबूबा और रिषभ अपना प्रतिद्वंद्वी मालूम होने लगता। रह-रह के उन्हें ऐसा भी महसूस होता कि रिषभ की मर्दानगी का उन्माद शान्ति के यौवन की दीवानगी से पराजित तथा उसके आवेश की उपेक्षाओं को तृप्ति करने में असफल होता जारहा है।

रिषभ और शान्ति को हनीमून पर गए तीन दिन बीत चुके थे। इस बीच प्रोफेसर की हालत पतली हो गई थी। घर में होते तो हवास पर शान्ति का मादक यौवन छाया रहता अथवा अपने ही बेटे की प्रतिद्वंद्वीता में चुपके-चुपके सुलगते रहते। उन्हें यह तक ख़्याल न आता कि अब उनके और शान्ति के बीच पवित्र रिश्ते की दीवार खड़ी कर दी गई है। रिषभ के संग गठबँधन उसे प्रेमिका से पुत्रवधू बना दिया है। पुत्रवधू यानी बेटी। वह अपनी इस चूक पर बस हाथ मलते थे। उनकी आवेगशीलता भीतर ही भीतर उन्हें छल रही थीं,कभी रिषभ का वजूद साँप बन कर डसने लगता,इस साँप के काटे का मँत्र वह कहाँ जानते थे। इन्हीं दिनों उनका एक स्टुडन्ट किसी काम के चलते उनसे मिलने आया। इधर-उधर की बातों के दौरान उसने बताया कि B.com के बाद वह एक Man Power consultancy में Accountant के तौर पर काम कर रहा है। फिर वह प्रोफेसर के पुछने पर विस्तार से उस फर्म के काम करने के तरीक़े पर प्रकाश डालता रहा। उस रात उन्हें काफी सुकून तथा बहके ख़्यालात में ठहराव का अहसास हुआ। ऐसा महसूस होने लगा जैसे उस स्टुडन्ट की मुलाक़ात ने उन्हें साँप के काटे का मँत्र सिखा दिया हो।

रिषभ और शान्ति पूरे बीस दिनों बाद हनीमून से लौटे थे। रिषभ शान्ति का साथ पाकर बेहद ख़ुश और खिला-खिला सा दिखाई दे रहा था। देखने में तो शान्ति भी ख़ुश थी परन्तु आँखों से ख़ुशियों की चमक ग़ायब और मुख पर शोभा का अभाव था। प्रोफेसर की अनुभवी दृष्टि ने सब कुछ पलक झपकते ही ताड़ लिया था और वह चिंता की असीम गहराईयों में डूब गए थे।

अगले दिन नाश्ते के बाद रिषभ को अपने कमरे में बुलवाया और दुनियादारी,ज़माने की ऊँच-नीच का पाठ पढ़ाते हुए कहा।

‘‘बेटा,अब तक तुम केवल अपनी ज़िन्दगी के जिम्मेदार थे। परन्तु अब एक और ज़िन्दगी तुम से जुड़ चुकी है। यानी कि तुम एक से दो हो चुके हो,आने वाले दिनों में तीन फिर चार हो जाओगे। ज़रूरतों और खर्चों में बढ़ोतरी स्वभाविक है। जबकि आमदनी वही होगी जो तुम Salary पाते हो। इसलिए मैंने तुम्हारे सुनहरी भविष्य के लिए,तुम्हारी मरज़ी जाने बिना मौजूदा नौकरी से बढ़िया और चार गुना अधिक वेतन वाली नौकरी का जुगाड़ कर दिया है।‘‘

इस बीच उनकी दृष्टि रिषभ के पीछे खड़ी शान्ति पर जमी थी। उसकी आँखों के सागर में प्रसन्नता की लहरें और अधरों पर कामुक मुस्कान रेंग रही थी। उसके इस भाव से आनंदित होते हुए मेज़ की दराज़ से एक लिफाफा निकाला और उसे शान्ति की ओर बढ़ाते हुए कहा।

‘‘शान्ति,यह मेरी ओर से तुम्हारे लिए एक साधारण सी भेंट है।‘‘

‘‘Thanks‘‘ वह एक अनभिज्ञ भावना में बहती बुदबुदाई।

‘‘यदि अब तुम इस साधारण भेंट को अपने शुभ हाथों से रिषभ को देदो तो यकिनन यह भेंट असाधारण हो जायेगा।‘‘

वह उनकी इच्छा भाँप गई और एक अदा से लजाती,इठलाती लिफाफा रिषभ की ओर बढ़ा दी। रिषभ को उसकी इस अदा पर बे-अख़तियार प्यार उमड़ आया। वह उसे चाहत भरी दृष्टि से देखते हुए लिफाफा थाम कर। ‘‘Thanks a lot honey‘‘ फुसफुसाते हुए बोला,साथ ही दृष्टि लिफाफे पर थिरकने लगी। मोटे अक्षरों में लिखा था। ‘‘With best compliments from Shanti Khurana‘‘

नीचे कोष्टक में लिखा था। (Appointment letter, Passport, Visa & Air Ticket)यह पढ़ते ही दृष्टि की थिरकन उसके हाथ में प्रविष्ट हो गई और लिफाफा थर-थर काँपने लगा।

थाणे, मो. 09224799971/09930211461